Tuesday, 28 July 2015

गनीमत है 
सपनों के गुनाह 
गुनाह नहीं होते 
वरना हम तो
बरसों से जेल में
सड़ रहे होते |
निष्काम कलाम तुझे सलाम

2)
कलाम से कलाम का धर्म किसी ने नहीं पूछा
उनसे जो मिला जब मिला झुककर सलाम ठोका

3)
अँधेरे से 
सूरज को डर लगता है
किया सलाम 
और कहा चलो कलाम 
ले गया सूरज 
उनको अपने घर
रोशनी के लिए |
फेसबुक अजायबघर है
आदमी और जानवर
दोनों को एक साथ देख सकते हैं आप
आदमी का बच्चा
जानवर को देखकर खुश होता है
जानवर का बच्चा
आदमी को जानवर समझता है  |

Sunday, 26 July 2015

भूखे कभी रहे नहीं
भूख पर लिखते बहुत हो
पैर में काँटा कभी चुभा नहीं
उनके दर्द में आहें भरते बहुत हो
वह मरा था तुम रोये बहुत थे
उनके मरने पर तुम मरते नहीं हो
ये कांटें नहीं हैं लेकिन चुभते बहुत हैं 
जिंदगी में शामिल ये अपने लोग हैं ||
घर होता है,
परिवार होता है
इनसे अगर थोड़ा वक्त बचा
तो मंदिर में बैठा भगवान होता है 
हमारी प्राथमिकताओं में देश का नाम नहीं होता |
इफ्तार पार्टियों की दौड़ में 
वे जोर-शोर से शामिल हैं
उन्हें किसी भविष्य-वक्ता ने बताया है 
जो इस दौड़ में प्रथम आयेगा
उसकी छत पर वोटों की बारिश होगी |
तब हमें 
होश आता है 
जब सब गुड़
गोबर हो जाता है |
तुम आगे
मैं तुम्हारे पीछे
एक ही दिशा में
लगातार चलते रहे
हमारे बीच
फासला बढ़ता रहा
पता ही नहीं चला
तुम मेरी निगाह से
कब ओझल हो गए ?
किसी भी धर्म से जुड़ा कोई भी पाखण्ड जिसमे हर वर्ष न जाने कितनी अनमोल जिंदगियों की हानि होती हो , ऐसे पाखण्ड को महिमामंडित करना जघन्य अपराध है |


एक तरफ डिजिटल इण्डिया का सपना दिखाया जा रहा है और दूसरी ओर रथ यात्रा के आयोजन का ढकोसला |




एक प्रेम कविता
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चन्द रोज और
फिर हम तुम दोनों
अपने अपने घेरों में कैद 
एक दूसरे की पहुँच से दूर
अनुपस्थित में भी
एक दूसरे से जुड़ जायेंगे
हम अचानक अपनी उम्रों से
बहुत छोटे हो जायेंगे |
मेरा बच्चा मुझे पापा
तुम्हारा बच्चा तुम्हे माँ
कहकर जगायेगा
अपनी तोतली भाषा में
हमें बड़े होने का अहसास कराएगा |
बार बार छोटे और फिर बड़े
होने की इस प्रकिया में
हम न छोटे और न बड़े ही रह पाएंगे
एक दिन दहलीज पर खड़े -खड़े देखेंगे क़ि
हमारे बच्चे
हमसे भी बड़े हो गए हैं ।
सबके पास अपने-अपने बुद्धिजीवी हैं |
यह जो नेता-परेता हैं सब परजीवी हैं ||
क्या कहना है ?
कैसे कहना है ?
कब कहना है ?
यह सब इन नेताओं के चाकर बुद्धिजीवी बताते हैं |




बुद्धिजीवी,
नपुंसक आक्रोश का जन्मदाता 
पिता की भूमिका नहीं निभाता |
प्यार नहीं है
हमारे तुम्हारे बीच
एक टूटा हुआ पुल है
जो प्यार की कहानी सुनाता है
लम्हें वही याद रह जाते हैं
जिन लम्हों में गुनाह किया जाता है  |

Saturday, 25 July 2015

नपुंसक केवल वही नहीं होते जो स्त्री के साथ सहवास करने में अक्षम होते हैं | नपुंसकों की भीड़ में एक नपुंसक मैं भी हूँ  और दो बच्चों का बाप भी हूँ  | हम - आप सभी नपुंसकों की इस भीड़ में अपने आपको खड़ा पाएंगे |  


2)
बच्चों को विकल्प सुझाने की बात करते हैं ,आप क्यों मजाक करते हैं  |
आज के बच्चे दस विकल्प सामने रखकर उनमें से एक चुनते हैं | उन्हें हम जब विकल्प सुझाते हैं तो वे मंद मंद मुस्कराते हैं |

Sunday, 19 July 2015

हाथ तुमनें बढ़ाया था
आगे बढ़कर मैंने उसे थाम लिया
फिर जो कुछ मेरे- तुम्हारे बीच हुआ
उसका सारा दोष तुमने मुझपर मढ़ा  |
ऊब, 
ऊब से बचने के लिए
दूब की शरण में एक अल्पविराम |




आते हैं 
तो डराते हैं 
इसीलिए नींद में 
अब सपने नहीं आते हैं |





व्यापम घोटाला 
सिलसिलेवार इतनी मौतें 
अब तो शक होता है 

मौत है या कहीं कोई हत्यारा छिपा है ?




वे पाखंडों को धर्म मानते हैं
सांप बीन की धुन पर नाचते हैं



एक तरफ डिजिटल इण्डिया का सपना दिखाया जा रहा है और दूसरी ओर रथ यात्रा के आयोजन का ढकोसला |



इफ्तार पार्टियों की दौड़ में 
वे जोर-शोर से शामिल हैं
उन्हें किसी भविष्य-वक्ता ने बताया है 
जो इस दौड़ में प्रथम आयेगा
उसकी छत पर वोटों की बारिश होगी |





अच्छे दिनों का इंतज़ार 
६८ बरस किया 
२५ बरस और कर लेंगे 
हम नहीं जी सके तो क्या 
हमारे बच्चे तो सुख-चैन से जियेंगे 
जो पेड़ हम लगाते हैं
उसके फल तो आखिर हमारे बच्चे ही खाते हैं |