Sunday, 21 September 2014

उसके चुप रहने में भी
तुम्हें साजिश दिखती है
उसके बोलने को भी
तुम शक की नजर से देखते हो
तुम चाहते हो कि
वह जब बोले तो तुमसे पूछकर बोले
उसका चुप रहना
हमेशा तुम्हारे पक्ष में हो
ताकि तुम उसपर
पक्षपात करने का आरोप लगा सको
और उसे धर्म निरपेक्षता का पाठ पढ़ा सको |

हम हमेशा खुद को मदारी की भूमिका में देखना चाहते हैं जबकि हम जिंदगी भर बन्दर की भूमिका निभाने के लिए अभिशप्त हैं |

हमारी आस्थाएं हमें हिंसक होने की इज़ाज़त नहीं देती | धर्म के प्रति हिंसक कट्टरता को क्या आप आस्था का नाम देंगे ?

चीखने पर भी नहीं सुनते 
बिन कहे जो समझ जाएँ 
ऐसे लोग अब कहाँ ?

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