Saturday, 29 June 2013

परिंदा जमीन पर


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आकाश में स्वतंत्र उड़ने का
सपना देखा था उसने 
अब वह सपना
उसके बच्चों की
आँखों में पल रहा है |
बच्चों को नहीं दिखाई देती
पैरों में पड़ी बेड़ियाँ
अपने सपनों के साथ
जमीन पर रेंगता हुआ परिंदा
कितना बेहूदा लगता है
लेकिन फिर भी
आकाश में उड़ने का ख्वाब
सतरंगा लगता है |

मिलन

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मिलन से बेहतर है
मिलन की आस 
मिलन के बाद वे दोनों
एक दूसरे की खोज में
जिंदगी भर भटकते हैं |
बरसात
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बरसने के बाद
बादलों का मायूस चेहरा
कभी देखा है तुमने
जम कर बरसते हैं
और फिर
पानी के लिए तरसते हैं
बादल प्यास से मरते हैं |
मौन स्पर्श
========
रोको मत
छूने दो देह
हजारों शब्दों को
नकारता है एक चुम्बन |


मौन,
संप्रेषित नहीं हो पाता है 
एक स्पर्श
सभी भाषाओं को
बौना कर जाता है |


स्पर्श के साथ हो मौन
फिर कौन भाषा तलाशता है ?

 १७/०९/७९
उन गहराइयों में
जहाँ भाषा खो जाती है
तुम ढूढते रहे शब्द |


कब कौन
चला आता है दबे पावँ
हमारे सपनों में
बस जाता है निशब्द |
१९८२ में लिखी एक प्रकाशित कविता | यह वह समय था जब कविता में विद्रोह की बातें ही बातें थी |
नपुंसक विद्रोह
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तुम जानते हो
व्यवस्था की सामर्थ्य
इसीलिए व्यवस्था को
नपुंसक कहते हुए
तुम काँप रहे हो |

अभाव से पैदा होनेवाला
विद्रोह नपुंसक है
चंद सिक्कों में बिक जाता है |


जिसे तुम
समुचित विद्रोह कहते हो
वह व्यवस्था के सामने
भिक्षा की मुद्रा में फैला हुआ
एक भिखारी का हाथ है
और तुम्हारा सारा विद्रोह
व्यवस्था का अंग बनने के लिए
एक योजनाबद्ध प्रयास है |


अब बताओ मेरे दोस्त
कविता क्या है ?   
रथ को गति
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रुका हुआ रथ
      अनर्थ
रथ को गति दे दो |
मैं नहीं समझा
आप समझे इसका अर्थ ?


कदमताल करना
चलना नहीं होता |


वे खोजेंगे
कविता का अर्थ
जो सरे राह
कविता को नंगा करते हैं
और फिर उसके 
अंगों को टटोल टटोल कर
कविता की व्याख्या करते हैं |


कविता अंधों का हाथी है | 

Friday, 28 June 2013

हम सब
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अन्धे
हमें रास्ता दिखाते हैं
हम अपनी आँखें बंद किये
उनके पीछे पीछे चले जाते हैं |


अन्धे का कहना है
ईश्वर ने मुझे दर्शन दिया
और बदले में मुझसे मेरी आँखे ले लिया
उन्हें आँखें देना गंवारा नहीं
इसलिए अपनी आँखों को
खुद ही अपने हांथों से मूँद लिया |

अन्धें ने पूछा
तुम सबको ईश्वर दिखता है
सब करने लगे हुवां हुवां   | 
चिड़िया नहीं जानती
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बच्चे जब
उड़ना सीख लेते हैं
घोसला छोड़ देते हैं
घोसला वीरान,चिड़िया अकेली
तलाशती है चिरौटा
बार बार अपना पेट भरती है
सोचती है -
अब इस बार
बच्चों को उड़ना नहीं सिखाएगी
घोसले के बाहर का आकाश
उन्हें नहीं दिखायेगी |
चिड़िया नहीं जानती कि
बच्चे खुद ब खुद
उड़ना सीख लेते हैं
पेट के लिए
घोसला छोड़ देते हैं |

Thursday, 27 June 2013

बरगद
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तुम जिसे
पिता मानते रहे
वह बरगद
आशीर्वाद की मुद्रा में
तुम्हारे अस्तित्व को
बौना करता रहा 
विभाजित करता रहा
आकाश को
तुम्हें सूरज से काटता रहा
बांटता रहा अन्धेरा
अन्धेरा
तुम्हारी नियति नहीं
बरगद की कूटनीति है |

Wednesday, 26 June 2013

उन्होंने पूछा =
कैसे हैं सरकार
मैं बोला निश्छल 
तुम सुनाओ
मेरे पास सब बासी है |
ताज़ा पकवान
नए नए मुकाम
तुम हो पहलवान
मेरे पास सब बासी है |
तुम्हारे पास हैं शब्द
मैं मौन निशब्द
तुम सुनाओ
मेरे पास सब बासी है |
 
 

Monday, 24 June 2013

गणतंत्र दिवस पर बधाई देने का मेरा कोई इरादा नहीं है ,पिछले ६४ वर्षों से इस औपचारिकता को निभाते निभाते एक पूरी पीढ़ी जमीदोंज हो गयी | इन चौसठ वर्षों में "गण" लगातार कमजोर होता चला गया और "तंत्र" मूल्यहीन होकर भ्रष्ट्राचार के कीचड़ में धसता चला गया | आईये गणतंत्र दिवस के इस मौके पर प्रार्थना करें कि "गण" मजबूत और शक्तिशाली बने तथा वर्तमान "तंत्र" का समूल नाश हो तथा नए कोपल "तंत्र" का उदय |
सविंधान निर्माताओं को नमन
देश में चारों ओर हो अमन — with Durgesh Verma and 12 others.
हमारे सपनों में
+++++++++++
जो हमारे पास होते हैं
वो
हमारे सपनों में नहीं आते |

जिनको पाने
और पास लाने की
उम्मीद अभी बाकी है
वे भी
हमारे सपनों में नहीं आते |

जिनको पाने
और पास लाने की
तिनका भर
उम्मीद नहीं होती
वे हमारे सपनों में
बेख़ौफ़ चले आते हैं |


हमारे पास होते हैं जो
वो हमारे सपनों में
कभी नहीं आते |
आदमी ने तो खुद को
मर्यादाओं में बांधा हैं |
जब लाँघा ईश्वर ने ही
मर्यादाओं को लाँघा है ||
बड़े होते ही
चुक जाते हैं
झुक जाते हैं
ऐसे बड़े तुम मत होना
तुम चुकना नहीं
तुम झुकना नहीं   

Sunday, 23 June 2013

जिसे प्यार किया
उसके साथ
घर नहीं बसा पाया
उसे दिल में छिपाकर
घर बसाया |


आभासी दुनियाँ के "घर"
घर से बेहतर क्यों लगते हैं ?
गुम हो गए दोनों
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जिस लड़की से
प्यार किया
पत्नी बनाकर
घर उसके हवाले किया
आज इतने बरस
गुजर जाने के बाद
पाता हूँ कि वह लड़की
जिसे मैंने प्यार किया था
घर जिसके हवाले किया था
हो गयी है गुम
रहती है हरदम गुमसुम
उदास निगाहों से
देखती है मेरी ओर
जैसे कह रही हो
तुम ऐसे तो न थे
कहाँ गुम हो गए
तुम मेरे हमदम |


गुम हो गए
हम दोनों
"घर" अभी बाकी है ?
प्रार्थनाएँ
जब सुनी नहीं जाती
प्रार्थनाएँ
व्यर्थ ही की जाती हैं
क्यों की जाती हैं
प्रार्थनाएँ

Saturday, 22 June 2013

मजबूरी
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गिद्ध हैं
मंदिर के बुर्ज
पर बैठकर करते हैं 
लाशों का व्यापार |



हरबार की तरह
इन्हीं गिद्धों में से ही
चुनना है
हमें अपनी सरकार |
अँगूठी में हीरा
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प्रेम खीसें निपोरता
आँगन(अब तो आँगन का चलन ही नहीं है ) की
गन्दी नाली में पड़ा है
क्या हुआ उठा लो
अरे उस अँगूठी में हीरा जड़ा है |
चाहत तो बाकी है
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जो चाहा नहीं मिला
चाहत तो बाकी है
उस चाहत के चलते
जीवन में अब भी
रस तो बाकी है
वह अपनी चाहत पर इतराता है |



उसे मिला वह सब कुछ
जो उसने चाहा
जीवन में उसके अब
कोई झस नहीं बाकी है
वह अपनी चाहत पर पछताता है |
रुका नहीं हूँ
थका हूँ |
थका नहीं हूँ
कुछ देर के लिए
थमा हूँ |
थकूंगा
थमूंगा
किन्तु ,परन्तु
रूकूंगा नहीं |

Friday, 21 June 2013

तन्हाई बड़ी मुश्किल से मिलती है !
शमा क्यों रात रात भर जलती है !!
मैंने पूछा श्रीमती जी से कि
आखिर तुमने क्या देखा था
मुझमे, क्यों पसंद किया ?
गर्मी की तपती दोपहरी में
झुंझला कर बोली खाक किया पसंद
मैंने अपना सर फोड़ा था |

Thursday, 20 June 2013

वह लोग जो ऐसा साहित्य रचते हैं जो जड़ता ,यथास्थितिवाद ,रूढि़यों एवं वर्जनाओं को बनाए रखने पर ही बल देता है ऐसे साहित्यकारों पर भी तो कभी चर्चा होनी चाहिए | अरे कम से कम ऐसे साहित्यकारों को हम चिन्हित तो कर ही सकते हैं |
मुझे लाया गया
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मैं अब दर्शन नहीं दूंगा |

चलो देर बाद ही सही
उन्हें शर्म तो आई |


वे अपना दर्द
बयाँ कर रहे थे
भाई मैं यहाँ
खुद नहीं आया
मुझे जबर्दस्ती
यहाँ लाया गया
आप कहते हो
यह दुनिया मैंने बनाई
चारो ओर
हो रही है मेरी रुसवाई |
आदमी ने मेरी शक्ल
हुबहू अपने जैसी बनाई
आदमी के भगवान् को
पशु पक्षी नहीं पहचानते
चाँद तारे नहीं जानते
उनका भगवान् तो
उनके जैसा होगा
वे हैं यही मानते |


इस दुनियाँ में
जर्रे जर्रे का
अपना अपना
अलग अलग भगवान् है
मैं तो व्यर्थ ही बदनाम हूँ | 
तुम कहते हो कि प्रेम बड़ी मुश्किल से मिलता है | मैं कहता हूँ कि प्रेम मिलता ही नहीं है  खोजते रह जाओगे जो है ही नहीं वह कहाँ से मिलेगा ? जैसे ईश्वर आदमी के दिमाग की परिकल्पना है वैसे ही आदमी के जिस्म की काम वासना ने ज़ना है प्रेम |
मुझे रास्ते में
मिली थी कविता
बोली नहीं चुप रही

आज भी चुप है
कविता
कल बोलेगी
पंछी उड़ जाता है
पिंजरा पिंजरे में
कैद हो जाता है
पिंजरे का दर्द
खोलेगी
कविता
कल बोलेगी |
क्या हो रहा है इस देश में
हिन्दू और मुसलमान
दोनों को ठगा जा रहा है
जब मुसलमान ठगा जाता है
तो हिन्दू मुस्कराता है
जब हिन्दू ठगा जाता है
तो मुसलमान मुस्कराता है
जब यह दोनों
मिलाने के लिये
हाथ बढ़ाते हैं
तो इनके बढ़े हुए हाथ
काट दिए जाते हैं |

Wednesday, 19 June 2013

केदार बाबू सहमे हुए हैं  18/06/2013
================
अब तो मान लो
तुम्हारा विश्वास हार गया
जिसकी पूजा अर्चना
करते हो तुम
वह कितना असहाय है |
जिस चबूतरे पर
आसन लगा था
नींव उसकी दरक गयी है
अपने भक्तों को
प्रसाद स्वरुप वितरित कर दी 
प्राकृतिक आपदा
के नाम पर "मौत"
केदार बाबू सहमे हुए हैं |
अब तो मान लो
तुम्हारा विश्वास हार गया
जिसकी पूजा अर्चना
करते हो तुम
वह कितना असहाय है |
जिसे हमने बनाया
मंदिर में बैठाया
वह हमें क्या देगा ?
प्राकृतिक आपदा
के नाम पर "मौत"

Tuesday, 18 June 2013

वह कौन है
+++++++++++
क्या हो रहा है इस देश में
हिन्दू और मुसलमान
दोनों को ठगा जा रहा है
जब मुसलमान ठगा जाता है
तो हिन्दू मुस्कराता है
जब हिन्दू ठगा जाता है
तो मुसलमान मुस्कराता है
जब यह दोनों
मिलाने के लिये
हाथ बढ़ाते हैं
तो इनके बढ़े हुए हाथ
काट दिए जाते हैं | 
वह कौन है जो
इनके बढ़े हुए हाथों को
काट देता है और
परदे की ओट में खड़ा
मुस्कराए चला जाता है |
उसे ढूढ़ना है और
उसका सिर मूंडना है |
 
गुनाह करो
और मंदिर जाओ
कुछ पैसा देकर
उनको बहलाओ |
महंगाई के चलते
उनका रेट भी
बढ़ गया है
अब नहीं सुनी जाती
गरीबों की बात
सोने का मुकुट है
तो बात बन जायेगी
तुम्हारी बात  |

Saturday, 15 June 2013

संभावना है प्रेम
+++++++++++
प्रेम
संभावना है
मंदिर के मिट जाने की
गिरजाघर के
सलीब पर चढ़ जाने की
मस्जिद के ढह जाने की
ईश्वर के खो जाने की
स्त्री पुरुष के बीच
तथाकथित प्रेम से इतर
प्रेम संभावना है |  
एक व्यक्ति एक लड़की को औरत बनाता है फिर दूसरी लड़की जिसे शादी के बाद वह माँ बनाता है, क्या यह व्यक्ति दोनों के पास प्यार से भरा हुआ था ? और वह लड़की उस व्यक्ति को प्यार करती है जिसने उसे औरत बनाया या उस व्यक्ति को प्यार करती हैजिसने उसे माँ होने का गौरव प्रदान किया | प्यार कहाँ बसता है ? प्यार एक परिकल्पना है वैसे ही जैसे ईश्वर मनुष्य के दिमाग की उपज | ईश्वर और प्यार कोरी बकवास |  
 
फादर्स डे पर
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मुझे याद आता है पिता
रात रात भर जागता था
और बार बार
अपना कद नापता था
पिता से सीखा है
पिता होने का सलीका
जागता हूँ
अपना कद नापता हूँ
हर रोज अपना कद
कुछ घटा हुआ पाता हूँ |

Friday, 14 June 2013

बर्फानी बाबा
==========
क्यों पिघल रहे हैं
बर्फानी बाबा ?
उम्र ढलती है 
अहंकार गलता है
आईने में
हमें एक बौना दिखता है |
ठण्ड में कांपता है
जम जाता है
ताप बढ़ने पर
पिघल जाता है
बर्फानी बाबा का
कद कम हो जाता |
विज्ञान के जो पाठ
पढ़े थे बचपन में
भूल जाते हैं |
हम
बर्फानी बाबा के दर्शन करने
दौड़े चले जाते हैं |     

Wednesday, 12 June 2013

दोगले
======
हम दोगले
हमारे अग्रज दोगले
नेता दोगले, परेता दोगले
चारो तरफ हैं दोगले ही दोगले |

दोगले हैं हम मानते नहीं
इसीलिए हम हैं 
अन्दर से खोकले
हम पोपले |
उम्मीद भी है
रास्ता भी है
कोशिश भी है
मुकद्दर नहीं
मंजिल कैसे मिलेगी ?
वे डराते हैं
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पहले आये हम
फिर हमने
खुदा बनाया
उसे मंदिर और मस्जिद में
हमने बैठाया
वे शातिर हैं
उसी खुदा का नाम लेकर
हमें डराते हैं
और हम डर जाते हैं |
हम क्यों डर जाते हैं ?
शीर्षक नहीं
==========
खूँटा ठोकेंगे
फिर उससे खुद को बांधेंगे |
ठोकना नहीं है
खूँटों को निकाल फेकना है
किसी को
बाँधना नहीं है |     
पिंजरे का दरवाजा
खोलने में ही भलाई है
देखते नहीं
परिंदे के मुख पर
कैसी ख़ुशी छाई है | 

Tuesday, 11 June 2013

अलीबाबा नहीं रहे
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अलीबाबा भी
शामिल हो गया चोरों में
अब चोर चोर का शोर है
सबके सब एक ही ओर हैं
अलीबाबा और चालीस चोर
की कहानी
अब हो गयी पुरानी
अलीबाबा ने
पहला काम किया
झट से
पासवर्ड बदल दिया
सिम सिम खुल जा से
नहीं खुलता कोई दरवाजा
अलीबाबा अलीबाबा
तू लौटकर आजा  | 
बूढ़े का दिमाग था
सटक गया
पका फल था
टपक गया
भीष्म पितामह
बाणों की शैय्या पर
विचारमग्न हैं कि
उनका स्वप्न
क्यों हो गया भग्न ?
एक दुसरे पर
तोहमत लगाना
एक दूसरे को
नीचा दिखाना
क्या यही साहित्य है ?
हो सकता है इसे पत्रकारिता कहते हों
मैं न साहित्यकार हूँ ना पत्रकार
लेकिन यह बेहूदगी
मुझे नहीं है स्वीकार ? 

Monday, 10 June 2013

साँप। तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया ।
एक बात पूछूं-(उत्तर दोगे)
तब कैसे सीखा डसना ।
विष कहाँ से पाया ?
 -अज्ञेय



साँप ने कहा
एक बार शहर गया था
आदमी का पैर
मुझ पर पड़ गया था  |

-अवधेश निगम 
देखिये आडवाणी जी अभी अभी अचानक सेक्युलर हो गए 


आडवाणी जी रातों रात अब से धर्मनिरपेक्ष कहलायेंगे |
बाबरी मस्जिद गिरवाने की तोहमत से बच भी जायेंगे ||


न बदला है न कुछ बदलेगा |
आईना टूटने से बच जाएगा ||
एक प्रश्न--मैं यह कैसे जानूँ कि मैं साम्प्रदायिक हूँ या सेक्युलर |
आकाशवाणी--अरे यह तो बहुत आसान है | बीजेपी के पक्ष में कुछ बोलते हैं तो आप साम्प्रदायिक अन्यथा तो आप धर्मनिरपेक्ष हैं ही |सारा बुद्धिजीवी वर्ग इसी आधार पर खेमों में बटा हुआ है |

Sunday, 9 June 2013

अभिनेत्री जिया के आत्महत्या करने पर
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आत्महत्या कोई हल नहीं
जिंदगी से कोई गल नहीं
तुम्हारा चुनाव गलत था
अपनी गलती की सज़ा
जिंदगी को क्यों दिया "जिया"

 
जिन्हें रोटी नहीं मिली
वे नहीं जानते
कौन है महाबली ?

जिनके पेट हैं भरे
वे ईश्वर के सामने
भीख मांगते हैं खड़े 

Saturday, 8 June 2013

लुटाओ मत खुशियाँ
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मेरे ऊपर
पत्थर उछाल कर
मेरा क़द
क्यों बढ़ाते हो |

मेरे माथे पर
लगी चोट देखकर
तुम क्यों मुस्कराते हो |

मैं चल रहा जिन रास्तों पर
उन रास्तों पर
तुम कांटें क्यों बिछाते हो |

उछालते हो पत्थर
बिछाते हो कांटें
तुम अपनी खुशियाँ
क्यों व्यर्थ ही लुटाते हो |

Friday, 7 June 2013

रक्तजीवी
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उन्हें हमारी जिंदगी से
प्यार नहीं है
फिर भी वे हमें
मारने को तैयार नहीं हैं |


चार रोटियों की
भूख है जिसे
आधी रोटी देकर
ज़िंदा रखना चाहते हैं
वे अपना वोट बैंक
खोना नहीं चाहते हैं |


वे न दूध से जले हैं
न छाछ से जले हैं
फूँक फूँक कर
कदम रखना जानते हैं |

वे रक्तजीवी हैं
हमारे खून का स्वाद
बखूबी पहचानते हैं |
कहाँ हैं तितलियाँ
===========
उनका प्यार
प्यार
मेरा प्यार
बेकार
उनकी गलतियाँ
नादानी
मेरी गलतियाँ
बेईमानी
उनकी झोली में
सैकड़ों तितलियाँ थीं
मेरी झोली
रही खाली |



वह पागल दीवाना
खोज रहा है प्यार
और तितलियाँ
उसे नहीं मालूम
अपनी गलतियाँ |
किसी ने किया प्रश्न 
पाप क्या होता है ?
आकाश से
एक आवाज़ आई
जिसे करने का बार बार मन होता है |
गुम हो गया घर
===========
शहर हो
या हो गाँव
मकानों के बनने का सिलसिला
बदस्तूर जारी है |
अब कहाँ बसते हैं "घर"
धर्मशालाओं में
गुजर जाती है जिंदगी |
एक दूसरे को
बहुत दिन सहा
"घर"
अब घर नहीं रहा |

Tuesday, 4 June 2013

औरत के विरोध में
============
पुरुष ने
औरत को
करवा चौथ
एवं छठ का व्रत रखवाकर
इस तरह फँसाया कि
औरत हो गयी
औरत के खिलाफ और
पुरुष कहता है कि
मैं हूँ औरत के साथ |
पुरुष की गोद में बैठकर
औरतें देती हैं
औरत को गाली |
विधवा सास भी बहू को
करवा चौथ का व्रत
रखने को बाध्य करती है
और बहू की नादानी देखो
वह इसे स्वीकार करती है |
जीवन तो एक सपना है
यहाँ नहीं कोई अपना है
आँख खुलेगी टूटेगा
चैन तुम्हारा लूटेगा
छोड़ो सपनों को 
खेलो खिलौनों से
रोज तोड़ो 

Monday, 3 June 2013

छाया
=======
कैसे करूँ
प्यार छाया को ?
आपकी, हमारी
सबकी छाया
कभी आगे,कभी पीछे
उम्र भर
साथ साथ चलती है
फिर भी न जाने क्यों ? 
प्यार के लिए तरसती है |

प्यार करने का
वक़्त होता है जब
साथ छोड़ देती है
इसीलिए तो
प्यार को तरसती है |
ऐसे बनती है परम्परा
===============
प्यार मुझे नहीं मिला
प्यार
मेरे बेटे को भी नहीं मिला
परम्परा किस तरह
पाँव पसारती है
हमें देखने को मिला |
उन्होंने कहा
प्यार तुमने नहीं किया
प्यार
तुम्हारे बेटे ने भी नहीं किया
तुम दोनों ने ही
परम्परा को
पाँव पसारने का मौक़ा दिया |

Saturday, 1 June 2013

मुस्कराना चाहता हूँ
===============
जीवन भर
जो कहना चाहा
नहीं कह सका
वह सब अनकहा
एक सागर
मेरे भीतर लहराता है
कभी रोता है,कभी गाता है
मुक्त कर देना चाहता हूँ सागर को
कह देना चाहता हूँ सब अनकहा
मरने से पहले
मुस्कराना चाहता हूँ एक बार |
जो भीड़ में शामिल होने से बचता है
अकेले चलने में डरता है
वह कवि है
और कविता ?
एक कायर आदमी का प्रलाप