Sunday, 11 October 2015

चौसठ बरस का हो गया हूँ , सोच में नया-नया ,बूढ़े दोस्त पास नहीं फटकते | अनुभव का तड़का लग जाने से गलतियांऔर बेकूफ़ियाँ नहीं होती | सब कुछ नया नया सा है |

अपने को पुरनिया मत कहिये ,मर्यादा पर बात फिर करें अपनी सीमाओं का निर्धारण खुद करें और फिर उसमे स्वतंत्र होकर रहे | अस्सी की भी हो जाएंगी तो खुद को नया नया सा पाएंगी |

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