Thursday, 31 January 2013

एक सच यह भी
=========
जमता पानी है ,
कहते हैं बर्फ़ जम गयी |
मेरे दोस्त
बर्फ़ पिघलती है ,
जमता पानी है |

Thursday, 24 January 2013

हर रोज मेरे पास से
==============
मैं नहीं पहचानता कविता को
क्योकि मैं कवि नहीं हूँ |
कई बार
मुझे छूती हुई
चिकोटी काटती हुई
मेरे  पास से
गुजर जाती है
कविता मुस्कराती हुई |
मैं नहीं पहचानता कविता को
क्योकि मैं कवि नहीं हूँ |
लेकिन वह जानती है मुझे
किसी को हर रोज
छूता हुआ 
चिकोटी काटता हुआ
इतने करीब से
कोई योहीं नहीं गुजरता |
वह मुस्कराती है
मुझे देखकर इस तरह
न जाने कब से
जानती है मुझे कविता |
 

Wednesday, 23 January 2013

साहित्य के जो मठाधीश हैं उनके बारे में हम क्यों इतना ज्यादा बातें करते हैं| पहले तो हम उनके बारे में ज्यादा बातें करके उनका क़द बढ़ाते हैं और फिर हाय हाय करके चिल्लाते हैं | आज बंद कर दो इनकी बातें करना इनकी ओर ध्यान देना वे बुला बुला कर तुम्हारा हाल पूछेंगे | आइये साहित्य के मैदान में हम जैसे जो बच्चे हैं वे एक दूसरे का हालचाल लेते रहे और भूल जाएँ इन मठाधीशों को |
कल के लिए का दिसंबर अंक। अंक की शुरुआत विष्‍णु खरे की दमदार कविताओं से हुई है और उस पर उतना ही धारदार आलेख कुमार मुकुल का है। नैरेटिव की जो मजबूत परम्‍परा विष्‍णु खरे ने अपने पूर्वजों से आयत्‍त की है उसका घनत्‍व युवा कवियों में उतना प्रभावी नहीं है। इस राह पर चलने वाले कवियों में गीत चतुर्वेदी, व्‍योमेश शुक्‍ल तथा उमाशंकर चौधरी हैं। इस अंक में चौधरी की कविताऍं भी हैं अपने आख्यान के बलबूते वे इन दिनों चर्चा में हैं। किसी को उनका नैरेटिव उबाऊ लगता है तो किसी को उसमें कविता का चरम बोलता नजर आता है। पर जो भी हो, उमाशंकर को देखना होगा कि इस नैरेटिव में वह वक्रता और व्‍यंजना ओझल न होने पाए जिससे अच्‍छी कविता का जन्‍म होता है। कमलिनी दत्‍त ने स्‍त्री समाज और कला पर निर्मम व्‍याख्‍या प्रस्‍तुत की है। मन्‍नू की बातचीत उनके जीवन के अंतरंग पक्ष पर आधारित है। वैभव सिंह तेजी से पहचान बना रहे युवा कथा आलोचकों में हैं। विनोद कुमार शुक्‍ल के उपन्‍यासों में कल्‍पना और यथार्थ के विनियोग पर अच्‍छी तहरीर पेश की है। कृष्ण बिहारी की कहानी षटकोण उम्‍दा है।अपर्णा मनोज की भाषा काव्‍यात्‍मकता का एक सच्‍चा उदाहरण है। उमेश चौहान का लोक कवि उनके आल्‍हा में उभर कर सामने आया है । इसमें पर्याप्‍त समकालीन कथ्‍य भी अंतनिर्हित है। भारतीय जीवन की दुरावस्‍थाऍ—छाप कर कुबेरदत्‍त की याद आपने जीवित कर दी है। पर दुरावस्‍थाऍं को दुरवस्‍थाऍं होना चाहिए। लेखक संगठनों पर अच्‍छी बहस है । पर एक बात यह भी सच है कि ये संगठन अब गैरमहत्‍व के हो चुके हैं। तमाम औचित्‍यपूर्ण मुद्दों पर पार्टी लाइन निहारने वाले ये संगठन आज बेमानी हो चुके हैं। जरूरत है इस बुझती मशाल को और ईधन मुहैया कराना ताकि लेखकों का जो उद्देश्‍य प्रेमचंद ने बताया था, वह पूरा हो सके |

Tuesday, 22 January 2013

कल रात मैं जागता रहा ,देखता रहा सपना==
१) इस भयंकर जाड़े में चिता पर ,गुनगुनी धूप का अहसास,पिघलता हुआ शरीर | शनै शनै खोता हुआ अस्तित्व |
२) रात भर अहंकार चिता के पास खड़ा मुस्कराता रहा,थोड़ा भी कम नहीं हुआ उसका कद |
३)शमशान की ख़ामोशी में उन्मुक्त हास्य भी रुदन मालूम पड़ता है , चिता की रोशनी में हर आदमी सन्यासी दिखाई पड़ता है |    

Monday, 21 January 2013

मत काटो पेड़
=========
काट कर फेंक दिए पेड़ 
धरती के चेहरे पर
पोत दी कालिख  |
गधे तक रो रहे हैं
एक हम हैं जो
ड्राइंग रूम में
सोफे पर बैठ कर
हँस रहे हैं   |
हम नहीं जानते कि
एक पेड़ को काटना
एक बच्चे को मारना है |

Friday, 18 January 2013

बहुत से लोग हैं जो ताउम्र नहीं बदलते ,अब समझ में आया सचमुच वे सब स्टील या किसी अन्य धातु के ही बने होते हैं | ऐसे स्टील से बने लोगो से जीवन में कभी मुलाक़ात न हो यह ख्वाहिश है और मैं निरन्तर बदलता रहूँ ,यह भी है मेरी चाहना |
अब कुछ लिखता नहीं, बोलता भी कम ही हूँ  कुछ भी लिखूंगा कुछ भी बोलूँगा तो मेरी उम्र झलकने लगेगी ,चेहरे की झुर्रियां आपकी सोच में सबसे पहले झलकती हैं |
 नारी की इमेज बदलने के जो प्रयास हों रहे हैं उन प्रयासों की अगुवाई तो स्त्रियों को ही करनी होगी और इस बारे में मेरा सिर्फ एक सुझाव है कि किसी भी सूरत में इसकी अगुवाई पुरुषों के हाथ में न आने पाए वरना बदलेगा कुछ भी नहीं और सहयोग करने के एवज में वे प्रगतिशील पुरुष कुछ मेहनताना वसूल करने में कामयाबी जरूर हासिल कर लेंगे |स्त्रियों का स्वभाव आखिर एक ही रात में तो बदलने वाला नहीं है न ,वे स्वभाव से ही बहुत दयालू होती हैं | 
बहुत से लोग हैं जो ताउम्र नहीं बदलते ,अब समझ में आया सचमुच वे सब स्टील या किसी अन्य धातु के ही बने होते हैं | ऐसे स्टील से बने लोगो से जीवन में कभी मुलाक़ात न हो यह ख्वाहिश है और मैं निरन्तर बदलता रहूँ ,यह भी है मेरी चाहना |
अब कुछ लिखता नहीं, बोलता भी कम ही हूँ  कुछ भी लिखूंगा कुछ भी बोलूँगा तो मेरी उम्र झलकने लगेगी ,चेहरे की झुर्रियां आपकी सोच में सबसे पहले झलकती हैं |
 नारी की इमेज बदलने के जो प्रयास हों रहे हैं उन प्रयासों की अगुवाई तो स्त्रियों को ही करनी होगी और इस बारे में मेरा सिर्फ एक सुझाव है कि किसी भी सूरत में इसकी अगुवाई पुरुषों के हाथ में न आने पाए वरना बदलेगा कुछ भी नहीं और सहयोग करने के एवज में वे प्रगतिशील पुरुष कुछ मेहनताना वसूल करने में कामयाबी जरूर हासिल कर लेंगे   |
बार बार सोना
और फिर उठना
जीवन योहीं बीत गया
जीवन के अंतिम चरण में
अब जगना होगा क्या ?

Thursday, 17 January 2013

आखिर कब तक ?
अब और नहीं |
औरत ने
अगर इनकार कर दिया
अपनी कोख में
तुम्हें पालने से
तब कहाँ होगा
तुम्हारा वंश
कैसे झेलोगे यह दंश |
ऐसा क्यों ?
=======
सिर्फ
"गलत है" कहकर
हम चुक जाते हैं |

चीखते चिल्लाते
नारे लगाते हुए
अकड़ दिखाते है
और फिर
हम झुक जाते हैं |

किसी भी दौड़ में
बढ़ चढ़ कर
शामिल होते हैं
और फिर
हम रुक जाते हैं |

हर बार
गुर्राते गुर्राते
हम सहम जाते हैं |
क्यों भाई ऐसा क्यों ?

Wednesday, 16 January 2013

शीर्षक नहीं ?
=========
जाग रहा हूँ
या सो रहा हूँ
कुछ समझ में
नहीं आ रहा है ?
मुस्करा रहा हूँ
या रो रहा हूँ
कुछ समझ में
नहीं आ रहा है ?
जब कुछ समझ में न आये कि
तुम जग रहे हो या सो रहे हो
तुम मुस्करा रहे हो या रो रहे हो
तब तुम समझ लेना कि
पिघल रही है बर्फ
मौसम बहुत है सर्द
न तुम जग रहे हो न सो रहे हो
न तुम मुस्करा रहे हो न रो रहे हो
तुम आज़ाद हो रहे हो

Monday, 14 January 2013

शब्द
जिनके आसरे थे
वे आसमान पर चढ़े
शब्द गिर पड़े
दोस्त की तरह
------------------
हम एक दुसरे को
पीठ पीछे देते रहे गाली
हम जब मिले
दोस्तों की तरह गले मिले |
हर बार यही होता है मंजर
दोस्त की तरह मिलते हैं
और हाथ में होता है खंजर |
अधूरी आजादी
----------------
खाप पंचायतों पर
लगाम जरूरी
वर्ना है
आजादी अधूरी
रोती रह जायेगी
आधी आबादी
जिसको
कहते हैं हम छोरी
छोरियों को
इंसाफ तब मिलेगा
खाप पंचायतों पर
जब अंकुश लगेगा |
देश का
उच्चतम न्यायालय
जिसे कहता है
गैर कानूनी
उन्ही
खाप पंचायतों का वर्चस्व
क्यों करती है स्वीकार
हमारी  सरकार |


 
कुम्भ स्नान
==========
कुम्भ शुरू
आइये
प्रथम स्नान में
डुबकी लगायें ताकि
आज तक किये
सभी पाप धुल जाएँ
पापों को धोना
बहुत जरूरी है
नहीं तो दुनियाँ में
पाप बहुत बढ़ जायेंगे
क्योकि कहते है न कि
यदि पाप बहुत बढ़ जायेंगे
तो प्रभु
अवतार लेकर चले आयेंगे
और प्रभु
अगर अवतार लेकर आयेंगे
तो होगी बहुत मुश्किल |
आओ कुम्भ स्नान करें
प्रभु को अवतार लेने की
कठिनाइयों से बचाएं |
कुम्भ शुरू ,तमाम से प्रगतिशील विचारधारा के कवि और लेखक भी आपको दिख जायेंगे जो कुम्भ स्नान हेतु वहाँ पधारे होंगे | आखिर पाप कौन नहीं करता और पाप के परिणामों के भय से कौन मुक्त नहीं होना चाहता और कुम्भ स्नान से बेहतर और आसान तरीका और कुछ है क्या ? आइये मित्रों अपनी अंतरात्मा को सुलाने के लिए कुम्भ का प्रथम स्नान करें , यह लोरी है जिसे हमारे साधू संतों ने बड़ी मशक्कत के बाद रचा है | अपनी अंतरात्मा को सुलाने की प्रथम जिम्मेदारी तो हमारी ही है |आइये इस जिम्मेदारी को निभाएं |
इस देश में
-----------------
साधू या शैतान
किसी भी भेष में |
रहना है इसी देश में
इस देश में
इंसानों की
इन दोनों प्रजातियों को
बेख़ौफ़ आजादी है मिली |
साधू जो चाहे बोले
शैतान
जिसका चाहे नाड़ा खोले
साधू चाहते हैं अन्धानुकरण
कोई कुछ न बोले
शैतान चाहते हैं
अन्याय के खिलाफ
कोई अपना मुहँ न खोले
प्रगति और विकास के
इस दौर में
शैतान ने अपना मुखौटा
बदल लिया है
साधू और शैतान
अपने अपने काम में
मुस्तैदी से लगे हैं
और हम
हाथ और मुहँ बांधें खड़े हैं

Saturday, 12 January 2013

किस्सा बच्चियाँ का
============
यह किस्सा नहीं है
परदेश का
नहीं जानता
क्या होगा इस देश का ?
हमें अभ्यास है
मोमबत्तियां जलाकर
कुछ देर आंसू बहाने का
फिर सदा के लिए
सब कुछ भूल जाने का |
हम सोचते हैं
कि हम इस तरह
अपनी बच्चियों को बचा लेंगे ? 
गर्भ में
बच्चियों का चेहरा पहचान कर
मार देने वालों
और बच्चियों के साथ
बलात्कार करने वालों
मत करो दुर्व्यवहार
करो आदर
देखना कहीं गर्भाशय
बगावत पर न उतर आए
और तुम्हें
संतान के लिए तरसाए |

Friday, 11 January 2013

फेसबुक पर जनवरी २०११ से हूँ ,तब से न जाने कितनी बार फेसबुक द्वारा प्रतिबंधित किया गया हूँ प्रतिबंधित किये जाने के कारण चूकि अंग्रेजी में बताये जाते हैं इसलिए मै आज तक प्रतिबंधित किये जाने के कारणों को जान नहीं पाया | मित्रों ,आप लोगों में जो लोग अंग्रेजी के जानकार हो वह कृपया मुझे फेसबुक पर प्रतिबंधित किये जाने के संभावित समस्त कारणों से अवगत कराने का कष्ट करें ताकि मैं सतर्कता/सफलता पूर्वक बगैर प्रतिबंधित हुए फेसबुक का इस्तेमाल करता रह सकूँ | सहयोग मिलने से पहले ही आभार प्रगट करने का जोखिम उठा रहा हूँ |   

Thursday, 10 January 2013

एक बार फिर
==========
अब शुरू होगा
हेमराज और सुधाकर सिंह की
शहादत के नाम पर
रोनी सूरत बनाकर
जंतर मंतर पर 
मोमबत्तियां जलाने का
सिलसिला एक बार फिर

क्योंकि
जंतर मंतर पर
मोमबत्तियां जलाने के सिवाय
हमें कुछ नहीं आता है

मोमबत्तियां जलाते जलाते
एक दिन हम
खुद बुझ जायेंगे
और हमारी कब्र पर खड़े होकर
वे गुनगुनायेंगे कि भाईजान
आप हमें बहुत याद आयेंगे 
कितना आसान होता है घर में सारी सुख सुविधाओं के बीच बैठकर कविता,कहानी के माध्यम से अपने आक्रोश को व्यक्त कर देना | कितना कृत्रिम है यह आक्रोश और शायद इसीलिये प्रभावी भी नहीं |
दर्द को देखना
सुखद है ,
दुखद है
दर्द को भोगना |
चलते -चलते योहीं
===========
किसी भी विवाद में
पड़ने से बेहतर है
कुछ करो |
मेरा तो कहना है

"अगर गिरो
तो पेड़ से
फल की तरह गिरो" |
चीखो मत
=======
वे चाहते हैं
तुम चीखो
चीखने से
कोई नहीं रोकेगा तुम्हें |
वे जानते हैं
चीखने से
बह जाता है आक्रोश
इसीलिए
वे तुम्हें चीखने देते हैं |
और तुम
जितने ज्यादा
जोर से चीखते हो
उतना ही वे
निश्चिन्त हो जाते हैं |
आदमी के स्खलित
होने की प्रक्रिया से
वे भलीभांति परिचित हैं
पुरुष और समाज
अज्ञानी हैं और
बेटियाँ
उनकी अज्ञानता की
सजा पाती हैं
बिटिया बोली -
पुरुष अज्ञानी नहीं है
साजिशकर्ता है
और जिसे आप
समाज कहते हैं
यह पुरुष
उसका कर्ता-धर्ता है |
शीर्षक नहीं
------------------
मत करो मुझसे
कोई सवाल,
हर सवाल के बाद
सहनी होती है मुझे
पीड़ा बार-बार |
बगैर गर्भाशय के
गर्भ धारण करना
और फिर गर्भपात की
पीड़ा से गुजरना
कविता
"माँ" होने की ख्वाहिश को
पूरा नहीं करती लेकिन
कविता
"माँ" होने की लालसा को
मरने नहीं देती |

Tuesday, 8 January 2013

इस बार भी ?
================
मोमबत्तियां
जंतर मंतर पर
जली हैं हर बार
जंतर मंतर ने देखा हैं
यह मंजर कितनी बार |
जब भी
ऐसा कुछ लगा कि
बदलेगा जरूर कुछ इस बार |
पड़ोसी मुल्क के साथ
सटी देश की सीमाओं पर
दिखने लगती है हलचल
हर बार पड़ोसी मुल्क
किसी ऐसे मौके पर
या चुनाव से पहले,
चुनाव हों पड़ोसी मुल्क में
या हों हमारे मुल्क में  
ये संसद में बैठे लोग
उतार देते हैं
हमारे दिल और दिमाग में खंजर
जंतर मंतर ने देखा है
न जाने कितनी बार यह मंजर |
देश खतरों से घिरा है
यह कहकर
मोमबत्तियां बुझा देने का
फरमान जारी कर दिया जाएगा
और यह सब पड़ोसी मुल्क के
हवाई हमलों से आपको
बचाने के लिए होगा  |

Monday, 7 January 2013

बगावत अधूरी है 
------------------
अकेले
एकांत में पड़े पड़े
कभी कभी मैं
टुच्ची सहानुभूति
चाहने लगता हूँ |
मेरे भीतर से
एक आदमी निकलकर
मूंछों को ऐंठता हुआ
लिंग को रगड़ता हुआ
हस्तमैथुन में
व्यस्त हो जाता है |
कनखियों से
चारो ओर देखता 
आश्वस्त मैं
उस आदमी को
जल्दी से
निगल जाता हूँ
मछलियां खाने के बाद
सन्यासी की मुद्रा में
खड़ा हो जाता हूँ |
मैं नंगा होना चाहता हूँ
लेकिन मेरे लिंग की
पूजा हो
यह निश्चित हो |
मैं भूमिगत
बागी होना चाहता हूँ
बाहर आधुनिक और
घर के भीतर
परम्परा को
कैद रखना चाहता हूँ |
देहरी से बाहर
पाँव निकालने पर
परम्परा को
टाँग तोड़ने की धमकी
यह हमारे
आधुनिक होने की सीमा है
इसीलिए 
बगावत का स्वर धीमा है |

Friday, 4 January 2013

मेरे पास बैठीं
मेरी हथेलियों पर
चन्दन मलती रहीं
चलते वक्त
उसी हथेली पर
तुमने
अंगारा रख दिया
हथेली पर
उग आया "तीर्थ "
प्रेम का "सीद्पीठ"
मादाम
चिरकालीन कुछ नहीं होता
जो आज है
वोह कल नहीं होता
सम्बन्धों में
दुर्गन्ध
सम्बन्धों में
नहीं कोई गन्ध
ऐसा भी होता है
जो आज है
वोह कल नहीं होता |

Thursday, 3 January 2013

१)
हिन्दू हो
या मुसलमान
इस सवाल का
कोई हल नहीं है
ख़ुदा के पीछे
भागते वही हैं
जिनकी आत्मा में
कोई बल नहीं है |
२)
झूठ बोलने से पहले
कसम खाने का रिवाज है
अरे, यह कौन है ?
बोलता है सच
यह किसकी आवाज़ है |
३)
पेड़ हो या आदमी
हम सभी का है दर्द
मौसम बहुत है सर्द ||
४)
मैं सही
तुम सही
अब
कोई बहस नहीं |
हर साल तुम्हारी मौत पर
=============
दामिनी
हम
तुम्हे भी भूल जायेंगे
लेकिन यह वादा रहा
हर साल
२९ दिसम्बर को
तुम्हारी बरसी
जरूर मनाएंगे और
हर नए बलात्कार के बाद
तुम्हारी याद
हमें आएगी बहुत |
आज और कल
तुम्हारी आत्मा की
शांति के लिए
रखेंगे मौन और फिर
३१ दिसम्बर को
शराब पीकर
मचाएंगे बहुत शोर |
कोई कृष्ण
नहीं आएगा तुम्हें बचाने
उठाओ मशाल
पहचानो उस आदमी का चेहरा
जिसने बाँध रक्खा है तुम्हें
अपने आँगन में
गाय की तरह
उम्र भर दुहने के लिए |
"जितना भी हो जाये उसे ही पर्याप्त समझिये" की मानसिकता ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है = और पाखंडी धर्म गुरुओं के पैरों में रेंगने वाले कीड़े बदलने वाले नहीं हैं वे व्यस्त हैं बरसती हुई कृपा को पाने में =सब कुछ योहीं लस्टम पस्टम चलता रहेगा =न जाने अभी और कितनी दामिनियों को कुर्बानी देनी होगी =और हम साहित्य रच रहे हैं के दंभ में फूले नहीं समाते हैं | चलिए नए वर्ष के आगमन पर शुभकामनाएं देने की औपचारिकता एक बार फिर निभाते हैं ,दुनियाँ को जगाने का स्वांग करते हैं और खुद सो जाते हैं |
वह औरत जो पुरुष की पूजा करती है उस औरत को मृत्यदंड दिए बगैर स्त्री की मुक्ति संभव नहीं है |पुरुष का यह विश्वास कि औरत उसके लिए जीती है जब तक नहीं टूटेगा पुरुष की नींद टूटेगी नहीं |पुरुष के अहंकार को पुष्ट करने का सारा श्रेय औरत को ही जाता है ,पता नहीं औरत कभी जागेगी भी या नहीं या योहीं करवा चौथ एवं छठ पूजा के बहाने पुरुष के अहंकार को पुष्ट करती रहेगी और पुरुष मदमस्त हाथी की तरह अपने पैरों तले स्त्री को यों ही रौंदता रहेगा | .
जिंदगी गुलगुला
पानी का बुलबुला
वह भाग रहा है
भीड़ से
चाहता है एकान्त
अकेलापन
एकाकी होना चाहता है |
आदमखोर रिश्ते
भीड़ की तरह
लील जाते हैं
समूचा अस्तित्व |
वह एक बार फिर
किसी सपने में
प्रवेश कर जाना चाहता है
पान चाहता है
एकान्त |
दामिनी की मौत पर
===================
इस बार ????
===========
गुस्से को पालना है
बनाना है ताकतवर
ढालना है तलवार
ताकि इस बार
खाली मत जाए प्रहार
हम सो न सकें
चैन से कभी
हमारी आत्माओं को
कभी न मिले शांति
इस बार
गुस्से को पालना है
ढालना है तलवार
करना है पलटवार |
नववर्ष की
पूर्व संध्या पर
शराब पियेंगे
चीखेंगे ,चिल्लायेंगे
और भूल जायेंगे सब कुछ
( दामिनी का बलात्कार भी )
आखिर नए वर्ष
के स्वागत की
जिम्मेदारी भी तो
हमें ही निभानी है |
दामिनी का बलात्कार 16/12/2012
=========================
ओ नपुंसक
तुम्हारी इस हरकत पर
भेड़िये भी शर्मिंदा
क्या हम हैं मानुष जिन्दा
हरबार
संसद से सड़क तक
यह आक्रोश
अगले बलात्कार तक
चुक जाता है हरबार |

बलात्कारी
इस सच को
अच्छी तरह जानता है
मंद मंद मुस्कराता है |

अब आगे से
बलात्कारी की सिर्फ एक सजा
उसका लिंग काटकर
उसके हाथ में
अगला बलात्कार करने
की सामर्थ छीन कर |