Wednesday, 23 April 2014

(१)
किससे कहूँ ?????????
(२)
जिससे कहूँ 
फिर जिंदगी भर 
उसी का होके रहूँ ?????
पिंजरे में 
क़ैद होने से बेहतर है 
चुप ही रहूँ |||||||||||||||||||||||||
चुनाव
||||||||||||
(१)
जब बजी हो
चुनाव की रणभेरी
सब धान एक पसेरी ||||
(२)
ये एक ही थैली के
चट्टे-बट्टे हैं
ये तिलचट्टे हैं  ||||||||||||||||||| 

Sunday, 20 April 2014

ठग
जब ठगा गया
ठगा सा
खड़ा रह गया |
खुली हवा में 
बच्चों को सांस लेने दिया 
बच्चों ने इसे 
उसका अपराध घोषित किया 
हालाकि उसके बच्चों ने 
उसे माफ़ कर दिया है 
वह स्वस्थ है लेकिन 
अपराध बोध से ग्रस्त है |
1)
कैरम के खेल में भी किसी के लिए एक ही पॉकेट में सभी गोटियों को डाल पाना संभव नहीं हो पाता है |
2)
गिरगिट 
है सबसे फिट 
गिड़गिड़ाकर मीडिया से बोला 
मेरी गलतियां भूलकर 
एकबार फिर चलो हमारे संग 
देखिये कैसे बदलता है गिरगिट अपना रंग
3)
भरी सभा में 
द्रौपदी के चीरहरण के समय 
वचनबद्ध भीष्म पितामह
सिर झुकाकर बैठे रहे | 
सिंहासन से बंधे थे 
लोगों की नजरों से बचाकर 
द्रौपदी के नंगे जिस्म को 
देखने की कोशिश करते रहे |
4)
खुद को सेक्युलर साबित करने की होड़ लगी है | इस दौड़ में अव्वल आने के चक्कर में कैसी-कैसी बेहूदा हरकते करते हैं यह राजनेता और भोंडे भोंडे तर्क देते हैं ये बुद्दिजीवी | मित्रों,क्या सच को साबित करने की जरूरत होती है ?

5)
भ्रष्ट्राचार मिटाने को बनी एक कमेटी 
भ्रष्ट्राचार फ़ैल गया इसमें ही 
अब इसका उन्मूलन करने को 
बनेगी नयी कमेटी
जब तक अपने आप को 
भ्रष्ट मानने के लिए हम नहीं तैयार
आप की सब कोशिशें हैं बेकार 
भ्रष्ट्राचार न मिटा है,न मिटेगा 
यह सिलसिला अनवरत योहीं चलेगा |
6)
क्‍या आपने ध्‍यान दिया है कि चुनाव जैसे जैसे आगे बढ रहा है ,साम्प्रदायिक होने के आरोप और खुद को सेक्युलर साबित करने की हड़बड़ाहट अब नहीं दिखाई दे रही है | जनता को इस सेक्युलर शब्द से ही साम्प्रदायिकता की बू आने लगी है, यह जनता है और जनता सब जानती है अब बहकावे में नहीं आने वाली |
7)
दोस्तों, अपने अपने पक्ष को लेकर बहुत हो चुका आरोप-प्रत्यारोप ,चुनावी वातावरण में अब जहर धीरे-धीरे दिमाग में भी घुलने लगा है और इस स्तिथि को मैं अपने लिए उचित नहीं मानता अतः अंतिम चरण के चुनाव होने तक किसी भी राजनीतिक विषय पर नो लाइक,नो कमेंट एंड नो पोस्ट

Sunday, 6 April 2014

जो यहाँ नहीं है
वह वहाँ है
जो यहाँ है
वह वहाँ नहीं है
जो न यहाँ है,न वहाँ है
वह कहाँ है ,कहाँ है ? 

Friday, 4 April 2014

तुम मुझसे पूछते हो
"धर्म का अर्थ तो
वे भी नहीं जानते जो
धर्म-धर्म चिल्लाते हैं"

अवधेश निगम 
हर बार
झूठ बोलने से पहले
वह कसम खाता है  |
कोई गुनाह तो नहीं करता
झूठ बोलने से पहले
कसम खाने का रिवाज़ ही तो निभाता है |
गोधरा पर बात क्यों नहीं होनी चाहिए इसका कोई तर्क पूर्ण उत्तर आजतक कोई भी बुध्धिजीवी नहीं दे सका है ,गोधरा काण्ड पर बात करते ही हमें सांप्रदायिक घोषित किये जाने का भय आखिर क्यों सताता है ? सभी राजनीतिक दल गोधरा काण्ड पर बात करने में हिचकते दिखाई पड़ते हैं  | गोधरा में अगर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग मरे होते और गुजरात दंगों में बहुसंख्यक समुदाय के लोग तो गुजरात दंगों को गोधरा काण्ड की स्वाभाविक प्रतिक्रिया मान लेने में सभी तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दलों को भी कोई आपत्ति नहीं होती | 

Thursday, 3 April 2014

जाति या धर्म के नाम पर जो भी वोटों को लुभाने या बरगलाने की बात करता है,वह साम्प्रदायिक है | इस आधार पर इस देश में कोई भी सेक्युलर पार्टी नहीं है | क्या सेक्युलर(धर्म-निरपेक्ष )शब्द से ही घोर साम्प्रदायिकता की बू नहीं आती है ?

हर राजनीतिक पार्टी के पास बुद्धिजीवियों का एक हुजूम हैं और यह बुद्धिजीवी सेक्युलर शब्द की व्याख्या अपनी अपनी  पसंद की पार्टी के पक्ष में करते हुए गर्व से फूले नहीं समाते हैं, इस महान देश के बुद्धिजीवियों आखिर सेक्युलर शब्द के साथ बलात्कार में आपका सहयोग इन राजनीतिज्ञों को कब तक मिलता रहेगा?      

Wednesday, 2 April 2014

पैदा होने के बाद 
बच्चे ने बाप से कहा
आप मेरे होने का कारण 
खुद को मानते हैं 
अरे आप ने जो किया
वह तो कोई भी
आम आदमी कर सकता है
नगरपालिका के दफ्तर में जाइये
और बाप के नाम पर
आम आदमी लिखकर आइये |
1)
ये बुद्धिजीवी हैं 
हमारा-आप का दिमाग खाते हैं
हाँ,ये सेक्युलर हैं 
जो भी सत्ता में आता है 
उसी के साथ जुड़ जाते हैं 
ये सिरफिरे नहीं हैं
हाँ, इनके सिरे ढूंढें नहीं मिलते |


2)
सुनो पहाड़
पत्थर ही बने रहो
वे देवता बनाकर
एक न एक दिन
तुम्हे मंदिर में बिठा देंगे


3)
लाल सलाम अब जंचता नहीं 
उनका काम भी अब लाल सलाम से चलता नहीं 

कम्युनिस्टों को श्वेत सलाम 
1)

मेरे तुम्हारे बीच 
कुछ तो था
क्या था जो बचा हुआ है 
आज भी मरा नहीं 
पुराना जख्म है 
जो आज तक भरा नहीं
क्या कुछ नहीं था मेरे तुम्हारे बीच ?


2)
पुराने लौट आते हैं
तो बहुत दिक्कत होती है
नए हो चुके होते हैं पुराने
और पुराने नये नये से लगते हैं


3)
किसी के होने और न होने में है बहुत फर्क,
किसी के न होने पर ही हम महसूस पाते हैं उसके होने का अर्थ
कभी होना अच्छा लगता है, कभी न होना अच्छा लगता है
होना और न होना क्रमवार घटते रहे
तो सफ़र कुछ और सुहाना लगता है

4)
शब्द सांप्रदायिक नहीं होते
शब्दों को जो अर्थ
हमारा शातिर दिमाग दे देता है
शब्द उसे वैसे-का-वैसा उम्र-भर ढोता है |
प्रेम का पहाड़ा
प्रेम करनेवाला खुद गढ़ता है
इसीलिए
प्रेम के पहाड़ पर चढ़ने से पहले ही
पहाड़ा भूल जाता है |

Tuesday, 1 April 2014

भोग लगाने के लिए
प्रसाद लेकर मंदिर जाते हैं
और फिर उसे खुद ही खाते हैं
चुनाव का समय है
उन्होंने तुम्हे देवता माना है
घोषणापत्र में तुम्हारे लिए
परोसा है सप्तरंगी पकवान
वे जानते हैं कि चुनाव के बाद
इसे खुद उन्हें ही तो खाना है  |