Saturday, 18 August 2012

सन्नाटा चीर दे
कोई शोर
ऐसा
हो
भी तो
सब खामोश हैं |
दीवारों पर लगे पोस्टर
आकर्षित नहीं करते
राहत नहीं देती
पेड़ की छाँव भी |
कोई नोचे मेरे बालों को
खसोटे मुझको
किसी दर्द से जगना चाहता हूँ
मैं अपने होने को
महसूसना चाहता हूँ
सब  नख-हीन हैं | 

Tuesday, 14 August 2012

मेरी समस्त आशाओं  ने
शरीर छोड़ दिया है
और अब
उनकी अतृप्त आत्माएं
किसी और शरीर में
प्रवेश करते भय खाती है |

Wednesday, 8 August 2012

मेरे पैदा होने की तारीख़
माँ नहीं जानती
वोह कहती है
बस इतना याद है कि तू
पितरपक्ष में पैदा हुआ था
तेरे पिता ने
पुरखों को
सिर्फ एक दिन पानी दिया था
फिर उन्हें पानी नहीं दिया गया |
अन्धेरें में
उस पार खड़ा
मेरा पिता भूखा और उदास हैं
मेरी प्यास
 मेरे पुरखों की प्यास है
इस नन्हे पौधे को
इसी प्यास ने रोपा था |
माँ इसे
पौधा नहीं समझती
माँ कहती है ..
तुने पुरखों को ज़ना है
तू अपने पितरों का पिता है 
एकांत में
कुछ कांपता है
क्या कांपता है एकांत में ?
पत्तियां टूटती गयीं .....टूटती गयीं
बनती गयीं भीड़
भीड़ ,जहां कुछ नहीं कांपता
क्यों नहीं कांपता
कुछ भी भीड़ में ?
नदी में चेहरा कांपता है
क्यों कांपता है चेहरा नदी में ?
आओ ,
एकांत और नदी से बचें
भीड़ हो जायें |

Monday, 6 August 2012

अन्ना मत करो नई पार्टी बनाने का गुनाह
राजनीति के कीचड़ से कैसे बच पाओगे
वे जो चाहते थे तुम तैयार भी हो गए कमर कस कर
उसी पागल घोड़े पर बैठने के लिए
यह घोड़ा गिरा देगा ,रौंद देगा तुम्हें
तुम सयाने नहीं हो |
एक परिचय
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अभी अभी
जो आदमी यहाँ खड़ा था
चला गया केंचुल छोड़कर

Saturday, 4 August 2012

तुम कहती हो
लेकिन
मैं मान नहीं पाता हूँ |
शब्द
कुछ नहीं देते
लेकिन जब कुछ नहीं होता
शब्द राहत देते हैं |
लोग ....लोग तो
सिर्फ आह़त करते हैं |