Saturday, 29 July 2017

सफेदी जब बालों से झाँकने लगे
दौड़ते दौड़ते जब आप हाँफने लगें
हसीं सपनें जब आपको डराने लगें
खाने में जब आप लौकी खाने लगें
बूढ़ी पत्नी तब बहुत याद आने लगे | 
पत्थर फेंकों
या फेंकों फूल
तालाब के पानी में
अब कोई हलचल नहीं होती |
फ़ेसबुक,
राहत भी है, आफ़त भी है .
भरपूर सियासत है
जो चाहो सो बोलो
लगती नहीं कोई लागत है.
काश,
थोड़ी सी फीस लग जाती
तो अच्छों अच्छों की बोलती बंद हो जाती

प्रेम नही बाकी सब है.
यह कैसा इंसाफ़ तेरा रब है
प्रेम,
एक भ्रम
हो तो अच्छा
न हो
तो और भी अच्छा .

Thursday, 27 July 2017

शब्द विनती करने लगे
शब्दकोश की तरह भीड़ में जुटने लगे
शब्द  "विरोध" ने आगे बढ़कर कहा--
महोदय अब आप
राजनीति पर कुछ नहीं लिखेंगे
क्योंकि राजनीति हमारी समझ में नहीं आती
इन नेताओं की तरह
अचानक यू टर्न लेना हमें नहीं आता
अक्सर हमारी टांग टूट जाती है  |
शब्द " आक्रोश " ने गुस्से में कहा
महोदय, लोगों द्वारा  बार-बार जंतर मंतर पर
मोमबत्तियां जलाने से आपका यह प्यारा, राजदुलारा आक्रोश नपुंसक हो गया है.
और वह डरा सहमा इंसान न जाने कहाँ जाकर सो गया है.
शब्दों को शिकायत थी
कागज़ पर उकेर देते हो
फिर किताबों में क़ैद कर देते हो |

शब्दों को हवा में घुलने दो
नदी के बहाव में बहने दो
गीत गाने लगेंगे
शब्द मुस्कराने लगेंगे 
कुछ फूल ही तो हैं इस झोली में
माँ के घर से ले आई थी डोली में |

Monday, 24 July 2017

क्यों लगाते हो गुहार
बाँझ होती है सरकार
जनता ही गर्भ धारण करती है हरबार |
पिछली बार लगे बरस दस
अभी तो गर्भ ठहरा ही नहीं है इसबार.

Saturday, 22 July 2017

हम तो बन्दर हैं
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एक ज़माना था
हम भी समझते थे
कि हम सिकंदर हैं |
आईना चीखता नहीं
मुस्कराता है और
हम देखते है कि
हम तो बन्दर हैं |
बाँझ सरकार
जनता ही गर्भ धारण करती है हरबार
पिछली बार लगे बरस दस
अभी तो गर्भ ठहरा ही नहीं है इसबार |
बुद्धिजीवी है 
कलम घिसता है और 
जमीन के नीचे अपनी ही बनाई 
अति सुरक्षित खोह में रहता है 
नपुंसक आक्रोश का जन्मदाता है |
बुद्धिजीवी,
नपुंसक आक्रोश का जन्मदाता 
पिता की भूमिका नहीं निभाता |
खुशनसीब बारिश की बूँद
सर्दी के स्वागत में बारिश की तैयारी है 
अपनी तो भाई 
न किसी से दुश्मनी न किसी से यारी है |
विभाजन की वेदना तो
आज भी झेल रहा है हिन्दुस्तान
हर शहर हर गांव में बसता है एक पाकिस्तान |

दो टुकड़ों में बाँट दिया
एक को हिंदुस्तान
और दूजे को पाकिस्तान कह दिया
दिल तो वही एक है जो दोनों में धड़कता है |
प्रार्थना सभा से भागते हैं लोग.
प्रार्थना को हमने इतना जटिल क्यों बना दिया है ? 
खुदा को काशी और काबा में ढूंढते हो
यही तो है तुम्हारे इंसान होने की सज़ा ||

Thursday, 20 July 2017

धीरे धीरे मरना तो प्रकृति का नियम है
हाँ जब तक आप
पिता की ऊँगली नहीं छोड़ते बड़े नहीं होते
जब तक आप
मंदिर मस्जिद का मोह नहीं छोड़ते बड़े नहीं होते
जब तक आप
अंधविश्वासों से मुक्त नहीं होते बड़े नहीं होते
जब तक आप
चमत्कारों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसते बड़े नहीं होते
न जाने क्यों
मुझे लगता है मरने से पहले बड़ा होना ज्यादा जरूरी है ?

Wednesday, 12 July 2017

दोस्ती इतिहास ही नहीं हमारा भूगोल तक बदल देती है.
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रास्ते खत्म नहीं होते ,
हम ही थक कर रुक जाते हैं.
जो करता हो हम को तुम से जुदा 
वह न मेरा खुदा,न है तेरा खुदा.
1)

हर फटेहाल की मुकद्दर लालू जैसी नहीं होती |
भूखों को उपहार स्वरुप एक रोटी नहीं मिलती ||

2)
वह जीवट का आदमी था,
हर ठोकर पर खिलखिलाकर हँसता था |
3)
हर दर्द की एक मियाद होती है, मियाद के खत्म होने का तू इंतजार कर .
हाथ जोड़ कर.
4)

फ़िज़ा की रंगत 
हवा का रुख अब शायद बदले ,
आखिर कब तलक 
चलते रहेंगे वही पुराने जुमले |
5)
अँधेरे के आगोश में 
रात को चैन से सो लेने दो.
6)

रात को दिन के 
ऊजाले में कभी देखा है ?
7)
भूख उसके चेहरे पर पसरी थी.
ख्वाइश में उसकी एक रोटी थी.
8)
शतरंज में एक घोड़ा होता है जो ढाई घर चलता है. इन बुद्धिजीवियों की चाल का तो कुछ पता ही नहीं चलता है.
9)
उन गमो का जो आपने दिए,भी तो कुछ हिसाब कीजिए.
10)
मुझे मेरी ही नजरों में गिराने की साज़िश के लिये तुम्हारा शुक्रिया
मेरे दोस्त.
11)
एकांत में मेरा अस्तित्व काँपता है 
भीड़ में मेरा व्यक्तित्व काँपता है आओ 
एकांत और भीड़ से बचे 
घर चलें.
हमारी जीभ
तुम्हारी जीभ से लम्बी है
ये सियसत क्यों इतनी गन्दी है ?

Saturday, 8 July 2017

अब जब मिलेगी भाषा
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भाषा मुझे मिली
एक बुर्राक सफ़ेद साड़ी में 
एक नजर में मुझे
वह विधवा सी लगी
विधवा को जब कोई देखता है
गलत नज़र से देखता है
उन्होंने वादा किया
गलत नज़र से बचाने का
जिंदगी भर साथ निभाने का
अपनी खोली छोड़कर
वह उसके घर रहने आई
उसने सौंप दिए सारे मोती
कर दी झोली खाली
तबसे वे सफेदपोश
खा रहे हैं उसकी दलाली
उस विधवा की सफ़ेद बुर्राक साड़ी
कर दी मैली काली काली |
अब जब भी भाषा
मुझे मिलेगी तो उसे समझाउँगा
छोड़ दो शालीनता अब
और दो उन्हें भद्दी भद्दी गाली |
अहंकार का क़द
हमेशा आदमी के क़द से बड़ा होता है
खोखली होती है जमीन
जिसपर वह आदमी खड़ा होता है ,
उफनती हुई लहरों को देखो
ऐसा लगता है
समुन्दर कभी बूढ़ा नहीं होता है |

Tuesday, 4 July 2017

बदलता है कल का व्याकरण बदलता है, आज का व्याकरण कभी नहीं बदलता |
मरने से पहले हमारे बीच हुए संवादों को प्रकाशित जरूर करवा देना ताकि दुनियाँ जान सके कि हम कितने बड़े छिछोरे थे |
देश बदलेगा जब हम बदलेंगे और हम बदलना नहीं चाहते हैं | हमारे लिए देश का मतलब केवल मैं होकर रह गया है | 
मेरे परबाबा ने मेरे बाबा को और बाबा ने मुझे बताया था खुदा के घर का पता--
ईश्वर जिस घर में रहता है उससे सटा हुआ जो घर है वहीँ तो खुदा भी रहता है |

Monday, 3 July 2017

आँखों का समुन्दर सूख जाता है 
होंठों का मुस्कराना छूट जाता है 
तब कहीं जाकर वरिष्ठ नागरिक 
होने का सम्मान आपको मिल पाता है |