Friday, 30 January 2015

क्या करोगे
जब दोगले हैं सब
आप बार-बार सरकार पर आरोप क्यों लगाते हैं
सरकार ने आपको बताया न कि
जमाखोरी हो रही है
भ्रष्ट्राचार बढ़ा है
इसीलिए महंगाई का मुहं सुरसा की तरह खुला है
और आम जनता का चीर हरण हो रहा है
कोई भी सरकार आती है
तो सिगरेट की डिब्बी पर चेतावनी
"सिगरेट पीना स्वास्थ के लिए हानिकारक है " लिखकर
अपना राजधर्म निभाती है
जो कुछ जैसा भी कुछ हो रहा है
उसके कारण तो आप को बताती है |
सत्ता पक्ष हो या हो विरोध पक्ष
जनता की गर्दन पकड़कर
दोनों खड़े तो हैं कमर कसकर

Thursday, 29 January 2015

घाव भर जाता है
लेकिन उस घाव का निशान
जिंदगी भर मुहं चिढ़ाता है
जख्म के निशान पर
कभी-कभी
एक मोर पंख नज़र आता है  |

Wednesday, 28 January 2015

पुरुष केवल स्त्री का तन पाना चाहता है
स्त्री जिस पुरुष को अपना तन सौंप देती
फिर देर-सबेर अपना मन मारकर
मात्र एक घर के लिए
उसी पुरुष को अपना मन भी सौंप देती है
इस "घर" की परिवरिश में रीत जाता है स्त्री का तन,मन |    

Tuesday, 20 January 2015

वह आई
दीवार साथ लेकर आई
वह गया
दीवार साथ लेकर गया
हम जहां जाते हैं
दीवार साथ लेकर जाते हैं
और इन्हीं दीवारों से
अपने सपनों का घर बना लेते हैं  |

बगैर दीवारों के
घर नहीं बना करते
जितना बड़ा परिवार
उतनी ज्यादा दीवारें
खुश मत होइये कि
आप परिवार बढ़ा रहे हैं
सच तो यह है कि
आप एक दीवार और उठा रहे हैं |

Monday, 19 January 2015

चुनाव के दरमियान 
वह केंचुल बदल लेता है 
आम आदमी नहीं है 
अब वह एक सफल नेता है |
पुरुष 
स्त्री को कभी माफ़ नहीं करता 
स्त्री 
पुरुष को हर-बार माफ़ कर देती है 
स्त्री की यह ताक़त पुरुष के पास कभी नहीं रही 
और स्त्री की यही ताक़त
पुरुष के लिए वरदान बन जाती है |
प्रेम में रोना मत 
प्रेम में 
खाली जगहों को 
अपने मन मुताबिक़ भरो और ऐश करो |
वह बहरा है 
क्यों फ़रियाद करते हो ?
एक दूसरे पर 
बदसूरत होने का आरोप लगाना 
आईना देखने की ज़हमत न उठाना 
राजनीति का तो ये खेल है पुराना 
इस खेल में जो शामिल हैं 
अब उनके लिए क्या रोना और क्या गाना ?
उनके पास
हर आरोप के जवाब हैं
इसीलिए तो वे नवाब हैं
घिसे-पिटे प्रश्न पूछते हो
उनके पास
रटे-रटाये जवाब मौजूद हैं
खोजो ऐसे प्रश्न कि वे निरुत्तर हो जाएं |

Saturday, 17 January 2015

बड़े दिनों के बाद 
बरसा है बादल 
जिस्म ही नहीं 
रूह को भी भींग जाने दो |
अपने ही कंधे पर सिर रखकर 
रोना होता मुमकिन अगर 
उसकी तलाश में 
वह क्यों भटकता इधर-उधर |
वह मेरा बुढ़ापा
खराब करने पर अमादा था
दो चार मोर-पंख मेरे सिर पर
खोस देने का उसका इरादा था |

2)
तुम मेरा बुढ़ापा खराब करके ही मानोगे
दो चार मोर-पंख मेरे मुकुट में भी टाँकोगे

Thursday, 15 January 2015

अरविन्द केजरीवाल के समर्थकों की केजरीवाल के लिए उनकी भावनाओं का सम्मान करता हूँ , केजरीवाल ने देश के राजनीतिक परिदृश्य में परिवर्तन की नीँव रक्खी ऐसा मुझे भी लगता था लेकिन उस परिवर्तन का चेहरा इतना भोंडा होगा नहीं सोचा था | एक हत्यारे में भी बहुत सी अच्छाइयाँ हो सकती हैं लेकिन क्या इस आधार पर ह्त्या के गुनाह को मुआफ किया जा सकता है | एक वर्ष की छोटी सी उम्र में ही दिल्ली के मुख्यमंत्री हो जाने के बाद ढेड़ वर्ष में प्रधानमंत्री बनने का सपना देखना और दिल्ली की जनता की भावनाओं की ह्त्या उनका सबसे बड़ा अपराध था, जिसके लिए केजरीवाल आज माफ़ी मांगते फिर रहे हैं | 

Tuesday, 13 January 2015

ह्त्या के योजनाबद्द प्रयास को 
हादसा बताते हैं 
न जाने कबसे वो हमें योंही बहलाते हैं |
पैगम्बरों, दिगम्बरों,फरिश्तों और तमाम देवी देवताओं की फ़ौज इस दुनियाँ में क्यों भेज दी मेरे मौला | यह सभी अपने साथ एक-एक कीड़ा* लेकर आये और उस कीड़े ने तुम्हारी बनाई इस दुनियाँ को नरक से भी बत्तर बना दिया | निश्चित ही उस कीड़े को तुमने तो नहीं बनाया होगा |
धर्म रुपी कीड़ा *

2)
यह कौन लोग हैं भाई जिनका ईश्वर 
एक मासूम से कार्टून से घबरा जाता है 
अपने ईश्वर को बचाये रखने की 
उनकी हर कोशिश में शैतान मुस्कराता हैं 
ईश्वर को खुश करने की आड़ में 
शैतान को खुश करने का यह नाटक आखिर कब तक ?
3)

वीरान रास्तों से डरते क्यों हो ?
कुछ कदम चल के देखो तो
सफर में हो तब तक अकेले हो
मंज़िल पर पहुंच कर देखो तो


उन्हें अपने देश की जनता 
और देश की लोकतांत्रिक प्रणाली पर भरोसा नहीं है 
इसीलिए वे अपने भरोसे की जड़े 
किसी अन्य देश में रोप रहे हैं 
अन्य देश से खाद और पानी मिलेगा 
तो देश में ऐसे पौधे में फूल न खिलेगा
बरसों-बरस हो गए अब तो सीखो
अपने भरोसे की जड़े देश में ही रोपो |
धर्म बाज़ हैं,
समाज के ठेकेदार 
जब चाहते हैं, जैसे चाहते हैं 
खुशरंग परिंदों का 
शिकार करने में इसका इस्तेमाल करते हैं 
परिंदे बेवजह इस बाज़ का शिकार होते हैं |
उसने सूरज पर थूका
सूरज न मुस्कराया, न रोया
यह कौन महापुरुष है
जो एक कार्टून देखकर है रोता ?
सूरज के पक्ष में तो
कभी कोई नहीं खड़ा होता |
कभी प्रश्न ही प्रश्न थे 
उत्तर नहीं मिले 
जब प्रश्न ही नहीं बचे 
वह उत्तरों की क़ैद में है |
जहाँ "मैं" है 
कैसे रह सकते हैं बुद्ध वहाँ 
जहाँ "मैं" नहीं है बुद्ध हैं वहाँ
"मैं' से भयभीत बुद्ध ने 
एकबार फिर से ले लिया है संन्यास 
बुद्ध अब इस दुनियाँ में आपको मिलेंगे कहाँ ?
विज़िबिलिटी ज़ीरो 
कोहरे की वजह से नहीं है,
धर्म का चश्मा आप उतारेंगे नहीं 
जितना देखने को कहा जाता है 
केवल उतना ही देखते हैं 
और दोष कोहरे को देते हैं |
पहले जला 
फिर सूरज बना 
तुम सूरज बनकर जलना चाहते हो 
तुम्हारे विद्रोह का अंदाज़ निराला है 
खोना कम और पाना ज्यादा चाहते हो |
चन्द पंक्तियाँ बेहद पुरानी, लगती हैं फिर भी कुछ जानी-पहचानी  |
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दिल को घबराने दो
ज़रा पास तो आने दो |

दिल की आवाज़ है
आती है तो आने दो |

मुद्दतों बाद
फासला हुआ है कम
नींद रूठ कर जाती है तो जाने दो |

न जाने
फिर कभी मिलना हो, न हो
अब अगर मौत आती है तो आने दो  |

Friday, 9 January 2015

तुमने कहा-- रहो मौन 
और मैं मौन हो गया 
वह सब अनकहा 
एक सागर मेरे भीतर रोता है 
मौन थककर अनभिव्यक्त सो जाता है 
मौन मुझको तुम तक
सम्प्रेषित नहीं कर पा रहा है
मुझे भाषा चाहिए |
अब सवाल यह नहीं है कि
कैसे बदलोगे व्यवस्था को 
कैसे बदलोगे तुम,जुतोगे रथ में 
अब सवाल यह नहीं है कि 
रंग ने अपना रंग क्यों बदल लिया 
क्यों खुल गयी बंधी हुई मुट्ठी |
बिल्ली नें खुद ही बाँध ली है
अपने गले में घंटी
अब सवाल यह है कि इसे खोलेगा कौन ?
ह्त्या के योजनाबद्द प्रयास को 
हादसा बताते हैं 
न जाने कबसे वो हमें योंही बहलाते हैं |
वीरान रास्तों से डरते क्यों हो ?
कुछ कदम चल के देखो तो
सफर में हो तब तक अकेले हो
मंज़िल पर पहुंच कर देखो तो
यह कौन लोग हैं भाई जिनका ईश्वर 
एक मासूम से कार्टून से घबरा जाता है 
अपने ईश्वर को बचाये रखने की 
उनकी हर कोशिश में शैतान मुस्कराता हैं 
ईश्वर को खुश करने की आड़ में 
शैतान को खुश करने का यह नाटक आखिर कब तक ?
पैगम्बरों, दिगम्बरों,फरिश्तों और तमाम देवी देवताओं की फ़ौज इस दुनियाँ में क्यों भेज दी मेरे मौला | यह सभी अपने साथ एक-एक कीड़ा* लेकर आये और उस कीड़े ने तुम्हारी बनाई इस दुनियाँ को नरक से भी बत्तर बना दिया | निश्चित ही उस कीड़े को तुमने तो नहीं बनाया होगा |
धर्म रुपी कीड़ा *
उन्हें अपने देश की जनता 
और देश की लोकतांत्रिक प्रणाली पर भरोसा नहीं है 
इसीलिए वे अपने भरोसे की जड़े 
किसी अन्य देश में रोप रहे हैं 
अन्य देश से खाद और पानी मिलेगा 
तो देश में ऐसे पौधे में फूल न खिलेगा
बरसों-बरस हो गए अब तो सीखो
अपने भरोसे की जड़े देश में ही रोपो |
धर्म बाज़ हैं,
समाज के ठेकेदार 
जब चाहते हैं, जैसे चाहते हैं 
खुशरंग परिंदों का 
शिकार करने में इसका इस्तेमाल करते हैं 
परिंदे इस बाज़ का शिकार होते हैं |
सूरज पर थूका 
सूरज न मुस्कराया, न रोया 
सूरज के पक्ष में 
कभी कोई नहीं खड़ा होता |
झूठ के
उग आएं हैं पाँव
धरती पर आते ही
बहुत तेज दौड़ता है
हमारी समझ के पैर तोड़ता है
भूखे गणेश को
दूध पिलाने के लिए हर आदमी दौड़ता है |