अकादेमी पुरस्कार लौटाने की शहीदाना कवायद
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पिछले दिनों उदयप्रकाश ने कलबुर्गी की हत्या पर आक्रोश में अपना अकादेमी पुरस्कार क्या लौटाया, हाल में भाजपा सरकार को सांप्रदायिक घोषित करते हुए नयनतारा सहगल और कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने भी अकादेमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी है।
इन लेखकों के इस कदम की जहां कुछ लोगों ने सराहना की है वहीं कुछ लोग इसे इनका पैंतरा बता रहे हैं। देखा जाय तो इस कदम से भी सरकार के कान में जूं नही रेंगने वाली | पुरस्कार लौटाने वाले ये लेखको को कृतज्ञ होना चाहिए कि उनको उनकी साहित्यिक उत्कृष्टता के लिए पुरस्कृात दिया गया | इससे प्राप्त यश का आप जगह जगह उल्लेख करते रहे। अकादेमी व सरकार के समारोहों में आप जाते रहे। आपकी कृतियों के अनेक भाषाओं में अनुवाद होते रहे। पहले उदयप्रकाश को लें। उदयप्रकाश ने गोरखपुर में जब अपने ही परिवार के महंत योगी आदित्यनाथ से पुरस्कार लिया तो क्यां यह इसी सरकार के नुमांइंदे का पुरस्कार नहीं था। । नयनतारा सहगल को लीजिए। इनसे पूछिए कि जब कांग्रेस में इतने घोटाले हो रहे थे, जब देश में इमरजेंसी लगाई गयी। इंदिरा गांधी की तानाशाही ने लोहिया और जयप्रकाश जैसे तेजस्वी नेताओं को मृत्यु के मुहाने तक पहुंचा दिया। उस वक्त इन्हों ने किस सुविधा का परित्यााग किया। अशेाक वाजपेयी == कांग्रेसी शासन की तानाशाही व हिंसा पर उन्होंंने एक भी शब्द न लिखा होगा ,पर गुजरात त्रासदी पर कविताएं लिखीं। इमरजेंसी की खुल कर मुखालफत की हो, ऐसा उदाहरण हमारे सामने नहीं आया। भोपाल में गैस त्रासदी में हजारों लोग मारे गए। दुनिया कहती रही विश्व कविता उत्सव बंद कर दो। यह बोलते रहे: मुर्दो के साथ कोई मर नही जाता। उधर लोग मरते रहे बदहवास शहर छोड कर भागते रहे, इधर भारत भवन कविता उत्सव रचाता रहा। यह है अशेाक वाजपेयी का सच। जिंदगी भर सत्ता की दलाली करने वाला व्यक्ति जब सत्ता के विरोध की बात करता है उसकी नीयत पर शक तो होगा न |
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पिछले दिनों उदयप्रकाश ने कलबुर्गी की हत्या पर आक्रोश में अपना अकादेमी पुरस्कार क्या लौटाया, हाल में भाजपा सरकार को सांप्रदायिक घोषित करते हुए नयनतारा सहगल और कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने भी अकादेमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी है।
इन लेखकों के इस कदम की जहां कुछ लोगों ने सराहना की है वहीं कुछ लोग इसे इनका पैंतरा बता रहे हैं। देखा जाय तो इस कदम से भी सरकार के कान में जूं नही रेंगने वाली | पुरस्कार लौटाने वाले ये लेखको को कृतज्ञ होना चाहिए कि उनको उनकी साहित्यिक उत्कृष्टता के लिए पुरस्कृात दिया गया | इससे प्राप्त यश का आप जगह जगह उल्लेख करते रहे। अकादेमी व सरकार के समारोहों में आप जाते रहे। आपकी कृतियों के अनेक भाषाओं में अनुवाद होते रहे। पहले उदयप्रकाश को लें। उदयप्रकाश ने गोरखपुर में जब अपने ही परिवार के महंत योगी आदित्यनाथ से पुरस्कार लिया तो क्यां यह इसी सरकार के नुमांइंदे का पुरस्कार नहीं था। । नयनतारा सहगल को लीजिए। इनसे पूछिए कि जब कांग्रेस में इतने घोटाले हो रहे थे, जब देश में इमरजेंसी लगाई गयी। इंदिरा गांधी की तानाशाही ने लोहिया और जयप्रकाश जैसे तेजस्वी नेताओं को मृत्यु के मुहाने तक पहुंचा दिया। उस वक्त इन्हों ने किस सुविधा का परित्यााग किया। अशेाक वाजपेयी == कांग्रेसी शासन की तानाशाही व हिंसा पर उन्होंंने एक भी शब्द न लिखा होगा ,पर गुजरात त्रासदी पर कविताएं लिखीं। इमरजेंसी की खुल कर मुखालफत की हो, ऐसा उदाहरण हमारे सामने नहीं आया। भोपाल में गैस त्रासदी में हजारों लोग मारे गए। दुनिया कहती रही विश्व कविता उत्सव बंद कर दो। यह बोलते रहे: मुर्दो के साथ कोई मर नही जाता। उधर लोग मरते रहे बदहवास शहर छोड कर भागते रहे, इधर भारत भवन कविता उत्सव रचाता रहा। यह है अशेाक वाजपेयी का सच। जिंदगी भर सत्ता की दलाली करने वाला व्यक्ति जब सत्ता के विरोध की बात करता है उसकी नीयत पर शक तो होगा न |
सच तो यह है कि यदि आप सांप्रदायिकता के विरुद्ध हैं या थे तो यह काम आपको बहुत पहले करना चाहिए था। जैसे सार्त्र ने किया। नोबेल तक ठुकरा दिया। रामविलास शर्मा को लीजिए । उन्होंने जीवन में बहुत से पुरस्कार ठुकराए। पर संस्थाओं का अपमान नहीं किया। मात्र मूर्ति और प्रशस्तिपट्ट स्वीकार किया। उन्होंने केवल लिखा, लिखने की राजनीति नही की। किसी कांग्रेस किसी भाजपा की दलाली नहीं की। सरकारें तो सभी एक जैसी हैं। कोई भी दूध की धुली नहीं। अकादेमी ने कोई पाप थोडे न किया है। किया है सरकारी गुर्गों ने बिहार चुनाव जीतने के लिए सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के नाम पर। आप किसी मायने में यदि स्वतंत्र लेखक हैं तो आपको पुरस्काार लेना ही नहीं चाहिए था, तब तो कोई बात होती। रही बात पुरस्कार ठुकरा कर शहीद बनने की तो साहित्यिक जन इस लौटाने के पीछे की रणनीतियों से वाकिफ हैं। देश में इतनी मंहगाई है। 200रुपये किलो दाल है। प्याज दुर्लभ है। आम जन की हालत खस्ताा है। कोई जनसंगठन है जो इसे मुद्दा बना रहा हो। न ये चीजें लेखकों की प्राथमिकता सूची में हैं न सरकार के।क्यों नहीं मुजफ्फर नगर आदि के दंगों में सरकार की भूमिका के विरोध में लेखकों ने पुरस्कारों का बहिष्काार किया।
अंत में खेमों में बंटे ये कवि लेखक जो कुछ भी करते है उसके कारण राजनीति से जुड़े होते हैं वामपंथियों का तो कांग्रेस की गोद में बैठने का एकाधिकार है, तथाकथित जनवादी और प्रगतिशील कवि लेखक वही करते हैं जो उनके वामपंथी आका कहते हैं | जो लोग जिंदगी भर सत्ता की दलाली करते रहे वो आज सत्ता का विरोध करने का नाटक क्यों कर रहे हैं ?
अंत में खेमों में बंटे ये कवि लेखक जो कुछ भी करते है उसके कारण राजनीति से जुड़े होते हैं वामपंथियों का तो कांग्रेस की गोद में बैठने का एकाधिकार है, तथाकथित जनवादी और प्रगतिशील कवि लेखक वही करते हैं जो उनके वामपंथी आका कहते हैं | जो लोग जिंदगी भर सत्ता की दलाली करते रहे वो आज सत्ता का विरोध करने का नाटक क्यों कर रहे हैं ?
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