Wednesday, 30 December 2015

तेरे बस में था
हे ईश्वर तू पेट न बनाता
भरे पेट वालों का मजहब
तब इतना उत्पात न मचाता |

Tuesday, 29 December 2015

हवा दे दी , पानी दे दिया
धरती दे दी ,आकाश दे दिया
ज़िंदा रहने के लिए
जो कुछ जरूरी था उसने दे दिया
इसके एवज में
तुमने उसे मंदिर/ मस्जिद में क़ैद कर दिया |

Friday, 25 December 2015

फिर नया साल

नए साल में कभी
क्या कुछ भी नया हुआ ?
वही मंदिर-मस्जिद की लड़ाई
किस अधिकारी
और किस मंत्री ने
कितनी रिश्वत खाई  ?
भूखे सो जानेवालों की संख्या में
कितना इज़ाफ़ा हुआ यह बात किसी ने कभी नहीं बताई
हरबार बलात्कार के बाद मोमबत्तियां खूब जलाईं |
परम्परा को तोड़ने की नादानी
हम कभी नहीं करते हैं
बीते साल की बिदाई
और नए साल के स्वागत की तैयारी
जोर शोर से करते हैं
आइये जन गन मन अधिनायक गाते हैं
शुभकामनायें देने की औपचारिकता एकबार फिर निभाते हैं | 

Wednesday, 16 December 2015

औरत से कोई नहीं पूछता उसका धर्म
भोग लेने के पहले
औरत से नहीं पूछी जाती है उसकी जाति 

Sunday, 13 December 2015

ज़िंदा नजर आओगे
तो बेमौत मारे जाओगे

ज़हर को
अमृत समझकर पीना है तो पियो
मुस्कराने का कोई सबब ही नहीं बचा
लाश की शक्ल में जीना है तो जियो

बड़ी तेज रफ़्तार है जिंदगी की
बरसों का सफर मिनटों में तय करो  |

Saturday, 12 December 2015

उदय प्रकाश ने कुलबुर्गी को 
कब्र से खोदकर निकाला 
अशोक बाजपेयी ने कुलबुर्गी को 
कब्र में फिर डाला और अखलाख का जिन्न निकाला
अखलाख का जिन्न उदय प्रकाश को निगल गया 
चारो ओर फैला अशोक बाजपेयी का उजाला |
तेईस बरस 
बनारस में गुज़ारे हैं 
जाड़ा,गर्मी ,बरसात 
जब भी गया मणिकर्णिका घाट
एक रोशनी बहार से भीतर 
मेरे अन्दर गयी है पैठ
जलती हुई चिताओं की रोशनी
मणिकर्णिका घाट पर
अँधेरा नहीं होने देती |
वे सवाल करते भी तो क्या करते 
तुम्हारे हर जवाब से उनकी अच्छी पहचान है |
कितना भी बताओ 
कुछ रह ही जाता है बताने से 
हर दिन कुछ नया 
जुड़ जाता है हमारे फ़साने में |
अभी-अभी 
या फिर नहीं कभी 
खड़ी रह जाती है 
जिंदगी ठगी-ठगी 
पाँव के नीचे 
दूब सी दबी-दबी |
हिन्दुस्तान की कसम, 
चारागाह उनके पुरखों का था , चर लिया तो क्या गुनाह किया ?
सलमान खान को अगर सजा हो जाती,
असहिष्णु होने का इलज़ाम फिर लगाया जाता 
सेक्युलर लोगों द्वारा ;
देर रात सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा एक बार फिर खटखटाया जाता |
चलो गरीब के हक़ के लिए लड़ते हैं 
शुरुआत किसान से करते हैं 
सैकड़ों एकड़ जमीन अपने नाम करते हैं |
बना रहेगा
हर रिश्ता पवित्र
छिड़कते रहिये इत्र
रिश्ता रिसने लगे
इसके पहले आपको
इतना तो करना ही पड़ेगा |

Friday, 4 December 2015

खींच ली है उन्होंने पैरों के नीचे से जमीन  |
अब उनकी किसी बात पर होता नहीं यकीन ||
जन्नत है
दोजख  से कुछ बेहतर
सच मानों
वहाँ इंसान नहीं मुर्दे रहते हैं
उनके पास स्वर्ग है
नरक से कुछ बेहतर
वर्जित है इंसानों का प्रवेश
सच जानो स्वर्ग है मुर्दों का देश  | 

Monday, 30 November 2015

सच तुम सुन न पाओगे
झूठ तुमसे कह न पाउँगा
सच बोलता तो अहंकारी कहलाता
झूठ बोलता तो आत्मग्लानि से भर जाता
न सच बोलूंगा न झूठ
तुम्हारे लिए ताउम्र खामोश रहूंगा |

Saturday, 28 November 2015

देश की इज़्ज़त करना हिन्दू-मुसलमान दोनों को सीखना होगा | आज देश हमारी प्राथमिकताओं में है ही नहीं | देश हमारी प्राथमिकताओं में होता तो धर्म के नाम पर हम कभी यों लामबद्ध नहीं होते, राजनीतिज्ञों की साजिश का हर बार शिकार नहीं होते |
वे बेक़सूर हैं क्योकि 
उनके पास गुनाह करने के कारण मौजूद हैं |

2)
ऐसा पुरुष ख्वाब है ,देना ही जिसका स्वभाव हो |
3)
वे प्रगतिशील हैं,
उनकी प्रगतिशीलता अंधी और बहरी है 
जुबान है लेकिन फिलहाल थकी हुई है
पिछले दिनों असहिष्णुता का राग 
इस बुरी तरह से अलापा है कि
जुबान सहिष्णुता के नशे में सोयी हुई है |


3)
पेरिस में जो हुआ इस्लाम के नाम पर हुआ है,इसका सीधा मतलब है कि इसे मुसलामानों ने ही किया होगा ,या यह मुसलामानों को बदनाम करने की कोई साजिश है ,देश के सेक्युलर बुद्धिजीवी कुछ बोलेंगे या अभिव्यक्ति की आज़ादी का रोना ही रोते रहेंगे |
4)
अपने आँगन में 
दीप जलायें या न जलायें 
अपने भीतर एक दीप जरूर जलायें 
दीपावली पर आपको अनंत शुभकामनायें |
जिन रिश्तों में मित्रता का थोड़ा भी अंश नहीं होता वे स्वाभाविक मौत मर जाते हैं और हम इन रिश्तों की मौत का जश्न मनाते है |

2)
चाँद की फितरत समझ न आती
शीतलता मुझे डराती है
रात के आँचल में
अब नींद नहीं आती है
सोचता हूँ उड़ जाऊं
सूरज के पास चला जाऊं
उसके दरवाजे पर जाने से
अब शर्म मुझे आती है |

3)
मजहबी किताबें 
जुल्म और सितम को हवा देती हैं ?
सच नहीं बदलता 
सूरज के निकलते ही 
सरपट भाग जाता है अन्धेरा, 
प्रेम से अपरिचित 
परम्परा से तो केवल देह को ही जाना है |
बेबुनियाद है आपका डर, देश की आम जनता किसी भी मुसलमान को शक की निगाह से नहीं देखती | असहिष्णुता का मुद्दा चंद सिरफिरे और उनके चाकर बुद्धिजीवियों द्वारा अपने राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिए उछाला जाता है | आज भी बाल मैं सुलेमान से ही कटवाता हूँ और एक भी हिन्दू मुझे नहीं मिला जिसने इस तथाकथित असहिष्णुता के माहौल में सुलेमान से बाल कटवाना बंद कर दिया हो | मटन आज भी जुबैर के यहाँ से ही आता है और उसके भी गाहकों की संख्या में ( इस भीषण असहिष्णुता के माहौल में ) कोई कमी नहीं आयी है | टीवी देखना बंद कर दीजिये आपको भाईचारा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिखेगा |

2) आज़ादी के बाद हर घर में गांधी,नेहरू ,सुभाष तथा भगत सिंह की तसवीरें दीवार की शोभा बढ़ाती थी |कांग्रेसी शासन के दौरान सुभाष चन्द्र बोस तथा भगत सिंह की तसवीरें गायब हो गयीं | समझ में नहीं आता है कि यह सब कांग्रेस द्वारा योजनाबद्ध तरीके से किया गया या वास्तव में इन क्रांतिकारियों का देश की आज़ादी में कोई योगदान ही नहीं था |
हमारे हिस्से का सुख
तुम्हारे पास है
धीरे-धीरे नोचुंगा
अस्थिपंजर करके छोड़ूंगा |

Tuesday, 17 November 2015

वे बेक़सूर हैं क्योकि
उनके पास गुनाह करने के कारण मौजूद हैं
अभी कुछ दिनों पहले
असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापस करके
संगठित तरीके से आपने अपनी प्रतिक्रिया ही तो व्यक्त की थी
वे प्रतिक्रिया स्वरुप कुछ हत्याएं करते हैं
फिर आप उन्हें किस आधार पर गलत कह सकते हैं ?
अच्छा किया जो आपने चुप रहना चुना  |   

Saturday, 14 November 2015

आ जाना 
लौटकर जल्दी आ जाना 
रिश्तों को इंतज़ार करने की आदत नहीं होती |
कौवों की कांव कांव में 
मुश्किल हो जाता है, कोयल को सुनना 
रंग-भेद ,जाति-भेद और धर्म-भेद का आधार 
रंग और पैदाइश क्यों बना ?
कौवों नें जाल कुछ इस तरह बुना कि
सुरीली और नशीली आवाजें हो गयीं धुवाँ
बहुत मुश्किल है
कौवों की इस भीड़ में कोयल को ढूढ़ना |

Friday, 6 November 2015

रंग बदलने का हुनर उन्हें आता है
उन्हें देखकर गिरगिट शर्माता है  |
धर्म अज़गर है
इंसानियत को निगल जाता है
आदमी के खोल में
चारो तरफ शैतान नज़र आता है |

Tuesday, 3 November 2015

पुरस्कार वापस करने से कुछ नहीं होगा
सत्ता जानती है कि
पुरस्कृत होने के लिए तुम्हें
सत्ता की चौखट पर ही आना है
ऐसे आन्दोलनों से 
सत्ता का पेट भरता है
सत्ता सवालों से घबराती है
लोकतंत्र ज़िंदा रहे
इसलिए करने होंगे सवाल |

Sunday, 1 November 2015

धर्म उत्पात मचा रहा है,
धर्म के नाम पर पाप किया जा रहा है |


2)

नदी के जिस पानी में 
आप डुबकी लगाते हैं 
बाहर आने पर वह पानी नहीं मिलता 
नदी की फितरत में ठहरना नहीं होता |

Thursday, 29 October 2015

गलतियां बाबर ने की थी जुम्मन का घर फिर क्यों जले --अदम गोंडवी |
अदम गोंडवी जी की उपरोक्त पंक्तियों को पढ़कर ऐसा लगता है कि बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किया जा रहा है | इसको निम्न तरीके से लिखा जाता तो इससे साम्प्रदायिकता की बू खत्म हो जाती | 


बाबर की गलतियों का खामियाजा हम क्यों भरे 
कभी रामू का तो कभी जुम्मन का घर क्यों जले
मैं तुम पर करूँ
तुम मुझ पर करो शक
जो करते हैं
प्रेम में होने का ढोंग
उन्हें हासिल  है यह हक़ |

प्रेम में हासिल है
केवल एक ही हक़
करो एक दूसरे पर शक |

पहले भूकम्प कहाँ आते थे , मोदी के आने के बाद भूकम्प का आना शुरू हुआ | पेड़ों से फूल कहाँ तोड़े जाते थे , इस देश में बलात्कार तो केवल देवत्व प्राप्त पुरुष ही किया करते थे ,मोदी के आने के बाद इस बीमारी के लक्षण आम आदमी में दिखना शुरू हुए | पुरस्कार वापसी का सेहरा बांधे हुए सभी कवि,लेखक और तथाकथित प्रगतिशील ,जनवादी शायद सही कहते है कि मोदी के आने के पहले तो सब कुछ भ्रष्ट्राचार के तले ठीक-ठाक चल रहा था, चारो ओर शांति ही शांति थी, मोदी ने आकर शांति को भंग कर दिया |

अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर त्रिशंकु हो गये |
न इधर के रहे ,न उधर के रहे ,बेचारे न बजने वाला शंख हो गये |

सरकार ने पुरस्कार दिया ,सरकार को जनता ने चुना ,सच पूछिये तो इन्होने जनता के मुहं पर थूका है |

Sunday, 25 October 2015

एक हमसफ़र से कटती नहीं हैं जिंदगी
हर शहर में बदल जाता हमसफ़र तो अच्छा होता |

बहुवचन से अब डर नहीं लगता
इस उम्र में कोई भरम नहीं टिकता

हर शहर में बदल जाए अगर हमसफ़र
तो बताओ वह सफर कैसा होगा ?

हमसफ़र को कभी बेवफा मत कहना
बेवफाई को हमेशा खुद के नाम करना |

किसी को मिला हो अगर हमसफ़र
तो उसका पता ग़ालिब मुझे देना  

Tuesday, 20 October 2015

मजहब किताबों में क़ैद हैं
यह किला दुर्भेध है
कोई गीता कोई कहता कुरान है
सबकी अपनी अपनी दुकान है
मालिक बन बैठा इन दुकानों का
वह आदमी नहीं हैवान है
वेद की ऋचाएं और कुरान की आयतें
इनका मुख्य हथियार है
चलो चलें उस पार कहीं
यहाँ सुरक्षित नहीं इंसान है  |

Friday, 16 October 2015

वह मेरे एक अज़ीज़ मित्र की माँ थी लेकिन मेरे लिए मुझे पैदा करने वाली माँ से भी बढ़कर कल दिनांक ०५/१०/२०१५ को उनका देहांत हो गया |
तुमने मुझे
पैदा नहीं किया
गीली मिटटी को 
आकार तुमने ही दिया
अम्मा, मेरी स्मृतियों में
तुम हमेशा जीवित रहोगी |
तुम्हारा मानस पुत्र अवधेश






अम्मा, 
मैं कृष्ण तो नहीं हूँ 
लेकिन तुम यशोदा थीं
तुम्हारी मौत में शामिल है 
मेरा कुछ-कुछ मरना भी |


दो नंगे 
सदियाँ गुजार दी 
एक दूसरे को नंगा कहने में 
अबे नंगों 
रुखसत होने से पहले 
अपनी औलादों को तो
कपडे पहनना सिखलाओ
उन्हें नंगा छोड़कर मत जाओ |
सत्ता पुरष्कार उन्हीं लोगों को देती हैं जो सत्ता को suit करता है, सत्ता की विचारधारा का पक्षधर होता है, जिस समय यह पुरष्कार ग्रहण किया गया था क्या सत्ता का चेहरा इन कवियों/ लेखकों के मनमाफिक था ? सत्ता का चेहरा कभी नहीं बदलता,क्या ये बात पुरष्कार लेने वाले नहीं जानते थे ? 
नाटक जारी है |

एक-एक कर वापस कर रहे हैं ताकि चर्चा बनी रहे , नोबल पुरस्कार किसको मिला यह तो लोगों को याद नहीं रहता है ,अब किसे याद होगा कि अकादमी पुरस्कार किसको मिला और किसको नहीं | चलों हम भी उस पुरस्कार को वापस करने की घोषणा कर दें जो हमें मिला ही नहीं |

बहुमत से चुनी गयी सरकार के प्रधानमंत्री को रोज सैकड़ों अपशब्द कहे जाते हैं ,अपशब्द कहने वाले घर जाकर आराम से सो जाते हैं, अरे भाई अब और किस तरह की अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहिए देश के अकादमी पुरस्कार विजेता महान साहित्यकारों को |
देश के 
किसी भी हिस्से में 
कोई पेड़ गिरा 
हवाएँ तेज चली 
भूकम्प आया
इन सबकी जिम्मेदारी
आप उन पर ठोक देते हैं
आखिर कैसी अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहते हैं आप ?



अकादेमी पुरस्कार लौटाने की शहीदाना कवायद
---------------------------------------------------------
पिछले दिनों उदयप्रकाश ने कलबुर्गी की हत्या पर आक्रोश में अपना अकादेमी पुरस्कार क्या लौटाया, हाल में भाजपा सरकार को सांप्रदायिक घोषित करते हुए नयनतारा सहगल और कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने भी अकादेमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी है।
इन लेखकों के इस कदम की जहां कुछ लोगों ने सराहना की है वहीं कुछ लोग इसे इनका पैंतरा बता रहे हैं। देखा जाय तो इस कदम से भी सरकार के कान में जूं नही रेंगने वाली | पुरस्कार लौटाने वाले ये लेखको को कृतज्ञ होना चाहिए कि उनको उनकी साहित्यिक उत्कृष्टता के लिए पुरस्कृात दिया गया | इससे प्राप्त यश का आप जगह जगह उल्लेख करते रहे। अकादेमी व सरकार के समारोहों में आप जाते रहे। आपकी कृतियों के अनेक भाषाओं में अनुवाद होते रहे। पहले उदयप्रकाश को लें। उदयप्रकाश ने गोरखपुर में जब अपने ही परिवार के महंत योगी आदित्यनाथ से पुरस्कार लिया तो क्यां यह इसी सरकार के नुमांइंदे का पुरस्कार नहीं था। । नयनतारा सहगल को लीजिए। इनसे पूछिए कि जब कांग्रेस में इतने घोटाले हो रहे थे, जब देश में इमरजेंसी लगाई गयी। इंदिरा गांधी की तानाशाही ने लोहिया और जयप्रकाश जैसे तेजस्वी नेताओं को मृत्यु के मुहाने तक पहुंचा दिया। उस वक्त इन्हों ने किस सुविधा का परित्यााग किया। अशेाक वाजपेयी == कांग्रेसी शासन की तानाशाही व हिंसा पर उन्होंंने एक भी शब्द न लिखा होगा ,पर गुजरात त्रासदी पर कविताएं लिखीं। इमरजेंसी की खुल कर मुखालफत की हो, ऐसा उदाहरण हमारे सामने नहीं आया। भोपाल में गैस त्रासदी में हजारों लोग मारे गए। दुनिया कहती रही विश्व कविता उत्सव बंद कर दो। यह बोलते रहे: मुर्दो के साथ कोई मर नही जाता। उधर लोग मरते रहे बदहवास शहर छोड कर भागते रहे, इधर भारत भवन कविता उत्सव रचाता रहा। यह है अशेाक वाजपेयी का सच। जिंदगी भर सत्ता की दलाली करने वाला व्यक्ति जब सत्ता के विरोध की बात करता है उसकी नीयत पर शक तो होगा न |
सच तो यह है कि यदि आप सांप्रदायिकता के विरुद्ध हैं या थे तो यह काम आपको बहुत पहले करना चाहिए था। जैसे सार्त्र ने किया। नोबेल तक ठुकरा दिया। रामविलास शर्मा को लीजिए । उन्होंने जीवन में बहुत से पुरस्कार ठुकराए। पर संस्थाओं का अपमान नहीं किया। मात्र मूर्ति और प्रशस्तिपट्ट स्वीकार किया। उन्होंने केवल लिखा, लिखने की राजनीति नही की। किसी कांग्रेस किसी भाजपा की दलाली नहीं की। सरकारें तो सभी एक जैसी हैं। कोई भी दूध की धुली नहीं। अकादेमी ने कोई पाप थोडे न किया है। किया है सरकारी गुर्गों ने बिहार चुनाव जीतने के लिए सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के नाम पर। आप किसी मायने में यदि स्वतंत्र लेखक हैं तो आपको पुरस्काार लेना ही नहीं चाहिए था, तब तो कोई बात होती। रही बात पुरस्कार ठुकरा कर शहीद बनने की तो साहित्यिक जन इस लौटाने के पीछे की रणनीतियों से वाकिफ हैं। देश में इतनी मंहगाई है। 200रुपये किलो दाल है। प्याज दुर्लभ है। आम जन की हालत खस्ताा है। कोई जनसंगठन है जो इसे मुद्दा बना रहा हो। न ये चीजें लेखकों की प्राथमिकता सूची में हैं न सरकार के।क्यों नहीं मुजफ्फर नगर आदि के दंगों में सरकार की भूमिका के विरोध में लेखकों ने पुरस्कारों का बहिष्काार किया।
अंत में खेमों में बंटे ये कवि लेखक जो कुछ भी करते है उसके कारण राजनीति से जुड़े होते हैं वामपंथियों का तो कांग्रेस की गोद में बैठने का एकाधिकार है, तथाकथित जनवादी और प्रगतिशील कवि लेखक वही करते हैं जो उनके वामपंथी आका कहते हैं | जो लोग जिंदगी भर सत्ता की दलाली करते रहे वो आज सत्ता का विरोध करने का नाटक क्यों कर रहे हैं ?

चंद सिरफिरों ने कुछ कहा 
आप बौखला गए 
क्या नहीं जानते आप कि 
देश की जनता आपको कितना प्यार करती है ?
नसीरुद्दीन शाह 
तुम्हें और तुम्हारी अदाकारी को शत-शत नमन |

करोड़ों फूल जो बरसाये 
उनका हिसाब रखना था 
किसी पागल ने एक पत्थर मारा

तो तुम्हें इस तरह न रूठना था |


ये कुकुरमुत्ते हैं 
उग आते हैं और हम लोग 
जो अपने आप को बुद्धिजीवी समझते हैं 

इनके पीछे भेड़ की तरह चले जाते हैं |
धर्म के नाम पर
खेतों में बोयी जा रही है आग
आग की फसल
सिरफिरे काटेंगे तो मुश्किल होगी | 

Wednesday, 14 October 2015

दो नंगे
सदियाँ गुजार दी
एक दूसरे को नंगा कहने में
अबे नंगों
रुखसत होने से पहले
अपनी औलादों को तो
कपडे पहनना सिखलाओ
उन्हें नंगा छोड़कर मत जाओ  |

Tuesday, 13 October 2015

जब तक
राम को ज़िंदा रक्खोगे
रावण भी ज़िंदा रहेगा
रावण की जान
राम की नाभि में स्थित
अमृत-कलश में,
रावण नहीं होगा तो
राम को पूछेगा कौन ?

Sunday, 11 October 2015

चौसठ बरस का हो गया हूँ , सोच में नया-नया ,बूढ़े दोस्त पास नहीं फटकते | अनुभव का तड़का लग जाने से गलतियांऔर बेकूफ़ियाँ नहीं होती | सब कुछ नया नया सा है |

अपने को पुरनिया मत कहिये ,मर्यादा पर बात फिर करें अपनी सीमाओं का निर्धारण खुद करें और फिर उसमे स्वतंत्र होकर रहे | अस्सी की भी हो जाएंगी तो खुद को नया नया सा पाएंगी |
शिकारियों की बहादुरी
की कहानियाँ तो खूब लिखीं
दर्द उसका लिखो
जिसका शिकार होता है
जब तक शेरों को
लिखना नहीं आयेगा
शिकारी तो जांबाज ही कहा जायेगा | 
बहुत दिनों से रात में सोया नहीं हूँ मैं
कमबख्त किसी ने प्याला चुरा लिया

वह जब मरेगा भूख से ही मरेगा
कमबख्त किसी ने निवाला चुरा लिया

खुश थे चाँद और सूरज की रोशनी में हम
कम्बख्तों ने चाँद और सूरज चुरा लिया  

अलीबाबा पर भारी पड़ गये चालीस चोर
कम्बख्तों ने खुल जा सिमसिम का मंतर चुरा लिया

Tuesday, 6 October 2015

1)
वह मेरे एक अज़ीज़ मित्र की माँ थी लेकिन मेरे लिए मुझे पैदा करने वाली माँ से भी बढ़कर कल दिनांक ०५/१०/२०१५ को उनका देहांत हो गया |
तुमने मुझे
पैदा नहीं किया
गीली मिटटी को 
आकार तुमने ही दिया
अम्मा, मेरी स्मृतियों में
तुम हमेशा जीवित रहोगी |
तुम्हारा मानस पुत्र अवधेश

2)
अम्मा, 
मैं कृष्ण तो नहीं हूँ 
लेकिन तुम यशोदा थीं
तुम्हारी मौत में शामिल है 
मेरा कुछ-कुछ मरना भी |
ईश्वर और प्यार
कोरी बकवास |

कृत्रिम पौधे
न पैदा होते हैं
न बड़े होते हैं
मरते नहीं
वे अमर होते हैं |

Sunday, 4 October 2015

लाश को दर्द नहीं होता
मुर्दे को रोते हुए
आज तक किसी ने नहीं देखा
हम ज़िंदा होने का स्वांग करते हैं
हम खुश हैं
क्योंकि हम कभी नहीं रोते  |

Saturday, 3 October 2015

ऊपर आकाश में चिंतित गुरुघंटाल
यमराज से बोले कि
हमारे देश में
गाय की वजह से बहुत उपद्रव होते है,
जाओ और रातो-रात सारी गायों को उठा लाओ  
गाय की अनुपस्थिति में
लोगों भैंस को माँ मानने लगे
यमराज को हुक्म हुआ
जाओ अब सारी भैंसो को लेकर आओ
यमराज ने कहा
हुज़ूर फिर हिन्दुस्तान में
लोग दूध किसका पिएंगे
हुज़ूर मुस्करा कर बोले
चिंता मत करो तात
तब लोग बकरी का दूध पिएंगे
और देश में
गांधी के पैदा होने की संभावना बढ़ेगी  |    

Friday, 2 October 2015

किसी ने कहा नहीं , किसी ने मिलवाया नहीं ,किसी ने उसका पता बताया नहीं और सब लोग ईश्वर के अस्तित्व को मान लेते हैं ,है न आश्चर्यजनक | इतनी बड़ी दुनियाँ में ऐसी छोटी-छोटी मूर्खताएं होती रहती हैं सोनोरिटा |

Friday, 25 September 2015

चलो मान लिया कि
तुम वह औरत नहीं हो
तो क्या तुमने गर्भाशय को
उखाड़कर फेंक दिया है
और पति की लम्बी उम्र के लिए
करवा चौथ का व्रत रखना छोड़ दिया है ?
आज भी माथे पर
लगाती हो टीका भरती हो मांग
क्यों करती हो
सौभाग्यवती होने का स्वांग ? 

Saturday, 19 September 2015

टालती है मेरी मौत
मेरी पत्नी
रखती है व्रत करवा चौथ |

Wednesday, 2 September 2015

किसी के पक्ष में 
या उसके विरोध में 
तर्क तो गढ़े जा सकते हैं 

कोई नहीं जानता 
ऊँट किस करवट बैठेगा ?????
शब्दों के बाण 
ऊँट के बैठने की दिशा तय नहीं करते  |  

Thursday, 20 August 2015

कुछ प्रश्नों के जवाब नहीं मिले | 
मिट न पाये शिकवे और गिले ||


गजल से लिपट जाए 
तो कविता संवर सकती है 
कम शब्दों में 
बात कहने का सलीका नहीं सीखा 
तो कविता मर भी सकती है |


हो गया है
जागने का वक़्त
नींद है भरपूर आँखों में
सोने के वक़्त
क्यों नींद उड़ जाती है आँखों से |
हम खुद को 
जब भी देखते हैं 
आईने में ही देखते हैं 
कभी खुद को 
अपने सामने बैठाकर
आँखों में आँखें डालकर भी तो देखो |
मैं "देशभक्ति" हूँ 
साल में दो बार तो निश्चित रूप से आती हूँ 
और कभी कभी जब पाकिस्तान 
हमारे सैनिकों के सिर काटकर ले जाता हैं 
तब मुझे मजबूरी में आना पड़ता है |
नागपंचमी
नागों से दोस्ती करो
मुफ्त में ज़हर मिलने की सुविधा उपलब्ध |



वे त्रस्त हैं फिर भी 
शव की आराधना में व्यस्त हैं |
यह भी एक पर्व है 
बहनें गुड़िया बनाती थी 
भाइयों के हाथ में छड़ी थमाती थी 
नजदीक के चौराहे पर 
गुड़िया को फेंकती थी 
और भाइयों के हाथ की छड़ी
गुड़िया को पीटती थी
गुड़िया को पीटने का
जो सबक बहनें सिखाती हैं
भाई लोग उसे
अपना धर्म मानकर जिंदगी भर निभाते हैं |
आसमान में आखिर कब तक उड़ोगे ?
प्यार करने के लिए
तुम्हें उतरना ही होगा
घर जमीन पर ही बनाना होगा
अपने अंतिम संस्कार के लिए
आखिर तुम्हें धरती पर ही आना होगा |

Wednesday, 5 August 2015

कोई अपना नहीं होता
कोई पराया नहीं होता
नजराने बदल देते हैं नजरिया
नजरानों का कोई घराना नहीं होता |  -मैगी प्रकरण।
चीटी को हराया
शेर से हाथ मिलाया
आपकी चाकरी में
खड़ा है अगर शेर
तो जीने के लिए
रोज-रोज समझौते करने की
मजबूरी हो जाती है ढेर
ताक़तवर को
नींच कहने की सामर्थ्य अब उनमे नहीं रही  | 

Saturday, 1 August 2015

राजनीति के शिखर पर बैठे राजनेता 
और पिछलग्गू बुद्धिजीवियों का हुजूम 
ये हमेशा रहे हैं, हमेशा रहेंगे 
ये कभी नहीं होंगे मरहूम |
भीषण ठण्ड में 
चिलचिलाती धूप के दर्शन कहाँ होते हैं 
सूरज महाशय इन दिनों मुहं ढक के सोते हैं |
अँधेरे से 
सूरज को डर लगता है
किया सलाम 
और कहा चलो कलाम 
ले गया सूरज 
उनको अपने घर
रोशनी के लिए |


2)
कलाम से कलाम का धर्म किसी ने नहीं पूछा
उनसे जो मिला जब मिला झुककर सलाम ठोका
आतंकवादी कौन ?
विदेशी ताक़तों के सहयोग से 
देश में कत्लेआम की साजिश को 
जो देता हैं अंजाम और कौन ?
याकूब मेनन को आतंकवादी कहने में क्यों हिचकते हो मेरे भाई |


2)
शर्म आती है जब अपराधियों को भी हिन्दू और मुसलमान की नज़र से देखा जाता है | इस दूषित राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में जिनका योगदान है आइये उन्हें चिन्हित करें |

3)
राजनीति ने 
उनके चेहरों को भद्दा बना दिया 
इसीलिए तो उन्होंने 
अपने आस-पास से आइनों को हटा दिया |
असहमति,
धूप चिलचिलाती है 
किसे भाती है ?????

Tuesday, 28 July 2015

गनीमत है 
सपनों के गुनाह 
गुनाह नहीं होते 
वरना हम तो
बरसों से जेल में
सड़ रहे होते |
निष्काम कलाम तुझे सलाम

2)
कलाम से कलाम का धर्म किसी ने नहीं पूछा
उनसे जो मिला जब मिला झुककर सलाम ठोका

3)
अँधेरे से 
सूरज को डर लगता है
किया सलाम 
और कहा चलो कलाम 
ले गया सूरज 
उनको अपने घर
रोशनी के लिए |
फेसबुक अजायबघर है
आदमी और जानवर
दोनों को एक साथ देख सकते हैं आप
आदमी का बच्चा
जानवर को देखकर खुश होता है
जानवर का बच्चा
आदमी को जानवर समझता है  |

Sunday, 26 July 2015

भूखे कभी रहे नहीं
भूख पर लिखते बहुत हो
पैर में काँटा कभी चुभा नहीं
उनके दर्द में आहें भरते बहुत हो
वह मरा था तुम रोये बहुत थे
उनके मरने पर तुम मरते नहीं हो
ये कांटें नहीं हैं लेकिन चुभते बहुत हैं 
जिंदगी में शामिल ये अपने लोग हैं ||
घर होता है,
परिवार होता है
इनसे अगर थोड़ा वक्त बचा
तो मंदिर में बैठा भगवान होता है 
हमारी प्राथमिकताओं में देश का नाम नहीं होता |
इफ्तार पार्टियों की दौड़ में 
वे जोर-शोर से शामिल हैं
उन्हें किसी भविष्य-वक्ता ने बताया है 
जो इस दौड़ में प्रथम आयेगा
उसकी छत पर वोटों की बारिश होगी |
तब हमें 
होश आता है 
जब सब गुड़
गोबर हो जाता है |
तुम आगे
मैं तुम्हारे पीछे
एक ही दिशा में
लगातार चलते रहे
हमारे बीच
फासला बढ़ता रहा
पता ही नहीं चला
तुम मेरी निगाह से
कब ओझल हो गए ?
किसी भी धर्म से जुड़ा कोई भी पाखण्ड जिसमे हर वर्ष न जाने कितनी अनमोल जिंदगियों की हानि होती हो , ऐसे पाखण्ड को महिमामंडित करना जघन्य अपराध है |


एक तरफ डिजिटल इण्डिया का सपना दिखाया जा रहा है और दूसरी ओर रथ यात्रा के आयोजन का ढकोसला |




एक प्रेम कविता
+++++++++++
चन्द रोज और
फिर हम तुम दोनों
अपने अपने घेरों में कैद 
एक दूसरे की पहुँच से दूर
अनुपस्थित में भी
एक दूसरे से जुड़ जायेंगे
हम अचानक अपनी उम्रों से
बहुत छोटे हो जायेंगे |
मेरा बच्चा मुझे पापा
तुम्हारा बच्चा तुम्हे माँ
कहकर जगायेगा
अपनी तोतली भाषा में
हमें बड़े होने का अहसास कराएगा |
बार बार छोटे और फिर बड़े
होने की इस प्रकिया में
हम न छोटे और न बड़े ही रह पाएंगे
एक दिन दहलीज पर खड़े -खड़े देखेंगे क़ि
हमारे बच्चे
हमसे भी बड़े हो गए हैं ।
सबके पास अपने-अपने बुद्धिजीवी हैं |
यह जो नेता-परेता हैं सब परजीवी हैं ||
क्या कहना है ?
कैसे कहना है ?
कब कहना है ?
यह सब इन नेताओं के चाकर बुद्धिजीवी बताते हैं |




बुद्धिजीवी,
नपुंसक आक्रोश का जन्मदाता 
पिता की भूमिका नहीं निभाता |
प्यार नहीं है
हमारे तुम्हारे बीच
एक टूटा हुआ पुल है
जो प्यार की कहानी सुनाता है
लम्हें वही याद रह जाते हैं
जिन लम्हों में गुनाह किया जाता है  |

Saturday, 25 July 2015

नपुंसक केवल वही नहीं होते जो स्त्री के साथ सहवास करने में अक्षम होते हैं | नपुंसकों की भीड़ में एक नपुंसक मैं भी हूँ  और दो बच्चों का बाप भी हूँ  | हम - आप सभी नपुंसकों की इस भीड़ में अपने आपको खड़ा पाएंगे |  


2)
बच्चों को विकल्प सुझाने की बात करते हैं ,आप क्यों मजाक करते हैं  |
आज के बच्चे दस विकल्प सामने रखकर उनमें से एक चुनते हैं | उन्हें हम जब विकल्प सुझाते हैं तो वे मंद मंद मुस्कराते हैं |

Sunday, 19 July 2015

हाथ तुमनें बढ़ाया था
आगे बढ़कर मैंने उसे थाम लिया
फिर जो कुछ मेरे- तुम्हारे बीच हुआ
उसका सारा दोष तुमने मुझपर मढ़ा  |
ऊब, 
ऊब से बचने के लिए
दूब की शरण में एक अल्पविराम |




आते हैं 
तो डराते हैं 
इसीलिए नींद में 
अब सपने नहीं आते हैं |





व्यापम घोटाला 
सिलसिलेवार इतनी मौतें 
अब तो शक होता है 

मौत है या कहीं कोई हत्यारा छिपा है ?