बहेलिये के पास
गिरवी रखकर उड़ जाते हैं
मुझे सतानें में
न जाने वे कौन सा सुख पाते हैं
कहाँ हैं वे
जिन्हें खोजती हैं कविताएँ
कविता को खोजते हों जो
वे अब रहे कहाँ ?
जड़े जब सड़ जाती हैं तो पत्ते, फूल, फल ही नहीं पेड़ का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है |जड़े सड़ चुकी हैं इस सत्य को नकारा भी तो नहीं जा सकता है, आपका कथन इस सत्य से नजरें चुराता हुआ सा लगता है ,क्या ऐसा नहीं है ?
रात गुजर ही जाती है
तुम्हारा साथ हो, न हो
नींद आ ही जाती है |
मित्र को
धन्यवाद् देना
कुछ अजीब तो लगता है
लेकिन फिर भी
कहना तो पड़ता है |
माँ पर
जब हम कोई कविता लिखते हैं
तो न जानें क्यों
मुझे लगता है
माँ का कद हम कम करते हैं
माँ है तो हम हैं
माँ के अतिरिक्त
सब भ्रम है
अब नहीं
आयेगा कोई कृष्ण
धर्म से पैदा होती है
जो निर्मम/ आतताई प्रवृति
उसपर तुम्हें ही कसनी होगी नकेल |
गुजर गया
एक बरस और
नववर्ष पर
शुभकामनाएँ देनें की
औपचारिकता एक बार और
वह कभी हारता है नहीं
जो करता है कोशिश एकबार और |
नए शब्द
नहीं रचे जाते,
नए सिरे से
नई तारीखों में
शब्दों से
रचते हैं हम नए अर्थ |
नया साल २०१४ मंगलमय हो |