Saturday, 29 July 2017

फ़ेसबुक,
राहत भी है, आफ़त भी है .
भरपूर सियासत है
जो चाहो सो बोलो
लगती नहीं कोई लागत है.
काश,
थोड़ी सी फीस लग जाती
तो अच्छों अच्छों की बोलती बंद हो जाती

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