Sunday, 31 March 2013

स्त्री=विमर्श
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मर्दवादी व्यवस्था ने
औरत को
मांग में सिन्दूर भरने को
मजबूर कर दिया
और सदा सुहागिन रहो का
आशीर्वाद मुफ़्त में दे दिया |
और औरत
इसी आशीर्वाद को पाने के लिए
अपनी मांग में
रोज सिन्दूर लगाती है
और पति के मरने तक
इस गुलामी
को ख़ुशी ख़ुशी निभाती है  |

Saturday, 30 March 2013

क्षणिक होते हैं
क्रोध,घ्रणा और वासना
इनके वश में होकर
कोई भी निर्णय मत लो |
निर्णय तुम्हें ही लेना है
और उसके परिणाम
तुम्हें ही भोगना है |
खुद पर हंसने की बात करते हैं आप बेतुकी / यहाँ आईना भी देखने से कतराते हैं लोग
ईश्वर की आड़ में छिप जाते हैं
मलाई खुद खाते हैं
और जूठन छोड़ जाते हैं
अपने ईश्वर के लिए |

 

Thursday, 28 March 2013

यह है घोर व्याभिचार
आस्था के नाम पर अत्याचार
तुम्हारा नहीं है कोई धर्म से सरोकार

 
तमाम हिन्दू महापंडितों और मुल्लाओं की मिलीभगत है यह | किसी भी धर्म या सम्प्रदाय का पुरुष हो स्त्री के बारे में सब एकमत हैं उन्हें आजादी देने के खिलाफ़ | स्त्री की शुचिता को उसकीं टांगों के बीच कैद कर दिया और स्त्री ने इसे ज्यों का त्यों मान लिया है | ताज्जुब होता है कि पुरुष की शुचिता पर इन धर्म ग्रंथों ने कभी कोई प्रश्नचिन्ह लगाया ही नहीं | पुरुष बेख़ौफ़ होकर घूमता है और स्त्री की  टांगों के बीच कैद उसकी शुचिता को बार बार भंग करता है |और मुल्ला कहते हैं कि चार वयस्क मर्दों की गवाही लाये यानि की उन चार मर्दों की गवाही प्राप्त करने के लिए उन चारो को भी अपनी शुचिता को भंग करने का मौका प्रदान करे | शर्म आती है कि हम इन्ही मुल्लाओं और पंडितों की पूजा करते है |

Wednesday, 27 March 2013

शिकारी से बचो
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तुम शिकार हो
शिकारी से बचो
तुम परिंदे हो
शिकारी से बचो

शिकारी
बहुत सयाना है
जानते हो
शिकारी ने परिंदे को
यह कहकर
पिंजड़े में कैद कर लिया
" आ मैं तुझे उड़ना सिखाऊंगा "
परिंदा बेचारा
उसे उड़ने का शौक था
शिकारी ने सपना दिखाया
और वह" सपने " में फँस गया
रोज़ खेलते होली
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चेहरे के रंग
बदलने का सिलसिला
क्या होगा कभी ख़त्म ?
आखिर कब तक निबाहोगे
यह सड़ी गली रस्म ?
होली के दिन जितने चाहो
रंग चढ़ा लो चेहरे पर
अपना चेहरा मिल ही जाता है
साबुन से धुलकर |

रोजमर्रा की जिंदगी में
घर हो या बाहर
रोज रोज
जो रंग हम लगाते हैं
अपने चेहरे पर
और फिर
खुद भूल जाते हैं अपनी शक्ल |
आइने में देखकर
तुम छिपा सकते हो
चेहरे पर खरौंच के निशान
लेकिन यह बताओ
अपने आप से तुम
कैसे छिपाओगे अपने जख्म ?
हर रोज
चेहरे का रंग बदलने की
सड़ी गली रस्म
आखिर कब तक निबाहोगे ?  

Tuesday, 26 March 2013

मैं अपनी उम्र से बड़े मनुष्यों का सम्मान करता हूँ
अपनी उम्र से छोटे लोगों को प्यार करता हूँ
जानवर सम्मान नहीं जानते इसीलिए चाहते भी नहीं
जानवर, किसी भी उम्र का हो को मैं प्यार करता हूँ
लोगों को प्यार से बड़ा सम्मान दिखता है
सोचता हूँ
बड़ा आदमी होता है या
बड़ा होता है जानवर
मुझे लगता है कि मैं कुछ ज्यादा सोचता हूँ ?  
सुबह सवेरे नहाने के बाद दर्पण के सामने खुद को निहार रहा था अचानक मैंने देखा अपने चेहरे पर लिखा हुआ "रँगा सियार" | मित्रों , दर्पण के सामने आपने अपने चेहरे पर जो लिखा पाया है क्या अपने आप को उसके बारे में बतलाया है ? 
श्री बिंदु सेवा संस्थान ,वृन्दावन------३ 
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दिन हो या रात / अनोखी है हर बात ---सच में यहाँ सब कुछ अनोखा है कोई मंदिर नहीं , मस्जिद नहीं, गिरजाघर नहीं ,न तो मंदिर की घंटियाँ बजती हैं न देवता की उतारी जाती है आरती | सिर्फ बाहर की स्वच्छता को ही महत्व नहीं दिया जाता , भीतर की स्वच्छता का भी रक्खा जाता है विशेष ख़याल | बालेन्दु का पूरा का पूरा परिवार एक साथ एक थाली में खाता हैं खाना /जैसे कोरस में गाता हो कोई गाना | आइये मित्रों, चित्रों के माध्यम से चलिए एक बार फिर घूम आते हैं श्री बिंदु सेवा संस्थान आपके साथ |

Saturday, 23 March 2013

अब नहीं
मुझको है कोई मोह
छिपने के लिए मैंने
खोज ली है खोह
डर नहीं है इसका कि
कोई खोज लेगा
सुकून में हूँ यह सोचकर
हवाओं का रुख
कोई तो मोड़ देगा | 
अब नहीं
मुझको है कोई मोह
छिपने के लिए मैंने
खोज ली है खोह
वे कमीने
सरे राह लूट लेंगे
हिन्दू और मुसलमान
दोनों मरेंगे
अगर साथ न चलेंगे |
                      आपकी राय बेहद जरूरी
            मत समझिये इसे खानापूरी 

Friday, 22 March 2013

मीठे पानी की नदी
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अभी अभी
जो आदमी यहाँ खड़ा
चला गया केंचुल छोड़कर |
कातिलों की पूरी कौम
हो गयी है साधू
रामनामी दुशाला ओढ़कर |
कातिलों की पहचान
हो गयी मुश्किल
सोचता हूँ =
मीठे पानी की नदी
निकलेगी कब पत्थर तोड़कर ?

Thursday, 21 March 2013

अत्याचारी तो यह जिंदगी
मौत ने तो जब दिया
सहारा ही दिया
सागर में मैं था
और मेरी किश्ती
तूफानों ने जब दिया
किनारा ही दिया  |

Wednesday, 20 March 2013

हर दिन होता है 
कोई न कोई दिवस
और हम हैं
शुभकामनाएँ देने के लिए विवश |
कहते हैं
आज है कविता दिवस | 21/03/2013

Tuesday, 19 March 2013

कुन्ती
अगर अपने
पाँच पुत्रों के लिए
पाँच औरतें लातीं
तो वे पाँचों उन्हें
नोच नोच कर खा जातीं |
पाँचों पुत्रों को
बांधकर रखने का
नायब तरीका
खोजा था कुन्ती ने |

Monday, 18 March 2013

ईश्वर
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जिसे देखा नहीं
महसूस नहीं किया
उसके आस्तित्व को
मन स्वीकारता नहीं |
जब जब जाता हूँ मंदिर
वहां बैठा आपका ईश्वर
हर बार मुझसे कहता है=
"मैं तुमको पहचानता नहीं "

Sunday, 17 March 2013

पति और पत्नी
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न वो बदली
न हम बदले |
हर रोज
बदलते रहे मुखौटे
और बहुत दिनों बाद
मैंने उन दोनों के लिए
एक शब्द लिखा-" दोगले "

Friday, 15 March 2013

चलते रहो
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उड़ना
जमीन से जुड़े जुड़े 
यह कैसा उड़ना ?
खड़े खड़े कदमताल करना
तो कैसे होगा चलना ?
यह तो है खुद को ठगना
जमीन से जुड़े जुड़े 
यह कैसा उड़ना ?
जागो
उड़ो नहीं
जमीन पर चलते रहो
अगर तुम्हें आसमान है छूना |

Wednesday, 6 March 2013

इस देश में
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इस देश में
हादसे बहुत होते हैं
और इन हादसों में
मरने वाला
या तो हिन्दू होता है
या मुसलमान
मरते नहीं यहाँ इंसान |
अगर चाहते हो
हंगामा हो बरपा तुम्हारी मौत पर
तो तुम्हे होना होगा
हिन्दू या मुसलमान
लोग उठा लेंगे सिर पर आसमान |
इंसान यहाँ मरते हैं
गुमनामी की मौत
तुम अपनी पहचान
हिन्दू या मुसलमान ही रखना
इंसान की मौत कभी न मरना |
कछुए और खरगोश की कहानी
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कछुए की तरह
निरंतर चलते रहना
और दौड़ जीत जाना
कहावत हो गयी पुरानी |
खरगोश की तरह
निरंतर दौड़ोगे
रास्ते में सोने का
इरादा भी छोड़ोगे
तब भी दौड़ में नहीं जीतोगे |
खरगोश
अब दौड़ में जीतने
का ख्वाब देख सकता हैं |
जीतते हैं वे
जो राजमहलों में
मखमली बिस्तर पर सोते हैं
वे
दौड़ में शामिल भी नहीं होते
और जीत जाते हैं  |
वे ख्वाब भी नहीं देखते
दौड़ में शामिल भी नहीं होते
वे विजेता हैं
दौड़ ख़त्म होने से पहले ही
जीत का जश्न
मनाने में व्यस्त हो जाते हैं |