Tuesday, 28 January 2014

अतृप्त मन
अगर तृप्त हो जाता
तो न ख्वाब आते
और न ख्वाब में आते तुम
जिस्म पर चीटियों का रेंगना
स्थगित हो जाता
और हम बेलौस मुस्कराते |
खिले हुए फूल को देखकर
जो उदास हो जाते हैं
वे ही धर्म-धर्म चिल्लाते हैं  

Sunday, 26 January 2014

उन्होंने वायदे किये थे
निभाएंगे भी
इसकी गारंटी कौन देता है ?
मेरा रंग दे बसंती चोला
कहने वाले अब कहाँ रहे
वतन के लिए
अब मुफ्त में जान कौन देता है ?
मैगी पीढ़ी
सिर्फ दो मिनिट
आइये तैयार है
"आप" की सीढ़ी |
खाइये बर्गर
धरनें पर बैठिये
"आप" जान लीजिये
कोई भी कार्य
नहीं है दुष्कर ????
१}
छोटे-छोटे झूठ
बड़े बड़े भ्रम
जो इस पार है
वही उस पार है |
२}
आत्ममुग्ध हैं सब
जो आत्ममुग्ध नहीं हैं
उनका जीवित होना संदिग्ध है ?

Saturday, 25 January 2014

आँसू
आँखों के दुश्मन हो गए
अब नहीं आते
याद आती थी जिनकी बहुत
वे अब नहीं भाते |
तुम मुझे
मैं तुम्हें
टूटते हुए देखते
तो खुश नहीं
उदास हो जाते
इसी को हम प्यार कहते
एक दूसरे को टूटते हुए देखना
आज हमारा पसंदीदा शगल है |
सिसकियों की आवाज़
न मुझ तक आती है
न तुम तक जाती है  | 
जिनकी आँखें नहीं भीगती 
उनके होंठों पर 
मुस्कान भी है नहीं थिरकती
मैंने तुम्हें 
तुमनें मुझे 
विकल्प के तौर पर चुना 
तुम मेरे लिए
मैं तुम्हारे लिए 
विकल्प ही बने रहे
जिंदगी चुक गयी
किन्तु/परन्तु घर नहीं बना
क्यों हमनें एक दूसरे को
विकल्प के तौर पर चुना ?
बरसों-बरस पहले
बजा था आज़ादी का बिगुल
तंत्र के शिकंजे से
गण को मुक्ति नहीं मिली
बगुले फूँक रहे हैं
गण के कानों में मंत्र
आओ मनाएं गणतंत्र दिवस |
तंत्र के शिकंजे से
गण की मुक्ति के लिए
हमारी ढेरों शुभ-कामनाएँ  | 

Thursday, 23 January 2014

मुझे तो लगता है कुछ दिनों में "आप" का चेहरा भी भाजपा तथा कॉंग्रेस जैसा ही लगनें लगेगा | सत्ता के लिए बेतुके वायदे करना और फिर सत्ता पाने के बाद उसे भूल जाना | अभी हरयाणा में खाप पंचायतों का जिस तरह "आप" ने समर्थन किया क्या वह "आप" के चरित्र पर संदेह नहीं पैदा करता है ?

अगर कांग्रेस और भाजापा को आप बिल्लियाँ जो आपस में लड़ रहीं मानते हैं तो यह लोगों की ग़लतफ़हमी है,यह दोनों दो सगी बहनें हैं जो लड़ने का नाटक करती रहती हैं | जैसे ही इन्हे लगा कि कहीं बन्दर फ़ायदा न उठा ले इन दो सगी बहनों ने साजिश के तहत बन्दर को उस्तरा थमा दिया और बन्दर अपना गला काटने में जुट गया प्रतीत होता है |
उम्मीद तो थी लेकिन 
अब टूटती नज़र आती

Wednesday, 22 January 2014

हमारे देश में प्रजातंत्र के नाम पर एक ऐसा तंत्र विकसित हो गया है जिसका चेहरा कभी जाना-जाना और कभी अनजाना सा लगता है | हाँ, जनता के हाथ में मताधिकार का झुनझुना देखकर यह मानना ही पड़ता है कि हम दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिक हैं,इस झुनझुने की आवाज़ हमें चैन से सुला देती है और यह भ्रम हमें खुश रखता है कि सरकार हम बनाते हैं,सरकार हम चलाते हैं | 

Tuesday, 21 January 2014

बड़े बड़े नामचीन साहित्यकार केजरीवाल की छोटी छोटी और ओछी ओछी हरकतों के समर्थन में केजरीवाल के प्रवक्ता की भूमिका में क्यों दिखाई पड़ते हैं ? मित्र दयानंद पाण्डेय का यह कथन="हिंदी के कुछ लेखकों की इस बाबत जो लिजलिजी भाऊकता फ़ेसबुक पर दिखी, उस पर भी तरस बहुत आया। साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल अब क्यों नहीं है," बहुत ही सटीक टिपण्णी है  | 
बन्दर के हाथ में
उस्तरा अगर आया
तो दोष उसका है जिसने
बन्दर के हाथ में उस्तरा थमाया |
घायल कोई नहीं हुआ
उस्तरा केवल हवा में लहराया
बड़ों बड़ों के काटने लगा है कान
बन्दर जल्दी ही उस्ताद हो गया |

Monday, 20 January 2014

छोटे छोटे झूठ बोलने पड़ते हैं
सम्बन्धों में मिठास बनाये रखने के लिए 
बड़े बड़े सच छिपाने के लिए 
बोलने पड़ते हैं छोटे छोटे झूठ |
हम तुम्हे बेहद प्यार करते हैं, 
तुम्हारे बिना जीवन अधूरा है, 
जब तुम हमारे पास नहीं होते 
हम तुम्हे मिस करते हैं, 
हम इन्हें छोटे छोटे झूठ कहते हैं |
अगर यह छोटे छोटे झूठ बोलकर 
बड़े सच छिपा लेते हैं 
तो क्या हम कोई अपराध करते हैं ? 

Sunday, 19 January 2014

विद्वान् नहीं हूँ ,विद्वानों की संगत में रहने की जुगत करता रहता हूँ  | अनपढ़ हूँ , पढ़े लिखे लोगों से उठने ,बैठने और चापलूसी करने की शिक्षा प्राप्त कर रहा हूँ | एकमात्र ख्वाईश, बुद्धिजीविओं की सूची में अपना भी नाम आए तो जीवन सफल हो जाए  |

Mohan Kumar Nagar
एक अच्छी कविता दस नये पाठक पैदा करती है और बुरी कविता दस नये लेखक !
यदि आप चाहते हैं कि नये रचनाकार ना जन्में तो लगातार अच्छा लिखिये वर्ना आपके हर बुरे लिखे के खिलाफ एक नया रचनाकार पैदा होगा क्योंकि हर नया लेखक अच्छा ना पढ़ने पर असंतुष्टि की ही उपज है ।
(हिंदी साहित्य सम्मेलन में दिये गये व्याख्यान का एक अंश )

Avdhesh Nigam
रचनाकारों की पैदाइश पर अंकुश लगाने का बहुत ही नायाब तरीका बखान किया है आपने और मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि वाह कहूँ या आह | अगर सब अच्छा ही लिखने लगे तो एक वक्त ऐसा आयेगा कि केवल पाठक ही पाठक बचेंगे रचनाकार होंगे ही नहीं |

सुनंदा पुष्कर की मौत पर
===============
जिंदगी से यों भागना
लगता नहीं है ठीक
जानती थी लहराना मुट्ठियां
तब क्यों दिखाई पीठ ?

Saturday, 18 January 2014

एक सवाल
क्या अपने धर्म को गाली देना ही धर्मनिरपेक्ष होना है  ?
पैदा होने से पहले
संसार में प्रचलित धर्मों की लिस्ट दिखाकर
अगर पूछा गया होता तुमसे कि
तुम किस धार्मिक मान्यता को पसंद करते हो ?
जानते हो पशु पक्षी उन्हें बनाया गया
जिन्होनें धर्म के नाम पर
इंसान की पहचान पर असहमति जतायी
धर्म की जंजीरों से मुक्ति पाने के लिए
बहुत बड़ी कीमत चुकाई  |
सुनंदा पुष्कर की मौत पर
===============
जिंदगी से यों भागना
लगता नहीं है ठीक
जानती थी लहराना मुट्ठियां
तब क्यों दिखाई पीठ ?

Friday, 17 January 2014

कई बार बहका है मन 
कई बार भीगा है मन 
जब जब मन बहका 
भीग कर लौटा है 
हर बार 
कुछ दिनों सहमा-सहमा सा रहा
फिर-फिर बहका है मन
भीग कर लौटा है मन ?????
जब भी भविष्य के लिए हम योजनाएं बनाते हैं ,चिंताएं पिछले दरवाजे से प्रवेश कर ही जाती हैं  | वर्त्तमान में जीना ही एक मात्र विकल्प | संतुष्टि कभी किसीको नहीं मिलती, प्यास बनी ही रहती है |
काश ऐसा हो पाता,व्यक्ति जैसे चाहता है वैसे ही जी पाता |
सपनों में मंज़िल कई बार पाई है |
नींद खुलने पर आँख भर आई है ||
सोचा था
नहीं निकलूंगा घर से
आसमान फटनें का डर है
सड़क हादसों का घर है  |
खुद को समझाया
घर से बाहर निकल आया
कभी इस सड़क पर
कभी उस सड़क पर दौड़ता रहा
कुछ नहीं पाया तो "घर" लौट आया |
घर में,
मेरे शयन कक्ष की छत गिर पड़ी थी
और वहाँ
एक अधमरी लाश दबी पड़ी थी | 

Thursday, 16 January 2014

चाही थी
एक रात
तुम्हारे साथ
न तुम आईं
न रात आई  |
अपनें विरोध में
जो खड़े होते हैं
उनका होना ही होना है
बाकी सब घिनौना है  |

फरेबी था,
सबसे जरूरी काम
उसनें किया
आईना तोड़ दिया |
बिरले होते हैं वे
जो आईना साथ लेकर चलते हैं | 
मन छूता
फिर तन छूता 
यूँ  होता सिलसिला अगर
तो शायद 
कुछ बेहतर होता |
मन छुवा
तन छुवा 
अब रहा न कुछ अनछुवा |
तृप्ति का अहसास 
कसैला क्यों है ?
जिसकी हँसी में 
पागलपन झलकता है 
उसी के पास 
बिना पंख 
आसमान में उड़नें का
हौसला भी होता है |

Tuesday, 14 January 2014

हम ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करतें हैं या नकारते हैं इसका ईश्वर पर कोई असर पड़ता है क्या ?जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारता है ,क्या ईश्वर की कुदृष्टि उस पर पड़ती | ईश्वर के अस्तित्व को जो स्वीकार करता हैं,क्या ईश्वर उसे अपनी गोद में बैठा कर प्यार करता है |

Monday, 13 January 2014

न पेट भरता है
न मन भरता है
मन और पेट
भरने की कोशिश में,
रीत जाती है
जिंदगी बीत जाती है |
तारीख 13 जनवरी 2014 के दैनिक जागरण के मेरठ संस्करण प्रष्ठ 2 पर पढ़ सकते हैं AAP के हरयाणा प्रभारी योगेंद्र यादव ने खुलकर खाप पंचायतो का समर्थन किया है

वोट के लिए समर्थन खाप का
यह है चरित्र "आप" का 

Saturday, 11 January 2014

गाँधी अगर कुछ दिन और ज़िंदा रह गए होते तो उनकी लंगोटी तक उतार लेते, तुम किस खेत की मूली हो  अन्ना | 

Friday, 10 January 2014

जो दिखता है 
वह पूरा सच नहीं होता | 
आधे-अधूरे सच के सहारे ही 
काटनी पड़ती है पूरी जिंदगी |
वह खुद को 
कई हिस्सों में बाँटता है 
और फिर 
सुख शांति से जीना चाहता है 
देखिये आदमी किस तरह 
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है |


कहाँ हैं वे 
जिन्हें खोजती हैं कविताएँ
कविता को खोजते हों जो 
वे अब रहे कहाँ ?
कल जिन्हे
टोपी पहनना नहीं आता था
आज टोपी पहनानें में
पारंगत हो गयें हैं |
आपको पढ़ना नहीं आता
कोई बात नहीं है
आपको लिखना नहीं आता
कोई जरूरी तो नहीं
आप गुणी हैं
आपको टोपी पहनाना तो आता |

Thursday, 9 January 2014

बरसों पहले समाजवाद की नथ उतारी गयी थी,बलात्कारी पकड़े नहीं गए क्योकि समाजवाद बाँझ साबित हुआ |

Wednesday, 8 January 2014

लाल हरी
नीली पीली टोपियाँ
आरियाँ हैं
काटती हैं
हमें तुमसे,तुम्हें हमसे  |
सफ़ेद टोपी पर
लगा है खून
बर्फ सा जम गया है
आम आदमी का जुनून | 

Tuesday, 7 January 2014

किसी भी पार्टी का सदस्य बनने के बाद पार्टी के नेताओं की बेहूदा हरकतों और वक्तव्यों के समर्थन में हाथ उठाना जब आपकी बाध्यता हो जाती है ,कुछ ही दिनों में आप घुटन महसूस करने लगते हैं |


सभी हिंदी भाषी प्रदेशों में हिंसक लूट मची हुई है ,एक सवाल है कि क्या इस लूट में हम शामिल नहीं हैं ?हम जब लूटते हैं तो उसे लूट नहीं मानते,हम जब चोरी करते हैं तो उसे चोरी नहीं मानते,यही दोगली नैतिकता इस हिंसक लूट का कारण है |  

Sunday, 5 January 2014

बहेलिये के पास
गिरवी रखकर उड़ जाते हैं
मुझे सतानें में
न जाने वे कौन सा सुख पाते हैं

कहाँ हैं वे 
जिन्हें खोजती हैं कविताएँ
कविता को खोजते हों जो 
वे अब रहे कहाँ ?


जड़े जब सड़ जाती हैं तो पत्ते, फूल, फल ही नहीं पेड़ का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है |जड़े सड़ चुकी हैं इस सत्य को नकारा भी तो नहीं जा सकता है, आपका कथन इस सत्य से नजरें चुराता हुआ सा लगता है ,क्या ऐसा नहीं है ?

रात गुजर ही जाती है 
तुम्हारा साथ हो, न हो 
नींद आ ही जाती है |

मित्र को 
धन्यवाद् देना 
कुछ अजीब तो लगता है 
लेकिन फिर भी 
कहना तो पड़ता है |

माँ पर 
जब हम कोई कविता लिखते हैं 
तो न जानें क्यों 
मुझे लगता है 
माँ का कद हम कम करते हैं

माँ है तो हम हैं 
माँ के अतिरिक्त 
सब भ्रम है


अब नहीं 
आयेगा कोई कृष्ण
धर्म से पैदा होती है 
जो निर्मम/ आतताई प्रवृति
उसपर तुम्हें ही कसनी होगी नकेल |

गुजर गया 
एक बरस और 
नववर्ष पर 
शुभकामनाएँ देनें की 
औपचारिकता एक बार और 
वह कभी हारता है नहीं
जो करता है कोशिश एकबार और |

नए शब्द 
नहीं रचे जाते, 
नए सिरे से 
नई तारीखों में
शब्दों से 
रचते हैं हम नए अर्थ |
नया साल २०१४ मंगलमय हो |