Saturday, 16 September 2017

'सारा जहान आज दो खेमों में बंट गया
कोई दिए के साथ है कोई हवा के साथ'

जब रौशनी के लिए आप दिए को चुनते है तो यह मत भूलिए कि दिया उस हवा की वजह से ही जल सका है
दिए को हवा के थपेड़ों से बचाये,हवा के खिलाफ मत हो जाएँ | हवा की अनुपस्थिति में दिए का जलते रहना नामुमकिन है | हवा भी जरूरी है जलता हुआ दिया भी जरूरी है | 

Friday, 15 September 2017

👉 *#अवश्य पढ़े और पूरा लेख पढ़े समय नहीं हो तो बाद में पढ़े!*
दुनिया के भ्रष्टाचार मुक्त देशों में शीर्ष पर गिने जाने वाले न्यूजीलैंण्ड के एक लेखक ब्रायन ने भारत में व्यापक रूप से फैंलें भष्टाचार पर एक लेख लिखा है। ये लेख सोशल मीडि़या पर काफी वायरल हो रहा है। लेख की लोकप्रियता और प्रभाव को देखते हुए विनोद कुमार जी ने इसे हिन्दी भाषीय पाठ़कों के लिए अनुवादित किया है।
मै इस लेख को पढ़कर पोस्ट करने से रोक नही पाया।
अगर पसन्द आये तो आप भी शेयर करें –
*न्यूजीलैंड से एक बेहद तल्ख आर्टिकिल।*
*भारतीय लोग होब्स विचारधारा वाले है (सिर्फ अनियंत्रित असभ्य स्वार्थ की संस्कृति वाले)*
भारत मे भ्रष्टाचार का एक कल्चरल पहलू है। भारतीय भ्रष्टाचार मे बिलकुल असहज नही होते, भ्रष्टाचार यहाँ बेहद व्यापक है। भारतीय भ्रष्ट व्यक्ति का विरोध करने के बजाय उसे सहन करते है। कोई भी नस्ल इतनी जन्मजात भ्रष्ट नही होती
*ये जानने के लिये कि भारतीय इतने भ्रष्ट क्यो होते हैं उनके जीवनपद्धति और परम्पराये देखिये।*
भारत मे धर्म लेनेदेन वाले व्यवसाय जैसा है। भारतीय लोग भगवान को भी पैसा देते हैं इस उम्मीद मे कि वो बदले मे दूसरे के तुलना मे इन्हे वरीयता देकर फल देंगे। ये तर्क इस बात को दिमाग मे बिठाते हैं कि अयोग्य लोग को इच्छित चीज पाने के लिये कुछ देना पडता है। मंदिर चहारदीवारी के बाहर हम इसी लेनदेन को भ्रष्टाचार कहते हैं। धनी भारतीय कैश के बजाय स्वर्ण और अन्य आभूषण आदि देता है। वो अपने गिफ्ट गरीब को नही देता, भगवान को देता है। वो सोचता है कि किसी जरूरतमंद को देने से धन बरबाद होता है।
*जून 2009 मे द हिंदू ने कर्नाटक मंत्री जी जनार्दन रेड्डी द्वारा स्वर्ण और हीरो के 45 करोड मूल्य के आभूषण तिरुपति को चढाने की खबर छापी थी। भारत के मंदिर इतना ज्यादा धन प्राप्त कर लेते हैं कि वो ये भी नही जानते कि इसका करे क्या। अरबो की सम्पत्ति मंदिरो मे व्यर्थ पडी है।*
*जब यूरोपियन इंडिया आये तो उन्होने यहाँ स्कूल बनवाये। जब भारतीय यूरोप और अमेरिका जाते हैं तो वो वहाँ मंदिर बनाते हैं।*
*भारतीयो को लगता है कि अगर भगवान कुछ देने के लिये धन चाहते हैं तो फिर वही काम करने मे कुछ कुछ गलत नही है। इसीलिये भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्ट बन जाते हैं।*
*भारतीय कल्चर इसीलिये इस तरह के व्यवहार को आसानी से आत्मसात कर लेती है, क्योंकि*
1 नैतिक तौर पर इसमे कोई नैतिक दाग नही आता। एक अति भ्रष्ट नेता जयललिता दुबारा सत्ता मे आ जाती है, जो आप पश्चिमी देशो मे सोच भी नही सकते ।
2 भारतीयो की भ्रष्टाचार के प्रति संशयात्मक स्थिति इतिहास मे स्पष्ट है। भारतीय इतिहास बताता है कि कई शहर और राजधानियो को रक्षको को गेट खोलने के लिये और कमांडरो को सरेंडर करने के लिये घूस देकर जीता गया। ये सिर्फ भारत मे है
भारतीयो के भ्रष्ट चरित्र का परिणाम है कि भारतीय उपमहाद्वीप मे बेहद सीमित युद्ध हुये। ये चकित करने वाला है कि भारतीयो ने प्राचीन यूनान और माडर्न यूरोप की तुलना मे कितने कम युद्ध लडे। नादिरशाह का तुर्को से युद्ध तो बेहद तीव्र और अंतिम सांस तक लडा गया था। भारत मे तो युद्ध की जरूरत ही नही थी, घूस देना ही ही सेना को रास्ते से हटाने के लिये काफी था। कोई भी आक्रमणकारी जो पैसे खर्च करना चाहे भारतीय राजा को, चाहे उसके सेना मे लाखो सैनिक हो, हटा सकता था।
प्लासी के युद्ध मे भी भारतीय सैनिको ने मुश्किल से कोई मुकाबला किया। क्लाइव ने मीर जाफर को पैसे दिये और पूरी बंगाल सेना 3000 मे सिमट गई। भारतीय किलो को जीतने मे हमेशा पैसो के लेनदेन का प्रयोग हुआ। गोलकुंडा का किला 1687 मे पीछे का गुप्त द्वार खुलवाकर जीता गया। मुगलो ने मराठो और राजपूतो को मूलतः रिश्वत से जीता श्रीनगर के राजा ने दारा के पुत्र सुलेमान को औरंगजेब को पैसे के बदले सौंप दिया। ऐसे कई केसेज हैं जहाँ भारतीयो ने सिर्फ रिश्वत के लिये बडे पैमाने पर गद्दारी की।
सवाल है कि भारतीयो मे सौदेबाजी का ऐसा कल्चर क्यो है जबकि जहाँ तमाम सभ्य देशो मे ये सौदेबाजी का कल्चर नही है
3- *भारतीय इस सिद्धांत मे विश्वास नही करते कि यदि वो सब नैतिक रूप से व्यवहार करेंगे तो सभी तरक्की करेंगे क्योंकि उनका “विश्वास/धर्म” ये शिक्षा नही देता। उनका कास्ट सिस्टम उन्हे बांटता है। वो ये हरगिज नही मानते कि हर इंसान समान है। इसकी वजह से वो आपस मे बंटे और दूसरे धर्मो मे भी गये। कई हिंदुओ ने अपना अलग धर्म चलाया जैसे सिख, जैन बुद्ध, और कई लोग इसाई और इस्लाम अपनाये। परिणामतः भारतीय एक दूसरे पर विश्वास नही करते। भारत मे कोई भारतीय नही है, वो हिंदू ईसाई मुस्लिम आदि हैं। भारतीय भूल चुके हैं कि 1400 साल पहले वो एक ही धर्म के थे। इस बंटवारे ने एक बीमार कल्चर को जन्म दिया। ये असमानता एक भ्रष्ट समाज मे परिणित हुई, जिसमे हर भारतीय दूसरे भारतीय के विरुद्ध है, सिवाय भगवान के जो उनके विश्वास मे खुद रिश्वतखोर है।*
लेखक-ब्रायन,
गाडजोन न्यूजीलैंड

Sunday, 3 September 2017

सन्दर्भ-भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार
"कविता " एक शब्द की गाली है .
धरती पर पैर न धरते थे
बिना पंख के उड़ते थे
दोस्तों आओ,
पंख की कहानी सुनाओ |

तुम आते या अब न आते
काश यादो के सिलसिले टूट पाते.
चलो इन पहाडों में कहीं गुम हो जाते हैं .

मैं याद करता हूँ ,
उनको हिचकियाँ भी नहीं आती |
मासूमों की मौत पर खामोश खड़े रहे
इतना गिरे कि हम अब पशु भी नहीं रहे.

रूठ जाता है बचपन
फिर लौटकर नहीं आता
बुढ़ापे की शक्ल में लौटता है मगर
थके और उदास क़दमों से चलकर

हम खुद को नहीं बदलते
दुनियां को बदलने निकल पड़ते हैं.
खरीद कर लाते हैं,
अपनी बगिया के फूल तो
हम पूजा में भी नहीं चढ़ाते हैं.

अनजाने ही सही, व्यवस्था की अव्यवस्था को और हष्ट पुष्ट बनाने में कुछ तो है ही हमारा भी योगदान.
खुदा और ईश्वर के चर्चे जिस दिन बन्द हो जाएंगे हम अमन पसन्द हो जाएंगे

रूहें कब्रिस्तान में फ़रमा रही हैं आराम
इंसानी बस्तियां अब दिखती कहाँ हैं जनाब.

भविष्य की लाश पर खड़े होकर वर्तमान सुधार रहे हैं
कमाओ खूब कमाओ अपने बच्चों का भविष्य बनाओ.
सिर्फ नकारात्मकता ही ढूँढना स्वस्थ मानसिकता का परिचायक नहीं होता . ये चटनी बनाने का व्यवसाय बंद कीजिये जनाब .

इंसानियत अभी बची है और इंसानियत का हिन्दू या मुसलमान से कोई लेना देना नहीं है.

उफ़,हम किधर जा रहे हैं,इंसान थे शैतान बनते जा रहे हैं.हे खुदा तू शैतान को अपनी कैद से क्यों करता है रिहा.
रंगहीन सपनों की कोई इबारत नहीं होती
बालू के ढूह पर खड़ी कोई इमारत नहीं होती.

कोई स्पर्श ऐसा नहीं होता जिसे हम भूल न पाएं
फिर हम क्यों प्रेम के नाम पर अपना घर बसाएं .
मंदिर,मस्जिद में बढ़ने लगी है भीड़, शेर दबे पाँव चलकर आ रहा है.
आसाराम के पैर राजनेताओ ने छुये फिर उनका बाजा बजा, राम रहीम के पैर राजनेताओ ने छुये फिर उनका भी बाजा बजा. निर्मल बाबा के पैर छूते हुये किसी राजनेता की तस्वीर वायरल हुई है क्या?

अपने गिरहबान में कोई नहीं है देखता,किसी का घर जलता देखकर हर कोई अपनी रोटी है सेकता.

अपने " हिन्दू या मुसलमान " होने का जश्न घर के अंदर ही मनाएं घर से बाहर आप एक इंसान हैं.
धर्म को घर की देहरी से बाहर पाँव मत रखने दो .
हम घर में सच बोलने का खतरा क्यों नहीं उठाते, वक़्त मिले तो सोचियेगा जरूर.

सैलाब सी है जिंदगी
इसमें हमारी औकात ही क्या.

न आधा हूँ, न पूरा हूँ
ऊँट के मुहँ में जीरा हूँ

सर्वशक्तिमान को आपके भजन,कीर्तन और भोग की कोई आवश्यकता नहीं है.ढोंग आपके इस पाखण्ड में है.
हम घर में सच बोलने का खतरा क्यों नहीं उठाते, वक़्त मिले तो सोचियेगा जरूर.
हिंदी अनंतकाल तक दस्तावेजों में योहीं राजभाषा बनी रहेगी और सितम्बर के महीने में हिंदी की कब्र पर श्रद्धा सुमन चढाने का यह सिलसिला अनंतकाल तक जारी रहेगा |
बुद्धिजीवी और विरोध पक्ष अगर प्रगतिशीलता के बहाने तथा अपने वोट बैंक को बनाये रखने के लिए ऐसे ही अल्पसंख्यंकों के पक्ष में खड़े होने का नाटक करता रहा तो निश्चित जानिये राम के पक्ष में बहुसंख्यक लामबद्ध हो जाएंगे |
प्रेम की नदी में
आप नहाये तो अच्छा,
न नहाये तो और भी अच्छा.
तहजीब बिकती नहीं बाजार में वर्ना खरीदलाते.
सजाकर ड्राइग रूम में माखौल उसका भी उड़ाते.
धर्म से जुड़ी किताबों में जो भी लिखा है उन पर सवाल न उठाने की वजह से यह दुनियाँ जहन्नुम बनती जा रही है.
सब कुछ उपलब्ध करा देंगे वे 
सिर्फ दो वक्त की रोटी 
का ही तो तुम्हे इंतज़ाम करना है |
कितना भला है राजा
उसे मालूम है 
इक्कीसवीं सदी में जरूरी है
मोबाइल ,क्रिकेट का विश्व कप
ओलंपिक मेडल और एटोमिक बम
तुम्हें सिर्फ दो वक़्त की रोटी
का ही तो इंतजाम करना है |
तुम फिरभी कोसते हो राजा को
यह तो भाई ठीक बात नहीं है |
आओ हम सब मिलकर
ऐसे राजा की बिदाई के बारे में सोचे | 04/09/2012
अंतर्वस्त्र मैले हैं 
कमीज तो उजली है 
आकाश में 
छेद करने का हौसला है 
लेकिन द्रष्टि छिछली है 
इसीलिए भविष्य की तस्वीर धुंधली है
हमारी वजह से 
फलता फूलता है उनका पाखण्ड 
हमें मिलना ही चाहिए इसके लिए दण्ड |

Friday, 1 September 2017

तीन साल में 66 वर्ष का युवा 
8000 किमी के हाइवे बनवाकर
50 लाख मकान बनवा कर
करोडो शौचालय बनवा कर
6 नए एम्स बनवाकर
3 नयी पनडुब्बियां बनवा कर
तेजस विमान हिन्दुस्तान में बनवा कर
धनुष तोप दिलाकर
Orop देकर
सर्जिकल स्ट्राइक करके
तीनो सेना को मजबूत बना कर
65 देशों से व्यापारिक रिश्ते बना कर
चीन को पीछे छोड़कर
विकास दर 7.5के ऊपर ले जाकर
महगाई 5 से नीचे लाकर
फसल बीमा देकर
12 रु में 2 लाख का बीमा देकर
नोटबंदी करके नक्सलियों पाकिस्तानियो को दुखी करके
राफेल विमान का सौदा करके
सऊदी अरब में शेख से मंदिर बनवा के
बुरहान वानी को ऊपर पहुचा के
अलगाववादी कश्मीरियों को औकात में लाके।
बस सब की गालियाँ खाता है।
जो काम करता है,
वो कभी ये नहीं कहता कि
*काम बोलता है*
क्योंकि
*काम दिखता है।
ईश्वर की परिकल्पना को सामाजिक स्वीकृति मिलने के साथ ही शुरू हुई हिंसा |ईश्वर की परिकल्पना ने मनुष्य को हिंसक बना दिया |