जब याद आते हैं पुराने मित्र
महक जाता है सब कुछ
जैसे पसर गया हो कमरे में इत्र |
वह लड़ना झगड़ना
रूठना मनाना
सब कुछ कितना सरल था ,
आज इतने बरस बाद
कुछ भी सरल नहीं है मित्र |
कोई भी प्रश्न हो
अब लगता है कठिन ,
नहीं होता अब किसी पर भी यकीन |
जब याद आते हैं पुराने मित्र
महक जाता है सब कुछ
जैसे पसर गया हो कमरे में इत्र |
महक जाता है सब कुछ
जैसे पसर गया हो कमरे में इत्र |
वह लड़ना झगड़ना
रूठना मनाना
सब कुछ कितना सरल था ,
आज इतने बरस बाद
कुछ भी सरल नहीं है मित्र |
कोई भी प्रश्न हो
अब लगता है कठिन ,
नहीं होता अब किसी पर भी यकीन |
जब याद आते हैं पुराने मित्र
महक जाता है सब कुछ
जैसे पसर गया हो कमरे में इत्र |
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