१९८२ में लिखी एक प्रकाशित कविता | यह वह समय था जब कविता में विद्रोह की बातें ही बातें थी |
नपुंसक विद्रोह
==========
तुम जानते हो
व्यवस्था की सामर्थ्य
इसीलिए व्यवस्था को
नपुंसक कहते हुए
तुम काँप रहे हो |
अभाव से पैदा होनेवाला
विद्रोह नपुंसक है
चंद सिक्कों में बिक जाता है |
जिसे तुम
समुचित विद्रोह कहते हो
वह व्यवस्था के सामने
भिक्षा की मुद्रा में फैला हुआ
एक भिखारी का हाथ है
और तुम्हारा सारा विद्रोह
व्यवस्था का अंग बनने के लिए
एक योजनाबद्ध प्रयास है |
अब बताओ मेरे दोस्त
कविता क्या है ?
नपुंसक विद्रोह
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तुम जानते हो
व्यवस्था की सामर्थ्य
इसीलिए व्यवस्था को
नपुंसक कहते हुए
तुम काँप रहे हो |
अभाव से पैदा होनेवाला
विद्रोह नपुंसक है
चंद सिक्कों में बिक जाता है |
जिसे तुम
समुचित विद्रोह कहते हो
वह व्यवस्था के सामने
भिक्षा की मुद्रा में फैला हुआ
एक भिखारी का हाथ है
और तुम्हारा सारा विद्रोह
व्यवस्था का अंग बनने के लिए
एक योजनाबद्ध प्रयास है |
अब बताओ मेरे दोस्त
कविता क्या है ?
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