Thursday, 30 April 2015

कोई भी बहस
जब गाली-गलौज में बदलने लगे 
तो समझ लेना कि
जानवर अपनी मांद से निकलने लगे |
लम्बी उम्र जी चुका 
अब इससे बू आती है 
कमबख्त मज़हब को 
मौत क्यों नहीं आती है ?
बिरले होते हैं
जिन्हें असहमति के स्वर भाते हैं
झूठी प्रशंसा को भी
लोग सत्य मान लेते हैं 
प्रशंसा ऐसा ज़हर है
जिसे हँसते-हँसते लोग पी जाते हैं |
दूध का धुला कौन ?
सैकड़ों हाथ 
उठे एक साथ 
चीखकर बोले 
हम और कौन |
भूकम्प के आने पर
भूकम्प के खिलाफ
सड़क पर सब एक साथ
महल हो या हो झोपड़ी
घूम जाती है सभी की खोपड़ी
पशु, पक्षी और मनुष्य
मौत से सब डरते है
अनजाने में मौत की ओर
एक क़दम रोज बढ़ते हैं |
मंदिर छोड़कर भागे 
भगवान ने प्रकृति से पूछा 
आखिर क्या है तुम्हारे इरादे 
प्रकृति गुस्से से भरी थी 
उसके साथ लगातार 
किया जाता रहा बलात्कार
इसके लिए वह मानती है
मंदिर में बैठे भगवान को भी गुनहगार |
लोग आपके बारे में वह नहीं सोचते जो आप अपने बारे में सोचते हैं | सच वह नहीं है जो लोग आपके बारे में सोच रहे हैं, सच वह भी नहीं है जो आप अपने बारे में सोच रहे हैं | आग्रह मुक्त होकर सोचना मनुष्य का स्वभाव नहीं है |
वह जब उड़ा 
पिंजरे को साथ लेकर उड़ा
उड़ने का हौसला हो तो 
पिंजरा बाधित नहीं करता उड़ान को |



2)
लोगों से मिलना 
उनकी बातें सुनकर 
कभी खुश होना और कभी रोना 
यह सब रेगिस्तान में पानी दिखने जैसा है 
कभी कभी खुद से भी मिला करो |

3)
वह घर के बाहर खड़ा 
उसका घर 
सामान से अटा पड़ा |

4)
जो बच गया 
उसे भगवान ने बचाया 
जो नहीं बचे 
उनकी तरफ से एक सवाल 
भगवान भूकम्प को 
आने से क्यों रोक नहीं पाया ?


5)
दुर्व्यवस्था को आस्था का नाम देकर खुश हो लेते हैं लोग |

6)
ख्वाब टूटा है 
लेकिन बचपन नहीं छूटा है |
·
कहते है-
ईश्वर सब देखता है 
देखकर भी किसी का 
वह क्या उखाड़ लेता है ?
मिट्टी भी स्पर्श से 
रूपांतरित हो जाती है 
फिर वह मिट्टी नहीं 
मूर्ति कहलाती है 
कुम्हार की तरह 
हौले से हाथ लगाओगे
तो जैसे चाहोगे
वैसे बर्तन बनाओगे |
कसम खाइये 
प्रकृति की पूजा करोगे 
देवी-देवताओं को 
मंदिर से बेदखल करोगे |