Tuesday, 31 December 2013

नए शब्द
नहीं रचे जाते,
नए सिरे से
नई तारीखों में
शब्दों से
रचते हैं हम नए अर्थ  |

Monday, 30 December 2013

अब नहीं
आयेगा कोई कृष्ण
धर्म से पैदा होती है
जो निर्मम और आतंकी  प्रवृति
उसपर तुम्हें ही कसनी होगी नकेल 
गुजर गया
एक बरस और,
वह कभी हारता है नहीं
जो करता है कोशिश एकबार और,
हर बरस की तरह 
नववर्ष २०१४ के लिए 
शुभकामनाएँ देनें की
औपचारिकता एक बार और |

Sunday, 29 December 2013

जिसके घुंघराले बालों की
तारीफ़ करते हुए
हम नहीं अघाते थे
वह विग लगाकर चलता था
वास्तव में वह गंजा था |
कड़ी धूप में हमें छाया देगा
वह जिसे हम
छतरी समझते थे
वास्तव में
वह गिद्ध का निर्मम पंजा था  |

Saturday, 28 December 2013

अपने सपनों के बारे में
तुम्हारे ज़ेहन में जो शंकाएं हैं
अगर उनपर भरोसा करोगे
तो अपने सपनों में
तुम रंग कैसे भरोगे  ?
काँटों भरी है "आप" की राह
"आप"राह से भटकनें न पाएँ
काँटें "आप" को चुभने न पाएँ 
"आप" को मेरी शुभकामनाएँ |
जो ओस की बूँद 
पत्तियों के शिखर पर होती है 
सबसे पहले गिरती है 
धरती पर ख़ाक होनें के लिए
झाड़ू से पहले जगती है
वह
जो झाड़ू उठाती है
झाड़ू खुद नहीं उठती
झाड़ू को वह जगाती है
हाथों के श्रम को
झाड़ू का श्रम बताते हुए
तुम्हें शर्म नहीं आती है |
छतपर ,
इकठ्ठा हो गया है कूड़ा बहुत
उसमें कुछ है सहेजने लायक
कुछ है फेकनें लायक |
कूड़ा कोई भी हो
सहेजने लायक नहीं होता
कितनी भी स्वादिष्ट हो मिठाई
कुछ दिनों बाद सड़ जाती है
कितनी ही ठंडी जगह में रक्खो
सुबह का बना खाना
शाम को
अपना स्वाद खो देता है  | 

Wednesday, 25 December 2013

जिन्हें उसनें किया प्यार
उनपर भरोसा भी किया
उन सभी नें उसको धोखा दिया  |
शायद इसीलिए
उसनें मुझे प्यार तो ढेर किया
लेकिन भरोसा
तनिक भी नहीं किया  |
अक्सर मेरे ज़ेहन में
यह प्रश्न उठता है
क्या उसनें मुझे प्यार किया ?

Monday, 23 December 2013

पत्थर पर उगे पेड़
और उन पेड़ों पर
मुस्कराते हुए फूल
कितनी भी सख्त हो जमीन
पेड़ों के उगने और फूलों के खिलनें की
अनगिनित सम्भावनाएं गर्भ में समेटे हुए |

Sunday, 22 December 2013

स्त्री आमंत्रण दे और पुरुष अस्वीकार कर दे ,ऐसे वीर बालक क्या कहीं हैं ? और ऐसी स्त्री का सानिध्य जो आपको बरसों से अपना मित्र मानती हो ,ऐसी स्त्री का आमंत्रण आप कैसे अस्वीकार कर सकते हैं लेकिन वही स्त्री जब इसे बलात्कार कहती है तो त्रियाचरित्र  का मतलब समझ में आ जाता है और जब आपके अधिकाँश मित्र एवं सहयोगी उस महिला के झूठ में उसके साथ खड़े हुए दिखाई देते हैं तो आत्महत्या करने  के अतिरिक्त कुछ बचता है क्या ?
खुर्शीद भाई तुम्हें सच को स्वीकार कर लेना था,उनका झूठ स्वतः बेपर्दा हो जाता  |    

Saturday, 21 December 2013

तुम आगे
मैं तुम्हारे पीछे
एक ही दिशा में
लगातार चलते रहे
हमारे बीच
फासला बढ़ता रहा
पता ही नहीं चला
एक दूसरे की निगाह से
कब ओझल हो गए  ?

Friday, 20 December 2013


आपका समर्थन करने वालों में ,आपके साथ खड़े होने वालों में हमेशा पुरुषों की संख्या ही ज्यादा देखनें को मिली है | क्या इन पुरुषों के द्वारा आपको दिए समर्थन में कोई दुराग्रह दिखता है ? मर्द जिस भाषा में आपस में बात करते हैं ,उस भाषा में स्त्रियों से बातें नहीं करते | मर्द और स्त्री होनें का बोध ,क्या कभी इस बोध के मिटनें की सम्भावना है ? जब तक यह स्त्री और पुरुष होने का बोध है , दोगलापन इसी बोध का पर्यायवाची है |

अगर स्त्रियाँ ही हैं जिन्होंने पुरुष प्रजाति को इंसान बना रखा है तो यह जानवर किस ग्रह से आते हैं मित्र ?
इंसानों को स्त्री और पुरुष में बांटकर ,स्त्रियों के साथ अन्याय करनें में पुरुषों को सुविधा होती है  |

कुछ पुरुषों की कमजोरी होती है कि वे पुरुष प्रधान बरसों पुरानी व्यवस्था की खिलाफत नहीं कर पाते हैं और कुछ लोग इसकी खिलाफत मात्र इसलिए करते हैं ताकि  रायशुमारी के समय उनका नाम प्रगतिशीलों  में लिखा जा सके  | महिलाएँ इस बारे में क्या सोचती हैं ?पुरूषों को अपनी राय देने का कोई निषेध नहीं है|     

Thursday, 19 December 2013

खुर्शीद भाई की मौत पर ==

हर बार की तरह
अब यादों के साथ
बलात्कार का सिलसिला होगा शुरू |
कुछ लोग मरनें वाले के पक्ष में
और कुछ लोग विरोध में पंक्तिबद्ध होंगे
कुछ जोड़ी आँखें नम होंगी
और कुछ लोग
मरनें वाले को गाली देनें पर
कुटिल मुस्कराहट के साथ कहेंगे
क्या बात कही गुरु |
किसी की मृत्यु पर
उससे जुड़ी यादों के साथ
बलात्कार का सिलसिला
क्यों होता है शुरू ?
किसी की मृत्यु पर
उससे जुड़ी यादों के साथ
बलात्कार का सिलसिला
क्यों होता है शुरू ?

Wednesday, 18 December 2013

बूँद से
प्यास नहीं बुझी तो
वह
सागर की ओर चला
सागर उसे निगल गया |
अब तो 
अपनी परछाईं से भी 
डर लगता है |
खुद पर भरोसा है लेकिन 
परछाईं के किसी गुनाह में 
शामिल होने की खबर नहीं 
आपको है क्या ?

Monday, 16 December 2013

अपनी चीख के सिवा 
कोई नहीं सुनता किसी की चीख |
जैसे चाहे
वैसा उपयोग करनें के लिए
उसे सौंप दी पूरी देह
उसने उस देह में चुना
मात्र कुछ विशेष  |
कुछ दिन बाद
जब नहीं रहा उसके लिए
उस विशेष का महत्व
उसनें शुरू किया
देह को कपड़े पहनाना
और कपड़ों में लगी जेब तलाशना |

Friday, 13 December 2013

गयी भैंस पानी में 
नहीं मालूम था 
"आप" की मौत होगी जवानी में |
मरनें से पहले ही 
"आप" को तो डूब जाना चाहिए 
चुल्लू भर पानी में  |

Tuesday, 10 December 2013

पहली मुलाक़ात में ही उसकी नज़रों ने भरोसा जताया था,
भरोसा बांधता क्यों है ?
क्या इसी भरोसे को प्यार कहते हैं ?
काश,हर रिश्ते की नींव में भरोसा होता
पहली मुलाक़ात में ही
उसने इस भरोसे को परोसा होता,काश |   
बर्फ सी जमी है दिमाग में  |
दिल में लगी आग भी
पिघला नहीं पाती इस बर्फ को |
बुझा नहीं पाती दिल की आग को
दिमाग पर जमी बर्फ भी |

Monday, 9 December 2013

यह कोई मामूली घाव नहीं है
बिलबिलाने लगे हैं कीड़े,
जिसका डर था
वही हुआ आखिर
धर्म कोढ़ हो गया
जिंदगी के रास्ते में
अंधा मोड़ हो गया |

Saturday, 7 December 2013

हम बुद्धिजीवी हैं
खतरे उठाने से डरते हैं
इसीलिए
तलवार की जगह
कलम हाथ में लेकर
शोषितों का
मसीहा बननें की जुगत में लगे हैं |
यह जो सम्बन्ध बरसो-बरस निभ जाते हैं यह उन ढेरों मुखौटों के कारण ही सम्भव हो पाता है जिन्हे हम समय और परिस्थिति के अनुसार अपनें चेहरे पर बदल बदल कर चढ़ाते हैं | पारदर्शिता सम्बन्धों के टिकाऊ होने की गारंटी नहीं देती जबकि मुखौटे चढ़ाइए और सम्बन्धों के उम्रभर निभनें की गारंटी पाईये  |  

Tuesday, 3 December 2013

पहली बार प्यार
प्यार लगता है
पुनरावृति से नहीं होती
तृप्ति
हर बार नया हो कैसे प्यार ?

Sunday, 1 December 2013

फ्लॉप हो चुके शो की चर्चा क्यों करते है भाई | 
रहनुमा समझा था जिन्हें, निकले सब कसाई ||
किसी के व्यक्तित्व की पहचान उसके द्वारा दिए गए प्रश्नोत्तरों के आधार पर कभी मत करना, उत्तर तो रटे भी जा सकते हैं | जिसकी पहचान करनी हो उससे कहिये प्रश्न रखने को , किसी भी व्यक्ति के दिमाग़   में उठने वाले प्रश्न उसकी पहचान करने में आपका सही मार्गदर्शन कर सकते हैं | भोथरा व्यक्ति होगा तो उसके प्रश्न भी भोथरे होंगे | 
आस्तिकों और नास्तिकों
दोनों की दुकाने
जिसकी वजह से चल रही हैं
वह खुद नहीं जानता
आस्तिक और नास्तिक होने का अर्थ
हम यहाँ लड़ रहे हैं व्यर्थ  |
उसके होने को सच मानों
या उसके न होनें को सच मानों
यह दुनियाँ है इंसानों की इस सच को जानों |

Friday, 29 November 2013

पहली बार प्यार
तृप्ति है
पुनरावृति से नहीं होती
इच्छापूर्ति
हर बार नया हो कैसे प्यार ?

Wednesday, 27 November 2013

कभी खेलता था खिलौनों से 
फिर बना खिलौना 
खेलते रहे लोग
तोड़ते रहे 
काश,
हमारे निभाने से निभ जाते रिश्ते
अक्सर
रिश्तों के टूटनें के साथ ही हम टूट जाते हैं
फिर भी रिश्तों को बचा पाना हमारे बस में नहीं होता
उतना आसान भी नहीं है
रिश्तों को निभाना और उन्हें टूटनें से बचाना , है क्या ?
हमारी कोशिश होनी चाहिए कि कविता बची रहे  |

Monday, 25 November 2013

प्रेम,
एक झूठ
जब जिसको होता है
उसको सच जैसा लगता है
सच बदलता है,
हर क्षण बदलता है सच
जो सच तुम्हें अंधा बना दे
वह झूठ के ज्यादा निकट होता है |

Sunday, 24 November 2013

आत्महत्या करने से कोई किसी को रोक नहीं सकता | कामयाब होने पर कोई गुनाह नहीं बनता आत्महत्या के आरोप से बरी कर दिया जाता है,नाकामयाब होनेपर ही सजा का प्रावधान है | 
कुछ नहीं बदला 
न मैं, न तुम 
हाँ का मतलब तो हाँ होता ही है
न का मतलब भी हाँ होता है 
औरत के सन्दर्भ में 
इस सीख को उसनें अंतिम मान लिया 
तो क्या गुनाह किया ?
स्त्री के लिए कुछ बदला हो शायद 
पुरुष के लिए तो कुछ नहीं बदला |

Saturday, 23 November 2013

भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
भीड़ चलती है भेड़ चाल
दंगा हो या हो बलात्कार
भरपूर लुफ्त उठाती है
सस्ते मनोरंजन की खोज में
यहाँ से वहाँ
वहाँ से यहाँ  भटकती है
भीड़ लक्षहीन होती है  |
दुनियाँ की जितनी जनसंख्या है
उतनी ही संख्या है सपनों की
सबके पास उनका अपना एक सपना है
उन सबके सपनों की अपनी एक कहानी है
दुनियाँ का सारा साहित्य
शब्दों से गढ़ी गई इमारत है
जिसमें दफ्न है उनके सपनों की कहानी |
कुछ लोग
आज भी व्यस्त हैं उनके सपनों को जानने में
और कुछ उनके सपनों को चुराने की कोशिश में  |
दंगो की आड़ में बलात्कार,
ऒफ़ यह सब कितना वीभत्स है
यह सब उसी समाज में हो रहा है
जिस समाज के
हम सब सम्मानित सदस्य कहलाते नहीं अघाते
लानत है ऐसे साहित्य और साहित्यकारों को
जो समाज को चित्रित करने के दम्भ से भरे हैं
और आज भी सिर के बल खड़े हैं |  
सच बदलता है,
हर क्षण बदलता है सच
जो सच तुम्हें अंधा बना दे
वह झूट के ज्यादा निकट होता है |
तुम्हारे हर झूट पर भरोसा किया
और मेरा हर सच तुम्हें झूट लगा

Tuesday, 19 November 2013

विचारधारा
देशी या विदेशी नहीं होती
बादलों पर किसी का बस नहीं होता ,
पूरा आकाश उनका है
और पूरी धरती उनकी है  ,
जहाँ चाहें बरसे ,जहाँ चाहें दें छाया ,
परकाया में प्रवेश का हुनर उनके पास है
धरती और आकाश के बीच
पक्षियों की उड़ान पर अंकुश ?
पक्षी नहीं उड़ते आकाश में निर्धारित पथ पर |
जो दलित
अरबपति हो जाता है
आसमान पर चढ़ जाता है
वह अपने आप को
दलित कहाँ मानता है ?
दलितों को वह
सवर्णों की तरह ही दुत्कारता है |

Monday, 18 November 2013

सस्ते में बिकता था
आंसुओं में भी इसका स्वाद
मुफ्त में मिलता था
पितर विसर्जन के लिए
जबसे "गया" गया  
नमक भी बेख़ौफ़ हो गया  |
वह हर रोज
सुबह सुबह आती है
बारात के साथ
रसोईं में घुस जाती है
और जूठे बरतनों में तलाशती है भोजन
जो रात में
खाया नहीं गया उन पुण्यात्माओं द्वारा
गाय को
जूठन खिलाकर पुण्य कमाने की अभिलाषा
और गाय को माता कहकर
दान कर देने का अहंकार
कन्यादान करने के अहंकार से कमतर नहीं है
हर रोज
जो सुबह सुबह आती है रसोईं में
उसके लिए किसी भी रसोईं में भोजन नहीं है    
तुम्हारे
बहुत करीब है
इसीलिए तुम्हें नहीं दिखती
जो ढूँढता है
"कविता" उसे नहीं मिलती 

Sunday, 17 November 2013

घना अँधियारा देखकर
नन्हें दीप की
जलने की इच्छा जागी
अन्धेरा
नन्हे दीप का दुश्मन हो गया
और सूरज
अँधेरे के साथ  हो गया   |

Saturday, 16 November 2013

जब यह सुनिश्चित हो जाता है कि किसी व्यक्ति विशेष की पहचान करने से हमारी पहचान भी बनती है तभी बहुत से लोग उस व्यक्ति विशेष की पहचान करने के लिए आगे आते हैं  | मुक्तिबोध के समकालीनों ने उनकी पहचान करने में कोताही की, आखिर क्यों ? 
मुझे अभी अभी लगा कि
मैं सोता ही रहा
कभी जगा ही नहीं |
उनको पाने के बाद भी
मैं रोता ही रहा
कभी हँसा ही नहीं  |
कौन कह सकता है कि
वह किसी जाल में कभी फंसा ही नहीं ?
जागना-सोना,पाना-खोना
और रोना-हंसना
यही तो जिंदगी है  |
जाल में फंस तो गए हैं
बस अब मुक्त होना है  |
न तो कोई विचार है 
और न मान्यताएं
केवल सन्नाटा है | 
सन्नाटा जब चीखता है 
दहलाता है , 
भीड़ में 
वह डर जाता है
इसीलिए 
न वह किसी के पास जाता है 
और न कोई उसके पास आता है |
वह पथराया सा खड़ा है 
खाली घड़ा है |

Thursday, 14 November 2013

उसने जब कहा था प्यार
उसे नहीं मालूम था कि
वह झूठ बोल रही है  |
उसने जब कहा था प्यार
उसे मालूम था कि
वह झूठ बोल रहा है  |
अनजाने में बोले गए झूठ को
क्या सच माना जा सकता है ?
वह इस झूठ की सजा पाती है
और वह
अपने झूठ पर इतराता है, मुस्कराता है 
उसने जब कहा था प्यार
उसे नहीं मालूम था कि
वह झूठ बोल रही है  |
उसने जब कहा था प्यार
उसे मालूम था कि
वह झूठ बोल रहा है  |
अनजाने में बोले गए झूठ को
क्या, सच माना जा सकता है ?
वह इस झूठ की सजा पाती है
और वह
अपने झूठ पर इतराता है, मुस्कराता है 
1. भारत में ही सर्वप्रथम वर्णव्यवस्था की  शरुआत हुई , जिसने भारत को दो हजार वर्षों तक गुलाम बनाने में मुख्य भूमिका निभायी.
2. भारत में ही सर्वप्रथम सतीप्रथा की  शरुआत हुई, जिसमे विधवा औरतों को जिन्दा जला दिया जाता था. इस प्रथा को ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार ने 1841 में कानून बनाकर बंद किया था.
3. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर छुआछूत की शरुआत हुई, जिसके द्वारा लाखों लोगों को अछूत बनाकर सभ्यता के प्रकाश से दूर रखा गया. 
4. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर गाय, बैलों और घोड़ों की बलि देने की प्रथा का आरम्भ हुआ. 
5. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर नरबलि की प्रथा का आरम्भ किया गया.
6. भारत में ही सर्वप्रथम दासप्रथा का भी आरम्भ हुआ.
7. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर निष्ठुर प्रथा गंगा-प्रवाह का आरम्भ हुआ था, जिसमे मनौती पूरी होने पर लोग अपनी पहली संतान को गंगा-सागर में छोड़ देते थे. इस क्रूर प्रथा को कम्पनी सरकार ने 1835 में कानून बनाकर बंद किया था.
8. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर चरक-पूजा का आरम्भ हुआ था, जिसमे मोक्ष के इच्छुक उपासक के मेरुदंड में दो लोहे के हुक धंसाकर उसे रस्सी के द्वारा चरखी के एक छोर से लटका देते थे और दूसरे छोर से उसे तब तक नचाते थे, जब तक उसके प्राण नहीं निकल जाते थे. इस प्रथा को ब्रिटिश सरकार ने 1863 में कानून द्वारा बंद किया था. 
9. भारत में ही सर्वप्रथम कर्मफल आधारित पुनर्जन्म के सिद्धांत का आरम्भ हुआ, जिसने गरीबों के शोषण का क्रूर तन्त्र विकसित किया. 
10. भारत में ही सर्वप्रथम सनातन धर्म के नाम पर एक ऐसे धर्म का आरम्भ हुआ, जिसमे समानता के लिए कोई जगह नहीं है.


उपरोक्त परिप्रेक्ष में क्या हम अपनी विरासत पर गर्व कर सकते हैं  ?

Wednesday, 13 November 2013

कौवों की कांव कांव में
मुश्किल हो जाता है, कोयल को सुनना
रंग-भेद ,जाति-भेद और धर्म-भेद का आधार
रंग और पैदाइश क्यों बना ?
कौवों नें जाल कुछ इस तरह बुना कि
सुरीली और नशीली आवाजें हो गयीं धुवाँ
बहुत मुश्किल है
कौवों की इस भीड़ में कोयल को ढूढ़ना  

Monday, 11 November 2013

आस्तिकता और नास्तिकता पर होने वाली तमाम बहसों को सुनने और पढ़ने पर ऐसा क्यों लगता है कि हम एक घेरे में गोल गोल घूम रहे हैं ,जहाँ से चलते हैं फिर घूम कर वहीँ वापस आ जाते हैं |जब बच्चे के पैदा होते ही उसके धर्म का निर्धारण हो जाता है अब इसमें बच्चे का क्या दोष ? क्या इस व्यवस्था से निजात सम्भव है ? ढेरों मूर्खता पूर्ण विधियों द्वारा इन बच्चों को हम हिन्दू ,मुसलमान औए ईसाई बनाते हैं | काश, इन बच्चों को चुनने की आजादी होती और धर्म के नाम पर इंसानियत के अलावा कोई और  विकल्प नहीं होता |

Sunday, 10 November 2013

सिर से पाँव तक
वे नंगे थे
लेकिन उनका नंगापन हमें दिखा नहीं
क्योकि हम उनके साथ
हम्माम में खड़े थे |
एक ही घर में
अनजानों की तरह रहने से बेहतर है
अलग-अलग मकानों में
परिचितों की तरह रहा जाए
रिश्तों में खुशबू खोना
एक दूसरे से अपरिचित होना
दुर्गन्ध फैलने से पहले
शव को शमशान पहुँचाना
एक सामाजिक जिम्मेदारी है
आईये शव-यात्रा में
खुशी-ख़ुशी शामिल हो जाईये   ।  

Saturday, 9 November 2013

अगर ईमानदारी से देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन एक दूसरे को अपराधी घोषित करने में ही व्यतीत हो जाता है | अपनी समस्त विफलताओं के लिए हम किसी न किसी को दोषी करार देते हैं | तुम्हारे चुप होने के बाद भी तुम्हारी आहट को सुन पाने का नाटक तब तक करती/ करता  रही/रहा  जब तक मेरे ह्रदय की धड़कनों में कोई दूसरा आकर नहीं बसा  | अनंतकाल से नाटक जारी है, आदमी की फितरत कभी नहीं हारी है |
मेरे अलिखित उपन्यास से    

Friday, 8 November 2013

औरत बच्चे को जनती  है
 और बच्चे के साथ ही
जन्म लेती है "माँ"
पिता जन्म नहीं लेता है
पिता बनना होता है
और पुरुष को
पिता बनने में वक्त लगता है |
मौत
अपना पता कहाँ देती है
आती है और आपको
आपके सपनों से
घसीट कर ले जाती है
मौत
आपको मोहलत  कहाँ देती है  ?

Wednesday, 6 November 2013

जिसके आने की
कोई उम्मीद ही न हो
उसका आना
अच्छा लगता है |
जिसे भूल गए थे
यह मानकर कि
वह हमें भूल गया है
हिचकियों के साथ उसकी याद आना
और फिर हिचकियों का बंद हो जाना
अच्छा लगता है | 
मेरे झूट पर यकीन करना
तुम्हारी मजबूरी थी
तुम्हारे झूट पर यकीन करना मेरी |
ख़ुशफहमियाँ जिंदगी को
आसान और सरल बना देती हैं
पहले क्यों नहीं था इसपर यकीन ? 

Monday, 4 November 2013

लड़का
जब प्यार करता है
तो वह केवल पुरुष होता है
लड़की जब प्यार करती है
तो वह होती है केवल स्त्री |
इसी स्त्री से
जन्मती है एक माँ

प्यार 
न पहले था 
न आज है 
हाँ ,
बहुत दिनों से 
तुम लड़ी नहीं   

Sunday, 3 November 2013

देखकर  
डरी सहमीं तितलियाँ
थम गयीं
आँखों की पुतलियाँ  
अल्फाजों से
जख्म बनते हैं
और नज्मों से हम
उन जख्मों पर मरहम लगाते हैं
सच पूछिए तो हम
न कुछ खोते हैं
और ना कुछ पाते हैं |
खोखले और दोगले
लोगों से भरी है
फिर भी
दुनियाँ रसभरी है |

उनका उद्योग
केवल विरोध
समर्थन किसका करते हैं
वे खुद भी नहीं जानते  ?
विकल्प की बात करो
तो बगलें झांकने लगते हैं  |
हालाकि वो अंजाना है 
लेकिन मुझे 
उसे पाना है 
एक अच्छी बात यह है कि
जितना पुराना मैं हूँ 
वह भी उतनी ही पुरानी है 
मेरी और उसकी पहचान 
बरसों बरस  पुरानी है |
विकल्प के नाम पर
राहुल का नाम
लेने से भी वे डरते  हैं  |
विकल्प कहाँ से लाएंगे
क्या विदेश से
आयात करके लायेंगे  
गरम गरम तवे पर
मेरे पैर पड़ गए
क्या गुनाह था हाथों का
क्यों हाथ जल गए ? 
सूरज शर्म से लाल हो गया
एक प्रश्न =
सूरज किस बात पर
शरमा गया
और क्यों लाल हो गया ?
सूरज जब लाल हुआ
अँधेरा कुछ और गहरा
और घना हुआ  | 

Saturday, 2 November 2013

शुभकामनाएँ फलित होती हैं
अगर इस बात का भरोसा होता
तो व्यक्ति
आईने के सामने खड़ा होकर
सारी शुभकामनाएँ खुद को ही दे देता  |

Thursday, 31 October 2013

सोचता हूँ
दीवाली पर शुभकामनाएं देने की
औपचारिकता निभा ही दूँ |
दीप जलाऊं या न जलाऊं
अँधेरा भाग जाये
आपके जीवन से
इसका ढोंग तो रचाऊं |

हम सब
एक दूसरे को
शुभकामनाएं देते हैं
और डरते भी हैं कि
कहीं शुभकामनाएं
फलीभूत न हो जायें |

Tuesday, 29 October 2013

बालों में पसर गयी चांदी
आँखों पर चढ़ गया चश्मा
इतने बरस बीत जाने के बाद भी
तुम सुन पाती हो अपनी चीख
तुम देख पाती हो अपने आंसू
तुम समझ पाती हो अपनी भूख
नमन तुम्हारे हौसले को
चारो ओर बहरे और अन्धें हैं
और मैं इनमें शामिल हूँ |

Monday, 28 October 2013

राजेंद्र यादव को श्रद्धांजलि
================
किसे नहीं सताया ?
सोते हुओं को
नींद से भी जगाया
और अब खुद सो गए
चिरनिद्रा में अकेले  |
अब तुम्हारे माथे पर
वे ढेरों मोर पंख जड़ेंगे
(मरने के बाद मोर पंख
जड़ने की परम्परा सभी निभाते हैं )
साहित्य के सिरमौर
साहित्य में सन्नाटा
असम्भव है क्षतिपूर्ति

और सबसे बड़ा प्रश्न होगा
"हंस" अब सफ़ेद कैसे दिखेगा ?  

Sunday, 27 October 2013

मेरे सपनों में
अब भी तुम आती हो
मेरे सपनों में
तुम क्यों आती हो ?

सपनों के रिश्ते भी
कितने अजीब होते हैं
जो दूर दूर तक
पास नहीं होते हैं
कितने करीब होते हैं |
पत्नी, पति से
पिता का प्यार चाहे
पति रात रात भर
भरता है आहें
कोई अगर जानता हो
तो बताए
पति इस रिश्ते को कैसे निभाए |

Saturday, 26 October 2013

काटने पर
रूलाता था प्याज
अब खरीदने पर  हैं रूलाता
मैं खुश हूँ कि
प्याज की तासीर तो नहीं बदली |
सन्नाटा जब चीखता है
दहलाता है
भीड़ में
वह डर जाता है
इसीलिए
न वह किसी के पास जाता है
और न कोई उसके पास आता है |  
पंख नहीं थे
हौसला  था तुम्हारे पास
इसीलिए भर सके
तुम ऊँची उड़ान

दूरभाष पर
सूचनाओं का आदान-प्रदान
ही केवल हो पाता
मिलो और दिल की बात सुनों

मेरे पास न पंख थे
न हौसला  था
उड़ न सका
जमीन पर रेंगता रहा
सच कहा तुमने
हसरत अभी बाकी है |

Tuesday, 22 October 2013

मेरा प्यार तुम तक
वाया किसी तीसरे के आया
तुम्हारा प्यार मुझ तक
धोबी-घाट पर धुलकर आया
इसीलिए तो
मेरे और तुम्हारे बीच
प्यार का रूप-रंग
इतना निखर पाया |

Friday, 18 October 2013

एक टूटे हुए
खिलौनें को
जोड़ तो दिया
मजबूती से खड़ा है
उसकी मुस्कराहट में
नहीं कोई गिला है
तुम्हें शिकायत है
खिलौनें में
जोड़ क्यों दिखता है ?
आईना मत दिखाओ
न "आप" को
न "खाप" को
आईना देखते ही
एक खूंखार
और दूसरा  
आदमखोर हो जाता है |

Thursday, 17 October 2013

अभी अभी
जो आदमी यहाँ खड़ा था
चला गया केंचुल छोड़कर
इंसान वह है नहीं
सांप कहा तो डस लेगा |
बाज़ार में
तैरनें लगा है प्रश्न
यह महोदय कौन हैं ?
न जाने क्यों
सब के सब मौन हैं |
पालते हैं
फिर काटते हैं
बच्चे जान गए हैं
परवरिश किये जाने का सच
बच्चे डरे हुए हैं

Tuesday, 15 October 2013

रावण है
अपराध बोध से मुक्त
उसे मालूम है कि
उसने सीता को नहीं छुआ
राम व्यस्त हैं
सीता की
शुचिता परखने में
और हम
रामराज्य का सपना देखनें में  
बापू का नाम
किया बदनाम बापू "आसाराम"
हे राम,हे राम,हे राम | 

===================


बापू,
तुम वापस आये भी
तो बनकर " आसाराम"
हे राम
हे राम
हे राम 

Saturday, 12 October 2013

जब तक
राम ज़िंदा हैं
रावण भी ज़िंदा रहेगा
रावण की जान
राम की नाभि में स्थित
अमृत-कलश में,
रावण नहीं होगा तो
राम को पूछेगा कौन ?
भटक गए हैं
और जिस
रास्ते पर खड़े हैं
वह रास्ता आगे है बंद
रास्ता खुलेगा
इस इंतज़ार में
सदियों से शमशान में खड़े हैं |
सारी उम्र
तुम मुझमें ज़िंदा रहीं
हर रोज
तुम्हें नहलाता धुलाता
करीनें से संवारता
और पूरा दिन
तुम्हारे साथ गुजर जाता
रात पालने में सुला देता |
तुम्हें अपने भीतर
पालते रहने की जिम्मेदारी ने
मुझे जीना सिखा दिया |    
प्यार और सवेंदनायें
केवल शब्द
क्यों हैं स्तब्ध ?

Thursday, 10 October 2013

तुम शुरुआत
मैं अंत
तुम गुरुग्रंथ
मैं संत

Wednesday, 9 October 2013

दूसरी परम्परा की अर्थी
कब तक ढोते रहोगे
दाह-संस्कार कर दो
तीसरी परम्परा का पौधा
अपनी जड़े जमा चुका है |
राम की अयोध्या में
दीप जल रहे थे
रावण की लंका
युद्ध की त्रासद स्तिथियों
भूख ,बीमारी और
राजनैतिक सन्नाटे को
झेलती रही बरसों-बरस 
राम ने सिखाया
युद्ध लड़ो खूब लड़ो
लेकिन अपनी जन्मभूमि से दूर
उनकी धरती पर लड़ो |
महाशक्तियां
अपनी धरती पर
नहीं लड़ती युद्ध          

Monday, 7 October 2013

ऐसी कोई कविता
नहीं लिखी गयी
जो अन्याय को रोक सके
न्याय के तराजू पर
पीड़ित के साथ बैठ सके
ऐसी कोई कविता
नहीं लिखी गयी
जो न्याय की
आँखों पर बँधी पट्टी खोल सके
न लिखी गयी है और
न लिखी जायेगी
ऐसी कोई कविता
जो सताए गए
लोगों की आवाज़ बन सके |  

Sunday, 6 October 2013

ईश्वर और प्यार
कोरी बकवास |
प्यार और सवेंदनायें
केवल शब्द
क्यों स्तब्ध ?
कृत्रिम पौधे
न पैदा होते हैं
न बड़े होते हैं
इसलिए वे कभी मरते नहीं |

Saturday, 5 October 2013

औरतों की आजादी और बराबरी का विरोध करने वाले और फीमेल वर्जिनिटी को आसमान पर बैठानेवाले, मंदिर समर्थक, मोदी सपोर्टर और आरक्षण विरोधी अधिकांश ऊंची, दबंग जातियों के ही लोग हैं ,आपकी यह बात अगर मान भी ली जाए तो पूरे भारत की जनसंख्या की तुलना में ये मुट्ठीभर लोग इतने प्रभावी कैसे हो सकते हैं कि जन-सैलाब को हांक सके |
मैं तेरा नाड़ा खोलूँ
तू मेरा नाड़ा खोले
अब दो नंगों में से
जो कम नंगा लगे
उसको वे चुने
हम तो
अपना जाल बुन चुके |
इंदु प्रकाश की भविष्यवाणी और निर्मल बाबा के पाखण्ड की क्या प्रमाणिकता है ? लगभग सभी चैनलों पर भविष्यवाणी जैसे कार्यक्रम जोर शोर से दिखाए जा रहे हैं | निर्मल बाबा के पाखण्ड और भविष्यवाणी जैसे अवैज्ञानिक कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार तथा दूसरी ओर पाखण्ड और अवैज्ञानिक सोच की खिलाफत करने का ढोंग टी.वी चैनलों के दोहरे चरित्र को ही उजागर करता है |
माँ को भूखा सुलाता है
फिर माँ का 
जगराता करवाता है
वे
सयाने थे बहुत
जानते थे
जिस दिन जागेगा
सवालों की झड़ी लगा देगा
तर्क की कसौटी पर
कसा जाएगा उनका हर फरेब
उन्होंने अपने हर फरेब को
तर्क से परे बताया
वे सयाने थे बहुत
उन्होंने इस फरेब को
बाल-घुट्टी की तरह हमें पिलाया
और इस तरह उन्होंने
बड़ी मुश्किल से 
ईश्वर के अस्तित्व को बचाया |

Wednesday, 2 October 2013

हम एक दूसरे से
प्यार करते रहे
लेकिन एक सच
यह भी रहा कि
हमारी आँखों में प्रश्न
हमेशा तैरते रहे
मेरे और तुम्हारे बीच
एक पुल खड़ा रहा
और हम दो किनारे बने रहे |
मेरी ख्वाइश है
अपने अपने घेरों में क़ैद
एक दूसरे से जुड़े होने का
भ्रम योहीं बना रहे  | 
एक आदमी हर सुबह
हाथ में लालटेन लेकर
घर से निकलता था कुछ खोजने
दिन ढलने पर लौट आता मायूस
लोग देख रहे थे बरसों से
उसे लालटेन लेकर जाते
और मायूस होकर लौटते
सूरज की रोशनी से भी
ज्यादा भरोसा उसे लालटेन की रोशनी पर था
लालटेन की रोशनी पर
उसका भरोसा कभी टूटा नहीं
और जिसे ढूंढ रहा था वह मिला नहीं |
मरने से पहले,
दीवार पर उसने लिखा--
जिंदगी भर मैं खोजता रहा तुम्हारा ईश्वर
वह मुझे मिला नहीं
इसलिए मैं यह घोषणा करता हूँ कि
तुम्हारा  ईश्वर मर चुका है |  

Tuesday, 1 October 2013

दड़बा  खोलो
उड़ा दो सारे कबूतर
आज है दो अक्टूबर
शान्ति के सन्देश
अब और नहीं भेजे जायेंगे

Sunday, 29 September 2013

"अपनी कमजोरियों का विज्ञापन करके हम कुछ ज्यादा सुख-सुविधा और पद-प्रतिष्ठा पा सकते हैं" जब यह ज्ञान किसी भी विकलांग व्यक्ति/ समूह को हो जाता है तब वह व्यक्ति/ समूह मानसिक विकलांगता से ग्रसित हो जाता हैं | ऐसे व्यक्ति/समूह का उत्थान तमाम सुख-सुविधा और पद-प्रतिष्ठा देकर भी संभव नहीं|


वे बैसाखियों की मांग करते हैं
उन्हें बैसाखियाँ
उपलब्ध करा दी जाती हैं |
कोई है
जो नहीं चाहता कि
वे अपने पैरों पर चलना सीखें |
पैरों का इस्तेमाल करना
वे सीखेंगे तब
जब बैसाखी का मोह छोड़ेंगे
कोई है
जो नहीं चाहता कि
वे खुली आँखों से सपनें देखें |             
कुछ जख्म ऐसे होते हैं
जो भरते नहीं
नासूर बन जाते हैं
और विरासत में
हम उन्हें ही छोड़ जाते हैं |
विरासत में देकर मत जाओ
इन्हें अपने साथ ही ले जाओ |
अगली पीढ़ी को चैन से रहने दो
वे जैसे चाहें उन्हें जीने दो
अपने पद-चिन्हों को मिटा दो
रास्तों को रहने दो 
बैसाखियों की आदत
ऐसी पड़ी
बैगैर बैसाखियों के चलना
अब मुश्किल है
एक भी घड़ी
धरम है हथकड़ी
पाँव में बेड़ी पड़ी      
समझदार लोग
रहते हैं किताबो के बीच
बुद्धिजीवी कहलाते हैं
किताबों की
व्यूह रचना के बीच
वह न डरता है
न जीवन जीता है |
बुद्धिजीवी
जमीन के नीचे
अपनी ही बनाई
अति सुरक्षित खोह में रहता है | 
दुर्लभ वस्तु
जब सुलभ हो जाती है
खुशबू उसकी खो जाती है
एक नयी यात्रा
खुशबू की तालाश में
शुरू हो जाती है 
प्यार करने का ढंग तुम्हारा
इतना निराला था
मेरे क़द को घटा दिया
तुम्हारी जादुई छुवन ने
मुझे बौना बना दिया
तुम्हारी छुवन
अब जादुई नहीं रही 
उम्र गुजर गयी
मेरा क़द नहीं बढ़ा
मैं बूढ़ा हो गया
मैं बौना ही रह गया

Saturday, 28 September 2013

वे बैसाखियों की मांग करते हैं
उन्हें बैसाखियाँ
उपलब्ध करा दी जाती हैं |
कोई है
जो नहीं चाहता कि
वे अपने पैरों पर चलना सीखें |
पैरों का इस्तेमाल करना
वे सीखेंगे तब
जब बैसाखी का मोह छोड़ेंगे
कोई है
जो नहीं चाहता कि
वे खुली आँखों से सपनें देखें |     

Friday, 27 September 2013

गीदड़ अगर
शेर जैसा दहाड़ने लगे
आपको ताज्जुब होता है कि नहीं
मुझे ताज्जुब होता है
अगर सांप
छछूंदर के पीछे भागने लगे
गीदड़ अगर
शेर जैसा दहाड़ने लगे  

Thursday, 26 September 2013

सपनों का गणित
कुछ अजीब सा होता है |
सपनें जो खुद-ब-खुद
बस जाते हैं आँखों में
वे लुभाते हैं
टूटनें पर आँखों को
नम कर जाते हैं |
सपनें जो आँखों में
ठूस दिए जाते हैं
वे न टूटते हैं
और न पूरे होते हैं |
सपनों को आँखों में
ठूस देने का हुनर जो जानते हैं
क्या आप उन्हें पहचानते हैं ?

Wednesday, 25 September 2013

इस देश के ठहरे-संक्रमित लोकतंत्र पर सवाल उठाने वाला या तो कभी नक्सली कहलायेगा या तो कभी मोदी समर्थक=== बहुत सच्ची बात कही, इस स्थिति के लिए क्या इस देश के बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी नहीं बनती, भिनभिनाते बुद्धिजीवी |  
हिनहिनाते हैं
भिनभिनाते हैं बुद्धिजीवी
आपका एक वोट न देना
उनके दो वोट बढ़ाता है,
आपका वोट न देने का निर्णय
उनके पक्ष में जाता है |

Tuesday, 24 September 2013

पलक झपकते ही
पीड़ित
उत्पीड़क बन जाता है
शोषित
शोषक बन जाता है
समतावादी समाज का निर्माण
एक सपना है
वर्ग संघर्ष तो
अनंतकाल तक चलना है |
एक निवेदन===
++++++++++++
लिखो लेकिन खुद को लेखकों की बिरादरी में शामिल मत मानों |दौड़ो मत, मंद मंद बयार सा चलो कभी थकोगे नहीं |

बैसाखियों की आदत
ऐसी पड़ी
बैगैर बैसाखियों के चलना
अब मुश्किल है
एक भी घड़ी
इधर भी सांप
उधर भी सांप
इसका जहर उनपर
उनका जहर इनपर
कोई असर नहीं डालता |
रास्ते में
पड़ी मिली एक लाश
जिसका पूरा शरीर
नीला पड़ चुका था |
हर बार की तरह
आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला
चल रहा है और
मताधिकार जिसके पास है
वह गहरी नींद सो रहा है |
शोषण उत्‍पीडन के खिलाफ संघर्ष ,वर्ग संघर्ष किसी न किसी रूप में मार्क्‍सवाद से बहुत  पहले भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहा है | निश्चित ही हम कह सकते है कि एक समतावादी समाज की स्‍थापना के लिए मनुष्‍य का संघर्ष अनवरत मौजूद रहा है लेकिन आज भी शोषण ,उत्पीडन ज्यों का त्यों | इससे एक प्रमेय तो सिद्द हो ही जाती है कि समतावादी समाज की स्‍थापना एक ख्वाब है और इस ख्वाब को देखने की स्वतन्त्रता हम से कोई नहीं छीन सकता |
और हिन्दू और मुसलमान की तरह ही 
भगवान् के लहू का रंग भी लाल था
पिता जी खुलेआम
सबके सामने
सिगरेट पीते थे
घर के आँगन में
शेर की तरह टहलते थे
मैंने पिया सिगरेट
खुलेआम सबके सामने
गुनाह किया
मुझे बागी करार दिया
पिता का झापड़
माँ का रोना
और बहन का उलाहना
सब याद है मुझे
माँ ने रोते हुए कहा था
अरे सिगरेट पीना है
अगर तुम्हारी मजबूरी
तो सबके सामने पियो
क्या यह है जरूरी |
बहन ने कहा था
कुछ तो
बड़ों की इज्ज़त किया करो
कैसे जीना है यह हम से सीखो
देखो मैं भी तो प्यार करती हूँ
बड़ों को पता न चल जाए
इस बात से डरती हूँ
इसलिए प्रेम भी छिपा के करती हूँ |
मैं आज तक
नहीं समझ पाया कि
मैंने किस तरह
उनकी इज्ज़त में बट्टा लगाया था ?
अरे भाई
मैं तो वही कर रहा था
जो मेरा बाप कर रहा था |
बहरहाल जब मैं पिता बना
तब कहीं जाकर मुझे
सबके सामने खुलेआम
सिगरेट पीने का हक मिला |
 

Monday, 23 September 2013

हमारे पास
वोट का अधिकार
फिर हम क्यों बेज़ार ?
कल वह फिर
तुम्हारे पास आयेगा
इस बार होशियार |
उन्हें हर बार
तुम्हारे पास आना पड़ता है
हाथ जोड़कर
मुस्कराना पड़ता है |
हड्डियों का ढांचा
हो चुके तुम
तुम्हारा भरोसा नहीं टूटता
और उनका विश्वास |
होठों पर
कुटिल मुस्कराहट लेकर आते हैं
और तुम्हारा खून चूसकर 
आदमखोर भेड़िया बन जाते हैं |
ईश्वर डर कर छिपते नहीं
छिपकर देखते हैं
स्त्री को
हलाल होते हुए
ईश्वर भी तो मर्द है
एक हलाल करके खुश होता है
दूसरे को अच्छा लगता है 
स्त्री को
हलाल होते हुए देखना | 

Sunday, 22 September 2013

दम्भी,
धर्म निरपेक्ष होने का
दंभ पालते है
ये जोड़ते नहीं
हमें बांटते हैं |
लाशों को भी
धर्म की चादर उढ़ाते हैं |
ये जोड़ते नहीं
हमें बांटते हैं
ढोंगी  
जब आप किसी का विरोध करते हैं तो आपको यह जानना बहुत जरूरी होता है की आपके इस विरोध में किसके लिए समर्थन छिपा है अगर आप यह नहीं मानते तो इसका सीधा सा मतलब होता है कि आप किसी दुराग्रह के वशीभूत होकर विरोध कर रहे हैं | मोदी का विरोध करना अंततोगत्वा कांग्रेस का समर्थन करना हैं और कांग्रेस का समर्थन मतलब भ्रष्ट्राचार का समर्थन | विकल्पहीनता की स्तिथि में जीवन को बचाए रखने के लिए विश्वामित्र ने कुत्ते का मांस खाने में कोई गुरेज नहीं किया |

इन मठाधीशों की पोल इतने सशक्त तरीके से खोलने के लिए आप बधाई के पात्र हैं | मोदी का विरोध करके यह लोग अंततोगत्वा कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं और कांग्रेस का समर्थन मतलब भ्रष्ट्राचार का समर्थन | ऊपर से तुर्रा यह है कि यह सब यह मानने के लिए कि वे कोंग्रेस का समर्थन कर रहे हैं भी तैयार नहीं हैं | शायद किसी दूसरे ग्रह से किसी पार्टी का आयात करने का इरादा रखते हैं |

Saturday, 21 September 2013

न गद्द्य
न पद्द्य
केवल दर्द
अब हो गई है हद्द
देखो हँस रहा है मर्द |
न गद्द्य
न पद्द्य
केवल दर्द
अब हो गई है हद्द
देखो हँस रहा है मर्द |
जो ज्यादा चीख रहे हैं
वे सस्ते में बिक जाते हैं
जिनके पेट में रोटी नहीं
चीख नहीं सकते वे
अपना खून बहाते हैं
गुमनाम मौत मर जाते हैं |
ये आये या वो आये
हमें क्या करना है
हमें तो काँटों
पर ही चलना है |
हमारे लिए
जो रास्ते बनाए गए हैं
मजबूत और टिकाऊ हैं
और इन रास्तों पर चलनेवाला
हर व्यक्ति बिकाऊ है |
वे इस तथ्य से परिचित हैं
और जब जब उन्हें
सांस लेती हुई लाशों
की जरूरत पड़ती है
वे खिचे चले आते हैं
और लाशों को लगता है कि
उन्हें मुहं मांगी कीमत मिल जाती है |
मेरे पास बैठीं
मेरी हथेलियों पर
चन्दन मलती रहीं
चलते वक्त
उसी हथेली पर
तुमनें अंगारा रख दिया
सोचता हूँ आज भी
कि तुमने ऐसा क्यों किया |

Friday, 20 September 2013

एक दीवार थी
जो रोकती थी
एक ऊँगली थी
जो टोकती थी
दीवार हमने लाँघ ली है
ऊँगली हमने तोड़ दी है

Thursday, 19 September 2013

आओ चलें,
कुछ प्यार की बातें करें
न राम की
न इस्लाम की
आओ चलें,
पगडंडियों में खो गया है जो 
उस इंसान की बातें करें
आओ चलें,
कुछ प्यार की बातें करें |
 
न इस्लाम खतरे में
न हैं राम खतरे में
खौफ में जी रहा
है इंसान खतरे में

Wednesday, 18 September 2013

भूला हुआ आज भी
जब याद आता है
सोया हुआ कुम्भकरण
भी कसमसाता है
भूलने की बीमारी बड़ी प्यारी
कभी कभी ही सही
वह मुस्कराता तो है 
मनीषा जी को लमही सम्‍मान क्‍यों लौटा देना चाहिए ?
+++++++++++++++++++++++++++++++++++++
ऐसा करना जूरी के निर्णय का असम्‍मान होगा और लमही सम्‍मान का अपमान भी।
+++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++
लमही पत्रिका के प्रधान संपादक के एक इंटरव्‍यू में एक सवाल के जबाव में यह कहे जाने कि लगता है इस बार के सम्‍मान में निर्णायक मंडल से चूक हुई होगी, पर पत्रकार दयानंद पांडेय ने बात का बतंगड़ बना दिया है। जरा उनकी भाषा देखिए:  '' आलोक मेहता और महेश भारद्वाज की तो यह दोनों लोग अब हद से अधिक बदनाम हो चुके हैं। आलोक मेहता की छवि अब पत्रकारिता में दलाली के लिए जानी जाती है। और कि राजा राम मोहन राय ट्रस्ट की केंद्रीय खरीद समिति के अध्यक्ष होने के नाते वह महेश भारद्वाज के लिए भी दलाली का काम खुल्लमखुल्ला कर रहे हैं। मेरे पास इस के एक नहीं अनेक प्रमाण हैं। मैं ने विजय राय को स्पष्ट रुप से कहा कि आप को इन तत्वों से बचना चाहिए। वह कुछ स्पष्ट बोले नहीं। हूं-हां कर के रह गए। मैं ने तब के दिनों शिवमूर्ति जी से भी इस बात का ज़िक्र किया। और कहा कि विजय राय जी को समझाइए क्यों कि यह तो रैकेट में फंस गए हैं।  '' यानी उनके शब्‍दों में जूरी के मेंमबरान में एक आलोक मेहता दलाल हैं, वे महेश भारद्वाज के पक्ष में दलाली कर रहे हैं। दूसरे आखिर में उन्‍होंने मनीषा कुलश्रेष्‍ठ को ढीठ व बेशर्म कह कर लमही सम्‍मान लौटाने के लिए ललकारा है। यह वे दयानंद पांडेय हैं जिन्‍हें हिंदी संस्‍थान का सम्‍मान वीरेन्‍द्र यादव को मिल गया तो वे उसमें हिंदी संस्‍थान व मुलायम सरकार के यादववाद का पोषण देख रहे हैं। उन्‍हीं की जबानी सुनिये : ''अब की बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए गए पुरस्कारों के लिए एक योग्यता यादव होना भी निर्धारित की गई थी। रचना नहीं तो क्या यादव तो हैं, ऐसा अब भी कहा जा रहा है।'' --जब कि हिंदी संस्‍थान का पुरस्‍कार खुद उन्‍होंने भी झटका है, और कई बार झटका है। इसके लिए उन्‍होंने संस्‍थान के निदेशक की किताब पर समीक्षा भी लिखीं तथा उन्‍हें खुश करने का प्रयास किया। हिंदी साहित्‍य में कौन कहाँ खड़ा है यह सर्वविदित है लेकिन दयानंद अपने को इस हद तक पंक्‍तिपावन मानते हैं कि हिंदी संस्‍थान मे उन्‍हें यादववाद नजर आता है और लमही सम्‍मान की जूरी भ्रष्‍ट नजर आती है जिसके विज्ञापित होते ही इसका भान उन्‍हें हो गया था, यह वही बता रहे हैं। जब दयानंद पांडे को पता ही था कि जूरी पहले से ही भ्रष्‍ट है तो वह कैसा निर्णय करेगी , यह भी तो पता होगा। तब तो वे मनीषा का खुल्‍लमखुल्‍ला विरोध कर रहे थे। कि विजय राय महेश के हाथो बिक गए हैं और जब जूरी के निर्णय का सम्‍मान करते हुए और बाकायदा दिल्‍ली में पुरस्‍कार समारोह में संयोजक के रूप में उपस्‍थित होकर भी एक सवाल के जवाब में  विजय राय ने अपने संपादकीय विवेक का परिचय देते हुए यह बात स्‍वीकार की कि लगता है जूरी से कुछ चूक हुई होगी तो इसे मनीषा जी का अपमान कह कर फतवा दे रहे हैं दयानंद पांडेय जी।  । अब वे लखनऊ के बड़के क्रांतिकारी लेखक बनकर फतवा दे रहे हैं।लगता है विजय राय से उनकी कोई निजी खुन्‍नस है। विजय राय कम बोलते हैं, पर इतना कम भी नहीं कि उन पर बढ़ चढ़ कर आक्रमण कर सकने की हैसियत कोई  जुटा सकें।
विजय राय को क्‍या एक व्‍यक्‍ति एक संयोजक के रूप में अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है। क्‍या एक जूरी के असहमत होने के बावजूद पुरस्‍कार घोषित नहीं होते। क्‍या निर्णायक मंडल की राय से संयोजक का सर्वथा सहमत होना जरूरी है। यदि एक विवेकी संयोजक संपादक अपना रुख अलग रखते हुए यह राय जाहिर करता है कि लगता है प्रेमचंद की परंपरा के आलोक में कदाचित जूरी के फैसले में कहीं चूक हुई है तो इसमे हाय तोबा मचाने की क्‍या बात। यदि जूरी अपने निर्णय पर अडिग है और संयोजक ने पुरस्‍कार लौटाने की बात ही नही की है तो पुरस्‍कार लौटान की क्‍या जरूरत । मनीषा न सही प्रेमचंद परंपरा की कथाकार पर वे श्रेष्‍ठ युवा कथाकार तो हैं ही, इसमें किसे संदेह है। विजय राय ने केवल अपनी राय का इजहार किया है, वह भी ऐसा सवाल पूछे जाने पर। ऐसी असहमतियां किस पुरस्‍कार में नहीं होतीं। उन्‍होंने मनीषा कुलश्रेष्‍ठ पर न केवल विशेषांक निकाला बल्‍कि कहानी अंक में उनकी कहानी भी आलोचक की सम्‍मति के साथ छापी गयी है। इससे जाहिर है एक कथाकार के रूप में विजय राय मनीषा कुलश्रेष्‍ठ की खासी इज्‍जत करते हैं । पर लमही सम्‍मान के लिए प्रेमचंद की कथा परंपरा के वाहक जिस तरह के कद्दावर लेखक की छवि उनके मन में होगी, वह शायद मनीषा में उन्‍हें न दिखी हो।

इस प्रकरण में कथाकार संजीव जी की बात भी उछाली गयी है। संजीव निस्‍संदेह एक बड़े कथाकार हैं। वे यदि ब्‍लैक एंड ब्‍वाइट में यह बात कह रहे हैं तो यह बात सुनी जानी चाहिए। वे कभी मुंहदेखी कहने वाले लेखक नहीं रहे। जिसके लोकार्पण में जाते हैं, यदि कहानी या उपन्‍यास कमजोर है तो वे सबके सामने यह बात कहते हैं। यह बात दुनिया जानती है। उनके कहे का हम सबको सम्‍मान करना चाहिए। 
लमही पत्रिका के सम्पादक श्री विजय राय किसी दबाव में आने वाले व्यक्ति कभी नहीं रहे ,मनीषा कुलश्रेष्ठ को दिए गए पुरस्‍कार के सन्दर्भ में उनके वक्तव्य को गलत तरह से प्रस्तुत करके दयानंद जी ने यह साबित कर दिया है कि हिंदी साहित्य में व्याप्त राजनीति का स्तर इस हद तक गिर  गया है।  विजय राय ने यह कहां कहा है कि मुझ पर निर्णायक मंडल का दबाव था,निर्णायक मंडल ने जो फैसला दिया, उसे अंतत: उन्‍होंने माना और दिल्‍ली जाकर पुरस्‍कार दिया। अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त स्‍थानिक गंदी कुत्सित राजनीति के कुरूप चेहरे को पहचानें। विजय राय जैसे संजीदा तथा जाने पहचाने  संपादक पर अपनी अधीर टिप्‍पणियों का मलवा उछालना उचित नहीं है | विजय राय न तो कोई सतही टिप्‍पणी कभी करते हैं, न इस तरह की राजनीति में यकीन रखते हैं। जो विजय राय को जानते हैं वे इस राय से सहमत होंगे।

ऐसी स्‍थिति में, जब कि विजय राय ने निजी राय जाहिर की है,वह भी 'लगता है' वाले भाव में |अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त राजनीति के कुरूप चेहरे को अपनी अगली कहानी/ उपन्यास में उजागर करने के लिए कमर कस लें |   

 
लमही पत्रिका के सम्पादक श्री विजय राय किसी दबाव में आने वाले व्यक्ति कभी नहीं रहे ,मनीषा कुलश्रेष्ठ को दिए गए पुरष्कार के सन्दर्भ में उनके वक्तव्य को गलत तरह से प्रस्तुत करके यह तो साबित हो गया कि हिंदी साहित्य में व्याप्त राजनीति का स्तर पहले से कुछ और गिर गया है, लेखन के स्तर और लेखक के स्तर पर चर्चा विषय से भटकना होगा शायद | विजय राय ने कहा कि मुझपर निर्णायक मंडल का दबाव था, किसी पुरष्कार वितरण के सन्दर्भ में निर्णायक मंडल के निर्णय को बदलने का दुस्साहस कोई सम्पादक क्यों करेगा |
अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त राजनीति के कुरूप चेहरे को अपनी अगली कहानी/ उपन्यास में उजागर करने के लिए कमर कास लें |  
विसर्जन
+++++++++
लाश का मतलब
जिसमें कभी जीवन था
समुद्र में तैरते
माटी के सैकड़ों गणेश
जो विसर्जन से पूर्व भी
माटी के पुतले थे
जीवन होता तो
समुद्र के जीव-जंतुओं का भोजन बनते
समुद्र को मैला तो नहीं करते |    

Monday, 16 September 2013

भ्रूण हत्याओं का सिलसिला
शुरू ही नहीं हुआ होता
अगर बेटियाँ
पिता के गर्भ में
और बेटे माँ के गर्भ में पलते |

Saturday, 14 September 2013

बुद्धिजीवियों की
लम्बी कतार में सबसे आगे
खड़े होने की जुगत करते रहे
उनके कहने पर
कभी उनका समर्थन
और कभी विरोध करते रहे
बुद्धिजीवियों की
लम्बी कतार में आप
आज भी खड़े हैं नतमस्तक
आप बुद्धिजीवी हैं
आपके सामने हम नतमस्तक   |
सांप समझकर डरते रहे
निकला वह छछूंदर
जिसे न सांप
अपने बिल में घुसने देता है
और न चूहा अपने बिल में |
कहते हैं-
जो फुफकारता है वह काटता नहीं
छछूंदर से घिन आती है सांप से नहीं
छछूंदर को तो सांप भी खाता नहीं |
गुरु और चेले ने
खेल ऐसा खेला
कि गुरु, गुरु ही रह गए
शक्कर हो गया चेला
भीष्मपितामह ने
द्रोणाचार्य को बुलाया
और पूरा गेम प्लान समझाया
बोले-इसबार की महाभारत में
शिखंडी की विशेष भूमिका होगी
चेले के खातिर 
अंगूठा द्रोणाचार्य को देना होगा
और अर्जुन की जगह
युद्ध में नायक एकलव्य होगा |
द्रोणाचार्य मुस्कराए और बोले
आप कहते हो तो अंगूठा दे दूंगा
इस बार की महाभारत में नायक
अर्जुन की जगह एकलव्य होगा
केवल एक शंका है कि
इस बार शिखंडी की भूमिका में
कौन कौन होगा ?
  
गुरु और चेले ने
खेल ऐसा खेला
कि गुरु, गुरु ही रह गए
शक्कर हो गया चेला
भीष्मपितामह ने
द्रोणाचार्य को बुलाया
और पूरा गेम प्लान समझाया
बोले-इसबार की महाभारत में
शिखंडी की विशेष भूमिका होगी
चेले के खातिर 
अंगूठा द्रोणाचार्य को देना होगा
और अर्जुन की जगह
युद्ध में नायक एकलव्य होगा |  
Anant Vijay
आज हिंदी के कई क्रांतिकारी लेखक उत्तर प्रदेश सरकार के सामने नत मस्तक थे । क्रांतिकारिता की जय हो
Avdhesh Nigamरचना में क्रन्तिकारिकता झलकती है
और मुहं से लार टपकती है
कविता में क्रांतिकारी हैं
कविता से बाहर भिखारी हैं 
हिंदी दिवस पर विशेष
++++++++++++++
बच्चों ने अभी
हिंदी बोलना नहीं है छोड़ा
क्योकि रास्ते में
है अभी माँ-बाप का रोड़ा
कुछ दिनों बाद
हिंदी समझने वाले
माँ-बाप नहीं मिलेंगे
तब बच्चों की
मुश्किल कम होगी थोड़ा थोड़ा
मध्यवर्गीय परिवारों में
हिंदी नहीं दिखेगी
हिंदी की तालाश में
तब छोड़ना होगा अश्वमेध घोड़ा |  
मोदी को लेकर इतनी माथा-पच्ची क्यों ???
आप मोदी का क़द बढ़ा रहे हैं ,
मुझे तो लगता है इस धुर विरोध में आपका समर्थन छिपा है |

Friday, 13 September 2013

आइये हिंदी दिवस मनाएं और एक दूसरे को Happy Hindi Day   कहकर दें शुभकामनाएं |
शब्द जिनके आसरे थे
वे आसमान पर चढ़े
शब्द गिर पड़े
बारहों मास अंडे खाएं
हिंदी अपनाएं ????? 
महोदय, यह सामूहिक रक्तपिपासा नहीं,  भेड़ियों को मारने की सामूहिक अभिलाषा है |
वे समूह में
कर सकते हैं बलात्कार
ऐसे भेड़ियों को
मौत की सजा की अभिलाषा
आप कहते हैं इसे सामूहिक रक्तपिपासा
दामिनी के गुनाहगारों को दफा ३०२ के अंतर्गत मौत की सजा |
दामिनी अगर मरी नहीं होती
तो इन गुनाहगारों को
बलात्कार के लिए
क्या कोई सजा नहीं होती ?
गैंग रेप के लिए फाँसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए | जिसके साथ बलात्कार हुआ उसका मरना जरूरी है क्या ?
मुंबई गैंग रेप जिसमे ,जिसके साथ बलात्कार हुआ वह आज भी ज़िंदा है तो क्या उन अपराधियों को मौत की सजा नहीं होनी चाहिए ? मेरा मानना है कि गैंग रेप के हर केस में अपराधियों को मौत की सजा दी जानी चाहिए |
काश ऐसा ही हो ,क़ानून में इनके लिए मौत से कम कोई सजा न हो
गैंग रेप की
एक सजा
फाँसी फाँसी फाँसी
फाँसी पर चढ़ने से पहले
रेपिस्ट भुनभुनायें
गैंग रेप ,नॉट सेफ
बलात्कार जिसके साथ हुआ
वह ज़िंदा रहे और मुस्कराए
  
बच्चे हिंदी उतनी ही जानते हैं जितना अपने माँ-बाप से संवाद के लिए जरूरी है फिर भी हिंदी दिवस मनाने का ढोंग तो कर ही सकते हैं हम आइये हिंदी दिवस मनाएं और एक दूसरे को Happy Hindi Day   कहकर शुभकामनायें दें | 

Thursday, 12 September 2013

बहुत याद आती हैं बनारस की गलियाँ कितनी मीठी होती हैं बनारस की गालियाँ | भुलाए नहीं भूलती बनारस की गालियाँ और बनारस की गलियाँ |
दंगाई कौन ?
+++++++++++
वोटों के
ध्रुवीकरण की कोशिश में
लाशों के ढेर लग गए
अगुवाई कर रहे थे जो
छोड़कर केंचुल निकल गए
हालात सुधरने लगे जब तो
वे शहर के
गणमान्य व्यक्ति हो गए | 
हम मेमनें
भेड़ियों से घिर जाने के बाद भी
मेमनें ही बने रहे
भेड़िये निश्चिन्त हैं कि
पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध है
और वे निर्विघ्न
लम्बे समय तक
राजा बनें रह सकते हैं
इन मेमनों पर
बेख़ौफ़ शासन कर सकते हैं |

Monday, 9 September 2013

सब चुप
अँधेरा घुप
पत्तियाँ दबे पाँव भी
घर लौटने में डरती हैं
लाशें पगडंडियाँ पकड़ती हैं
अँधेरा घुप
सब चुप  
फेसबुक पर
कुछ पंक्तियाँ लिखकर
अपना विरोध जताते हैं
और स्वप्न देखने के लिए
सो जाते हैं


उथला पानी
खोखला विरोध
हम खरगोश
वे जश्न मनाते हैं 
वे चाहते हैं
अधिक से अधिक मतदान
उनके पक्ष में हो
वे केवल
इसकी व्यवस्था ही तो कर रहे हैं
आप कहते हैं की दंगे हो रहे हैं |

Sunday, 8 September 2013

अपराध बोध से
या ख्वाब के बोझ से
दबे हैं सब
किसी न किसी रंग में
रगें हैं सब
कोई हमें बताये कि
आँख को आँख
कान को कान
नाक को नाक
होंठ को होंठ
पेट को पेट
हाथ को हाथ
और गांड को गांड
न कहें तो क्या कहें ?
वे शालीन हैं
मुहँ से ही खाते हैं
मुहँ से ही हगते हैं
गांड का इस्तेमाल नहीं करते | 
आईना देखो
राजनीतिज्ञों को मत कोसो
यह हमारी फैलाई हुई बीमारी है |
राजनीतिज्ञ
किसी दूसरे ग्रह से नहीं आते
हमारे आपके घर में पैदा होते हैं
और यहीं से संस्कार लेकर जाते हैं
सोचिये हम बच्चों को
क्या सिखा रहे हैं
उन्हें पैसा कमाने की
मशीन ही तो बना रहे हैं |
बच्चों को
हम जो भी सिखलाते है
बच्चे बहुत जल्दी सीख जाते हैं
बच्चे देश-विदेश में
हमारा नाम रोशन कर रहे हैं
और राजनीतिज्ञ
वो भी तो यही कर रहे हैं |     
बरसों से इस जमीं पर
साथ साथ रहते हैं
एक दूसरे की
ख़ुशी और गम में
एक-साथ शामिल होते हैं |
अफ़सोस होता है
जब किसी के भड़काने पर
हम भड़क जाते हैं
और किसी के समझाने पर
हम हिन्दू और मुसलमान हो जाते हैं |

Thursday, 5 September 2013

जिसकी दुम उठाओ
वह मादा है
इस देश का नागरिक
कितना सीधा साधा है |
अंध-श्रद्धा के खिलाफ लिखते हैं
सच कहो तो
भोले-भाले शब्दों पर बिदकते हैं 
पुरुष चलाता है
दुनियाँ की गाड़ी
पैगम्बर बनाए तो उन्हें
शक्ल और सूरत अपनी दी
औरतों को खुदा ने बनाया
और पैगम्बरों की
खिदमत में लगाया
पैगम्बर पुरुष है और
औरत खिदमतगार
पुरुष चलाता है
दुनियाँ की गाड़ी
वही है ,वही है गुनहगार

Wednesday, 4 September 2013

हम विरोध करते हैं
चीखते और चिल्लाते हैं
भारी भरकम नारे लगाते हैं
उनपर बड़े संगीन आरोप लगाते हैं
और फिर खामोश हो जाते हैं 
काश
अपने विरोध में
हम खुद खड़े हो पाते
तो हमें
सारे सवालों के जवाब मिल जाते
पतझड़ का रुआब देखो
पेड़ों के कंकाल देखो
मुस्कराते हुए आता है बसंत
इठलाते हैं पेड़
पेड़ों पर आया शबाब देखो |
तमीज  का पर्यायवाची नहीं है कमीज  लेकिन आप कितने तमीजदार हैं इसका निर्धारण आपकी कमीज देखकर ही किया जाता है इसलिए बंधुवर अपनी कमीज को साफ़ सुथरा रखिये |
अंतर्वस्त्र मैले हैं
कमीज तो उजली है
आकाश में
छेद करने का हौसला है
लेकिन द्रष्टि छिछली है
इसीलिए भविष्य की तस्वीर धुंधली है

Monday, 2 September 2013

हम हिन्दुस्तानी हैं 
हमें "शीघ्रपतन" की बीमारी है
चरम पर पहुँचने से पहले ही
स्खलित हो जातें हैं 
और फिर लम्बी नींद सो जाते हैं |

Saturday, 31 August 2013

वह दरिंदा है
लेकिन है अभी बच्चा
होने दो उसे बड़ा
खाने तो मांस कच्चा
औरत और मर्द के फर्क को
वह अभी नहीं जानता है
योनि और लिंग को
पेशाब करने की जगह मानता है |
औरत और आदमी के फर्क को
जब वह जानेगा
तभी तो उसमें
अपराध बोध जागेगा
वह दरिंदा है
लेकिन है अभी बच्चा
आओ प्रतीक्षा करें उसके वयस्क होने की |
(अति- वयस्क ,आसाराम में तो अब तक नहीं जागा अपराध बोध )
अवयस्क भेड़िये को
सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है
वयस्क होने से एक दिन पहले तक
वह जितना चाहे
उतना खून पी सकता है
अभी तो वह बच्चा है
खून और पानी में
भेद नहीं कर सकता है
लेकिन जहाँ तक मुझे ज्ञात है
भेड़िये के वयस्क होने की कोई उम्र नहीं होती 
भेड़िया तो जन्म से ही भेड़िया होता है |

Friday, 30 August 2013

जंगल के पशु,पक्षियों के लिए जो दहाड़ है शेरों के लिए वह उनका सामान्य व्यवहार है | 
उछलिये
जमीन पर आइये
और फिर उछलिये
जमीन कभी मत छोड़िये |
 
हवा में तैरते हैं
जमीन कहाँ दूढ़ते हैं ?
छलांग के लिए
जरूरी है जमीन
मेढक से
हम क्यों नहीं सीखते ?
हमारी,आपकी,सबकी मंजिलें हैं यहीं 
शून्य में छलांग लगाओगे
तो जमीन कहाँ पाओगे ? 

Thursday, 29 August 2013

"मोदी-समर्थक असहिष्णु और भाषा-आचरण में लगभग हिंसक हैं"  हिंदी दैनिक समाचारपत्र  जनसत्ता के सम्पादक की इस बात से कौन सहमत नहीं होगा लेकिन इन तथाकथित मोदी समर्थकों, जो वास्तव में लोगों को मोदी के खिलाफ करने में ही सहयोग कर रहे हैं | ऐसे अल्पबुद्धि तथाकथित मोदी-समर्थक कहीं हमें , भाषा के स्तर पर ही सही, हिंसक तो नहीं बना रहे हैं,यह प्रश्न विचारणीय अवश्य है |
कितना भी मुस्कराओ
जमकर खिलखिलाओ
उदासी छिपती नहीं
आँखों के कोरों से
होठों के पोरों से
झांकती है उदासी छिपती नहीं |
स्याह हुआ चेहरा बोलता है
आँखों में छलक आती है टीस
उदासी छिपती नहीं
कहानी
+++++++
पुरुष
सच कभी नहीं बोलता
एक स्त्री से कहता है प्रेम
और देखता है दूसरी की ओर |
स्त्री हो या पुरुष
दुनियाँ दोनों की अधूरी है
और यह कहानी सच्ची और पूरी है |

Wednesday, 28 August 2013

कुछ गलतफहमियां
+++++++++++++
१)प्यार करना सिर्फ और सिर्फ हम जानते हैं |
२) ईमानदार हम केवल अपने आप को मानते हैं |
३) बच्चों को संस्कार हमने दिए हैं ( यह एक दूसरी बात है कि जो कुछ बच्चों को सिखाया वह सब खुद नहीं किया )
४) हम समय के पाबन्द हैं ( जब भी हम ऑफिस देर से पहुँचते हैं ,हमारे अधीन सभी कर्मचारी उसके बाद ही पहुँचते हैं )
५) सच केवल हम बोलते हैं |
अभी तो वे व्यस्त हैं
भूखों को खाना खिलाने में
अपना सिक्का जमाने में
संसद को सोने दो
रुपये को
आखिरी सांस लेने दो |

उन्हें विश्वास है
वे फिर लौटकर आयेंगे
और तब
रुपये को बचायेंगे  |
सारे धरम एक समान
ऊँची दुकान फीके पकवान
पढ़ने वाला कोई नहीं
सभी यहाँ पर शिक्षक हैं
धरम से नहीं जिनका रिश्ता
वे सभी धरम के रक्षक हैं
न कोई शिक्षक न कोई रक्षक
भेष बदलकर आए भक्षक हैं
बच्चे
भामा और रुक्मणी को नहीं जानते हैं,
वे तो
राधा को ही कृष्ण की पत्नी मानते हैं |

Tuesday, 27 August 2013

जन्माष्टमी पर विशेष
==============
कृष्ण ने भी
पत्नी में प्रेम नहीं पाया
पत्नी के अतिरिक्त
एक प्रेमिका का सिद्दांत
उन्हें भी भाया और
उनके विनम्र अनुरोध पर ही  
राधा का चरित्र गढ़ा गया |

Monday, 26 August 2013

दिव्य पुरुष जब बलात्कार करता हैं तो मानव हित ही उसके लिए सर्वोपरि होता है ,इसीलिए हमारे धर्मग्रंथों में दिव्य पुरुषों के लिए बलात्कार की कोई सजा निर्धारित नहीं की गयी है |देवराज इंद्र को क्या कभी बलात्कार के लिए सजा दी गयी ,मात्र कुछ दिनों के लिए इन्द्रासन से बेदखल होना क्या उचित सजा थी | और बेक़सूर अहिल्या ???????
किसी का गुजरात है
किसी का बंगाल है
देश की खबर लेता हैं कौन
देश हो गया कंगाल है

Sunday, 18 August 2013

सांप आस्तीन में रहते हैं
यह सुनने के बाद
वे हाफ शर्ट पहनने लगे
और खुद
दूसरे की आस्तीन में छिप गए |
सेवानिवृति के बाद
पत्नी जी बोलीं-
मैं दिन और रात
तुम्हारी सेवा में लगी रहती हूँ
मैंने उन्हें टोका-
श्रीमती जी रुकिए
ज़रा मेरी भी सुनिए
दिन की बात तो ठीक है
रात की सेवा तो
न जाने कब से निरस्त है | 
पति और पत्नी
एक ही बिस्तर पर सोते हैं
सुबह उठकर नहाने जाते हैं
तो बाथरूम का दरवाजा
बंद करना कभी नहीं भूलते
यह शर्म है या मन का भरम |

Saturday, 17 August 2013

नैतिकता सुरक्षित है

नैतिकता सुरक्षित है
==============
कितने बरस हुए
खुद को गाली दिए हुए ?
हम सब खुद को
आदर्श स्त्री/पुरुष मानते हैं
नैतिकता को बैंक के लाकर में
सहेजकर रखते हैं
और कुछ ख़ास मौकों पर
उसे धारण करते हैं |
मूल्यवान वस्तुओं को
सुरक्षित रखना कोई पाप तो नहीं
गहनों को रात-दिन
हर समय पहने रहने में
कोई लाभ भी तो नहीं |
जब होता है जरूरी
लाकर से नैतिकता को निकालते हैं
और पूरे परिवार को ऊपर से नीचे तक
गहनों से लाद देते हैं |
हाँ, हमें याद नहीं 
कितने बरस हुए
खुद को गाली दिए हुए ?
 
लडूंगा ,लडूंगा
अपने हक़ के लिए लडूंगा
कहता रहा
लड़ा नहीं कभी |
अपनी पत्नी
अपने बच्चों में मस्त रहा
जो लड़ रहे थे
उनके साथ खड़ा भी नहीं हुआ |
बढ़ती हुई उम्र में अपराध बोध जागा
जब लड़ना था
लड़ा नहीं वह अभागा

Friday, 16 August 2013

हमारे आपके बीच से ही आते हैं/ और कालान्तर में वे नेता कहाते हैं / वे आईना हैं/ हमारा ही अक्स उनमें दिखता है/ उन्हें गाली देने से कुछ नहीं होगा / सबकुछ सुधर जाएगा जब हम/ खुद को गाली देना सीख जायेंगे/ ज़रा सोचिये कितने बरस हुए खुद को गाली दिए हुए ?
कहते हैं कि जो कविता लोगों को समझ में न आये और समीक्षक उसमें नए नए अर्थ खोज पाएं वही कविता महान होती है वैसी ही एक रचना जो मुझे भी समझ में नहीं आई,आपके लिए प्रस्तुत  | कविता के समीक्षकों से प्रार्थना कि आईये ,गोता लगाइये और समुद्र से कुछ मोती मेरे लिए भी चुन लाईये 

समुद्र की विशाल छाती पर
पहाड़ का एक टुकड़ा
सुना रहा था अपना दुखड़ा
पानी को फुरसत नहीं हैं
दौड़ना है उसे
लहरों के साथ
किनारों को छूना और लौट आना
लहरों का अस्तित्व
ख़त्म होने तक
उनके साथ रहना और दौड़ना |
समुद्र क्या है ?
पानी ,लहरें ,गहराई
मछलियां ,रत्नों का भण्डार और तरूणाई
छाती पर पहाड़ का एक टुकड़ा
समुद्र को सुना भी सकेगा अपना दुखड़ा |  
वे जेल भी
सोची समझी स्कीम
के अंतर्गत जाते हैं
और जेल में बैठकर
हर दिन त्यौहार मनाते है |
संसद में जो क़ानून बनता है
वह जन के पक्ष में नहीं
जनप्रतिनिधियों के लिए
खुशहाली लाता है |
मिड डे मील आया
उनके भरे खजाने और 
बच्चों के लिए मौत लाया |
राजनैतिक दलों को
आरटीआई के अंतर्गत लाया गया
संसद द्वारा इन दलों को
आरटीआई के चंगुल से छुड़ाया गया
उनका मानना है कि
जनप्रतिनिधि खुश रहेंगे
तो देश में खुशहाली आएगी
इसीलिए तो सर्वप्रथम
जनप्रतिनिधियों का ही वेतन बढ़ाया गया | 
सर्वोच्च न्यायालय
जब भी दहाड़ता है
संसद में मचता है शोर
करो इसे खामोश
करो इसे खामोश
और फिर बनता है
एक नया कानून
आमजन की ख्वाइशों के खिलाफ |
कलम के सिपाही अब कहाँ ?
लैपटॉप पर
रोमन में लिखते हैं
दबाते हैं स्पेस बार
और सब
हिंदी हो जाता
वैज्ञानिकों से अनुरोध है कि
कीबोर्ड पर
कोई ऐसा बटन बनाएं
जिसके दबाने से
हमारे और उनके बीच
एक पुल बन जाए    | 

जनप्रतिनिधि

जनप्रतिनिधि
+++++++++
ये सब के सब
जेल जायेंगे
जेल से लड़ेंगे चुनाव
जीत कर बाहर आयेंगे
और फिर पांच बरस तक
चैन की बंसी बजायेंगे |

Thursday, 15 August 2013

मैं हिन्दुस्तानी हूँ
मुझे "शीघ्रपतन" की बीमारी है
चरम पर पहुँचने से पहले ही
स्खलित हो जाता हूँ
इसीलिए मैं लम्बी कविता
नहीं लिख पाता हूँ |

पलटकर देखो

पलटकर देखो
===========
एक बुजुर्ग
मेरे कंधे पर हाथ रखकर 
बहुत प्यार से बोले
तुम्हारा बेटा
बिलकुल तुम जैसा दिखता है
शक्ल और सूरत में ही नहीं
सोच में भी
और जो बिछाए थे तुमने रास्ते
उन्ही पर
बिलकुल तुम जैसा ही चलता है
पहली बार मैंने बेटे को
बहुत ध्यान से देखा
और शर्म से गड़ गया यह सोचकर कि
बेटे की उम्र में जब मैं था
तो कितना बेहूदा दिखता था |
और किस तरह फूलों को
रौंद कर चलता था            

Wednesday, 14 August 2013

अपने हाथों
और पैरों की जंजीर खोलकर 
वे सब देश का
निर्माण करने में व्यस्त हो गए
इस व्यस्तता में 
देशवासियों को आज़ाद करना भूल गए
सपनें नहीं हुए पूरे
बूढी हो गयी आज़ादी
हर रोज आँखों में वे
एक नया सपना ठूस देते हैं
चन्द क़दमों पर दिख रही थी जो
उस आज़ादी को हमसे
कोसों दूर कर देते हैं |
 
प्याज के दाम और
बैंक ऋण पर ब्याज
इनका क्या भरोसा
कभी बढ़ते हैं,कभी घटते हैं |
देश की अर्थव्यवस्था को
पटरी पर लाने के लिए
सरकार को कभी कभी
कठोर कदम उठाने पड़ते हैं
आप व्यर्थ ही चिल्लाते हैं ?  
हिटलर ने अंग्रेजों की कमर तोड़ी
मजबूरी में उन्होनें सत्ता छोड़ी
कोई कीमत हमने अदा नहीं की
खैरात में मिली हमको आज़ादी
देखिये अब
आज़ाद देश की बर्बादी
फिर भी आज़ादी का जश्न हम मनाएंगे
आइये हम सब एक साथ मुस्कराएँ
स्वतन्त्रता दिवस पर शुभकामनाएँ

Monday, 12 August 2013

वे दोनों ( मम्मी-डैडी )
एक दूसरे से करते नहीं प्यार
लेकिन बच्चों को
"प्रेम "सिखाते हैं
बच्चों को सच बोलने की शिक्षा देते हैं
और अपने सच छिपाते हैं
वे कभी भी ,कहीं भी
समय पर नहीं पहुचे
बच्चों को समय की पाबंदी का पाठ पढ़ाते हैं |
पहले कहलाती थी जो चोरी
अब वह  है सीनाजोरी
लेकिन बच्चों को तो आज भी हम
ईमानदारी ही सिखलाते हैं |
बच्चों को कुछ भी
सिखलाने की जरूरत नहीं
बच्चे आपकी नक़ल उतारते हैं
बच्चे सब कुछ माँ के गर्भ से ही सीखकर आते हैं |
नागपंचमी पर विशेष
++++++++++++++
वे जैसा चाहते थे
वैसा हो गया
उनकी टोपी में
एक और मोर पंख लग गया |
सांप को
बुरी नज़र से बचाने के लिए
टोपी में मोर पंख लगाने का
सिलसिला शुरू हुआ
अभी अभी जो आदमी यहाँ खड़ा था
चला गया केचुल छोड़कर
सांप ठगा सा देखता रह गया |
बुढ़ापा आये
और सांस रुक जाए
इतनी भी उम्र न मिले कि
अपने भी सोचने लगें कि
अब यह जाए |

Friday, 9 August 2013

धर्म

धर्म
+++++++
आप ख़ुशी ख़ुशी
ज़हर खा रहे हैं
और जो लोग
आपको ज़हर खिला रहें हैं
आप उनपर
चढ़ावा भी चढ़ा रहें हैं
उसी ज़हर को प्रसाद कहकर
अपने बच्चों को भी खिला रहें हैं |

Wednesday, 7 August 2013

तुम सोचते हो

तुम सोचते हो
तुम सही हो
वह सोचता है कि
वह सही है
अगर दोनों सही हो
तो रेल की पटरियों जैसा
जीवन जीना होगा
साथ तो रहना होगा फिर भी |
सोचो
फिर फिर सोचो
पटरियां अगर
अलग अलग दिशायें पकड़ लें
और भूल जाएँ कि
रेल गुजरती है
तो रेल का क्या होगा ?
किसी दुर्घटना से
आशियाने को बचाना है |
 

Monday, 5 August 2013

भरे पेट का
स्वांग है प्रेम 
पेट भरता है
वह नया स्वांग रचता है |
उल्टियां होंगी
हम तो मर जायेंगे
और वे,उनका क्या 
वे तो अजगर को भी
निगल जायेंगे
सोचता हूँ
मेरी शव यात्रा में
क्या कंधें मिलेंगे चार ?
इतनी कोशिशें की
जुबान को लपेटे चाशनी में
ऊपर और ऊपर चढ़ते रहे
इतना लिखा
इतना पढ़ा
खूब छपे
क्या सब हो जाएगा बेकार ?

अलग दिखने की ख्वाइश में

अलग दिखने की ख्वाइश में
+++++++++++++++++++
हाथों और पैरों में
जंजीरें पड़ी हों
कैदी सा जीवन हो 
यह जीवन भी कोई जीवन है ? 
बंदिशें उन्हें बाध्य करती हैं
और वे बागी हो जातें हैं 
बंदिशें न हो पिंजरा खुला हो 
तो आकाश में उड़ने का सलीका
उन्हें खुद- ब- खुद आ जाएगा |
पशुओं से अलग दिखने के चक्कर में
हम उनसे बत्तर नहीं हो गयें हैं ?
गेहूँ के साथ
घुन पिस जाता है
अब इस कहावत को
बच्चे नहीं जानते
क्योकि अब
घर में आटा आता है |
चवन्नी के बराबर
रुपया हो गया
मूल्य में ही नहीं
आकार में भी
ठगे से.....
++++++++
ठगे से खड़े पेड़
निहारते हैं औरत को
जिसका चेहरा
इनके चेहरों से
मिलता हरा भरा
फल देते हैं
छाया देते हैं
वातावरण की सारी गन्दगी
खुद पी लेते हैं नीलकंठ
पेड़ हो या हो औरत
सबसे पहले
इन्हें ही काटा जाता है
कहते हैं कि
पहाड़ पर चढ़ने
और जंगल में घुसने के लिए
रास्ता बनाया जा रहा है |

शिव कुमार मिश्र की मौत पर

शिव कुमार मिश्र की मौत पर
+++++++++++++++++++
हिंदी , कैसी हिंदी
कहते हो भारत माँ की बिंदी
वे बिदा हो गए
उनकी शव यात्रा में
शामिल थे केवल १०, १५ लोग
शिव कुमार मिश्र रचनाकार थे  
कौन करता
उनकी शवयात्रा को प्रायोजित
मीडिया ने भी नहीं ली सुध
भाई अगर दूरदर्शन पर
यह खबर आ भी जाती
तो लोग करते कानाफूसी कि
यह शिव कुमार मिश्र हैं कौन ?
इस देश में रचनाकारों की
यही है कहानी
हम हिन्दुस्तानी ,हम हिन्दुस्तानी |   

Sunday, 4 August 2013

गुजरा हुआ वक्त हूँ
किसी भी दौड़ में
शामिल नहीं भयमुक्त हूँ
जैसे ही किसी दौड़ में
शामिल होते है आप
डर बना लेता है घर
आपको दीमक की तरह चाटता है 

चलो उस पार चलें

आज तो
सिर्फ औपचारिकताएं ही
औपचारिकताएं शेष हैं |
प्रेम और मित्रता
कहीं शून्य में
खोजती हैं अपना ठिकाना |
जब जब कहा 
चलो उस पार चलें
मुहं सिकोड़ कर
उसने कहा -
मुझे उस पार कतई नहीं जाना |
धर्म के नाम पर दुनियाँ भर में सिर्फ खून खराबे के सिवा और कुछ नहीं हुआ है और अब धर्म के नाम पर देश में हो रहा है धंधा ,शायद आपको भी दिखता होगा | धर्म ने कभी भी प्रकाश फैलाने का काम नहीं किया बल्कि अन्धेरे को और गहरा किया हैं | मंदिर और धर्म गुरुओं के शरण में जाकर अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति की आकांक्षा करना हमें ढोंगी बनाता है और हम समझतें हैं कि हम धार्मिक हैं |  

Saturday, 3 August 2013

रहने को काफी है कुटिया
आँखों में महलों के स्वप्न
क्यों, कैसे बस जाते हैं  |
आप बोतें हैं
एक छोटा सा बीज
बड़े बड़े पेड़ उग आते हैं |

अपने हो गए सपने

अपने हो गए सपने
+++++++++++++
अगर चले गए छोड़कर 
तो बेहतर होगा
लौटकर न आयें
सपने और अपने
हो सकता है
हम उन्हें लगें हो दुखने |
नदी तुम्हारी आँखों में
अपना घर बसा ले
होंठों पर तुम्हारे
खेलती रहे मुस्कान
जिन्हें हम लगे थे दुखने
वे अब अपने नहीं, हैं अनजान  |

Friday, 2 August 2013

साँप खून पीता है

साँप खून पीता है
+++++++++++
कोई याद करता है
तो अब हिचकियाँ नहीं आती |
सपेरे साँप लेकर
अब घर के दरवाजे पर नहीं आते
साँप को दूध पिलाया था कब
मुझे याद नहीं है अब
साँप बड़े बड़े महलों में रहने लगा है
दूध की जगह
अब वह खून पीने लगा है
सपेरे साँप के महलों में
दरबानी कर रहे हैं
साँप बीन बजाता है
और अब सपेरा साँप से डरता है |    
मुंडेर पर बोलता है कागा
तो अब आते नहीं मेहमान |
पशु,पक्षी और आदमी
सब के सब हो गए बेईमान |

क्यों आते हैं भूकंप ?

क्यों आते हैं भूकंप ?
++++++++++++
गुब्बारे की तरह
फूलना मुश्किल नहीं
मुश्किल है-
गुब्बारे की तरह हल्का हो जाना
हम जब फूलते हैं
कितने भारी हो जाते हैं |
हमारे बोझ से
कांपती है धरती
बिन बुलाए
चले आते हैं भूकंप |

Thursday, 1 August 2013

मित्रों जिंदगी में अनगिनत बार "सर" सुना है और न जाने कितनी बार "सर" कहा है कि अब  इस शब्द से दुर्गन्ध आती है | सेवानिवृति के पश्चात अब यह संबोधन मुझे आहत करता है इसलिए मेरा अनुरोध है कि मुझे दोस्त या मित्र कहकर संबोधित करें या "सर" के अतिरिक्त आप जो चाहें | मैं आशा कर सकता हूँ न कि मेरा अनुरोध मेरे मित्र मानेंगे ?
चढ़ाओ मत उढ़ाओ चादर
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मंदिर मस्जिद
और सूफियों की मजार पर
जो चादर
हम चढ़ाते हैं
वे फिर से बिकने के लिए
उसी दुकानपर चले आते हैं |
जितनी बार
वह चादर बिकती है
जिंदगी में
उससे कहीं ज्यादा बार
हम बिकते हैं |
मंदिर ,मस्जिद और मजारों पर
चादर चढ़ाने का यह सिलसिला
नहीं रूकेगा
और आदमी
मंदिर ,मस्जिद और मजारों के बाहर
भूख और ठण्ड से मरता रहेगा

Tuesday, 30 July 2013

जो जाल बुनते हैं
सबसे पहले जाल में
वे खुद फंसते हैं
और उन्हें यह सुविधा
जब चाहें जाएँ
और जब चाहें आएँ
नहीं मिलती