जन्नत में हूरों को पाना चाहते हो या जमीं पर अपने बच्चों का साथ अब खुदा के खिलाफ हो जाने का वक्त है |
बंजर खेतों में
पेड़ की छाया ढूंढते हो
नासमझ हो,
समुन्दर में किनारा ढूंढते हो |
Thursday, 21 April 2016
ईश्वर ने सुन्दर पृथ्वी बनाई
लेकिन पृथ्वी की सुंदरता को चरने के लिए
इंसानों को भेजकर ईश्वर ने बड़ी गलती की,
पता नहीं ईश्वर पश्चाताप की अग्नि में जल रहा है या नहीं ?
Saturday, 16 April 2016
तुम्हें मालूम नहीं विचारधारा की लाश पर नृत्य करते हुए तुम कितने भोंडे लगते हो |
बदलना होगा हमें भी, तुम्हें भी जीतने के लिए दोनों का बचे रहना जरूरी है सह-अस्तित्व ही है एकमात्र विकल्प |
हमारे या तुम्हारे का भेद मत करो,
धर्म की व्यूह रचना को समझो
और उससे निकलने का उपाय खोजो
वर्ना अभिमन्यु की तरह मारे जाओगे |
अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने की होड़ लगी है
हमारे या तुम्हारे का भेद मत करो,
धर्म की व्यूह रचना को समझो
और मिलकर उससे निकलने का उपाय खोजो |
Friday, 15 April 2016
प्रत्यूषा बनर्जी के नाम =============== जिंदगी दे दी जिसके लिए तूने वह तेरे प्यार के काबिल नहीं था ज़िंदा रहकर सारी उम्र उसे सताती इसके लिए उम्र भर तेरा मुस्कराना जरूरी था |
गालियाँ अध-कचरे लोग देते हैं, भक्त लोग केवल प्रशंसा करने में व्यस्त रहते हैं , किसी विचारधारा विशेष से जुड़े लोग पार्टी के प्रवक्ता मात्र होकर रह जाते | मैं न बुद्धिजीवी हूँ ,न किसी का भक्त |६४ वर्ष की पकी उम्र में केवल सूरज का उगना और उसका अस्त होना दिखाई देता है किसी भी रंग का हो चश्मा आपको दुराग्रही बनाता है |
चीन में
४ जून १९८९ थियानमेन चौक पर
हज़ारों लोगों का क़त्ल
रूस में स्टालिन द्वारा लाखों लोगों का कत्ल
समझ गए
या फिर समझाना होगा लाल सलाम का अर्थ |
सलाम ही काफी था,
इंसानी खून से उसे लाल करने में उन्हें शर्मिंदगी नहीं हुई |
अपनी मांगों के समर्थन में
इकट्ठे हुए लोगों का मौत के घाट उतारना , क्या दरिंदगी नहीं हुई ?
अच्छी हो या हों बुरी स्मृतियों को मिटाने की जुगत करो और सुख चैन से जियो स्मृतियाँ ही तो हैं जो आपके चेहरे पर उदासी पोत जाती हैं |
अपनी विद्ता से लोगों को निरुत्तर कर देने से समस्याओं का समाधान नहीं होता | आज देश की तमाम समस्याएं बाबा साहब आंबेडकर की अदूरदर्शिता का परिणाम हैं | जातीयता निश्चित ही एक समस्या है और बाबा साहेब की अदूरदर्शिता से अब यह पहाड़ की तरह से अड़ी खड़ी है | अम्बेडकर द्वारा दिलाई एक भी प्रतिज्ञा बहुजनों को याद नहीं रह गयी है वे सब भी भ्रष्ट्र हिन्दुओं की तरह ही व्यवहार करते है और आर्थिक रूप से संपन्न बहुजन तो बिलकुल ब्राह्मण की तरह व्यवहार करने लगता है | जब तक वह पास नहीं है/ तभी तक ऐसा लगता है/ उसके पास आ जाने पर/ सुकून भागा-भागा फिरता है / सुकून केवल एक मनःस्थिति है / किसी के पास होने और न होने से इसका सम्बन्ध जोड़ना मेरी समझ में नहीं आता | आज़ादी के बाद सत्ता मिलते ही देश प्रेम का बुखार धीरे-धीरे उतरने लगा और देश को लूटने का सिलसिला शुरू हुआ | इमरजेंसी के बाद जय प्रकाश नारायण और लोहिया के चेलों के हाथ सत्ता आई तो उन्होंने और जम कर लूटा | आज़ादी के बाद भारत का इतिहास लूटेरों की वीर गाथाओं से अटा पड़ा है | पैदाइश से निर्धारित होता है हमारा धर्म | जब हम सोचने समझने लायक होते तब तक हम हिन्दू या मुसलमान हो चुके होते हैं | इसलिए यह कहना " जब तक सोच समझ न लो, तब तक मज़्हब अख्तियार मत करो" एक सोचा समझा हथकंडा ही है |.
कार्ल मार्क्स का है बाप कन्हैया वामपंथ का भारतीयकरण हो गया भैया | ता था थैय्या, ता था थैय्या मार्क्स से बड़ा हो गया कन्हैया वामपंथ के भारतीयकरण की तैयारी है मार्क्सवाद की जगह लेगा अब वादकन्हैया ता था थैय्या, ता था थैय्या न लाल सलाम न भगवा प्रणाम हम सब, लातों के देवता हैं कसनी होगी लगाम |
भारत माता की जय कहने से भूख,गरीबी और बेरोजगारी से नहीं मिलेगी आज़ादी देश के टुकड़े करने और अफ़ज़ल गुरु की बरसी मनाना ही है एक मात्र समाधान सभी को मिलेगा रोटी कपड़ा और मकान |
खोने और पाने का यह अजीबो-गरीब रिश्ता मुझे आज तक समझ नहीं आया तुम्हें पाने के बाद खोने का अहसास कुछ और गहराया |
उदासी बांटना अपराध है और इस अपराध को करने से बचा जा सकता है | अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्षधर अपने से इतर विचारधारा वालो को यह आज़ादी देने के पक्षधर नहीं होते | दोगलापन तो हर स्तर पर विद्यमान है | अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करने वाले अपने घर में अपने बच्चों को अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं देते | पंचसितारा होटलों में बैठकर स्कॉच व्हिस्की के साथ मुर्गी की टांग चबाते हुए भूख के खिलाफ सर्वहारा के पक्ष में आंदोलन की रूपरेखा बनाते हुए लोगों को आपने भी देखा ही होगा | आप और हम पूरा समाज इस दोगलेपन का शिकार है, हमाम में सब है नंगे |
मंदिर कौन बनवाएगा ?
भोग कौन लगाएगा ?
उनकी पूजा-अर्चना में
अपना वक़्त कौन गंवाएगा ?
कौन उनकी आरती उतारेगा ?
परमपिता परमेश्वर के पद पर
उन्हें किसने बैठाया ?
वह हम नहीं तो और कौन ?
हमें नहीं
ईश्वर को हमारी जरूरत है |
Thursday, 7 April 2016
वह न हँसता है न रोता है चुपचाप रहता है उसके अंदर कही कोई समुन्दर बहता है आंसुओं ने आँखों का दामन छोड़ दिया है अब उनमें एक ख्वाब पलता है |
जिसका सिरा ही गुम है वह गुमशुदा कमबख्त हम हैं | जिनकी हथेलियों में छाले नहीं पड़े वह कमबख्त कामगार हम हैं |
तुम भी अंधे,वह भी अंधा भक्तों ने बाँट लिया है देश परिंदे तो देश छोड़ गये दिखता चारो ओर दरिंदा तुम भी अंधे,वह भी अंधा बना लिया है राजनीति को धंधा |
घुप अँधेरे में जो छोड़ देती है साथ मेरी परछाईं मुझसे पूछती है मेरा पता |
कौन कहता है कि हम संवेदनहीन हो गए है ? किसी की ह्त्या होने या किसी के आत्महत्या करने पर हम उसकी जाति और उसका धर्म जानने में थोड़ा भी विलम्ब नहीं करते | हमारी एक आवाज़ पर लाखों लोग मोमबत्तियां लेकर जंतर-मंतर पर इकट्ठा हो जाते हैं | लाशों के लिए ऐसा जज्बा आपने कभी देखा हो तो बताएं ? संवदेनहीन होने का इल्जाम बेमानी है प्रगतिशीलता की यही तो निशानी है |
न लाल सलाम न भगवा प्रणाम हम सब, लातों के देवता हैं कसनी होगी लगाम |
वाजिब सवाल उठाये ही नहीं जाते हैं बड़े-बड़े सूरमा देश के लिंग निर्धारण में व्यस्त हो जाते हैं |
दोगलापन तो हर स्तर पर विद्यमान है | अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करने वाले अपने घर में अपने बच्चों को अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं देते | पंचसितारा होटलों में बैठकर स्कॉच व्हिस्की के साथ मुर्गी की टांग चबाते हुए भूख के खिलाफ सर्वहारा के पक्ष में आंदोलन की रूपरेखा बनाते हुए लोगों को आपने भी देखा ही होगा | आप और हम पूरा समाज इस दोगलेपन का शिकार है, हमाम में सब है नंगे |
खोने और पाने का यह अजीबो-गरीब रिश्ता मुझे आज तक समझ नहीं आया तुम्हें पाने के बाद खोने का अहसास कुछ और गहराया |
विचारधारा का बंदी बनकर रहना
और फिर नदी में तैरने की ख्वाईश करना
बंधे हुये हैं हाथ तुम्हारे फिर लिखते कैसे हो ?
पैरों में पड़ी हुईं है बेड़ियां फिर चलते कैसे हो ?
हाथ बंधे हुये हो
पैरो में पड़ी हों बेड़ियां
तो नित्यकर्म निपटाना मुश्किल हो जाता है
अभिव्यक्ति की आज़ादी
भूख से आज़ादी
देश के सौ टुकड़े करने की बड़ी-बड़ी बातें करते कैसे हो ?