Sunday, 29 September 2013

"अपनी कमजोरियों का विज्ञापन करके हम कुछ ज्यादा सुख-सुविधा और पद-प्रतिष्ठा पा सकते हैं" जब यह ज्ञान किसी भी विकलांग व्यक्ति/ समूह को हो जाता है तब वह व्यक्ति/ समूह मानसिक विकलांगता से ग्रसित हो जाता हैं | ऐसे व्यक्ति/समूह का उत्थान तमाम सुख-सुविधा और पद-प्रतिष्ठा देकर भी संभव नहीं|


वे बैसाखियों की मांग करते हैं
उन्हें बैसाखियाँ
उपलब्ध करा दी जाती हैं |
कोई है
जो नहीं चाहता कि
वे अपने पैरों पर चलना सीखें |
पैरों का इस्तेमाल करना
वे सीखेंगे तब
जब बैसाखी का मोह छोड़ेंगे
कोई है
जो नहीं चाहता कि
वे खुली आँखों से सपनें देखें |             
कुछ जख्म ऐसे होते हैं
जो भरते नहीं
नासूर बन जाते हैं
और विरासत में
हम उन्हें ही छोड़ जाते हैं |
विरासत में देकर मत जाओ
इन्हें अपने साथ ही ले जाओ |
अगली पीढ़ी को चैन से रहने दो
वे जैसे चाहें उन्हें जीने दो
अपने पद-चिन्हों को मिटा दो
रास्तों को रहने दो 
बैसाखियों की आदत
ऐसी पड़ी
बैगैर बैसाखियों के चलना
अब मुश्किल है
एक भी घड़ी
धरम है हथकड़ी
पाँव में बेड़ी पड़ी      
समझदार लोग
रहते हैं किताबो के बीच
बुद्धिजीवी कहलाते हैं
किताबों की
व्यूह रचना के बीच
वह न डरता है
न जीवन जीता है |
बुद्धिजीवी
जमीन के नीचे
अपनी ही बनाई
अति सुरक्षित खोह में रहता है | 
दुर्लभ वस्तु
जब सुलभ हो जाती है
खुशबू उसकी खो जाती है
एक नयी यात्रा
खुशबू की तालाश में
शुरू हो जाती है 
प्यार करने का ढंग तुम्हारा
इतना निराला था
मेरे क़द को घटा दिया
तुम्हारी जादुई छुवन ने
मुझे बौना बना दिया
तुम्हारी छुवन
अब जादुई नहीं रही 
उम्र गुजर गयी
मेरा क़द नहीं बढ़ा
मैं बूढ़ा हो गया
मैं बौना ही रह गया

Saturday, 28 September 2013

वे बैसाखियों की मांग करते हैं
उन्हें बैसाखियाँ
उपलब्ध करा दी जाती हैं |
कोई है
जो नहीं चाहता कि
वे अपने पैरों पर चलना सीखें |
पैरों का इस्तेमाल करना
वे सीखेंगे तब
जब बैसाखी का मोह छोड़ेंगे
कोई है
जो नहीं चाहता कि
वे खुली आँखों से सपनें देखें |     

Friday, 27 September 2013

गीदड़ अगर
शेर जैसा दहाड़ने लगे
आपको ताज्जुब होता है कि नहीं
मुझे ताज्जुब होता है
अगर सांप
छछूंदर के पीछे भागने लगे
गीदड़ अगर
शेर जैसा दहाड़ने लगे  

Thursday, 26 September 2013

सपनों का गणित
कुछ अजीब सा होता है |
सपनें जो खुद-ब-खुद
बस जाते हैं आँखों में
वे लुभाते हैं
टूटनें पर आँखों को
नम कर जाते हैं |
सपनें जो आँखों में
ठूस दिए जाते हैं
वे न टूटते हैं
और न पूरे होते हैं |
सपनों को आँखों में
ठूस देने का हुनर जो जानते हैं
क्या आप उन्हें पहचानते हैं ?

Wednesday, 25 September 2013

इस देश के ठहरे-संक्रमित लोकतंत्र पर सवाल उठाने वाला या तो कभी नक्सली कहलायेगा या तो कभी मोदी समर्थक=== बहुत सच्ची बात कही, इस स्थिति के लिए क्या इस देश के बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी नहीं बनती, भिनभिनाते बुद्धिजीवी |  
हिनहिनाते हैं
भिनभिनाते हैं बुद्धिजीवी
आपका एक वोट न देना
उनके दो वोट बढ़ाता है,
आपका वोट न देने का निर्णय
उनके पक्ष में जाता है |

Tuesday, 24 September 2013

पलक झपकते ही
पीड़ित
उत्पीड़क बन जाता है
शोषित
शोषक बन जाता है
समतावादी समाज का निर्माण
एक सपना है
वर्ग संघर्ष तो
अनंतकाल तक चलना है |
एक निवेदन===
++++++++++++
लिखो लेकिन खुद को लेखकों की बिरादरी में शामिल मत मानों |दौड़ो मत, मंद मंद बयार सा चलो कभी थकोगे नहीं |

बैसाखियों की आदत
ऐसी पड़ी
बैगैर बैसाखियों के चलना
अब मुश्किल है
एक भी घड़ी
इधर भी सांप
उधर भी सांप
इसका जहर उनपर
उनका जहर इनपर
कोई असर नहीं डालता |
रास्ते में
पड़ी मिली एक लाश
जिसका पूरा शरीर
नीला पड़ चुका था |
हर बार की तरह
आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला
चल रहा है और
मताधिकार जिसके पास है
वह गहरी नींद सो रहा है |
शोषण उत्‍पीडन के खिलाफ संघर्ष ,वर्ग संघर्ष किसी न किसी रूप में मार्क्‍सवाद से बहुत  पहले भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहा है | निश्चित ही हम कह सकते है कि एक समतावादी समाज की स्‍थापना के लिए मनुष्‍य का संघर्ष अनवरत मौजूद रहा है लेकिन आज भी शोषण ,उत्पीडन ज्यों का त्यों | इससे एक प्रमेय तो सिद्द हो ही जाती है कि समतावादी समाज की स्‍थापना एक ख्वाब है और इस ख्वाब को देखने की स्वतन्त्रता हम से कोई नहीं छीन सकता |
और हिन्दू और मुसलमान की तरह ही 
भगवान् के लहू का रंग भी लाल था
पिता जी खुलेआम
सबके सामने
सिगरेट पीते थे
घर के आँगन में
शेर की तरह टहलते थे
मैंने पिया सिगरेट
खुलेआम सबके सामने
गुनाह किया
मुझे बागी करार दिया
पिता का झापड़
माँ का रोना
और बहन का उलाहना
सब याद है मुझे
माँ ने रोते हुए कहा था
अरे सिगरेट पीना है
अगर तुम्हारी मजबूरी
तो सबके सामने पियो
क्या यह है जरूरी |
बहन ने कहा था
कुछ तो
बड़ों की इज्ज़त किया करो
कैसे जीना है यह हम से सीखो
देखो मैं भी तो प्यार करती हूँ
बड़ों को पता न चल जाए
इस बात से डरती हूँ
इसलिए प्रेम भी छिपा के करती हूँ |
मैं आज तक
नहीं समझ पाया कि
मैंने किस तरह
उनकी इज्ज़त में बट्टा लगाया था ?
अरे भाई
मैं तो वही कर रहा था
जो मेरा बाप कर रहा था |
बहरहाल जब मैं पिता बना
तब कहीं जाकर मुझे
सबके सामने खुलेआम
सिगरेट पीने का हक मिला |
 

Monday, 23 September 2013

हमारे पास
वोट का अधिकार
फिर हम क्यों बेज़ार ?
कल वह फिर
तुम्हारे पास आयेगा
इस बार होशियार |
उन्हें हर बार
तुम्हारे पास आना पड़ता है
हाथ जोड़कर
मुस्कराना पड़ता है |
हड्डियों का ढांचा
हो चुके तुम
तुम्हारा भरोसा नहीं टूटता
और उनका विश्वास |
होठों पर
कुटिल मुस्कराहट लेकर आते हैं
और तुम्हारा खून चूसकर 
आदमखोर भेड़िया बन जाते हैं |
ईश्वर डर कर छिपते नहीं
छिपकर देखते हैं
स्त्री को
हलाल होते हुए
ईश्वर भी तो मर्द है
एक हलाल करके खुश होता है
दूसरे को अच्छा लगता है 
स्त्री को
हलाल होते हुए देखना | 

Sunday, 22 September 2013

दम्भी,
धर्म निरपेक्ष होने का
दंभ पालते है
ये जोड़ते नहीं
हमें बांटते हैं |
लाशों को भी
धर्म की चादर उढ़ाते हैं |
ये जोड़ते नहीं
हमें बांटते हैं
ढोंगी  
जब आप किसी का विरोध करते हैं तो आपको यह जानना बहुत जरूरी होता है की आपके इस विरोध में किसके लिए समर्थन छिपा है अगर आप यह नहीं मानते तो इसका सीधा सा मतलब होता है कि आप किसी दुराग्रह के वशीभूत होकर विरोध कर रहे हैं | मोदी का विरोध करना अंततोगत्वा कांग्रेस का समर्थन करना हैं और कांग्रेस का समर्थन मतलब भ्रष्ट्राचार का समर्थन | विकल्पहीनता की स्तिथि में जीवन को बचाए रखने के लिए विश्वामित्र ने कुत्ते का मांस खाने में कोई गुरेज नहीं किया |

इन मठाधीशों की पोल इतने सशक्त तरीके से खोलने के लिए आप बधाई के पात्र हैं | मोदी का विरोध करके यह लोग अंततोगत्वा कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं और कांग्रेस का समर्थन मतलब भ्रष्ट्राचार का समर्थन | ऊपर से तुर्रा यह है कि यह सब यह मानने के लिए कि वे कोंग्रेस का समर्थन कर रहे हैं भी तैयार नहीं हैं | शायद किसी दूसरे ग्रह से किसी पार्टी का आयात करने का इरादा रखते हैं |

Saturday, 21 September 2013

न गद्द्य
न पद्द्य
केवल दर्द
अब हो गई है हद्द
देखो हँस रहा है मर्द |
न गद्द्य
न पद्द्य
केवल दर्द
अब हो गई है हद्द
देखो हँस रहा है मर्द |
जो ज्यादा चीख रहे हैं
वे सस्ते में बिक जाते हैं
जिनके पेट में रोटी नहीं
चीख नहीं सकते वे
अपना खून बहाते हैं
गुमनाम मौत मर जाते हैं |
ये आये या वो आये
हमें क्या करना है
हमें तो काँटों
पर ही चलना है |
हमारे लिए
जो रास्ते बनाए गए हैं
मजबूत और टिकाऊ हैं
और इन रास्तों पर चलनेवाला
हर व्यक्ति बिकाऊ है |
वे इस तथ्य से परिचित हैं
और जब जब उन्हें
सांस लेती हुई लाशों
की जरूरत पड़ती है
वे खिचे चले आते हैं
और लाशों को लगता है कि
उन्हें मुहं मांगी कीमत मिल जाती है |
मेरे पास बैठीं
मेरी हथेलियों पर
चन्दन मलती रहीं
चलते वक्त
उसी हथेली पर
तुमनें अंगारा रख दिया
सोचता हूँ आज भी
कि तुमने ऐसा क्यों किया |

Friday, 20 September 2013

एक दीवार थी
जो रोकती थी
एक ऊँगली थी
जो टोकती थी
दीवार हमने लाँघ ली है
ऊँगली हमने तोड़ दी है

Thursday, 19 September 2013

आओ चलें,
कुछ प्यार की बातें करें
न राम की
न इस्लाम की
आओ चलें,
पगडंडियों में खो गया है जो 
उस इंसान की बातें करें
आओ चलें,
कुछ प्यार की बातें करें |
 
न इस्लाम खतरे में
न हैं राम खतरे में
खौफ में जी रहा
है इंसान खतरे में

Wednesday, 18 September 2013

भूला हुआ आज भी
जब याद आता है
सोया हुआ कुम्भकरण
भी कसमसाता है
भूलने की बीमारी बड़ी प्यारी
कभी कभी ही सही
वह मुस्कराता तो है 
मनीषा जी को लमही सम्‍मान क्‍यों लौटा देना चाहिए ?
+++++++++++++++++++++++++++++++++++++
ऐसा करना जूरी के निर्णय का असम्‍मान होगा और लमही सम्‍मान का अपमान भी।
+++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++
लमही पत्रिका के प्रधान संपादक के एक इंटरव्‍यू में एक सवाल के जबाव में यह कहे जाने कि लगता है इस बार के सम्‍मान में निर्णायक मंडल से चूक हुई होगी, पर पत्रकार दयानंद पांडेय ने बात का बतंगड़ बना दिया है। जरा उनकी भाषा देखिए:  '' आलोक मेहता और महेश भारद्वाज की तो यह दोनों लोग अब हद से अधिक बदनाम हो चुके हैं। आलोक मेहता की छवि अब पत्रकारिता में दलाली के लिए जानी जाती है। और कि राजा राम मोहन राय ट्रस्ट की केंद्रीय खरीद समिति के अध्यक्ष होने के नाते वह महेश भारद्वाज के लिए भी दलाली का काम खुल्लमखुल्ला कर रहे हैं। मेरे पास इस के एक नहीं अनेक प्रमाण हैं। मैं ने विजय राय को स्पष्ट रुप से कहा कि आप को इन तत्वों से बचना चाहिए। वह कुछ स्पष्ट बोले नहीं। हूं-हां कर के रह गए। मैं ने तब के दिनों शिवमूर्ति जी से भी इस बात का ज़िक्र किया। और कहा कि विजय राय जी को समझाइए क्यों कि यह तो रैकेट में फंस गए हैं।  '' यानी उनके शब्‍दों में जूरी के मेंमबरान में एक आलोक मेहता दलाल हैं, वे महेश भारद्वाज के पक्ष में दलाली कर रहे हैं। दूसरे आखिर में उन्‍होंने मनीषा कुलश्रेष्‍ठ को ढीठ व बेशर्म कह कर लमही सम्‍मान लौटाने के लिए ललकारा है। यह वे दयानंद पांडेय हैं जिन्‍हें हिंदी संस्‍थान का सम्‍मान वीरेन्‍द्र यादव को मिल गया तो वे उसमें हिंदी संस्‍थान व मुलायम सरकार के यादववाद का पोषण देख रहे हैं। उन्‍हीं की जबानी सुनिये : ''अब की बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए गए पुरस्कारों के लिए एक योग्यता यादव होना भी निर्धारित की गई थी। रचना नहीं तो क्या यादव तो हैं, ऐसा अब भी कहा जा रहा है।'' --जब कि हिंदी संस्‍थान का पुरस्‍कार खुद उन्‍होंने भी झटका है, और कई बार झटका है। इसके लिए उन्‍होंने संस्‍थान के निदेशक की किताब पर समीक्षा भी लिखीं तथा उन्‍हें खुश करने का प्रयास किया। हिंदी साहित्‍य में कौन कहाँ खड़ा है यह सर्वविदित है लेकिन दयानंद अपने को इस हद तक पंक्‍तिपावन मानते हैं कि हिंदी संस्‍थान मे उन्‍हें यादववाद नजर आता है और लमही सम्‍मान की जूरी भ्रष्‍ट नजर आती है जिसके विज्ञापित होते ही इसका भान उन्‍हें हो गया था, यह वही बता रहे हैं। जब दयानंद पांडे को पता ही था कि जूरी पहले से ही भ्रष्‍ट है तो वह कैसा निर्णय करेगी , यह भी तो पता होगा। तब तो वे मनीषा का खुल्‍लमखुल्‍ला विरोध कर रहे थे। कि विजय राय महेश के हाथो बिक गए हैं और जब जूरी के निर्णय का सम्‍मान करते हुए और बाकायदा दिल्‍ली में पुरस्‍कार समारोह में संयोजक के रूप में उपस्‍थित होकर भी एक सवाल के जवाब में  विजय राय ने अपने संपादकीय विवेक का परिचय देते हुए यह बात स्‍वीकार की कि लगता है जूरी से कुछ चूक हुई होगी तो इसे मनीषा जी का अपमान कह कर फतवा दे रहे हैं दयानंद पांडेय जी।  । अब वे लखनऊ के बड़के क्रांतिकारी लेखक बनकर फतवा दे रहे हैं।लगता है विजय राय से उनकी कोई निजी खुन्‍नस है। विजय राय कम बोलते हैं, पर इतना कम भी नहीं कि उन पर बढ़ चढ़ कर आक्रमण कर सकने की हैसियत कोई  जुटा सकें।
विजय राय को क्‍या एक व्‍यक्‍ति एक संयोजक के रूप में अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है। क्‍या एक जूरी के असहमत होने के बावजूद पुरस्‍कार घोषित नहीं होते। क्‍या निर्णायक मंडल की राय से संयोजक का सर्वथा सहमत होना जरूरी है। यदि एक विवेकी संयोजक संपादक अपना रुख अलग रखते हुए यह राय जाहिर करता है कि लगता है प्रेमचंद की परंपरा के आलोक में कदाचित जूरी के फैसले में कहीं चूक हुई है तो इसमे हाय तोबा मचाने की क्‍या बात। यदि जूरी अपने निर्णय पर अडिग है और संयोजक ने पुरस्‍कार लौटाने की बात ही नही की है तो पुरस्‍कार लौटान की क्‍या जरूरत । मनीषा न सही प्रेमचंद परंपरा की कथाकार पर वे श्रेष्‍ठ युवा कथाकार तो हैं ही, इसमें किसे संदेह है। विजय राय ने केवल अपनी राय का इजहार किया है, वह भी ऐसा सवाल पूछे जाने पर। ऐसी असहमतियां किस पुरस्‍कार में नहीं होतीं। उन्‍होंने मनीषा कुलश्रेष्‍ठ पर न केवल विशेषांक निकाला बल्‍कि कहानी अंक में उनकी कहानी भी आलोचक की सम्‍मति के साथ छापी गयी है। इससे जाहिर है एक कथाकार के रूप में विजय राय मनीषा कुलश्रेष्‍ठ की खासी इज्‍जत करते हैं । पर लमही सम्‍मान के लिए प्रेमचंद की कथा परंपरा के वाहक जिस तरह के कद्दावर लेखक की छवि उनके मन में होगी, वह शायद मनीषा में उन्‍हें न दिखी हो।

इस प्रकरण में कथाकार संजीव जी की बात भी उछाली गयी है। संजीव निस्‍संदेह एक बड़े कथाकार हैं। वे यदि ब्‍लैक एंड ब्‍वाइट में यह बात कह रहे हैं तो यह बात सुनी जानी चाहिए। वे कभी मुंहदेखी कहने वाले लेखक नहीं रहे। जिसके लोकार्पण में जाते हैं, यदि कहानी या उपन्‍यास कमजोर है तो वे सबके सामने यह बात कहते हैं। यह बात दुनिया जानती है। उनके कहे का हम सबको सम्‍मान करना चाहिए। 
लमही पत्रिका के सम्पादक श्री विजय राय किसी दबाव में आने वाले व्यक्ति कभी नहीं रहे ,मनीषा कुलश्रेष्ठ को दिए गए पुरस्‍कार के सन्दर्भ में उनके वक्तव्य को गलत तरह से प्रस्तुत करके दयानंद जी ने यह साबित कर दिया है कि हिंदी साहित्य में व्याप्त राजनीति का स्तर इस हद तक गिर  गया है।  विजय राय ने यह कहां कहा है कि मुझ पर निर्णायक मंडल का दबाव था,निर्णायक मंडल ने जो फैसला दिया, उसे अंतत: उन्‍होंने माना और दिल्‍ली जाकर पुरस्‍कार दिया। अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त स्‍थानिक गंदी कुत्सित राजनीति के कुरूप चेहरे को पहचानें। विजय राय जैसे संजीदा तथा जाने पहचाने  संपादक पर अपनी अधीर टिप्‍पणियों का मलवा उछालना उचित नहीं है | विजय राय न तो कोई सतही टिप्‍पणी कभी करते हैं, न इस तरह की राजनीति में यकीन रखते हैं। जो विजय राय को जानते हैं वे इस राय से सहमत होंगे।

ऐसी स्‍थिति में, जब कि विजय राय ने निजी राय जाहिर की है,वह भी 'लगता है' वाले भाव में |अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त राजनीति के कुरूप चेहरे को अपनी अगली कहानी/ उपन्यास में उजागर करने के लिए कमर कस लें |   

 
लमही पत्रिका के सम्पादक श्री विजय राय किसी दबाव में आने वाले व्यक्ति कभी नहीं रहे ,मनीषा कुलश्रेष्ठ को दिए गए पुरष्कार के सन्दर्भ में उनके वक्तव्य को गलत तरह से प्रस्तुत करके यह तो साबित हो गया कि हिंदी साहित्य में व्याप्त राजनीति का स्तर पहले से कुछ और गिर गया है, लेखन के स्तर और लेखक के स्तर पर चर्चा विषय से भटकना होगा शायद | विजय राय ने कहा कि मुझपर निर्णायक मंडल का दबाव था, किसी पुरष्कार वितरण के सन्दर्भ में निर्णायक मंडल के निर्णय को बदलने का दुस्साहस कोई सम्पादक क्यों करेगा |
अगर विजय राय जी की मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के लेखन के सन्दर्भ में कोई इतर राय होती तो लमही का मनीषा कुलश्रेष्ठ पर केन्द्रित विशेषांक निकालने की उनकी कोई बाध्यता नहीं थी | मैं मनीषा जी से कहना चाहूंगा कि वे भावावेश में कोई निर्णय न लें और साहित्य में व्याप्त राजनीति के कुरूप चेहरे को अपनी अगली कहानी/ उपन्यास में उजागर करने के लिए कमर कास लें |  
विसर्जन
+++++++++
लाश का मतलब
जिसमें कभी जीवन था
समुद्र में तैरते
माटी के सैकड़ों गणेश
जो विसर्जन से पूर्व भी
माटी के पुतले थे
जीवन होता तो
समुद्र के जीव-जंतुओं का भोजन बनते
समुद्र को मैला तो नहीं करते |    

Monday, 16 September 2013

भ्रूण हत्याओं का सिलसिला
शुरू ही नहीं हुआ होता
अगर बेटियाँ
पिता के गर्भ में
और बेटे माँ के गर्भ में पलते |

Saturday, 14 September 2013

बुद्धिजीवियों की
लम्बी कतार में सबसे आगे
खड़े होने की जुगत करते रहे
उनके कहने पर
कभी उनका समर्थन
और कभी विरोध करते रहे
बुद्धिजीवियों की
लम्बी कतार में आप
आज भी खड़े हैं नतमस्तक
आप बुद्धिजीवी हैं
आपके सामने हम नतमस्तक   |
सांप समझकर डरते रहे
निकला वह छछूंदर
जिसे न सांप
अपने बिल में घुसने देता है
और न चूहा अपने बिल में |
कहते हैं-
जो फुफकारता है वह काटता नहीं
छछूंदर से घिन आती है सांप से नहीं
छछूंदर को तो सांप भी खाता नहीं |
गुरु और चेले ने
खेल ऐसा खेला
कि गुरु, गुरु ही रह गए
शक्कर हो गया चेला
भीष्मपितामह ने
द्रोणाचार्य को बुलाया
और पूरा गेम प्लान समझाया
बोले-इसबार की महाभारत में
शिखंडी की विशेष भूमिका होगी
चेले के खातिर 
अंगूठा द्रोणाचार्य को देना होगा
और अर्जुन की जगह
युद्ध में नायक एकलव्य होगा |
द्रोणाचार्य मुस्कराए और बोले
आप कहते हो तो अंगूठा दे दूंगा
इस बार की महाभारत में नायक
अर्जुन की जगह एकलव्य होगा
केवल एक शंका है कि
इस बार शिखंडी की भूमिका में
कौन कौन होगा ?
  
गुरु और चेले ने
खेल ऐसा खेला
कि गुरु, गुरु ही रह गए
शक्कर हो गया चेला
भीष्मपितामह ने
द्रोणाचार्य को बुलाया
और पूरा गेम प्लान समझाया
बोले-इसबार की महाभारत में
शिखंडी की विशेष भूमिका होगी
चेले के खातिर 
अंगूठा द्रोणाचार्य को देना होगा
और अर्जुन की जगह
युद्ध में नायक एकलव्य होगा |  
Anant Vijay
आज हिंदी के कई क्रांतिकारी लेखक उत्तर प्रदेश सरकार के सामने नत मस्तक थे । क्रांतिकारिता की जय हो
Avdhesh Nigamरचना में क्रन्तिकारिकता झलकती है
और मुहं से लार टपकती है
कविता में क्रांतिकारी हैं
कविता से बाहर भिखारी हैं 
हिंदी दिवस पर विशेष
++++++++++++++
बच्चों ने अभी
हिंदी बोलना नहीं है छोड़ा
क्योकि रास्ते में
है अभी माँ-बाप का रोड़ा
कुछ दिनों बाद
हिंदी समझने वाले
माँ-बाप नहीं मिलेंगे
तब बच्चों की
मुश्किल कम होगी थोड़ा थोड़ा
मध्यवर्गीय परिवारों में
हिंदी नहीं दिखेगी
हिंदी की तालाश में
तब छोड़ना होगा अश्वमेध घोड़ा |  
मोदी को लेकर इतनी माथा-पच्ची क्यों ???
आप मोदी का क़द बढ़ा रहे हैं ,
मुझे तो लगता है इस धुर विरोध में आपका समर्थन छिपा है |

Friday, 13 September 2013

आइये हिंदी दिवस मनाएं और एक दूसरे को Happy Hindi Day   कहकर दें शुभकामनाएं |
शब्द जिनके आसरे थे
वे आसमान पर चढ़े
शब्द गिर पड़े
बारहों मास अंडे खाएं
हिंदी अपनाएं ????? 
महोदय, यह सामूहिक रक्तपिपासा नहीं,  भेड़ियों को मारने की सामूहिक अभिलाषा है |
वे समूह में
कर सकते हैं बलात्कार
ऐसे भेड़ियों को
मौत की सजा की अभिलाषा
आप कहते हैं इसे सामूहिक रक्तपिपासा
दामिनी के गुनाहगारों को दफा ३०२ के अंतर्गत मौत की सजा |
दामिनी अगर मरी नहीं होती
तो इन गुनाहगारों को
बलात्कार के लिए
क्या कोई सजा नहीं होती ?
गैंग रेप के लिए फाँसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए | जिसके साथ बलात्कार हुआ उसका मरना जरूरी है क्या ?
मुंबई गैंग रेप जिसमे ,जिसके साथ बलात्कार हुआ वह आज भी ज़िंदा है तो क्या उन अपराधियों को मौत की सजा नहीं होनी चाहिए ? मेरा मानना है कि गैंग रेप के हर केस में अपराधियों को मौत की सजा दी जानी चाहिए |
काश ऐसा ही हो ,क़ानून में इनके लिए मौत से कम कोई सजा न हो
गैंग रेप की
एक सजा
फाँसी फाँसी फाँसी
फाँसी पर चढ़ने से पहले
रेपिस्ट भुनभुनायें
गैंग रेप ,नॉट सेफ
बलात्कार जिसके साथ हुआ
वह ज़िंदा रहे और मुस्कराए
  
बच्चे हिंदी उतनी ही जानते हैं जितना अपने माँ-बाप से संवाद के लिए जरूरी है फिर भी हिंदी दिवस मनाने का ढोंग तो कर ही सकते हैं हम आइये हिंदी दिवस मनाएं और एक दूसरे को Happy Hindi Day   कहकर शुभकामनायें दें | 

Thursday, 12 September 2013

बहुत याद आती हैं बनारस की गलियाँ कितनी मीठी होती हैं बनारस की गालियाँ | भुलाए नहीं भूलती बनारस की गालियाँ और बनारस की गलियाँ |
दंगाई कौन ?
+++++++++++
वोटों के
ध्रुवीकरण की कोशिश में
लाशों के ढेर लग गए
अगुवाई कर रहे थे जो
छोड़कर केंचुल निकल गए
हालात सुधरने लगे जब तो
वे शहर के
गणमान्य व्यक्ति हो गए | 
हम मेमनें
भेड़ियों से घिर जाने के बाद भी
मेमनें ही बने रहे
भेड़िये निश्चिन्त हैं कि
पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध है
और वे निर्विघ्न
लम्बे समय तक
राजा बनें रह सकते हैं
इन मेमनों पर
बेख़ौफ़ शासन कर सकते हैं |

Monday, 9 September 2013

सब चुप
अँधेरा घुप
पत्तियाँ दबे पाँव भी
घर लौटने में डरती हैं
लाशें पगडंडियाँ पकड़ती हैं
अँधेरा घुप
सब चुप  
फेसबुक पर
कुछ पंक्तियाँ लिखकर
अपना विरोध जताते हैं
और स्वप्न देखने के लिए
सो जाते हैं


उथला पानी
खोखला विरोध
हम खरगोश
वे जश्न मनाते हैं 
वे चाहते हैं
अधिक से अधिक मतदान
उनके पक्ष में हो
वे केवल
इसकी व्यवस्था ही तो कर रहे हैं
आप कहते हैं की दंगे हो रहे हैं |

Sunday, 8 September 2013

अपराध बोध से
या ख्वाब के बोझ से
दबे हैं सब
किसी न किसी रंग में
रगें हैं सब
कोई हमें बताये कि
आँख को आँख
कान को कान
नाक को नाक
होंठ को होंठ
पेट को पेट
हाथ को हाथ
और गांड को गांड
न कहें तो क्या कहें ?
वे शालीन हैं
मुहँ से ही खाते हैं
मुहँ से ही हगते हैं
गांड का इस्तेमाल नहीं करते | 
आईना देखो
राजनीतिज्ञों को मत कोसो
यह हमारी फैलाई हुई बीमारी है |
राजनीतिज्ञ
किसी दूसरे ग्रह से नहीं आते
हमारे आपके घर में पैदा होते हैं
और यहीं से संस्कार लेकर जाते हैं
सोचिये हम बच्चों को
क्या सिखा रहे हैं
उन्हें पैसा कमाने की
मशीन ही तो बना रहे हैं |
बच्चों को
हम जो भी सिखलाते है
बच्चे बहुत जल्दी सीख जाते हैं
बच्चे देश-विदेश में
हमारा नाम रोशन कर रहे हैं
और राजनीतिज्ञ
वो भी तो यही कर रहे हैं |     
बरसों से इस जमीं पर
साथ साथ रहते हैं
एक दूसरे की
ख़ुशी और गम में
एक-साथ शामिल होते हैं |
अफ़सोस होता है
जब किसी के भड़काने पर
हम भड़क जाते हैं
और किसी के समझाने पर
हम हिन्दू और मुसलमान हो जाते हैं |

Thursday, 5 September 2013

जिसकी दुम उठाओ
वह मादा है
इस देश का नागरिक
कितना सीधा साधा है |
अंध-श्रद्धा के खिलाफ लिखते हैं
सच कहो तो
भोले-भाले शब्दों पर बिदकते हैं 
पुरुष चलाता है
दुनियाँ की गाड़ी
पैगम्बर बनाए तो उन्हें
शक्ल और सूरत अपनी दी
औरतों को खुदा ने बनाया
और पैगम्बरों की
खिदमत में लगाया
पैगम्बर पुरुष है और
औरत खिदमतगार
पुरुष चलाता है
दुनियाँ की गाड़ी
वही है ,वही है गुनहगार

Wednesday, 4 September 2013

हम विरोध करते हैं
चीखते और चिल्लाते हैं
भारी भरकम नारे लगाते हैं
उनपर बड़े संगीन आरोप लगाते हैं
और फिर खामोश हो जाते हैं 
काश
अपने विरोध में
हम खुद खड़े हो पाते
तो हमें
सारे सवालों के जवाब मिल जाते
पतझड़ का रुआब देखो
पेड़ों के कंकाल देखो
मुस्कराते हुए आता है बसंत
इठलाते हैं पेड़
पेड़ों पर आया शबाब देखो |
तमीज  का पर्यायवाची नहीं है कमीज  लेकिन आप कितने तमीजदार हैं इसका निर्धारण आपकी कमीज देखकर ही किया जाता है इसलिए बंधुवर अपनी कमीज को साफ़ सुथरा रखिये |
अंतर्वस्त्र मैले हैं
कमीज तो उजली है
आकाश में
छेद करने का हौसला है
लेकिन द्रष्टि छिछली है
इसीलिए भविष्य की तस्वीर धुंधली है

Monday, 2 September 2013

हम हिन्दुस्तानी हैं 
हमें "शीघ्रपतन" की बीमारी है
चरम पर पहुँचने से पहले ही
स्खलित हो जातें हैं 
और फिर लम्बी नींद सो जाते हैं |