Tuesday, 30 September 2014

कितना अच्छा होता
अगर बेटियां पिता के गर्भ में पलती
पिता के गर्भ में करवट लेती
तो बच्ची इतनी डरी सहमी नहीं होती  |  

Friday, 26 September 2014

सब खड़े है यहाँ इस मुद्रा में
कि आओ और मुझे बेवकूफ बनाओ
पीठ पीछे गाली देते हो तो क्या
जब मेरे सामने आओ तो पैर छूकर जाओ
उनकी मूर्खताओं पर हँसों मत
उन्हें कालिदास का वंशज बताओ
अगर वह बाबू हैं तो उन्हें कर्मठ कर्मचारी कहो
अगर वह अधिकारी हैं तो उन्हें अनुशासित अधिकारी कहो
अगर कोई कवि है तो उसकी कविताओं में उसे मुक्तिबोध की झलक दिखलाओ
बस किसीको उसकी औकात मत बताओ
सब खड़े है यहाँ इस मुद्रा में
कि आओ और मुझे बेवकूफ बनाओ 

Tuesday, 23 September 2014

हम जब तुमसे
नहीं कह पाएंगे
कहने के लिए
कहीं और जाएंगे
सच तुम सुनना नहीं चाहती
तुम्हारा झूठ
मेरे कानों से टकराकर टपक जाता है
मेरे और तुम्हारे बीच
कोई संवाद हो ही नहीं पाता है
अनुग्रहित हूँ तुम्हारा
इस संवादहीन रिश्ते को निभा दिया
पूरा जीवन मेरे साथ बिता दिया  |
मैंने तुम्हें
तुमने मुझे
विकल्प के तौर पर चुना
इस वैकल्पिक व्यवस्था में
हम ढूंढते रहे
प्रथम प्रेम के रंग
एक साथ एक संग   |

Sunday, 21 September 2014

बाबुषा कोहली की कविता ब्रेकअप पर एक प्रतिक्रिया
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लम्बी कविता को पढ़ने का साहस कभी नहीं कर पाया इसीलिए मुक्तिबोध को भी "अँधेरे में" ही छोड़कर चला आया | 
तुम्हारी ह्त्या करने के बाद 
उसने आत्मह्त्या करने का अपराध भी तो किया था 

हत्यारे को किस अपराध से 
दोषमुक्त किये जाने की प्रार्थना है यह |

सात फिट लम्बे व्यक्ति को हम अमिताभ बच्चन मान लेने का गुनाह तो नहीं कर सकते, मनोज बाजपेई  और रघुबीर यादव जैसे साधारण कद-काठी के व्यक्ति में भी प्रतिभा दिखाई पड़ जाती है | पीठ ऊँची ऊंट की उँचाई से नहीं होती होती ही है होती ही है पीठ ऊँची ऊंट की | लम्बी होने मात्र से ही कोई कविता श्रेष्ठ नहीं हो जाती |
कविता
जब आवश्यकता से अधिक
लम्बी हो जाती है
अँधेरे में भी नहीं पढ़ी जाती है
आलोचकों के लिए
आसान होता है उसका महिमा मंडन
क्योकि एक पाठ में
वह कभी नहीं पढ़ी जाती है
महाकाव्य की तरह
किताबों में क़ैद कर दी जाती है
और पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाती है
कभी-कभी कोई छात्र उस लम्बी कविता को
शोध का विषय बनाता है
और शोध के दौरान ही उस कविता से ऊब जाता है |

ओम भाई, मेरी प्रतिक्रिया बाबुषा कोहली की कविता पर न होकर मुख्यतः लम्बी कविताओं पर की जाने वाली समीक्षाओं के विरोध में है,मुक्तिबोध की कविता अँधेरे में पर लिखने वाला कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो यह कह सके कि उसने उस कविता की एक-एक लाइन पढ़ी है तो बताइयेगा | बाबुषा की कविता निश्चित ही एक अच्छी कविता है | किसी भी ब्रेक-अप में दो पक्ष होते हैं, क्या दूसरा पक्ष इस ब्रेक-अप से प्रभावित नहीं होता ?


Baabusha Kohli Avdhesh Nigam Ji : 'मैं इस मतलबी संसार में उसकी इकलौती वकील हूँ' . आपके सवाल का जवाब आख़िरी खंड में. 

पूरा आख़िरी खंड.




निश्चित ही कविता के आखिरी खंड में आपने उसकी भरपूर वकालत की है लेकिन मुझे लगता है कि यदि कविता " सलीब पर टंगी है उसकी मुक्ति कीलों से बिंधी हुयी
सहते- सहते कब्र में ढह जाएगा मगर खुद के बचाव में कभी मुँह न खोलेगा " यहीं पर ख़त्म हो जाती त
ो वकील दोनों पक्षों के साथ तटस्थ भाव से खड़ा दिखाई पड़ता | लेकिन इसके आगे जब आप यह लिखती हैं कि "उसकी चुप्पी उसके हक़ में सबसे बड़ी दलील है " तब ऐसा ध्वनित होता है " क्योकि वह बहुत बड़ा जलील है "| अंत में फिर एक बार कहना चाहूंगा कि ब्रेक-अप एक अच्छी कविता है और कविता होने के सारे तत्व इसमें मौजूद है | इस कम उम्र में ऐसी कविता लिखने के लिए आपकी प्रशंसा की ही जानी चाहिए


Om Nishchal अवधेश भाई आपने तो इस कविता की अस्‍थिमज्‍जा तक पहुंच चुके है तभी आपने इतने यकीन और हक़ से अपनी बातें कही हैं। आपके सावधान पाठ और सतर्क भाष्‍य की सराहना करता हूं।
उसके चुप रहने में भी
तुम्हें साजिश दिखती है
उसके बोलने को भी
तुम शक की नजर से देखते हो
तुम चाहते हो कि
वह जब बोले तो तुमसे पूछकर बोले
उसका चुप रहना
हमेशा तुम्हारे पक्ष में हो
ताकि तुम उसपर
पक्षपात करने का आरोप लगा सको
और उसे धर्म निरपेक्षता का पाठ पढ़ा सको |

हम हमेशा खुद को मदारी की भूमिका में देखना चाहते हैं जबकि हम जिंदगी भर बन्दर की भूमिका निभाने के लिए अभिशप्त हैं |

हमारी आस्थाएं हमें हिंसक होने की इज़ाज़त नहीं देती | धर्म के प्रति हिंसक कट्टरता को क्या आप आस्था का नाम देंगे ?

चीखने पर भी नहीं सुनते 
बिन कहे जो समझ जाएँ 
ऐसे लोग अब कहाँ ?
जानवरों के सन्दर्भ में यह निर्विवाद रूप में सत्य है कि गधे का बच्चा बड़ा होकर गधा ,घोड़े का बच्चा घोड़ा ही बनेगा लेकिन आदमी का बच्चा बड़ा होने के बाद गधा ,घोड़ा ,खच्चर कुछ भी बन सकता है |
यह आदमखोर रिश्ते 
लील जाते हैं हमारा समूचा अस्तित्व 
रीढ़ की हड्डी के बिना
हम लिए फिरते हैं अपना व्यक्तित्व |
हमारे समाज में स्त्री-पुरुष के बीच हर रिश्ते को नाम देने की परम्परा रही है और स्त्री-पुरुष के बीच जिस रिश्ते को हम नाम नहीं दे पाते हैं उसे अवैध घोषित कर देते हैं | स्त्री-पुरुष के बीच दोस्ती को लेकर हमारी सोच में हमेशा ही एक दोगलापन रहा है | अगर कोई स्त्री हमारी दोस्त है तो उसे हम दोस्ती का नाम देते हैं और अगर कोई स्त्री किसी अन्य की दोस्त हैं तो उनके बीच अवैध सम्बन्धों की चर्चा करने में हम सुख पाते हैं |  

Saturday, 20 September 2014

मंदिर का विचार
इंसान के जेहन में आया
मंदिर में पत्थर इंसान ने ही पहुँचाया
और फिर उस पत्थर को
भगवान भी इंसान ने ही बनाया
उनका तर्क है
मंदिर का विचार इंसान के दिमाग में किसने उपजाया ?

Tuesday, 16 September 2014

पुरुष ने स्त्री से कहा=तुम हर रूप में मुझे सुन्दर लगती हो  |
पुरुष कहे कुछ भी उसे पत्नी का केवल सती-सावित्री रूप ही भाता है, क्या पत्नी स्त्री नहीं होती  ? 
मरी हुई
हमारी अनुभूतियाँ
धूल/ गर्द से ढकी हुई
अनचाहे ही मैली हो जाती हैं
तब वे
हमारा "अनुभव" कहलाती हैं  |
हमारे अहसास
हमारी अनुभूतियाँ
जब धूल/ गर्द से ढक जाती हैं
अनचाहे ही मैली हो जाती हैं
तब वे
हमारा "अनुभव" कहलाती हैं  |

Monday, 15 September 2014

हर प्राकृतिक आपदा के बाद
तुम्हारा तर्क होता है=
मनुष्य क्यों करता है
प्रकृति से छेड़-छाड़  ?
केदार बाबू
हरबार बच जाते हो
तुम लेकर मनुष्य की आड़  |

Sunday, 14 September 2014

मंदिर का विचार
इंसान के जेहन में आया
मंदिर में पत्थर इंसान ने ही पहुँचाया
और फिर उस पत्थर को
भगवान भी इंसान ने ही बनाया
भगवान बनने के बाद पत्थर अकड़ गया |
इंसान ने पैदा किया भगवान को
बेटा जब अपने पैरों पर चलना सीख जाता है
तब अक्सर वह माँ को भूल जाता है |
मंदिर में जो बैठा है
वह पत्थर है भगवान नहीं
धरती का भगवान है इंसान इंसान इंसान  |

Thursday, 11 September 2014

क़ानून से कुछ न होगा
ह्त्या के खिलाफ कानून है
बलात्कार के खिलाफ कानून है
ह्त्या और बलात्कार का सिलसिला बदस्तूर जारी है |
काश ! पल्स पोलियो जैसा ही
धर्म का एंटी डोज तैयार हो पाता
पोलियो की तरह ही धर्म रुपी कोढ़
हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो जाता
धरती पर हरसिंगार के फूलों जैसा
प्यार का बिखरना तब शायद संभव हो पाता |

Thursday, 4 September 2014

इक्कीस रुपये का प्रसाद चढ़ाने से
अगर नौकरी मिल सकती है
देवी माँ के दर्शन करने मात्र से
अगर लड़की पट सकती है
सोमवार का व्रत रखने से
अगर मन चाहा वर मिल जाता है
रियायती दरों पर
जहाँ सामान मिल जाता है
अरे भाई आदमी वहीँ तो जाता है |
आदमी को डरा दिया 
और भूसा इनके दिमाग में 
ठूस ठूस कर भर दिया
भूसे से इनको प्यार है 
और डर ने ईश्वर को 
इनकी मजबूरी बना दिया |

Tuesday, 2 September 2014

जनानी की कहानी
नाम दिया मर्दानी
जनानी को
जनानी ही रहने दो
मर्दानी क्यों बनाते हो
जनानियों के खिलाफ
अपनी साजिशों से क्यों बाज़ नहीं आते हो ?
खूब लड़ी थी वह जनानी
जो झाँसी वाली रानी थी |