Wednesday, 31 May 2017

कोई मस्जिद मस्जिद चिल्ला रहा है
कोई मंदिर मंदिर चिल्ला रहा है
ईश्वर और खुदा को अगर तुम "दो" मानते हो
तो जान लो वे दोनों एक दूसरे से लिपटकर आंसू बहा रहे हैं |
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अवधेश निगम 
गधे और घोड़े का रत्ती भर फर्क है मुझमे और तुम में | तुम खुद को घोड़ा मानकर इतराते हो |  हम दोनों में सबसे बड़ी साम्यता यह है कि हम दोनों ही मांसाहारी नहीं हैं |घास तुम भी खाते हो घास हम भी खाते हैं | 

Tuesday, 30 May 2017

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WIPRO CHAIRMAN MR. AZIM PREM JI'S COMMENT ON RESERVATION:

offline

Wipro chairman Mr. Azim prem ji's comment on reservation:

5 years, 1 month ago
I think we should have job reservations in all the fields.
I completely support the PM and all the politicians for promoting this.

Let's start the reservation with our cricket team.

We should have 10 percent reservation for Muslims.
30 percent for OBC, SC /ST like that. Cricket rules should be modified accordingly.
The boundary circle should be reduced for an SC/ST player.
The four hit by an SC/ST/OBC player should be considered
as a six and a six hit by a SC/ST/OBC player should be counted as 8 runs.
An SC/ST/OBC player scoring 60 runs should be declared as a century.
We should influence ICC and make rules so that the pace bowlers
like Shoaib Akhtar should not bowl fast balls to our SC/ST/OBC player.
Bowlers should bowl maximum speed of 80 kilometer per hour to an SC/ST/OBC
player. Any delivery above this speed should be made illegal.
Also we should have reservation in Olympics. In the 100 meters race,
an SC/ST/OBC player should be given a gold medal if he runs 80 meters.
There can be reservation in Government jobs also.
Let's recruit SC/ST and OBC pilots for aircrafts which are
carrying the ministers and politicians (that can really help the country)
Ensure that only SC/ST and OBC doctors do the operations for the ministers
and other politicians. (Another way of saving the country..)
Let's be creative and think of ways and means to guide INDIA forward.
Let's show the world that INDIA is a GREAT country.
Let's be proud of being an INDIAN...
May the good breed of politicians long live..

Monday, 29 May 2017

बात हिंदी गजलों की ज़मीन पर की जानी चाहिए । यास्‍मीन खान के पास गजलों की ऐसी रवानगी है कि कोई भी उसके शब्‍द चयन, काफिये व रदीफ पर मुग्‍ध हो जाए। यहां पांचों गजलें एक से एक उम्‍दा हैं। पहली गजल तो लाजवाब है। ऐसा काफिया रदीफ अभी तक हिंदी शायरी में तो मैने पाया नहीं। क्‍या खूब कहा है--



दिलदार का ये प्‍यार कभी है कभी नहीं

ये  मौसमे बहार कभी है कभी नहीं



किस्‍तों पर हमको जख्‍म न दीजै हुजूर आप

तलवार पे ये धार कभी है कभी नहीं।



क्‍या बात है।



क्‍या सादगी है ऐसा कहने में। हिंदी शायरी की परंपरा में आज सभी गालिब व मीर नही हैं पर हिंदी गजलों को जिन लोगों ने नए मेयार तक पहुचाया है उनमें दुष्‍यंत, अदम, एहतराम इस्‍लाम, ज्ञानप्रकाश विवेक जैसे गजलगो के बाद नई पीढी में बहुतेरे हस्‍ताक्षर हैं। जैसे मंगल नसीम, विजय किशोर मानव, लक्ष्‍मीशंकर वाजपेयी, दीक्षित दनकौरी,  गौतम राजऋषि, नागेन्‍द्र अनुज, सिचा सचदेव, आलोक श्रीवास्‍तव, सोनरूपा विशाल, इंदुश्रीवास्‍तव.............आदि आदि। यास्‍मीन की ये गजलें देख कर लगा कि गजलों में इन मोहतरमा का हाथ रंवा है। गजलें तो वहीं जिनहें पढ कर दिल को सुकून मिले कुछ नया मिले। कथ्‍य मिले नया शिल्‍प मिले। यास्‍मीन की गजलें एक नए अंदाजेबयां का आग़ाज़ हैं। बड़ी बहर की गजलें लिखनी आसान नहीं। पर यास्‍मीन की और भी गजलें देखी पढी हैं यहां भी दूसरी गजल इस बात की मिसाल है। जैसे छोटी बहर में विज्ञानव्रत को महारत हासिल है वैसे ही बडी व छोटी दोनो बहर में यास्‍मीन  कामयाब गजलें कह रही हैं।


तुमने ठीक कोट किया गुलाब जी को कि उसे अपने मन के गुरूर से न सुना किसी ने तो क्‍या हुआ। वो गजल किसी से तो कम न थी जिसे हम सुना के चले गये। ओम जी आप जिस पर बाएं हाथ से भी लिख दें वह शख्‍स हीरा हो जाए। गंभीर  समाचार को बधाई  कि  उसने  ऐसी गजले छापी। ईश्‍वर तुम्‍हारी कलम को ताकत दे। तमाम युवाओं की दुआएं तुम्‍हारे नाम।








जिस राह पर जल रहे हो दिये
उस राह पर ही चलना तुम प्रिये |
राह आसान करने के तरीके
दोस्त कोई उनसे जाकर सीखे |
मार्क्स के हाथ में तिरंगा देखा
वामपंथियों को  नंगा देखा |

Sunday, 28 May 2017

रंगहीन सपनों की कोई इबारत नहीं होती
बालू के ढूह पर खड़ी कोई इमारत नहीं होती  |
धर्म वह तलवार है
जो दिखती नहीं है,
उनको भी है मालूम
धर्म के नाम पर
कत्लेआम की कोई सज़ा नहीं है ||
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अवधेश निगम 

Saturday, 27 May 2017

चाँद तेरा है
और सूरज मेरा है
रंगों से क्यों है दुश्मनी
इंद्रधनुष न मेरा है न तेरा है |

दीवार को तो ढहना है / हमें एक साथ रहना है |
इस सच को कोई बदल नहीं सकता / हमें साथ जीना है और साथ ही मरना है |

स्त्री के शब्दों पर भरोसा मत करना
स्त्री के मौन को समझना फिर उसे बाहों में भरना |
   

Friday, 26 May 2017

ढके हुए चेहरे 
===========
टुकड़ों टुकड़ों में 
सच को 
कैसे जानोगे 
केवल उसका हाथ देखकर
तुम उसको कैसे पहचानोगे ?
चेहरे को ढककर
घर से बाहर निकलने का चलन
अब नहीं होता यहाँ कोई मिलन
ढके हुए चेहरों में
कौन है दोस्त
कौन है दुश्मन कैसे पहचानोगे ?
अब तो यही है यहाँ की रीति
कूड़े के ढेर पर पड़ी
रो रही है प्रीति |
जिन्होंने तुम्हें पहुँचाई है चोट क्या तुम उनसे बदला लेना चाहते हो ?एक आसान सा तरीका है खुश रहो और जब भी उनसे मिलो मुस्कराते हुए मिलो |


न शिकवा है न शिकायत है
न रूठते हैं,न मनाते हैं
अब रिश्ते यों निभाये जाते हैं |
हम सुधरेंगे तो देश सुधरेगा
हमनें तो न सुधरने की कसम खा रक्खी है,
हम सुधरेंगे नहीं तो देश कैसे सुधरेगा मित्र ?

संविधान में सवाल करने की है आज़ादी
उन्हें सवाल करने में है महारत हासिल
(यह अलग बात है कि
उन सवालों के जवाब वे खुद भी नहीं जानते )
सवालों के चक्रव्यूह में
अभिमन्यु के मरने की खबर सुनने के लिए वे हैं व्याकुल | 

Saturday, 20 May 2017

स्त्री मोह से
मुक्त हो गए
तुम बुद्ध हो गए  |
अब इतना सरलीकरण भी मत करो यार
बुद्ध को समझना इतना ही आसान होता तो गली गली में मिलते बुद्ध |

दलितों और वंचितों का मसीहा
साख बढ़ती ही जाती है,
ईमानदार हो तो लालू यादव जैसा हो |
द्रौपदी का चीरहरण हर युग में होता रहा है
हर खासो-आम का भरोसा बरकरार है कि ...
देर-सबेर कृष्ण आयेंगे जरूर,,,
चीर बढ़ाएंगे जरूर,,,, पीर घटाएंगे जरूर....
कृष्ण का इन्तजार हमारे नपुंसक होने की घोषणा भी तो करता है |
अपनी नपुंसकता को नकारने के लिए वे करते हैं बलात्कार बार-बार  
सुना है-
अंत में जीत सच की ही होती
लेकिन यह कोई नहीं बताता कि
अंत से पहले ही सच अंतिम सांस लेता है |

कृष्ण का इन्तजार हमारे नपुंसक होने की घोषणा भी तो करता है |
अपनी नपुंसकता को नकारने के लिए हम करते हैं बलात्कार बार-बार  
झूठ के पैरों तले
सच को कराहते देखा है
कौन जाने सच को
मैंने देखा है या तुमने देखा है ?

सुना है अंत में जीत सच की ही होती लेकिन यह कोई नहीं बताता कि अंत से पहले ही सच अंतिम सांस लेता है |
मायका कहता है, ये बेटियां तो पराई हैं |
ससुराल कहता है, ये पराये घर से आयी हैं |
मायके भी होते हैं
ससुराल भी होते हैं,मगर
घर नहीं होते लड़कियों के |
=================
नामालूम
एक वक्त आता है
जब न मायका होता है
और न ससुराल बचता है
तब इन बेटियों का घर बसता है |
यही बेटियां जब सास बनती हैं
तब मायके और ससुराल का खेल फिर शुरू होता है |
==================
अवधेश निगम

Friday, 19 May 2017

कभी हम यक़ीनन दोस्त थे ,
यह बेरुखी दोस्ती का ईनाम है |
कभी गर अँधेरा देखकर घबरा गया ,
काँधे पर मेरे ऐ दोस्त तुम्हारे हाथ थे  | 

Tuesday, 16 May 2017

चूँकि प्यार
झूठ के ढेर पर खड़ा होता
इसीलिए आपको
उसका क़द बड़ा दिखता है |

जो झूठ बोल सकते हैं 
वे बेहतर प्रेम कविताएं लिख सकते हैं |

Friday, 12 May 2017

माँ, गैर जरूरी बातों की ओर ध्यान नहीं देती लेकिन अफ़सोस अनुसरण हम हमेशा पिता का करते हैं |

हम भी कभी जवान थे और तब तुम्हारी ही तरह जिंदगी की हक़ीक़त से अनजान थे | हममें और तुममें केवल यही तो फर्क है== मैं जवान था तुम जवान हो |


न मरने का रास्ता 
अगर मुझे मालूम होता 
तो सबसे पहले 
मैं अपना मरना स्थगित करता |

ज्यादातर लोग तो जीना शुरू करने से पहले ही मर जाते है | वैसे मौत भी तो आखिर जिंदगी की शुरुआत ही है |

ख्वाब टूटा है 
लेकिन बचपन नहीं छूटा है |

फेसबुक पर किसी की मौत की खबर पर RIP लिखने की बाढ़ सी आ जाती है, यह सब यंत्रवत होता है==== 
 यह सवेंदना नहीं है, यह शोक भी नहीं है, यह भीड़ में अपनी औपचारिक उपस्थिति दर्ज करने की कवायद मात्र है |
नींद आ जाए तो राहत है रात वर्ना--- रात का सन्नाटा डराता है / दर्द अपना फन फैलाता है |
2)

पुजारी बांटता है 
ईश्वर के नाम की पंजीरी 
मुल्ला होता है 
अल्ला का दल्ला 
ईश्वर अल्ला एक समान
सबको सन्मति दे भगवान् |

3)

निश्चित ही देश को एक सशक्त विपक्ष की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है लेकिन अन्य मुख्य विपक्षी दल आज़ादी के बाद से लगातार सत्ता में रहने के कारण विपक्ष की भूमिका निभाने में अक्षम हैं | सच तो यह है कि जो सत्ता में हैं उन्हें सत्ता चलाने का अनुभव नहीं है और अन्य सत्ता के जटिलताओं से तो परिचित हैं लेकिन विपक्ष के संघर्ष से अनजान |

4)

जो लोग अन्दर से मर जाते है / वे मरने से पहले ही मर जाते हैं |
5)

हर किसी से तुम हँसकर बात करना / गमजदा होने की खबर फैलने मत देना |
6)
बड़ी कोशिश की माँ को भुलाने की, 
 वह बात ही नहीं करती कहीं जाने की |

7)
चंद सिरफिरों की वजह से किसी भी कौम को बदनाम करना बेहूदगी के अतिरिक्त कुछ नहीं होता लेकिन कभी जानबूझकर और कभी अनजाने में यह काम हम सब करते रहते हैं |आईना साथ लेकर अब हम नहीं चलते |

8)
जिन रिश्तों का हो जाता है नामकरण,अधिकार के बोझ तले दबकर मर जाते है |
कुछ ऐसे लोग भी होते हैं
जो बिन छुए ही आपको छू लेते हैं |

अनाम रिश्ते जिनका कोई नाम नहीं होता |
जिनके पास किसी भी तरह का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता |
9)
तुम्हारे एहसास से ही
पसर जाती है खुशबू
चारो ओर मेरे आस पास |
इस खुशबू को 
अपने भीतर समेटने से पहले
 भटकती हुई भूलकर भी आ मत जाना मेरे पास |
10)


खोने का डर अगर नहीं होता 
तो उग आते इंसानों के भी पर |
2)

निर्मल वर्मा को उनके जन्मदिन (३ अप्रैल १९२९) पर याद करते हुए---
अंतिम अरण्य के वे दिन
एक चिथड़ा सुख की तलाश में
लाल टीन की छत पर 
भटकता रहा 'रात का रिपोर्टर' |
3)
इतिहास माने कब्रिस्तान, 
घड़ी-घड़ी इतिहास में चले जाते हो तुम बेईमान |
4)
एक अनजाना सा भय ही ती है जो हमें ईश्वर की इबादत के लिए मजबूर करता है, वर्ना किसने देखा है उसे ?

2)

जो आप कहें वही सही बाकी सब बतकही,
अभिव्यक्ति की आज़ादी के पुरोधाओं को नमन |
3)
बूढ़ा हो गया प्रेम 
अब कैसी कुशल क्षेम |
4)
न एकमुश्त जिंदगी जीते हैं 
न एकमुश्त मरते हैं हम लोग 
 मरने से पहले 
थोड़ा थोड़ा मरते हैं हर रोज |
5)
हमारी किशोरावस्था में 
Jai Narain Budhwar के सभी दोस्तों के बीच 
एक मीठे पानी की नदी बहती थी 
गुड्डू का न रहना दरअसल उस नदी का सूख जाना है |
6)
व्यक्ति के बदलने से बदलता है समाज, 
समाज को बदलने की बेचैनी में हम खुद को बदलना भूल जाते हैं |
7)

सवाल करना बहुत अच्छी बात है लेकिन आपके सवाल पर अगर कोई सवाल करता है तो आप बुरा मान जाते हो और सवाल करने वाले को भक्त कहकर भाग लेते हो | किसी भी बहस में प्रश्न और प्रति प्रश्न न हों तो उसे सार्थक बहस नहीं कहा जा सकता है | आपका यह सोचना की जो हम कहें वही सही बाकी सब बतकही की वजह से ही आपकी सोच मात्र जेएनयू में क़ैद होकर रह गयी है |
हमारे देश में सारी प्रतिस्पर्धा खुद को ब्राह्मण या क्षत्रिय साबित करने में ही है |
2)
खिलौने जब डराने लगें 
तो समझ लेना 
आपके अपने आपसे दूर जानें लगे |
3)
आरक्षण की अफीम चटाकर दलित चेतना को हमेशा के लिए पंगु बना दिया गया है और अब इसके वर्गीय चेतना में परिवर्तित होने की गुंजाइश लगभग समाप्त हो चुकी है |
ये न मेरा खुदा न है तेरा खुदा
करता हमको एक-दूजे से जुदा |
&&&&&&
कुछ पल तो हमें सुकून से जीने दे
कुछ देर के लिए तू सो जा ऐ खुदा |

2)

गाँठों को, 
महसूस करना हरबार 
शादी की वर्षगाँठ पर 
मुझे सुख देता है प्रिये |
3)

माफ़ी माँगना भी एक कला है और कुछ लोगों को इसमें महारत हासिल है|
4)

मजदूरों के नाम पर
मजदूर दिवस मनाते हैं
आपको तो मजदूरों के नाम पर
वेतन के साथ एक दिन का अवकाश मिल जाता है
और आप परिवार के साथ अवकाश का लुफ्त उठाते हैं
इसी बहाने वामपंथी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं
मजदूर तो अपना पसीना रोज की तरह ही बहाते हैं
आखिर हम मजदूर दिवस क्यों मनाते हैं ?????????????

2)
कहते रहिये आप "श्रमिक गुलाम नहीं होता, अपने श्रम का मालिक होता है " लेकिन इस सत्य / तथ्य को बदल नहीं पाएंगे कि जिससे अपने श्रम का मूल्य पाता है श्रमिक उसीका गुलाम होता है |
3)
वातानुकूलित कमरे में बैठा हुआ मजदूरों का नेता जब लेबर दिवस की शुभकामनायें देता है तो अच्छा लगता है |
अनाम रिश्तों को सलाम |
2)

जिन्हें "तुम" कहकर सम्बोधित करता था उन्हें "आप" कहकर दूरी बना ली है |
3)
 यौवन 
इतिहास क्या हुआ, 
जिस्म का 
भूगोल ही बदल गया |
( स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू )

4)

अक्सर वो आधा सच ही बताता है और आधा सच झूठ से भी ज्यादा घातक होता है |
5)

उन्हें ख्वाब ही दिखाना 
मूढ़ बहुमत को कभी सच मत बताना 
 राजगद्दी रहेगी सलामत बरसों बरस |
अंगूर के सपने के खातिर वे भूखे ही सो गए |
6)






The dream of common civil code may come true .
???????????????????????????????????????????
हमें मुसलामानों के बहुविवाह प्रथा से आपत्ति नहीं है,हम केवल यह चाहते है कि यह सुविधा हमें भी प्रदान की जाए | हिन्दू धर्म में भी पुरुषों के लिए बहुविवाह का कोई निषेध नहीं किया गया है | आखिरकार हम एक ही देश के नागरिक हैं फिर हमारे साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों ?

 हिन्दू तो आप भी हैं,जहाँ तक मेरी जानकारी है आप ने अभी तक धर्म परिवर्तन नहीं किया है ? भाई मैंने किसी धर्म की कुरीतियों को उजागर करने की कोशिश नहीं की है बल्कि उनके धर्मानुसार जो अच्छी बातें जैसे बहुविवाह और तीन तलाक़ की मांग की है ताकि देश में एक Common Civil Code बन सके |

 हिन्दू तो आप भी हैं,जहाँ तक मेरी जानकारी है आप ने अभी तक धर्म परिवर्तन नहीं किया है ? भाई मैंने किसी धर्म की कुरीतियों को उजागर करने की कोशिश नहीं की है बल्कि उनके धर्मानुसार जो अच्छी बातें जैसे बहुविवाह और तीन तलाक़ की मांग की है ताकि देश में एक Common Civil Code बन सके |

हज़ारों वर्षों से पुरुष के बहुविवाह और तीन तलाक़ को मुस्लिम स्त्रियां झेल रहीं हैं न | मुस्लिम समाज अगर इसे धर्मानुसार मानता है और हिन्दू धर्म में इसका कोई निषेध भी नहीं है तो यह सुविधा अगर हमें भी मिल जाती है तो देश में एक Common Civil Code बनने की संभावना तो बन सकेगी |

औरत हिन्दू हो या मुस्लिम कमोबेश सभी की हालत दयनीय है | हिन्दू पुरुष तो कानून से बंधा है अगर तीन तलाक़ की सुविधा हिन्दू पुरुष को भी होती तो हिन्दू औरतों की दुर्दशा पर कोई रोनेवाला भी नहीं होता | मुस्लिम औरतों की स्थिति में केवल कानून बनाकर ही कुछ बदलाव किया जा सकता है |

ट्रिपल तलाक़ और हलाला जैसी अमानवीय प्रथाओं पर जो मौन हैं, आखिर वे कौन हैं ?
1)

मंटो ने कबीर की परम्परा को आगे बढ़ाया-मंटो-कबीर को नमन |
2)


भीतर हो
या हो बाहर
सन्नाटा चीर दे
कोई शोर ऐसा हो भी तो,
चुरा ले नींद
सपनों को भी चुरा ले
कोई चोर ऐसा हो भी तो,
नृत्य ऐसा करे
बादलों को बुला ले
कोई मोर ऐसा हो भी तो |
3)
सारी जिंदगी हम दोनों के बीच पसरी रही चुप्पी,
लाख कोशिश करते थे छिपाने की फिर भी
घुप अँधेरे में भी दिख ही जाती थी आँखों की नमी |
4)
उम्र जब कम होती है तब अनुभव जनित विश्वासों से सहमत होना सम्भव नहीं हो पाता है |

कितना भी गहरा हो 
जख्म भर ही जाता है 
वक्त के साथ 
दर्द का क़द घट ही जाता है |
बांसुरी की धुन पर
गोपियों का
कृष्ण की ओर खिंचे चले आना
अनाम रिश्ते ऐसे ही बुलाते हैं |
=========
अवधेश निगम 

Saturday, 6 May 2017

आँखों में हो मौन
संवाद करे फिर कौन ?
सूख गया जो पौधा वह कभी सूखने नहीं पाता.
थके हारे बटोही को चंद बूँद पानी की कोई तो पिलाता  |

Thursday, 4 May 2017

तुम्हारी उपस्थिति से बेहतर हैं तुम्हारे होने का एहसास |

Wednesday, 3 May 2017

यौवन
इतिहास क्या हुआ,
जिस्म का
भूगोल ही बदल गया |
( स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू )

2)

गठा बदन 
गठा नहीं रह जाता 
बर्फ सा पिघल जाता है 
वक़्त के साथ 
सब कुछ बदल जाता है |
(पुरुष हो या स्त्री
दोनों के लिए एक समान लागू )
बात कहने से छोटी हो जाती है,
कुछ अनकहा ही रह जाए तो बेहतर है |
मौन के साथ
आँखों का जुड़ जाना
संवाद का पूरा हो जाना है |