Tuesday, 25 September 2012

क्या करूँ ?
रुकूँ या चलूँ |
दोस्तों यह सवाल मेरे जेहन में सुगबुगाता हैं
इस उम्र में भी किसी का ख़याल गुदगुदाता है
कुछ तो बताओ मेरे दोस्त
क्या करूँ ?
रुकूँ या चलूँ |

Friday, 7 September 2012

सपनों में घर
तुमने कहा -
"मैं तुमसे प्यार करती हूँ "
यहाँ तक सब ठीक था
गलत हुआ तुम्हारी बात पर
विश्वास कर लेना ।

तुमने मुझे
"घर " का सपना दिखाया
और मैं
दो अदद बच्चों का
बाप बन गया ।

अब प्यार करने की बात
तुम सपने में भी नहीं करती
और "घर "
सपनों में आकर
मुझे डराता है ।  
मेरी गृहस्थी

तुमने कहा था
आओगे देखने मेरी गृहस्थी
मैं
अपनी गृहस्थी
चुन चुन कर सजाता रहा
एक बर्तन टूटता
दूसरा खरीद लाता
टूटे बर्तनों को मैं
तुमसे छिपाना चाहता था
सजाये रखना चाहता था
अपनी गृहस्थी तुम्हारे आने तक
ताकि तुम्हें उदास देख सकूँ ।



कुमार अवधेश

Wednesday, 5 September 2012

जब  याद आते हैं पुराने मित्र
महक जाता है सब कुछ
जैसे पसर गया हो कमरे में इत्र |
वह लड़ना झगड़ना
रूठना मनाना
सब कुछ कितना सरल था ,
आज इतने बरस बाद
कुछ भी सरल नहीं है मित्र |
कोई भी प्रश्न हो
अब लगता है कठिन ,
नहीं होता अब किसी पर भी यकीन |
जब याद आते हैं पुराने मित्र
महक जाता है सब कुछ
जैसे पसर गया हो कमरे में इत्र |

Tuesday, 4 September 2012

सब कुछ उपलब्ध करा देंगे वे
सिर्फ दो वक्त की रोटी
का ही तो तुम्हे इंतज़ाम करना है |
 कितना भला है राजा
 उसे मालूम है
इक्कीसवीं सदी में जरूरी है
मोबाइल ,क्रिकेट का विश्व कप
ओलंपिक मेडल और एटोमिक बम
तुम्हें सिर्फ दो वक़्त की रोटी
 का ही तो इंतजाम करना है |
तुम फिरभी कोसते हो राजा को
यह तो भाई ठीक बात नहीं है |
आओ हम सब मिलकर
ऐसे राजा की बिदाई के बारे में सोचे |

Monday, 3 September 2012

कभी कभी बेहतर होता है
चुप रह जाना
महसूसा हुआ व्यक्त करने से
बेहतर होता है
चुप रह जाना |
क्योकि तुम बुरी तरह से जख्मी होगे
जब तुम्हे मालूम पड़ेगा कि
जो लोग तुम्हारे सबसे करीब हैं
वे तुम्हे सुन तो सकते हैं
 तुम्हें समझ नहीं सकते |