Wednesday, 27 February 2013

यादें बाँझ होती हैं
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यादों के पीछे मत भागो
यादें बाँझ होती हैं
वक़्त है अभी
भागो सूरज को पकड़ो
सवार हो जाओ
सूरज के रथ पर
थाम लो उसके रथ की कमान
इसके पहले कि
हो जाए जिन्दगी की शाम |
आईने में
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झूठ से
मत करो आहत
सच की मार से
लहुलुहान होना चाहती हूँ |
मैं औरत हूँ
आईने में
अपने अक्श से भी डरती हूँ
लेकिन तुम्हारे लिए
उसी आईने के सामने
जिंदगी भर संवरती हूँ |
मैं औरत हूँ
आईने में
अपने अक्श से भी डरती हूँ |

पकड़ा है तुम्हारा झूठ
कई बार
इसीलिए हर कदम
फूँक फूँक कर रखती हूँ
सच की मार से
लहुलुहान होना चाहती हूँ
तुम्हारे झूठ से डरती हूँ |
वो अगर जोखिम उठाने को तैयार है !
उसके लिए पूरा-का-पूरा आसमान है !!  
दोस्त हैं
दोस्तों से
कैसी क्षमा याचना ?
दोस्त सभी
खुश रहें आबाद रहें
करता हूँ यह प्रार्थना |
मुर्दे ही मुर्दे
दिखते चारो ओर
जिन्दा तो सो गए
अपना कफ़न ओढ़
लोग क्या कहते हैं मत सोचो
अपने भीतर देखो
अंतरात्मा झूठ नहीं बोलती
सबके भीतर एक आईना है
उसमें अपनी तस्वीर साफ़ दिखती है |

Tuesday, 26 February 2013

कैसा घर ?
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यह न तेरा घर है
न मेरा घर है
जिसे "घर" समझकर
बसाया था
उसमें न मै आया
न वो आया |
बसा बसाया घर
हो गया पराया
अब हम दोनों "बेघर" हैं | 
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता !
भीड़ का कोई पता नहीं होता !!

डुगडुगी बजाकर भी जुटा लेते हैं भीड़ !
जिनका खुद अपना कोई पता नहीं होता !!

Monday, 25 February 2013

हिंदी राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने वाले अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में ही पढ़ाते हैं और घर में अपने नौकरों से भी अंग्रेजी में ही बात करना पसंद करते हैं |
हम दोगले
हमारी सरकार दोगली
दोगले हमारे संस्कार 

Sunday, 24 February 2013

हम दोगले
सरकार दोगली
दोगले हमारे संस्कार
दूसरों को दोष देने की
जरूरत नहीं है हुज़ूर
आखिर हम सब
क्यों खाना चाहते हैं खजूर
गंदा है तो क्या, धंधा है ?
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धंधा है जी धंधा है
गंदा है तो क्या, धंधा है ?
साहित्यकार पैसा देकर किताब छपवा रहे हैं
और प्रकाशक मज़े से मलाई खा रहे हैं
धर्म गुरु लोग टी.वी पर कृपा बरसा रहे हैं, तो क्या ?
अरे भाई धंधा है
गंदा है तो क्या ?
नेता वोट के लिए नोट बरसा रहे हैं
और वोटर अपने वोट की कीमत पा रहे हैं
अरे भाई यह तो धंधा है
गन्दा है तो क्या ?
अरे भाई सब ठीक तो चल रहा है
तुम्हारा दिल क्यों जल रहा है ?
कहते है किसी देश की प्रगति उसके आर्थिक विकास पर निर्भर है
आर्थिक विकास के लिए जरूरी है
धंधा ठीक चले
और इस देश में
गंदे है तो क्या ?
सारे धंधे ठीक से चल रहे हैं
देश की प्रगति निश्चित है |
स्त्री -पुरुष विमर्श
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पुरुष कभी नहीं थकता
स्त्री कभी नहीं थकती
"स्त्री-पुरुष" युग्म थकता है
थकना तो एक बहाना है
क्योकि "घर"
रास्ते में आता है |   
मैं और मेरे पैर
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 मैंने रुकने की
बात की ठहरने की
पैरों को मेरे पता चल गया
मेरे इरादों का
पहली बार जाना कि
 पैरों के भी अपने कान होते हैं
हमसे अलग भी है पैरों का अस्तित्व
हौले से मेरे पैरों ने
मुझे जगाया
प्यार से माथे को सहलाया
और बड़े मद्धिम स्वर में
करने लगे विनती -
 हम थके नहीं हैं
फिर तुम क्यों करने लगे
रुकने की बात
ठहरने की बात
मैं डर गया
पैरों को माथे से हटाया
मैंने सुना था
पैर जब
माथे पर उग आते हैं
रुकते नहीं
भागते हैं आसमान की ओर
 मेरी इस हरकत पर
पैरों को बड़ा गुस्सा आया
पैर मुझसे अलग जाकर
हो गए खड़े
और गुर्राते हुए बोले -
 हम तुम्हें छोड़कर चले जाते हैं
रेंगते रहो उम्रभर
या रुके रहो
हम उनके पास जायेंगे
जो हमारे सामने शीश नवायेंगे
 हम उनको लेकर उड़ जायेंगे
तुम रुके रहो
सच ही तो है
पैरों को वहीँ होना चाहिए
जहाँ उनकी हो जरूरत
आखिरकार मैंने
रूठे हुए पैरों को मनाया
रुक जाने के
अपने इरादों की
खिल्ली उड़ाता हुआ
पैरों को माथे से लगाया
पैर खुश हैं कि वे जहाँ थे वहीँ हैं
मैं खुश हूँ कि मुझे चलते ही रहना है |


 

Friday, 22 February 2013

आईने में
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झूठ से
मत करो आहत
सच की मार से
लहुलुहान होना चाहती हूँ |
मैं औरत हूँ
आईने में
अपने अक्श से भी डरती हूँ
लेकिन तुम्हारे लिए
उसी आईने के सामने
जिंदगी भर संवरती हूँ |
मैं औरत हूँ
आईने में
अपने अक्श से भी डरती हूँ
पकड़ा है तुम्हारा झूठ
कई बार
इसीलिए हर कदम
फूँक फूँक कर रखती हूँ |
सच की मार से
लहुलुहान होना चाहती हूँ |
 
आईने में औरत
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चालाक औरत
आईने में
अपने अक्श को भी
नापसन्द करती है |
वह बेचारी है
अपने आप से
बहुत डरती है |
सावधान रहना
चालाकी नहीं है
वह जानती है कि
सावधानी हटती है
और दुर्घटना घटती है |

Monday, 18 February 2013

मत काटो पेड़
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काट कर फेंक दिए पेड़
धरती के चेहरे पर
पोत दी कालिख |
गधे तक रो रहे हैं
एक हम हैं जो
ड्राइंग रूम में
सोफे पर बैठ कर
हँस रहे हैं |
हम नहीं जानते कि
एक पेड़ को काटना
एक बच्चे को मारना है |
मत बोलो सच
सच बोलने के बाद
तुम कितने अकेले हो जायेगे
इसका तुम्हें अंदाज़ा नहीं है
मैं जानता हूँ
इस बार तुम
मेरी बात नहीं मानोगे
उसके बाद
मेरे क़दमों पर
कदम रखकर आगे बढ़ोगे
और तरक्की करोगे 

Thursday, 7 February 2013

जिंदगी का सफ़र
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हम हों
किसी भी उम्र के
रूमानियत लुभाती तो है |
दूर से ही सही
आज भी वो
मुझे बुलाती तो है |
जिंदगी का यह सफ़र
खत्म होने को है
आज भी मेरी आवाज
उन तक जाती तो है |
रेल की पटरियों सा ही सही
आज भी
मेरा कोई साथी तो है |

Tuesday, 5 February 2013

शब्द योग
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शब्द
जिनके आसरे थे
वे आसमान पर चढ़े
शब्द गिर पड़े
कुत्ते भोंकते है और अंततः लोगों को नींद से जगाने का काम ही तो करते हैं बेचारे |
उन्हें गाली मत दो
उन्हें पुचकारो
फिर वे दुम हिलाने में भी तो देरी नहीं करते
वे अपनी आदतों के मारे हैं बेचारे     |
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फिर फतवा
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उन्होंने एलान कर दिया कि
बेटियाँ अपने चेहरे से
नकाब उठायेंगी नहीं
वे किसी जलसे में
गाना गायेंगी नहीं |
वे सोयेंगी भी
तो नकाब ओढ़कर ताकि
उनके सपनों में भी
कोई सपना आने न पाए
नींद में भी
वे मुस्करानें न पाएं |
दर्पण में
अपने आप को देखेंगी
नकाब ओढ़कर
किसी को भी अपना चेहरा
दिखाएंगी नहीं |
अपने आप से
अपना चेहरा
छिपाने का दस्तूर
बहुत पुराना है |
वह न अंधा है ,न काना है
हिन्दू का हो या मुसलमान का
यह पुरुष
बहुत सयाना है |  

Sunday, 3 February 2013

एकांत में
मेरा अस्तित्व काँपता है
भीड़ में
मेरा व्यक्तित्व काँपता है
आओ
एकांत और भीड़ से बचे
घर चलें |