बरगद
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तुम जिसे
पिता मानते रहे
वह बरगद
आशीर्वाद की मुद्रा में
तुम्हारे अस्तित्व को
बौना करता रहा
विभाजित करता रहा
आकाश को
तुम्हें सूरज से काटता रहा
बांटता रहा अन्धेरा
अन्धेरा
तुम्हारी नियति नहीं
बरगद की कूटनीति है |
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तुम जिसे
पिता मानते रहे
वह बरगद
आशीर्वाद की मुद्रा में
तुम्हारे अस्तित्व को
बौना करता रहा
विभाजित करता रहा
आकाश को
तुम्हें सूरज से काटता रहा
बांटता रहा अन्धेरा
अन्धेरा
तुम्हारी नियति नहीं
बरगद की कूटनीति है |
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