Sunday, 16 November 2014

स्वप्न में दिखा एक हाथ
हाथ में था
पानी से भरा गिलास
सोचा पी लूँ बुझे की प्यास
खोली आँख तो दिखा नहीं हाथ
स्वप्न में पानी से भरा गिलास
बुझाता नहीं, बढ़ाता है प्यास  |

Tuesday, 4 November 2014

तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों की मूर्खता से वोटो के ध्रुवीकरण का ऐसा सिलसिला शुरू हो गया है कि नरेंद्र मोदी की जीत का घोड़ा रोक पाना अब नामुमकिन सा लगता है |

Thursday, 23 October 2014

पाने के साथ ही
पैदा होता है खोने का डर
खोने का डर नहीं होता
तो उग आते इंसानों के भी पर   |

Saturday, 4 October 2014

और विडम्बना यह है कि स्त्रियों में अंदरूनी आत्‍मविश्‍वास भरे मजबूत व्‍यक्तित्‍व को ढूढ़ने वाले पुरुषों को स्त्रियां पसंद नहीं करती |

स्त्रियों को पसंद आते हैं उनके आगे पीछे चक्कर लगाते उनके मूर्खतापूर्ण व्यवहार पर मुस्कराकर प्यार बरसाते और उनको बार-बार उनकी खूबसूरती का अहसास कराते लिजलिजे पुरुष  |
वे एकत्रित हुए थे 
मनाने के लिए मौत का उत्सव 
मौत ने बिखेर दिए चारो ओर शव ही शव 
कालान्तर में हमारी आस्थाएँ आदमखोर हो जाती हैं |
एक लाख चौबीस हज़ार पैगंबर है |
खुदा के पैगम्बर से इंसानों की मुलाक़ात का जिक्र इतिहासविद बताते हैं |
खुदा के बेटे ईसा मसीह कहे जाते हैं |
ये खुदा महोदय कहाँ रहते है और कहाँ पाये जाते हैं ?

Tuesday, 30 September 2014

कितना अच्छा होता
अगर बेटियां पिता के गर्भ में पलती
पिता के गर्भ में करवट लेती
तो बच्ची इतनी डरी सहमी नहीं होती  |  

Friday, 26 September 2014

सब खड़े है यहाँ इस मुद्रा में
कि आओ और मुझे बेवकूफ बनाओ
पीठ पीछे गाली देते हो तो क्या
जब मेरे सामने आओ तो पैर छूकर जाओ
उनकी मूर्खताओं पर हँसों मत
उन्हें कालिदास का वंशज बताओ
अगर वह बाबू हैं तो उन्हें कर्मठ कर्मचारी कहो
अगर वह अधिकारी हैं तो उन्हें अनुशासित अधिकारी कहो
अगर कोई कवि है तो उसकी कविताओं में उसे मुक्तिबोध की झलक दिखलाओ
बस किसीको उसकी औकात मत बताओ
सब खड़े है यहाँ इस मुद्रा में
कि आओ और मुझे बेवकूफ बनाओ 

Tuesday, 23 September 2014

हम जब तुमसे
नहीं कह पाएंगे
कहने के लिए
कहीं और जाएंगे
सच तुम सुनना नहीं चाहती
तुम्हारा झूठ
मेरे कानों से टकराकर टपक जाता है
मेरे और तुम्हारे बीच
कोई संवाद हो ही नहीं पाता है
अनुग्रहित हूँ तुम्हारा
इस संवादहीन रिश्ते को निभा दिया
पूरा जीवन मेरे साथ बिता दिया  |
मैंने तुम्हें
तुमने मुझे
विकल्प के तौर पर चुना
इस वैकल्पिक व्यवस्था में
हम ढूंढते रहे
प्रथम प्रेम के रंग
एक साथ एक संग   |

Sunday, 21 September 2014

बाबुषा कोहली की कविता ब्रेकअप पर एक प्रतिक्रिया
+++++++++++++++++++++++++++++++++++++
लम्बी कविता को पढ़ने का साहस कभी नहीं कर पाया इसीलिए मुक्तिबोध को भी "अँधेरे में" ही छोड़कर चला आया | 
तुम्हारी ह्त्या करने के बाद 
उसने आत्मह्त्या करने का अपराध भी तो किया था 

हत्यारे को किस अपराध से 
दोषमुक्त किये जाने की प्रार्थना है यह |

सात फिट लम्बे व्यक्ति को हम अमिताभ बच्चन मान लेने का गुनाह तो नहीं कर सकते, मनोज बाजपेई  और रघुबीर यादव जैसे साधारण कद-काठी के व्यक्ति में भी प्रतिभा दिखाई पड़ जाती है | पीठ ऊँची ऊंट की उँचाई से नहीं होती होती ही है होती ही है पीठ ऊँची ऊंट की | लम्बी होने मात्र से ही कोई कविता श्रेष्ठ नहीं हो जाती |
कविता
जब आवश्यकता से अधिक
लम्बी हो जाती है
अँधेरे में भी नहीं पढ़ी जाती है
आलोचकों के लिए
आसान होता है उसका महिमा मंडन
क्योकि एक पाठ में
वह कभी नहीं पढ़ी जाती है
महाकाव्य की तरह
किताबों में क़ैद कर दी जाती है
और पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाती है
कभी-कभी कोई छात्र उस लम्बी कविता को
शोध का विषय बनाता है
और शोध के दौरान ही उस कविता से ऊब जाता है |

ओम भाई, मेरी प्रतिक्रिया बाबुषा कोहली की कविता पर न होकर मुख्यतः लम्बी कविताओं पर की जाने वाली समीक्षाओं के विरोध में है,मुक्तिबोध की कविता अँधेरे में पर लिखने वाला कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो यह कह सके कि उसने उस कविता की एक-एक लाइन पढ़ी है तो बताइयेगा | बाबुषा की कविता निश्चित ही एक अच्छी कविता है | किसी भी ब्रेक-अप में दो पक्ष होते हैं, क्या दूसरा पक्ष इस ब्रेक-अप से प्रभावित नहीं होता ?


Baabusha Kohli Avdhesh Nigam Ji : 'मैं इस मतलबी संसार में उसकी इकलौती वकील हूँ' . आपके सवाल का जवाब आख़िरी खंड में. 

पूरा आख़िरी खंड.




निश्चित ही कविता के आखिरी खंड में आपने उसकी भरपूर वकालत की है लेकिन मुझे लगता है कि यदि कविता " सलीब पर टंगी है उसकी मुक्ति कीलों से बिंधी हुयी
सहते- सहते कब्र में ढह जाएगा मगर खुद के बचाव में कभी मुँह न खोलेगा " यहीं पर ख़त्म हो जाती त
ो वकील दोनों पक्षों के साथ तटस्थ भाव से खड़ा दिखाई पड़ता | लेकिन इसके आगे जब आप यह लिखती हैं कि "उसकी चुप्पी उसके हक़ में सबसे बड़ी दलील है " तब ऐसा ध्वनित होता है " क्योकि वह बहुत बड़ा जलील है "| अंत में फिर एक बार कहना चाहूंगा कि ब्रेक-अप एक अच्छी कविता है और कविता होने के सारे तत्व इसमें मौजूद है | इस कम उम्र में ऐसी कविता लिखने के लिए आपकी प्रशंसा की ही जानी चाहिए


Om Nishchal अवधेश भाई आपने तो इस कविता की अस्‍थिमज्‍जा तक पहुंच चुके है तभी आपने इतने यकीन और हक़ से अपनी बातें कही हैं। आपके सावधान पाठ और सतर्क भाष्‍य की सराहना करता हूं।
उसके चुप रहने में भी
तुम्हें साजिश दिखती है
उसके बोलने को भी
तुम शक की नजर से देखते हो
तुम चाहते हो कि
वह जब बोले तो तुमसे पूछकर बोले
उसका चुप रहना
हमेशा तुम्हारे पक्ष में हो
ताकि तुम उसपर
पक्षपात करने का आरोप लगा सको
और उसे धर्म निरपेक्षता का पाठ पढ़ा सको |

हम हमेशा खुद को मदारी की भूमिका में देखना चाहते हैं जबकि हम जिंदगी भर बन्दर की भूमिका निभाने के लिए अभिशप्त हैं |

हमारी आस्थाएं हमें हिंसक होने की इज़ाज़त नहीं देती | धर्म के प्रति हिंसक कट्टरता को क्या आप आस्था का नाम देंगे ?

चीखने पर भी नहीं सुनते 
बिन कहे जो समझ जाएँ 
ऐसे लोग अब कहाँ ?
जानवरों के सन्दर्भ में यह निर्विवाद रूप में सत्य है कि गधे का बच्चा बड़ा होकर गधा ,घोड़े का बच्चा घोड़ा ही बनेगा लेकिन आदमी का बच्चा बड़ा होने के बाद गधा ,घोड़ा ,खच्चर कुछ भी बन सकता है |
यह आदमखोर रिश्ते 
लील जाते हैं हमारा समूचा अस्तित्व 
रीढ़ की हड्डी के बिना
हम लिए फिरते हैं अपना व्यक्तित्व |
हमारे समाज में स्त्री-पुरुष के बीच हर रिश्ते को नाम देने की परम्परा रही है और स्त्री-पुरुष के बीच जिस रिश्ते को हम नाम नहीं दे पाते हैं उसे अवैध घोषित कर देते हैं | स्त्री-पुरुष के बीच दोस्ती को लेकर हमारी सोच में हमेशा ही एक दोगलापन रहा है | अगर कोई स्त्री हमारी दोस्त है तो उसे हम दोस्ती का नाम देते हैं और अगर कोई स्त्री किसी अन्य की दोस्त हैं तो उनके बीच अवैध सम्बन्धों की चर्चा करने में हम सुख पाते हैं |  

Saturday, 20 September 2014

मंदिर का विचार
इंसान के जेहन में आया
मंदिर में पत्थर इंसान ने ही पहुँचाया
और फिर उस पत्थर को
भगवान भी इंसान ने ही बनाया
उनका तर्क है
मंदिर का विचार इंसान के दिमाग में किसने उपजाया ?

Tuesday, 16 September 2014

पुरुष ने स्त्री से कहा=तुम हर रूप में मुझे सुन्दर लगती हो  |
पुरुष कहे कुछ भी उसे पत्नी का केवल सती-सावित्री रूप ही भाता है, क्या पत्नी स्त्री नहीं होती  ? 
मरी हुई
हमारी अनुभूतियाँ
धूल/ गर्द से ढकी हुई
अनचाहे ही मैली हो जाती हैं
तब वे
हमारा "अनुभव" कहलाती हैं  |
हमारे अहसास
हमारी अनुभूतियाँ
जब धूल/ गर्द से ढक जाती हैं
अनचाहे ही मैली हो जाती हैं
तब वे
हमारा "अनुभव" कहलाती हैं  |

Monday, 15 September 2014

हर प्राकृतिक आपदा के बाद
तुम्हारा तर्क होता है=
मनुष्य क्यों करता है
प्रकृति से छेड़-छाड़  ?
केदार बाबू
हरबार बच जाते हो
तुम लेकर मनुष्य की आड़  |

Sunday, 14 September 2014

मंदिर का विचार
इंसान के जेहन में आया
मंदिर में पत्थर इंसान ने ही पहुँचाया
और फिर उस पत्थर को
भगवान भी इंसान ने ही बनाया
भगवान बनने के बाद पत्थर अकड़ गया |
इंसान ने पैदा किया भगवान को
बेटा जब अपने पैरों पर चलना सीख जाता है
तब अक्सर वह माँ को भूल जाता है |
मंदिर में जो बैठा है
वह पत्थर है भगवान नहीं
धरती का भगवान है इंसान इंसान इंसान  |

Thursday, 11 September 2014

क़ानून से कुछ न होगा
ह्त्या के खिलाफ कानून है
बलात्कार के खिलाफ कानून है
ह्त्या और बलात्कार का सिलसिला बदस्तूर जारी है |
काश ! पल्स पोलियो जैसा ही
धर्म का एंटी डोज तैयार हो पाता
पोलियो की तरह ही धर्म रुपी कोढ़
हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो जाता
धरती पर हरसिंगार के फूलों जैसा
प्यार का बिखरना तब शायद संभव हो पाता |

Thursday, 4 September 2014

इक्कीस रुपये का प्रसाद चढ़ाने से
अगर नौकरी मिल सकती है
देवी माँ के दर्शन करने मात्र से
अगर लड़की पट सकती है
सोमवार का व्रत रखने से
अगर मन चाहा वर मिल जाता है
रियायती दरों पर
जहाँ सामान मिल जाता है
अरे भाई आदमी वहीँ तो जाता है |
आदमी को डरा दिया 
और भूसा इनके दिमाग में 
ठूस ठूस कर भर दिया
भूसे से इनको प्यार है 
और डर ने ईश्वर को 
इनकी मजबूरी बना दिया |

Tuesday, 2 September 2014

जनानी की कहानी
नाम दिया मर्दानी
जनानी को
जनानी ही रहने दो
मर्दानी क्यों बनाते हो
जनानियों के खिलाफ
अपनी साजिशों से क्यों बाज़ नहीं आते हो ?
खूब लड़ी थी वह जनानी
जो झाँसी वाली रानी थी |

Saturday, 30 August 2014

याद आता है पंगत में बैठकर खाना
धीरे-धीरे चलकर पूड़ियों का आना 
रायते का दोने से बिखर जाना 
कद्दू की सब्ज़ी बैगन का भरता 
चटनी के साथ पापड़ का कुरकुराना
कुल्हड़ का बार-बार लुढ़क जाना
आखिर में मीठी बूंदियों का आना
उँगलियों को चाटना और फिर
मीठी उँगलियों को कुल्हड़ में डुबोना
पत्तल के साथ कुल्हड़ उठाना
और कूड़े के ढेर पर फेंक आना
कुत्तों के झुण्ड का जुट जाना
याद आता है पंगत में बैठकर खाना
परमेश्वर 
परमपिता नहीं रहे 
रिश्ते बदल गए हैं 
अब पिता है आदमी 
और आदमी का पुत्र है भगवान |
कृष्ण के साथ ही 
राधा की जोड़ी जमती है 
जब मैं शंकर नहीं हूँ 
तो वह पार्वती कैसे हो सकती है ? 
शंकर का सानिध्य पाती 
तो कोई भी स्त्री पार्वती हो जाती |
कभी कहते हो 
ईश्वर ने हममें प्राण फूंके 
कभी ईश्वर में प्राण फूंकते हो 
यह तुम क्या करते हो ?
लिखिए या मत लिखिए 
खुदको बड़ा कवि घोषित कर लीजिए
जो कुछ भी है स्व-घोषित है 
किताबों का छपना और पुरष्कारों का मिलना 
आज सब कुछ स्व-वित्तपोषित है |
सत्य यह है कि 
सूरज न उगता है न अस्त होता है
यथार्थ यह है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है 
और सूरज उगता और अस्त होता प्रतीत होता है |
जब उन्हें 
गिरगिट कहा जाता है 
वे शर्माते नहीं
केवल अपना रंग बदल लेते हैं 
राष्ट्रीय सम्मान की तालिका में 
उनका नाम सबसे पहले आता है 
जिन्हें रंग बदलने का हुनर आता है |

(केवल वर्तमान सन्दर्भ में ग्रहण करें )
अगर संतान न होने का कारण पुरुष में मौजूद है तो संतानोत्पत्ति के लिए स्त्री को भी बगैर तलाक़ दिए दूसरी शादी करने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए | माननीय शंकराचार्य स्वरूपानंद इस बारे में क्यों रहे मौन ?

2) अक्सर जो हमें स्नेह और सम्मान देता है हम उसके प्रति लापरवाह हो जाते हैं ,उसके जाने के बाद उसके होने का अर्थ जान पाते हैं |
यह कर्मकांड और 
पूजा/ प्रार्थना करने की 
अलग-अलग विधियाँ ही तो आती हैं आड़े 
मंदिर और मस्जिद 
बना दिए गए हैं धर्म के अखाड़े |
देवी देवताओं की मूर्तियों में यह "प्राण प्रतिष्ठा" का क्या नाटक है ? ओह,अपनी मनौतियों को पूरा करने का सामर्थ्य इन मूर्तियों को हम देते हैं और फिर इनके चरणों में लोटकर इनसे वर लेते हैं |
प्रश्न ? सो रहे हैं
प्रश्नों की तलाश में 
उत्तर भटक रहे हैं |
कभी कभी 
दिल और दिमाग को 
लकवा मार जाता है 
दिमाग में प्रश्न नहीं उठते 
और दिल धड़कना भूल जाता है
कभी-कभी ऐसा क्यों हो जाता है ?
जन्नत का लालच भी 
उन्हें गुनाह करने से रोक नहीं पाता है 
हाँ, कुछ क़ाफिरों का क़त्ल 
उनके हाथों से जरूर हो जाता है
ईर्ष्या से बचें
खुश रहें
मुश्किल है,नामुमकिन नहीं
उदासी का शर्तिया इलाज
दूसरों की खुशियों में
शामिल होना सीखें  |

Wednesday, 27 August 2014

स्त्रियां ही नहीं
पुरुष भी बाँझ होते हैं
इन बाँझ पुरुषों के
बाँझ होने का दर्द और
तिरस्कार भी स्त्रियां ही सहती हैं |
याद आता है पंगत में बैठकर खाना
धीरे-धीरे चलकर पूड़ियों का आना
रायते का दोने से बिखर जाना
कद्दू की सब्ज़ी बैगन का भरता
चटनी के साथ पापड़ का कुरकुराना
कुल्हड़ का बार-बार लुढ़क जाना
आखिर में मीठी बूंदियों का आना
उँगलियों को चाटना और फिर
मीठी उँगलियों को कुल्हड़ में डुबोना
पत्तल के साथ कुल्हड़ उठाना
और कूड़े के ढेर पर फेंक आना
कुत्तों के झुण्ड का जुट जाना
याद आता है पंगत में बैठकर खाना  

Saturday, 23 August 2014

हिन्दू लड़का
मुस्लिम लड़की से
शादी कर ले तो सब ठीक
हिन्दू लड़की
मुस्लिम लड़के से
शादी कर ले तो वह है ढीठ  |
प्रकृति ने तो
स्त्री और पुरुष को बनाया
फिर उनके बीच
यह धर्म कहाँ से आया
कैद कर लो
धर्म को देहरी से बाहर
पाँव मत रखने दो  |   

Thursday, 21 August 2014

वो मुसलमान परस्त थे
ये हिन्दू परस्त होने का पीटते हैं ढिंढोरा
ये और वो दोनों एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं
वो मुसलमान से शुरू करते थे
और थोड़ी देर बाद हिन्दू पर आते थे
ये हिन्दू से शुरू करते हैं और मुसलमान तक आते हैं
हिन्दू और मुसलमान बार-बार दोहराते हैं
स्त्री की शुचिता इन्हें भी बहुत प्यारी है
ये एक न एक दिन
महिलाओं को पहना देंगे बुर्का
न हिन्दू को न मुसलमान को  
ये चाहते हैं केवल पुरुष को खुश करना  |      

Wednesday, 20 August 2014

एक व्यक्ति
नया-नया राजनीति में आया
राजनीति के धुरंधर कहे जाते थे जो
उनके चरणों में बैठ गया
पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगा
गुरदेव मुझे भी राजनीति सिखाओ
धुरन्धर जी मुस्कराये और बोले=
भारत में राजनीति करना है
तो एक ही मन्त्र है
मौक़ा देखकर कभी हिन्दू-हिन्दू
और कभी मुसलमान-मुसलमान चिल्लाओ
कभी आरक्षण का करो विरोध
और कभी आरक्षण के पक्ष में
धरने पर बैठ जाओ |

Tuesday, 19 August 2014

कविता
जब आवश्यकता से अधिक
लम्बी हो जाती है
अँधेरे में भी नहीं पढ़ी जाती है
आलोचकों के लिए
आसान होता है उसका महिमा मंडन
क्योकि एक पाठ में
वह कभी नहीं पढ़ी जाती है
महाकाव्य की तरह
किताबों में क़ैद कर दी जाती है
और पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाती है
कभी-कभी कोई छात्र उस लम्बी कविता को
शोध का विषय बनाता है
और शोध के दौरान ही उस कविता से ऊब जाता है |  

Sunday, 17 August 2014

वे त्रस्त हैं
फिर भी शव की आराधना में व्यस्त हैं |
पत्थर को घिस-घिसकर
एक बुत बनाते हैं
फिर सारा जीवन
उसकी पूजा अर्चना में गवांते हैं
वे यों ही मस्त हैं
किसने कहा वे त्रस्त हैं  ? 
वे त्रस्त हैं
फिर भी शव की आराधना में व्यस्त हैं |
पत्थर को घिस-घिसकर
एक बुत बनाया
फिर सारा जीवन
उसकी पूजा अर्चना में गंवाया
वे यों ही मस्त हैं |

Saturday, 16 August 2014

जो हमेशा प्यार करती प्रतीत होती है
प्रेमिका कही जाती है
जो नफरत की हद तक प्यार करती
पत्नी कहलाती है
जो बार-बार
अपने प्यार का इज़हार करता है
वह ढोंगी नहीं प्रेमी है
जो कहता नहीं है
वह पति प्यार नहीं करता है |    
खिसियानी बिल्लियाँ 
एक ही खम्बे को नोचने में व्यस्त हैं 
उस खम्बे की ताक़त बढ़ती है
जिस खम्बे को 
इतनी बिल्लियाँ एक साथ नोचती हैं |
कुछ तथाकथित बुद्दिजीवियों का मानना है कि मोदी जी के पास एक जादू की छड़ी है जिससे वे चाहें तो रातो-रात देश को सभी समस्याओं से निजात दिला सकते हैं और उनकी शिकायत यह है कि मोदी जी जानबूझ कर ऐसा नहीं कर रहे हैं | मोदी जी के सामर्थ्य पर उनके भरोसे को नमन |
आजतक
विकसित नहीं कर पाये
अपना एक तंत्र
फिर भी हैं हम स्वतन्त्र |
उधार का तंत्र
स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएँ देना तो बनता है |

Wednesday, 13 August 2014

मुझे जो कहना था
कह दिया लेकिन
सम्प्रेषण हल न बन सका
मात्र इतना हुआ कि
एक छोटी सी बात का
क़द कुछ और घट गया  |
ठिठुरन से मुक्ति की चाह में
जब मैं अलाव की सेंक लेने बैठा था
तब मुझे यह नहीं मालूम था कि
ठिठुरन से मुक्ति के बदले
मेरा सब कुछ जल जाएगा  |

Tuesday, 12 August 2014

रक्षाबंधन 
अपनी रक्षा के लिए बहन द्वारा भाई से याचना का पर्व 
रक्षा कवच है अगर तो बहन की कलाई पर भाई को बाँधना चाहिए न |
धर्म ने आकर 
आपके कान में कहा
आओ मेरे साथ चलो 
मेरे पास इंसान बनने के सैकड़ों नुस्खे हैं 
आप धर्म से लिपट गए 
धर्म की ऊँगली पकड़कर चलते हुए
आप इंसानियत से दूर हो गए
हिन्दू और मुसलमान बनकर रह गए
अब निर्णय आपको करना है
धर्म की ऊँगली छोड़ना है
या पकड़कर रखना है |
काश ! धर्म निसंतान होता 
न होता कोई हिन्दू 
न होता कोई मुसलमान 
धरती पर दिखता केवल इंसान |
एक व्यक्ति
नया-नया राजनीति में आया
राजनीति के धुरंधर कहे जाते थे जो
उनके चरणों में बैठ गया
पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगा
गुरदेव मुझे भी राजनीति सिखाओ
धुरन्धर जी मुस्कराये और बोले=
भारत में  राजनीति करना है
तो एक ही मन्त्र है
मौक़ा देखकर कभी हिन्दू-हिन्दू
और कभी मुसलमान-मुसलमान चिल्लाओ
कभी आरक्षण का करो विरोध
और कभी आरक्षण के पक्ष में
धरने पर बैठ जाओ   |  

Monday, 11 August 2014

हमारे पुरखों ने
जो दरवाजे बंद कर दिए
उन्हें खोलने का प्रयास
हमनें कभी नहीं किया |

बंद दरवाजों से
निकलने की कोशिश
जब कामयाब होती है
सही मायनों में
जिंदगी तब शुरू होती है | 

Sunday, 10 August 2014

मनुष्य होने की कोशिश में
हम धर्म से लिपट जाते हैं और
मनुष्यता से बहुत दूर चले जाते है
हिन्दू या मुसलमान बनकर मर जाते हैं  |

जोड़ता नहीं
विभाजित करता है धर्म
पेड़ से फूल को तोड़ता है |

मनुष्य होने की कोशिश में
हम धर्म से लिपट जाते हैं और
मनुष्यता से बहुत दूर चले जाते है
हिन्दू या मुसलमान बनकर मर जाते हैं  |

ये बेहूदे भी
खुदा के बन्दे हैं
लेकिन अंधे हैं  |

न ईश्वर के अस्तित्व को नकारता हूँ
न ईश्वर के अस्तित्व को
आकार देने का दम्भ पालता हूँ
तमाम पूजा पाठ,कर्मकांड और धर्म की कालिख
जो ईश्वर के चेहरे पर पोत दी गयी है उसे हटायें
अपने चेहरे पर चढ़ा रक्खी है जो धर्म की नक़ाब
हिम्मत है तो उसे उतारकर
अपना चेहरा ईश्वर को दिखाएँ ज़नाब |

Saturday, 9 August 2014

झूठ बोलने से पहले
कसम खाने का रिवाज़ है
और सच
सच तो एक हसीन ख्वाब है
अब सच में
न कोई आब है,न कोई ताब है |
गीता और क़ुरान की आड़ में
हर रोज़ बोले जाते हैं करोड़ों झूठ
अफ़सोस होता है
जब सर्वज्ञाता, सर्वव्यापी ईश्वर भी
झूठ को पकड़ नहीं पाता है
और थक-हारकर
झूठ की भीड़ में शामिल हो जाता है  | 
अक्सर हम
ज़ुल्म करनेवालों के पक्ष में खड़े होते
और उनके पक्ष में बेहूदे तर्क देते हैं
उनके पक्ष को
और वजन देने के लिए
तमाम धार्मिक किताबों को ढोते हैं
अक्सर हम
ज़ुल्म उनपर ढाते हैं
जो बेहद कमजोर होते हैं    |
2)
अक्सर हम
ज़ुल्म करनेवालों के पक्ष में खड़े होते
और उनके पक्ष में बेहूदे तर्क देते हैं
उनके पक्ष में दिए तर्कों को
और वजन देने के लिए
तमाम धार्मिक किताबों को ढोते हैं
अक्सर हम
ज़ुल्म उनपर ढाते हैं
जो बेहद कमजोर होते हैं    
वे पत्थर मारते रहे 
मैं उन पत्थरों को समेटकर
हर बार उन्हें सौंपता रहा 

लेकिन पत्थर मारने का 
उनका हौसला आज भी कम नहीं हुआ |
एक ऐसा वक्त आता है
जब पेड़ के
दिल और दिमाग को
लकवा मार जाता है
ऐसे लकवाग्रस्त पेड़ पर
कोई पंछी घोसला नहीं बनाता है |

Friday, 8 August 2014

कितने हिन्दुओं के घरों में गीता पढ़ी जाती है ? कितने मुसलमानों द्वारा क़ुरान पढ़ी जाती है ?
उपरोक्त सवालों को लेकर एक सर्वे कराइये हक़ीक़त सामने आ जायेगी | पढ़ना तो दूर हर हिन्दू/ मुसलमान के घर में गीता/ क़ुरान का मिलना भी संदिग्ध है | हाँ,अदालतों में गीता और क़ुरान पर हाथ रखकर झूटी कसम खाने और चन्द लोगों द्वारा धार्मिक भावनाएं भड़काने का प्रचलन आज भी देश में है |     

Thursday, 7 August 2014

माँ ने
कभी कुछ लिखा नहीं
बच्चों के रूप में
कविताओं को रचा है |
हम व्यर्थ ही
कवि होने का दम्भ पालते हैं
हमारे द्वारा लिखी कोई भी कविता
माँ द्वारा रची गयी
कविता के सामने टिकती नहीं है |

Wednesday, 6 August 2014

कलम जिसके हाथ में होती है 
उसका मजहब बखूबी पहचानती है 
कलम अपने मालिक से बगावत नहीं करती 
कलम जिस हाथ में होती है 
उसी की गुलाम होती है |
बच्चे 
साझा करते हैं 
माँ-बाप के गुणों को |
फिर हममें
ईश्वर के गुण क्यों नहीं दिखते ?

2)
जो है वही तो 
सपनों में आता है 
ईश्वर मेरे सपनों में 
कभी नहीं आया |
मैंने कहा
तुमने भर दी हामी
सोचता हूँ मैंने तुमसे
पहले क्यों नहीं कहा ?
व्यर्थ ही
तुमसे दूर रहने का दर्द सहा  | 

Sunday, 3 August 2014

ये दुनियाँ
"मैं" और "तुम" में बटी है
आदमी बड़ा हठी है |
बार-बार लात खाता है
फिर भी
"हम" से घबराता है  | 

Saturday, 2 August 2014

जब वे
प्रेमी-प्रेमिका थे
अच्छे दोस्त थे
तन ही नहीं, मन भी छूते थे
पति-पत्नी बनते ही
केवल तन छूते रहे
मन से हो गए दूर  
दोस्त कहीं गुम हो गया
और एक दूसरे से
झूठ बोलने का सिलसिला शुरू हुआ |    

Thursday, 31 July 2014

गुम हो जाओगे
यादों के दलदल में
बाँझ होती हैं
यादें गर्भ धारण नहीं करती  |

Wednesday, 30 July 2014

बुद्धिजीविओं के पसंदीदा दो निशाने पहला नरेंद्र मोदी दूसरा इस्राइल- देश के बुद्धिजीविओं से मेरा नम्र निवेदन,कृपया निम्नलिखित दो बिन्दुओं पर मेरी जानकारी बढ़ाएं तो अति कृपा होगी=
 १) हमास अंतराष्ट्रीय आतंकवादी संघटन है या नहीं  ?
२) ISIS  प्रमुख शिया है या वहाबी | क्या आप इराक़ में ISIS  द्वारा किये जा रहे कत्लेआम का समर्थन करते हैं  

Tuesday, 29 July 2014

तुम जिसे पाप कहते हो
आदम और हव्वा ने
अगर वह पाप न किया होता
तो ईश्वर का जन्म ही नहीं हुआ होता
अपने जन्मदाता के भाग्यविधाता
तुम कब और कैसे बन गए ?
तुम्हारी जन्मकुंडली में ही लिखा था कि
तुम "धर्म" नाम का एक ज़हर
दुनियाँ में बरसाओगे और
इंसान को इंसान से लड़वाओगे   | 

Monday, 28 July 2014

दिन ने
सूरज का गला घोट दिया
और सूरज ने खून उगल दिया
साँझ के धुंधलके में
दिन के इस अपराध का
आज तक कोई गवाह नहीं मिला |

इंसान में अपराध की नीव
प्रकृति ने ही डाली है
देखिये न बड़ी मछली ने
सारी छोटी मछलियां निगल डाली हैं
सूरज चाँद को रोशन करता हैं
लेकिन अपने सामने उसे टिकने नहीं देता |
सूरज की ह्त्या में दिन और चाँद की मिलीभगत
किसी को नज़र नहीं आती है |
दिन ने
सूरज का गला घोट दिया
और सूरज ने खून उगल दिया
साँझ के धुंधलके में
दिन के इस अपराध का
आज तक कोई गवाह नहीं मिला |   

Sunday, 27 July 2014

ईराक में कत्लेआम हो रहा है 
कोई कह रहा है= 
यह नहीं हो सकता 
सुन्नियों का काम
वहाबी व्यर्थ ही 
कर रहे उन्हें बदनाम
 
सुन्नी हों या वहाबी 
वहशी दरिंदें है 
जिनका कत्लेआम हो रहा है 
वे खूबसूरत परिंदे हैं |
 
1)
छोटी सी ख्वाइश भी 
अगर पूरी नहीं हो पाती 
वक्त के साथ बड़ी हो जाती है 
और फिर उम्र भर सालती है |
2)

वे कश्मीरी पंडितों के कश्मीर से 
विस्थापित किये जाने की कथा नहीं सुनाते हैं 
और फिलीस्तीनियों का दर्द बढ़-चढ़ कर बताते हैं 
अपनों के दर्द में शामिल नहीं होते 
उनके दर्द में घड़ियाली आंसू बहाते हैं |
3)
कश्मीरी पंडितों और फिलीस्तीनियों का दर्द क्या एक जैसा नहीं है ?
4)
बुद्धिजीवी है 
कलम घिसता है और 
जमीन के नीचे अपनी ही बनाई 
अति सुरक्षित खोह में रहता है 
नपुंसक आक्रोश का जन्मदाता है |
5)
सरकार तो बाँझ होती हैं 
जनता को ही गर्भ धारण करना होता है हरबार 
पिछली बार लगे बरस दस 
तब कहीं जाकर जनता को प्रसव पीड़ा उठी 
अभी तो गर्भ ठहरा ही नहीं है इसबार |

यह तो निश्चित है कि स्त्री की सफलता के पीछे किसी पुरुष का हाथ नहीं होता है और पुरुष की सफलता वास्तव में स्त्री की ही सफलता है |
सबको अधिकार दे तो दिया है 
अपनी-अपनी भाषा में सोचने 
और अपनी भाषा में सपने देखने का 
उनका तर्क है== 
हम अगर अंग्रेजों की तरह 
सभ्य और सुसंस्कृत दिखना चाहते हैं 
उन्ही की तरह देश का शासन चलाना चाहते हैं 
तो अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजों की पुलिस को बनाये रखना जरूरी है
मत भूलिए जिन्होंने आपको आज़ादी दिलाई 
वे सब के सब अंग्रेजी के प्रकांड पंडित थे 
अंग्रेजी को बनाये रखना
उन आज़ादी के सिपाहियों के प्रति आभार प्रगट करना है
आप मजे में
अपनी भाषा में सोचिये
और अपनी भाषा में न पूरे होने वाले सपनें देखिये |

Wednesday, 23 July 2014

बुद्धिजीवी है
कलम घिसता है और
जमीन के नीचे अपनी ही बनाई
अति सुरक्षित खोह में रहता है
नपुंसक आक्रोश का जन्मदाता है  |

Tuesday, 22 July 2014

सरकार  तो बाँझ होती हैं
जनता को ही गर्भ धारण करना होता है हरबार
पिछली बार लगे बरस दस
तब कहीं जाकर जनता को प्रसव पीड़ा उठी
अभी तो गर्भ ठहरा ही नहीं है इसबार |
उम्मीद उड़ न जाए
पिंजरे में कैद कर रक्खी है
उनसे मेरी पटती नहीं है
लेकिन दोस्ती बड़ी पक्की है |
नरेश सक्सेना की कविता "रंग" पर एक प्रतिक्रिया
==============================
कविता को भी
धर्म की चौखट पर
माथा रगड़ना सिखा दिया
आकाश को हिन्दू और
धरती को मुसलमान बना दिया |
हवा ही धर्मविहीन क्यों रहे
कृपया हवा को ईसाई कहें  |

Sunday, 20 July 2014

खुद बेईमान
बुरके से बचाते हैं
अपना ईमान
लार टपकती है
सुनकर अज़ान
वाह रे मुसलमान  |

2)
हरि भजन गाते है
मंदिर की घंटियाँ सुनकर
लार टपकाते हैं
धर्म धर्म चिल्लाते हैं
वाह भाई मेरे हिन्दू  |
छोटी मछली 
बड़ी मछली का है शिकार  |
प्रकृति का नियम है 
कृपया हस्तक्षेप न करें 
कमजोर हैं तो ईश्वर से डरें  | 
जम गई है बर्फ
पिघलने दो
फासले मत बढ़ने दो |
थक गया है
रुकने को मत कहो
उसे चलने दो  |
वक्त फिर लौटकर आता नहीं है
अभी वह हँस रहा है
उसे हँसने दो  |
दोगले हैं
खोखले हैं हम सब
कोई एक भी न मिला
जिसके लार न टपकती हो
वह चैन से सोया पड़ा था
न उसके लार टपक रही थी
और न ही उसकी श्वांस चल रही थी  
दोस्तों,घंटी कहीं दूर बजती है
लार हमारी क्यों टपकती है  ?

Saturday, 19 July 2014

कहने और होने के बीच का फर्क
आपको नहीं दिखना चाहिए
इस बारे में वे एकमत हैं  |
जमता पानी है
कहते हैं बर्फ जम गयी
पिसता गेहूँ है
कहते हैं आटा पिस गया
एक सोची-समझी योजना के अनुसार
वे गिरते हैं जान-बूझकर
और कहते हैं पैर फिसल गया  |

Friday, 18 July 2014

प्यार से नहीं
अनजाने डर से पैदा होती है आस्था
सत्य कैद में है और  
ईश्वर का नाम लेते ही
उपस्थित हो जाते हैं ईश्वर के दलाल  |
उन्होंने कहा था
आप नहीं माने
बलात्कार को
अपराध की श्रेणी से
बाहर कर दिया होता
अपराध कम हो जाते  | 
तुम हो गए
कुछ और तीखे
इस तरह से
वार करना कहाँ सीखे ?

तुम्हें जब-जब
पहुँचाई चोट अपनों ने
तुम न रोये और न चीखे  |

Thursday, 17 July 2014

बच्चे ने पूछा-
माँ सपने कैसे होते है ?
माँ ने कहा-
बेटा सपनों की फसल अब नहीं होती |

Wednesday, 16 July 2014

कौन था
ईश्वर की अवधारणा का जनक  ?
किसने की
हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखने की व्यवस्था ?
सृष्टि के प्रारम्भ से पहले जब कर्म नदारद थे
नियति के निर्धारण का आधार क्या था  ?
वे कहते हैं ये सवाल अब बेमानी हैं
बस इतना जानिये कि
चाँद,तारे, हवा और पानी
सब उसकी मेहरबानी है  | 

Monday, 14 July 2014

काश ! ईश्वर से एक-बार मुलाक़ात हो जाती तो उनसे अल्लाह का हालचाल पूछता और इस बहाने गॉड से भी मिलना हो जाता | सुना है ये सब पड़ोसी हैं,इमारत के एक ही ब्लॉक में रहते हैं और सबसे बड़ी खूबी इनकी यह है कि ये कभी लड़ते नहीं ?   
बच्चों को
उनके बचपन में जाकर
देखने का बार-बार मन होता है
इस मुलाक़ात के कई फायदे हैं
बच्चों को उग आई सींग लुप्त हो जाती है
आप एक बार फिर
जवान हो जाते हैं और
बच्चों की ऊँगली पकड़कर
उन्हें चलना सिखाने का आनंद उठाते हैं
आइये चलें
बच्चों से उनके बचपन में जाकर मिलें   | 

Sunday, 13 July 2014

सन्दर्भ-  इस्रायल और फिलिस्तीन
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दोनों अड़े हैं
इसीलिए बरसों पहले
जहाँ थे वहीँ खड़े हैं  |
मेमने की नज़र से ही
दुनियाँ को देखते रहना
और शेर को कातिल समझना,
क्या यह न्याय है ?  

Wednesday, 9 July 2014

सर्वव्यापी ,
दिखते नहीं हैं
लेकिन चुभते बहुत हैं
नामकरण की सुविधा
है उपलब्ध आपको  |