Thursday, 29 June 2017

प्रकृति के साथ होना ,खुद के पास होना है ,
बरसों बीत जाते हैं खुद से मिलना नहीं होता है |
आज भी 
जंगल में कायम है 
आदमखोर शेर का दबदबा 
न कुछ बदला है, 
न कुछ बदलेगा 
जंगल है बेहद बीहड़
और हम सबके अंदर बैठा है गीदड़ |
मिले नहीं
बाकी रही कशिश
क्या यही प्यार है ?
मिल जाने पर
सब गुड़ गोबर हो जाता है
प्यार कहाँ खो जाता है ?
हमारे सपनों में
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जो हमारे पास होते हैं
वो
हमारे सपनों में नहीं आते |
जिनको पाने
और पास लाने की
उम्मीद अभी बाकी है
वे भी
हमारे सपनों में नहीं आते |
जिनको पाने
और पास लाने की
तिनका भर
उम्मीद नहीं होती
वे हमारे सपनों में
बेख़ौफ़ चले आते हैं |
हमारे पास होते हैं जो
वो हमारे सपनों में
कभी नहीं आते |
चिड़िया नहीं जानती 
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बच्चे जब 
उड़ना सीख लेते हैं 
घोसला छोड़ देते हैं 
घोसला वीरान,चिड़िया अकेली
तलाशती है चिरौटा
बार बार अपना पेट भरती है
सोचती है -
अब इस बार
बच्चों को उड़ना नहीं सिखाएगी
घोसले के बाहर का आकाश
उन्हें नहीं दिखायेगी |
चिड़िया नहीं जानती कि
बच्चे खुद ब खुद
उड़ना सीख लेते हैं
पेट के लिए
घोसला छोड़ देते हैं |
हम सब
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अन्धे
हमें रास्ता दिखाते हैं
हम अपनी आँखें बंद किये 
उनके पीछे पीछे चले जाते हैं |
अन्धे का कहना है
ईश्वर ने मुझे दर्शन दिया
और बदले में मुझसे मेरी आँखे ले लिया
उन्हें आँखें देना गंवारा नहीं
इसलिए अपनी आँखों को
खुद ही अपने हांथों से मूँद लिया |
अन्धें ने पूछा
तुम सबको ईश्वर दिखता है
सब करने लगे हुवां हुवां |
१९८२ में लिखी एक प्रकाशित कविता | यह वह समय था जब कविता में विद्रोह की बातें ही बातें थी |
नपुंसक विद्रोह
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तुम जानते हो
व्यवस्था की सामर्थ्य 
इसीलिए व्यवस्था को
नपुंसक कहते हुए
तुम काँप रहे हो |
अभाव से पैदा होनेवाला
विद्रोह नपुंसक है
चंद सिक्कों में बिक जाता है |
जिसे तुम
समुचित विद्रोह कहते हो
वह व्यवस्था के सामने
भिक्षा की मुद्रा में फैला हुआ
एक भिखारी का हाथ है
और तुम्हारा सारा विद्रोह
व्यवस्था का अंग बनने के लिए
एक योजनाबद्ध प्रयास है |
अब बताओ मेरे दोस्त
कविता क्या है ?
उन गहराइयों में
जहाँ भाषा खो जाती है
तुम ढूढते रहे शब्द |
कब कौन 
चला आता है दबे पावँ
हमारे सपनों में
बस जाता है निशब्द |
उन्हें 
अपनी दुकान चलानी थी 
तो कोई न कोई कहानी तो बनानी थी 
उन्होनें कहानी सुनाई 
और हम कहानी सुनते-सुनते सो गए 
तब के सोय
अब जागेगे कब खुदा भी नहीं है जानता ?
हमें इंतज़ार है क़यामत का और
जन्नत की परियाँ
खुश हैं शैतान के साथ |

Wednesday, 14 June 2017

पिता बनने के बाद
पिता की याद बहुत आती है
बच्चों की फिक्र में
उनका रात-रात भर जागना
बैठे-बैठे ही अपना क़द नापना
बच्चों का क़द
जब अपने क़द से बड़ा पाता है
तो पिता ही है जो जश्न मनाता है |
फादर्स डे पर पिता को याद करते हुए|||||||||||||||||||||||||||||
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अवधेश निगम 
पुराने दोस्तों से मिला
सभी ने पंख नोच डाले हैं
कुदरत का करिश्मा देखो
आकाश में उड़ते हुए पंछियों की
तादाद कभी कम नहीं होती |

Tuesday, 13 June 2017

तुम मेरे लिए
अँधेरे बंद कमरे में रोशनदान हो
और तुम
स्वच्छता अभियान के अंतर्गत रक्खा गया पीकदान हो  |
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अवधेश निगम 
कोई शिकवा नहीं
कोई शिकायत नहीं
जो मिलना था,मिल गया
जो नहीं मिल सका उसका गम नहीं.ऐसा कहकर झूठ क्यों बोलूं  |

Monday, 12 June 2017

बचपन में पढ़ा था
एक संतुष्ट सुअर से
बेहतर होता है
एक असंतुष्ट सुकरात

उम्र के इस पड़ाव पर
मैंने पाया कि मैं
न गधा रहा न घोड़ा
मेरे व्यक्तित्व में
दोनों ही शामिल हैं थोड़ा-थोड़ा |
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अवधेश निगम

Sunday, 11 June 2017

मानता हूँ, दुनियाँ में क्रांतियां भूखे लोगों की वजह से ही हुई हैं लेकिन यह भी एक सच है इन भूखे लोगों को नेतृत्व हमेशा भरे पेट वालों ने ही प्रदान किया | इसीलिए हर क्रान्ति के बाद दुनियाँ में भूखे लोगों की संख्या बढ़ी ही है  |  
हाथी सदियों में कभी                  
एक-आध बार बौखलाता है
और महावत को
मारकर ही खुश हो जाता
जंगल में हो या सर्कस में
हाथी को क्या चाहिए
फलों से भरा एक हरा-भरा पेड़ |
देखे हैं बहुत शेर
एक बोतल व्हिस्की में
हो जाते हैं ढेर |

Tuesday, 6 June 2017

घर,
अब घर जैसा नहीं लगता
जैसा घर
बरसों पहले हमने देखा था
घर का घर होना अब मुश्किल है  |
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अवधेश निगम 

Thursday, 1 June 2017

मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है |

मैं एक क़तरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है
हुआ करे जो समन्दर मेरी तलाश में है।

मैं जिसके हाथ में एक फूल दे के आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है |

बेतअल्लुक़ी उसकी कितनी जानलेवा है
आज हाथ में उसके फूल है न पत्थर है |
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– कृष्ण बिहारी ‘नूर’