Friday, 28 February 2014

न कोई आया 
न कोई गया 
जिंदगी ठहर सी गयी |
जो आया 
उसे रोका नहीं 
जो गया 
उसे टोका नहीं |
जिंदगी ठहर न जाए फिर कहीं 
इसलिए चलता रहा,चलता रहा 
वह खुद कहीं रुका ही नहीं | 

Thursday, 27 February 2014

पशु-पक्षियों में नर नारी को रिझाता है, इंसानों में यह व्यवस्था कब और क्योंकर बदली  |


दरक जाता है कांच फिर जुड़ता नहीं  |
अपनी रचना के प्रति मोह अपनी संतान के प्रति मोह जैसा ही होता है और इस मोह से मुक्त होना असम्भव न भी हो तो मुश्किल तो अवश्य ही है | कोई ऐसा रचनाकार बताइयेगा जिसने अपने लिखे पूरे उपन्यास की पांडुलिपि फाड़ कर फेक दी हो | आधी अधूरी लिखी कविताओं के प्रति वह मोह नहीं होता, जब कोई कवि अपनी लिखी किसी रचना को कविता मान लेता है तब उसके लिए उसे फाड़कर फेंक देना आसान नहीं होगा शायद |  
लिखना और पढ़ना
कुछ ऐसा ही है जैसे
घर में कूड़ा इकट्ठा करना |
वेद-पुराण और न जाने कितने
धर्मग्रन्थ रच डाले
कुछ पूजते रहे
कुछ ने रट डाला
एक भी न मिला ऐसा
जिसने हो इसको जीवन में ढाला
कोरा तन,मन काला जय गोपाला |

Wednesday, 26 February 2014

प्रकाश
अन्धकार को
अन्धकार प्रकाश को
दोनों एक दूसरे को ढूंढ रहे हैं  |
अनंत काल से
लुका-छिपी का खेल खेल रहे हैं  |



चुक जानें के बोध से उत्पन्न ग्लानि से बचने के लिए लिखनें की कोशिश करता हूँ ,न लिख पाता हूँ ,न चुक जाने के बोध से बच पाता हूँ |


अक्सर पाठक रचना में वह अर्थ खोज लेता है जो अर्थ रचनाकार के दिमाग में कभी कौंधा ही नहीं |

जिन बच्चों को 
खिलौनें नहीं मिलते 
खिलौनें तोड़ने में 
वे रस पाते हैं अभागे 
रिश्तों की लम्बी कतारों में 
खुद को 
नितांत अकेला पाते हैं |


महिलाओं से अगर पुरुष से उनकी अपेक्षाएं पूछी जाएंगी तो वह सच नहीं बोल पाएंगी | महिलाएं सच बोलने से डरती हैं क्योकि वे जानती हैं कि पुरुष में महिलाओं का सच सुनने की सामर्थ्य नहीं है | पुरुष महिलाओं का सच सुनने से डरता क्यों है 


Tuesday, 25 February 2014

वे दो औरते
अहंकार से भरी
आमने-सामनें खड़ी
दो औरते
जब एक ही पुरुष से
खुराक पाती हैं
तब योहीं एक दूसरे के सामनें
अकड़ कर खड़ी हो जाती हैं |

2)

वे दो पुरुष
एक दूसरे के सामनें
बुझे-बुझे से हैं खड़े |
दो पुरुष
जब एक ही औरत से
खुराक पाते हैं
तो न जानें क्यों
योहीं बुझ जाते हैं |
अपने पक्ष को परदे में छिपाकर रखना उचित नहीं जान पड़ता हैं | हाँ, इसमें एक सुविधा तो रहती है कि हम कभी भी अपना मुखौटा बदलकर सत्ता के पक्ष में खड़े हो सकते हैं |

हम क्यों चाहते हैं कि सभी हमारे मत का समर्थन करें ? और जो हमारे मत का समर्थन नहीं करते हम उन्हें अपना विरोधी क्यों मान लेते हैं ?
परछाइयाँ 
गुम होने से पहले
हम घर पहुँच पाएँ 
दें दुआएँ
सिंघल महराज का कहना मानिये
बड़ा आसान सा नुस्खा है 
पांच-पांच बच्चे पैदा कीजिये 
दस साल उनकी परवरिश कीजिये 
फिर एक को पंचर जोड़ने में लगाईये 
दूसरे को घरेलू नौकर के काम पर 
तीसरे को बेयरा 
चौथे को हलवाई की दुकान पर 
और पांचवें को ड्राईवर |
पंद्रह सालों में 
आपके घर की आमदनी दस गुना
और फिर चैन की बंशी बजाइये |
सिंघल महराज के गुन गाइये
आप किसी को अछूत मानोगे ,अपने पास बैठने नहीं दोगे,खुद को श्रेष्ठ मानोगे और उसे हेय दृष्टि से देखोगे | धर्म परिवर्तन का सारा श्रेय हमारी इस कमीनी सोच को जाता है ,इसे बदलने की जरूरत है | क्या आज तक किसी ब्राह्मण या तथाकथित उच्च जाति के किसी व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन किया है ?
कोई गुदगुदाए
और चेहरे पर हँसी पसर जाए |
उनकी उँगलियों में
अब वह बात कहाँ रही ?


अवधेश निगम 

Monday, 10 February 2014

दिन ने
सूरज का गला घोट दिया
और सूरज ने खून उगल दिया
शाम के धुँधलके में हुई
इस ह्त्या का कोई गवाह
आज तक नहीं मिला   | 
रात,
दिन भर
खोजती रही खुद को  
दिन थक गया
तो रात के आगोश में
चुपचाप सो गया  |

Sunday, 9 February 2014

वे अभी अभी तो आयें हैं
अभी थोड़ी देर और रोको
अभी तोड़ने को
बहुत कुछ बचा है
जब तक वे खुद न टूट जाएँ
उन्हें तोड़ने दो
उन्हें रचने दो तोड़ने का इतिहास  |

Saturday, 8 February 2014

कई बार बहका है मन
जब जब बहका है
भीग कर लौटा है मन  |
कुछ दिनों तो
सहमा-सहमा सा रहता है
फिर-फिर बहकता है मन
हर बार
भीग कर लौटता है मन ?????
घुप अँधेरे में
जुगनू
लोगों के चेहरे नहीं दिखाता
रास्ता दिखाता है
मंज़िल तक पहुँचाता हैं |
बड़े जतन से 
छिपा के रक्खा था 
जिस पंछी को
उड़ गया 
दर्द 
पारे सा छितरा गया
न कुछ तुमसे लिया 
न कुछ तुम्हें दिया 
तुम्हारी सहमति के बगैर 
तुम्हें अपना मान लिया 
यह गुनाह तो मैंने किया |
मैंने तुम्हें
तुमनें मुझे
विकल्प के तौर पर चुना
तुम मेरे लिए
मैं तुम्हारे लिए
विकल्प ही बने रहे
जिंदगी चुक गयी
किन्तु/परन्तु घर नहीं बना
क्यों हमनें एक दूसरे को
विकल्प के तौर पर चुना ?
वे हांफ रहे थे
लेकिन भाग रहे थे
मारीचिका दौड़ाती है
जिजीविषा नहीं है यह |

Sunday, 2 February 2014

बातें होती रहीं प्यार की
युद्ध होते रहे
चाँद की रोशनी में वे
कन्धों पर लाशों को ढोते रहे
प्रतिद्वन्तिता के इस दौर में
एक दूसरे के कन्धों पर
चढ़नें की कोशिश में हम
होती रहीं बातें प्यार की
युद्ध होते रहे हर दौर में  |
वे दो औरते
अहंकार से भरी
आमने-सामनें खड़ी
दो औरते
जब एक ही पुरुष से
खुराक पाती हैं
तब योहीं एक दूसरे के सामनें
अकड़ कर खड़ी हो जाती हैं  |

           2)

वे दो पुरुष
एक दूसरे के सामनें
बुझे-बुझे से हैं खड़े |
दो पुरुष
जब एक ही औरत से
खुराक पाते हैं
तो न जानें क्यों
योहीं बुझ जाते हैं  | 

Saturday, 1 February 2014

बातें होती रहीं प्यार की
युद्ध होते रहे
चाँद की रोशनी में वे
कन्धों पर लाशों को ढोते रहे
प्रतिद्वन्तिता के इस दौर में
एक दूसरे के कन्धों पर
चढ़नें की कोशिश में हम
होती रहीं बातें प्यार की
चाय की चुस्कियों के दौर चलते रहे  |

2)

बातें होती रहीं प्यार की
युद्ध होते रहे
चाँद की रोशनी में वे
कन्धों पर लाशों को ढोते रहे
प्रतिद्वन्तिता के इस दौर में
एक दूसरे के कन्धों पर
चढ़नें की कोशिश में हम
होती रहीं बातें प्यार की
युद्ध होते रहे हर दौर में  |