Tuesday, 24 March 2015

मन उचाट है 
दिख रहा था जो बगीचा गायब है
अब सामने सफाचट मैदान है |
तुम व्यापारी होते चले गए 
मुझसे कहा 
तुम दोस्त बने रहना 
यहीं ठहरो लौटकर आता हूँ 
मैं वहीँ खड़ा हूँ
फुर्सत मिले तो लौटकर आना
मेरे दोस्त को जरूर साथ लाना |
लम्बी उम्र जी चुका 
अब इससे बू आती है 
कमबख्त मज़हब को 
मौत क्यों नहीं आती है ?
धारा ६६ ए रद्द 
इसका मतलब यह नहीं है कि
अब दें दनादन गाली 
बहकना मत 
आज़ादी जब मिलती है 
तो दायित्व बढ़ जाता है |
हम 
छोटे से बड़े होकर 
बेटे से बाप बन जाते हैं
हमारे भीतर का बच्चा 
कभी नहीं मरता |


2)
कब्रगाह नहीं है 
शब्दकोश
शब्दों का कोष है 
शब्द, 
शब्दकोश से बाहर निकलता है
हमारा वर्तमान गढ़ता है
सच कहा-
हर भूत का एक वर्तमान होता है |
तुमने 
ढेरों इल्जाम लगाए 
कुछ नहीं कहा 
चुप रहा 
बोलता अगर तो
मेरा सच ही झूठ साबित हो जाता
शून्य में शून्य जोड़ा 
शून्य पाया 
शून्य से शून्य घटाया 
फिर वही शून्य 
शून्य को शून्य से डिवाइड किया 
भागफल शून्य ही आया |
बिरले होते हैं
जिन्हें असहमति के स्वर भाते हैं
झूठी प्रशंसा को भी
लोग सत्य मान लेते हैं
प्रशंसा ऐसा ज़हर है
जिसे हँसते-हँसते लोग पी जाते हैं |

Monday, 23 March 2015

बुद्धिजीवियों की
अंकशायिनी बनकर रह गयी है
काश,
कविता भीड़ का हिस्सा बन पाती
हंसती- हंसाती
रोती- रुलाती
अपनों के बीच पहुँचकर  सुरक्षित हो जाती  |

Thursday, 19 March 2015

स्त्री,
बार-बार आहत होती है
और हर बार
पुरुष को माफ़ कर देती है
आहत पुरुष ,
स्त्री को कभी माफ़ नहीं करता |

Monday, 16 March 2015

मंदिर को
मुसलामानों ने हथियाया
या हिन्दुओं ने मस्जिद को गिराया
इन बातों का अब कोई अर्थ नहीं है
अब देखना यह है कि
आमजन के हिस्से की रोटी को किसने चुराया
और मंदिर और मस्जिद ने
हमेशा उस चोर के पक्ष में ही क्योंकर फैसला सुनाया ?
इस मंदिर और मस्जिद के चक्कर में
केवल और केवल आमजन का खून बहाया, आखिर क्यों ? 
जो हमारे पास होता है
हम उससे ऊब जाते हैं
जो हमारे पास नहीं है
हम उसी के गीत गाते हैं
जो हमें भूल जाते हैं
वे ही हमें याद आते हैं
जिंदगी का यही तो फ़साना हैं
किसी को याद रखना है
किसी को भूल जाना है  | 

Sunday, 8 March 2015

तुम पुरुष हो
पुरुष ही रहोगे
बदलता कोई भी नहीं है
स्त्री है स्त्री ही रहेगी
और तमाम उम्र
तुम्हे योहीं ठगती रहेगी
अपने खुरदुरे स्पर्श से
स्त्री की पीठ पर खरोंच कर खुश हो तुम भी |

जिनके पेट भरे हैं
देते हैं निरर्थक बयान
और खाली पेट वाले
रोटी की लालच में
बयानों पर भरोसा कर लेते हैं
इस तरह वे खाली पेट वालों से
रोटी को कुछ और दूर कर देते हैं
जिनके पेट में रोटी पहुँच जाती है
वे सब बयान देने वालों की टोली में
शामिल होकर धार्मिक हो जाते हैं
और इन बयानों के दम पर
मंदिर और मस्जिद परिसर में भीड़ जुटाते हैं |

Sunday, 1 March 2015

साहित्य में "कुनबावाद" प्रभावी है | पूरा का पूरा कुनबा साथ-साथ चलता है | कवि ,प्रकाशक और आलोचक  अब इस कुनबे में पाठक भी जुड़ने लगे हैं |
पूरा का पूरा तंत्र
साहित्य में भी जनतंत्र
कविता
अगर व्यवस्था के साथ चलेगी
तभी तो पुरष्कृत होगी
साहित्य आईना है तो
कविता भी तो कीचड़ में सनी ही दिखेगी  |
हाथ की रेखाएँ
मंज़िल तक नहीं पहुंचाती
पैरों पर भरोसा करो और चलो |
लहरे एक जुट नहीं होती
भरोसा मत करना
एक के पीछे
दूसरी आती है
तट आते ही बिखर जाती हैं |