Saturday, 31 August 2013

वह दरिंदा है
लेकिन है अभी बच्चा
होने दो उसे बड़ा
खाने तो मांस कच्चा
औरत और मर्द के फर्क को
वह अभी नहीं जानता है
योनि और लिंग को
पेशाब करने की जगह मानता है |
औरत और आदमी के फर्क को
जब वह जानेगा
तभी तो उसमें
अपराध बोध जागेगा
वह दरिंदा है
लेकिन है अभी बच्चा
आओ प्रतीक्षा करें उसके वयस्क होने की |
(अति- वयस्क ,आसाराम में तो अब तक नहीं जागा अपराध बोध )
अवयस्क भेड़िये को
सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है
वयस्क होने से एक दिन पहले तक
वह जितना चाहे
उतना खून पी सकता है
अभी तो वह बच्चा है
खून और पानी में
भेद नहीं कर सकता है
लेकिन जहाँ तक मुझे ज्ञात है
भेड़िये के वयस्क होने की कोई उम्र नहीं होती 
भेड़िया तो जन्म से ही भेड़िया होता है |

Friday, 30 August 2013

जंगल के पशु,पक्षियों के लिए जो दहाड़ है शेरों के लिए वह उनका सामान्य व्यवहार है | 
उछलिये
जमीन पर आइये
और फिर उछलिये
जमीन कभी मत छोड़िये |
 
हवा में तैरते हैं
जमीन कहाँ दूढ़ते हैं ?
छलांग के लिए
जरूरी है जमीन
मेढक से
हम क्यों नहीं सीखते ?
हमारी,आपकी,सबकी मंजिलें हैं यहीं 
शून्य में छलांग लगाओगे
तो जमीन कहाँ पाओगे ? 

Thursday, 29 August 2013

"मोदी-समर्थक असहिष्णु और भाषा-आचरण में लगभग हिंसक हैं"  हिंदी दैनिक समाचारपत्र  जनसत्ता के सम्पादक की इस बात से कौन सहमत नहीं होगा लेकिन इन तथाकथित मोदी समर्थकों, जो वास्तव में लोगों को मोदी के खिलाफ करने में ही सहयोग कर रहे हैं | ऐसे अल्पबुद्धि तथाकथित मोदी-समर्थक कहीं हमें , भाषा के स्तर पर ही सही, हिंसक तो नहीं बना रहे हैं,यह प्रश्न विचारणीय अवश्य है |
कितना भी मुस्कराओ
जमकर खिलखिलाओ
उदासी छिपती नहीं
आँखों के कोरों से
होठों के पोरों से
झांकती है उदासी छिपती नहीं |
स्याह हुआ चेहरा बोलता है
आँखों में छलक आती है टीस
उदासी छिपती नहीं
कहानी
+++++++
पुरुष
सच कभी नहीं बोलता
एक स्त्री से कहता है प्रेम
और देखता है दूसरी की ओर |
स्त्री हो या पुरुष
दुनियाँ दोनों की अधूरी है
और यह कहानी सच्ची और पूरी है |

Wednesday, 28 August 2013

कुछ गलतफहमियां
+++++++++++++
१)प्यार करना सिर्फ और सिर्फ हम जानते हैं |
२) ईमानदार हम केवल अपने आप को मानते हैं |
३) बच्चों को संस्कार हमने दिए हैं ( यह एक दूसरी बात है कि जो कुछ बच्चों को सिखाया वह सब खुद नहीं किया )
४) हम समय के पाबन्द हैं ( जब भी हम ऑफिस देर से पहुँचते हैं ,हमारे अधीन सभी कर्मचारी उसके बाद ही पहुँचते हैं )
५) सच केवल हम बोलते हैं |
अभी तो वे व्यस्त हैं
भूखों को खाना खिलाने में
अपना सिक्का जमाने में
संसद को सोने दो
रुपये को
आखिरी सांस लेने दो |

उन्हें विश्वास है
वे फिर लौटकर आयेंगे
और तब
रुपये को बचायेंगे  |
सारे धरम एक समान
ऊँची दुकान फीके पकवान
पढ़ने वाला कोई नहीं
सभी यहाँ पर शिक्षक हैं
धरम से नहीं जिनका रिश्ता
वे सभी धरम के रक्षक हैं
न कोई शिक्षक न कोई रक्षक
भेष बदलकर आए भक्षक हैं
बच्चे
भामा और रुक्मणी को नहीं जानते हैं,
वे तो
राधा को ही कृष्ण की पत्नी मानते हैं |

Tuesday, 27 August 2013

जन्माष्टमी पर विशेष
==============
कृष्ण ने भी
पत्नी में प्रेम नहीं पाया
पत्नी के अतिरिक्त
एक प्रेमिका का सिद्दांत
उन्हें भी भाया और
उनके विनम्र अनुरोध पर ही  
राधा का चरित्र गढ़ा गया |

Monday, 26 August 2013

दिव्य पुरुष जब बलात्कार करता हैं तो मानव हित ही उसके लिए सर्वोपरि होता है ,इसीलिए हमारे धर्मग्रंथों में दिव्य पुरुषों के लिए बलात्कार की कोई सजा निर्धारित नहीं की गयी है |देवराज इंद्र को क्या कभी बलात्कार के लिए सजा दी गयी ,मात्र कुछ दिनों के लिए इन्द्रासन से बेदखल होना क्या उचित सजा थी | और बेक़सूर अहिल्या ???????
किसी का गुजरात है
किसी का बंगाल है
देश की खबर लेता हैं कौन
देश हो गया कंगाल है

Sunday, 18 August 2013

सांप आस्तीन में रहते हैं
यह सुनने के बाद
वे हाफ शर्ट पहनने लगे
और खुद
दूसरे की आस्तीन में छिप गए |
सेवानिवृति के बाद
पत्नी जी बोलीं-
मैं दिन और रात
तुम्हारी सेवा में लगी रहती हूँ
मैंने उन्हें टोका-
श्रीमती जी रुकिए
ज़रा मेरी भी सुनिए
दिन की बात तो ठीक है
रात की सेवा तो
न जाने कब से निरस्त है | 
पति और पत्नी
एक ही बिस्तर पर सोते हैं
सुबह उठकर नहाने जाते हैं
तो बाथरूम का दरवाजा
बंद करना कभी नहीं भूलते
यह शर्म है या मन का भरम |

Saturday, 17 August 2013

नैतिकता सुरक्षित है

नैतिकता सुरक्षित है
==============
कितने बरस हुए
खुद को गाली दिए हुए ?
हम सब खुद को
आदर्श स्त्री/पुरुष मानते हैं
नैतिकता को बैंक के लाकर में
सहेजकर रखते हैं
और कुछ ख़ास मौकों पर
उसे धारण करते हैं |
मूल्यवान वस्तुओं को
सुरक्षित रखना कोई पाप तो नहीं
गहनों को रात-दिन
हर समय पहने रहने में
कोई लाभ भी तो नहीं |
जब होता है जरूरी
लाकर से नैतिकता को निकालते हैं
और पूरे परिवार को ऊपर से नीचे तक
गहनों से लाद देते हैं |
हाँ, हमें याद नहीं 
कितने बरस हुए
खुद को गाली दिए हुए ?
 
लडूंगा ,लडूंगा
अपने हक़ के लिए लडूंगा
कहता रहा
लड़ा नहीं कभी |
अपनी पत्नी
अपने बच्चों में मस्त रहा
जो लड़ रहे थे
उनके साथ खड़ा भी नहीं हुआ |
बढ़ती हुई उम्र में अपराध बोध जागा
जब लड़ना था
लड़ा नहीं वह अभागा

Friday, 16 August 2013

हमारे आपके बीच से ही आते हैं/ और कालान्तर में वे नेता कहाते हैं / वे आईना हैं/ हमारा ही अक्स उनमें दिखता है/ उन्हें गाली देने से कुछ नहीं होगा / सबकुछ सुधर जाएगा जब हम/ खुद को गाली देना सीख जायेंगे/ ज़रा सोचिये कितने बरस हुए खुद को गाली दिए हुए ?
कहते हैं कि जो कविता लोगों को समझ में न आये और समीक्षक उसमें नए नए अर्थ खोज पाएं वही कविता महान होती है वैसी ही एक रचना जो मुझे भी समझ में नहीं आई,आपके लिए प्रस्तुत  | कविता के समीक्षकों से प्रार्थना कि आईये ,गोता लगाइये और समुद्र से कुछ मोती मेरे लिए भी चुन लाईये 

समुद्र की विशाल छाती पर
पहाड़ का एक टुकड़ा
सुना रहा था अपना दुखड़ा
पानी को फुरसत नहीं हैं
दौड़ना है उसे
लहरों के साथ
किनारों को छूना और लौट आना
लहरों का अस्तित्व
ख़त्म होने तक
उनके साथ रहना और दौड़ना |
समुद्र क्या है ?
पानी ,लहरें ,गहराई
मछलियां ,रत्नों का भण्डार और तरूणाई
छाती पर पहाड़ का एक टुकड़ा
समुद्र को सुना भी सकेगा अपना दुखड़ा |  
वे जेल भी
सोची समझी स्कीम
के अंतर्गत जाते हैं
और जेल में बैठकर
हर दिन त्यौहार मनाते है |
संसद में जो क़ानून बनता है
वह जन के पक्ष में नहीं
जनप्रतिनिधियों के लिए
खुशहाली लाता है |
मिड डे मील आया
उनके भरे खजाने और 
बच्चों के लिए मौत लाया |
राजनैतिक दलों को
आरटीआई के अंतर्गत लाया गया
संसद द्वारा इन दलों को
आरटीआई के चंगुल से छुड़ाया गया
उनका मानना है कि
जनप्रतिनिधि खुश रहेंगे
तो देश में खुशहाली आएगी
इसीलिए तो सर्वप्रथम
जनप्रतिनिधियों का ही वेतन बढ़ाया गया | 
सर्वोच्च न्यायालय
जब भी दहाड़ता है
संसद में मचता है शोर
करो इसे खामोश
करो इसे खामोश
और फिर बनता है
एक नया कानून
आमजन की ख्वाइशों के खिलाफ |
कलम के सिपाही अब कहाँ ?
लैपटॉप पर
रोमन में लिखते हैं
दबाते हैं स्पेस बार
और सब
हिंदी हो जाता
वैज्ञानिकों से अनुरोध है कि
कीबोर्ड पर
कोई ऐसा बटन बनाएं
जिसके दबाने से
हमारे और उनके बीच
एक पुल बन जाए    | 

जनप्रतिनिधि

जनप्रतिनिधि
+++++++++
ये सब के सब
जेल जायेंगे
जेल से लड़ेंगे चुनाव
जीत कर बाहर आयेंगे
और फिर पांच बरस तक
चैन की बंसी बजायेंगे |

Thursday, 15 August 2013

मैं हिन्दुस्तानी हूँ
मुझे "शीघ्रपतन" की बीमारी है
चरम पर पहुँचने से पहले ही
स्खलित हो जाता हूँ
इसीलिए मैं लम्बी कविता
नहीं लिख पाता हूँ |

पलटकर देखो

पलटकर देखो
===========
एक बुजुर्ग
मेरे कंधे पर हाथ रखकर 
बहुत प्यार से बोले
तुम्हारा बेटा
बिलकुल तुम जैसा दिखता है
शक्ल और सूरत में ही नहीं
सोच में भी
और जो बिछाए थे तुमने रास्ते
उन्ही पर
बिलकुल तुम जैसा ही चलता है
पहली बार मैंने बेटे को
बहुत ध्यान से देखा
और शर्म से गड़ गया यह सोचकर कि
बेटे की उम्र में जब मैं था
तो कितना बेहूदा दिखता था |
और किस तरह फूलों को
रौंद कर चलता था            

Wednesday, 14 August 2013

अपने हाथों
और पैरों की जंजीर खोलकर 
वे सब देश का
निर्माण करने में व्यस्त हो गए
इस व्यस्तता में 
देशवासियों को आज़ाद करना भूल गए
सपनें नहीं हुए पूरे
बूढी हो गयी आज़ादी
हर रोज आँखों में वे
एक नया सपना ठूस देते हैं
चन्द क़दमों पर दिख रही थी जो
उस आज़ादी को हमसे
कोसों दूर कर देते हैं |
 
प्याज के दाम और
बैंक ऋण पर ब्याज
इनका क्या भरोसा
कभी बढ़ते हैं,कभी घटते हैं |
देश की अर्थव्यवस्था को
पटरी पर लाने के लिए
सरकार को कभी कभी
कठोर कदम उठाने पड़ते हैं
आप व्यर्थ ही चिल्लाते हैं ?  
हिटलर ने अंग्रेजों की कमर तोड़ी
मजबूरी में उन्होनें सत्ता छोड़ी
कोई कीमत हमने अदा नहीं की
खैरात में मिली हमको आज़ादी
देखिये अब
आज़ाद देश की बर्बादी
फिर भी आज़ादी का जश्न हम मनाएंगे
आइये हम सब एक साथ मुस्कराएँ
स्वतन्त्रता दिवस पर शुभकामनाएँ

Monday, 12 August 2013

वे दोनों ( मम्मी-डैडी )
एक दूसरे से करते नहीं प्यार
लेकिन बच्चों को
"प्रेम "सिखाते हैं
बच्चों को सच बोलने की शिक्षा देते हैं
और अपने सच छिपाते हैं
वे कभी भी ,कहीं भी
समय पर नहीं पहुचे
बच्चों को समय की पाबंदी का पाठ पढ़ाते हैं |
पहले कहलाती थी जो चोरी
अब वह  है सीनाजोरी
लेकिन बच्चों को तो आज भी हम
ईमानदारी ही सिखलाते हैं |
बच्चों को कुछ भी
सिखलाने की जरूरत नहीं
बच्चे आपकी नक़ल उतारते हैं
बच्चे सब कुछ माँ के गर्भ से ही सीखकर आते हैं |
नागपंचमी पर विशेष
++++++++++++++
वे जैसा चाहते थे
वैसा हो गया
उनकी टोपी में
एक और मोर पंख लग गया |
सांप को
बुरी नज़र से बचाने के लिए
टोपी में मोर पंख लगाने का
सिलसिला शुरू हुआ
अभी अभी जो आदमी यहाँ खड़ा था
चला गया केचुल छोड़कर
सांप ठगा सा देखता रह गया |
बुढ़ापा आये
और सांस रुक जाए
इतनी भी उम्र न मिले कि
अपने भी सोचने लगें कि
अब यह जाए |

Friday, 9 August 2013

धर्म

धर्म
+++++++
आप ख़ुशी ख़ुशी
ज़हर खा रहे हैं
और जो लोग
आपको ज़हर खिला रहें हैं
आप उनपर
चढ़ावा भी चढ़ा रहें हैं
उसी ज़हर को प्रसाद कहकर
अपने बच्चों को भी खिला रहें हैं |

Wednesday, 7 August 2013

तुम सोचते हो

तुम सोचते हो
तुम सही हो
वह सोचता है कि
वह सही है
अगर दोनों सही हो
तो रेल की पटरियों जैसा
जीवन जीना होगा
साथ तो रहना होगा फिर भी |
सोचो
फिर फिर सोचो
पटरियां अगर
अलग अलग दिशायें पकड़ लें
और भूल जाएँ कि
रेल गुजरती है
तो रेल का क्या होगा ?
किसी दुर्घटना से
आशियाने को बचाना है |
 

Monday, 5 August 2013

भरे पेट का
स्वांग है प्रेम 
पेट भरता है
वह नया स्वांग रचता है |
उल्टियां होंगी
हम तो मर जायेंगे
और वे,उनका क्या 
वे तो अजगर को भी
निगल जायेंगे
सोचता हूँ
मेरी शव यात्रा में
क्या कंधें मिलेंगे चार ?
इतनी कोशिशें की
जुबान को लपेटे चाशनी में
ऊपर और ऊपर चढ़ते रहे
इतना लिखा
इतना पढ़ा
खूब छपे
क्या सब हो जाएगा बेकार ?

अलग दिखने की ख्वाइश में

अलग दिखने की ख्वाइश में
+++++++++++++++++++
हाथों और पैरों में
जंजीरें पड़ी हों
कैदी सा जीवन हो 
यह जीवन भी कोई जीवन है ? 
बंदिशें उन्हें बाध्य करती हैं
और वे बागी हो जातें हैं 
बंदिशें न हो पिंजरा खुला हो 
तो आकाश में उड़ने का सलीका
उन्हें खुद- ब- खुद आ जाएगा |
पशुओं से अलग दिखने के चक्कर में
हम उनसे बत्तर नहीं हो गयें हैं ?
गेहूँ के साथ
घुन पिस जाता है
अब इस कहावत को
बच्चे नहीं जानते
क्योकि अब
घर में आटा आता है |
चवन्नी के बराबर
रुपया हो गया
मूल्य में ही नहीं
आकार में भी
ठगे से.....
++++++++
ठगे से खड़े पेड़
निहारते हैं औरत को
जिसका चेहरा
इनके चेहरों से
मिलता हरा भरा
फल देते हैं
छाया देते हैं
वातावरण की सारी गन्दगी
खुद पी लेते हैं नीलकंठ
पेड़ हो या हो औरत
सबसे पहले
इन्हें ही काटा जाता है
कहते हैं कि
पहाड़ पर चढ़ने
और जंगल में घुसने के लिए
रास्ता बनाया जा रहा है |

शिव कुमार मिश्र की मौत पर

शिव कुमार मिश्र की मौत पर
+++++++++++++++++++
हिंदी , कैसी हिंदी
कहते हो भारत माँ की बिंदी
वे बिदा हो गए
उनकी शव यात्रा में
शामिल थे केवल १०, १५ लोग
शिव कुमार मिश्र रचनाकार थे  
कौन करता
उनकी शवयात्रा को प्रायोजित
मीडिया ने भी नहीं ली सुध
भाई अगर दूरदर्शन पर
यह खबर आ भी जाती
तो लोग करते कानाफूसी कि
यह शिव कुमार मिश्र हैं कौन ?
इस देश में रचनाकारों की
यही है कहानी
हम हिन्दुस्तानी ,हम हिन्दुस्तानी |   

Sunday, 4 August 2013

गुजरा हुआ वक्त हूँ
किसी भी दौड़ में
शामिल नहीं भयमुक्त हूँ
जैसे ही किसी दौड़ में
शामिल होते है आप
डर बना लेता है घर
आपको दीमक की तरह चाटता है 

चलो उस पार चलें

आज तो
सिर्फ औपचारिकताएं ही
औपचारिकताएं शेष हैं |
प्रेम और मित्रता
कहीं शून्य में
खोजती हैं अपना ठिकाना |
जब जब कहा 
चलो उस पार चलें
मुहं सिकोड़ कर
उसने कहा -
मुझे उस पार कतई नहीं जाना |
धर्म के नाम पर दुनियाँ भर में सिर्फ खून खराबे के सिवा और कुछ नहीं हुआ है और अब धर्म के नाम पर देश में हो रहा है धंधा ,शायद आपको भी दिखता होगा | धर्म ने कभी भी प्रकाश फैलाने का काम नहीं किया बल्कि अन्धेरे को और गहरा किया हैं | मंदिर और धर्म गुरुओं के शरण में जाकर अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति की आकांक्षा करना हमें ढोंगी बनाता है और हम समझतें हैं कि हम धार्मिक हैं |  

Saturday, 3 August 2013

रहने को काफी है कुटिया
आँखों में महलों के स्वप्न
क्यों, कैसे बस जाते हैं  |
आप बोतें हैं
एक छोटा सा बीज
बड़े बड़े पेड़ उग आते हैं |

अपने हो गए सपने

अपने हो गए सपने
+++++++++++++
अगर चले गए छोड़कर 
तो बेहतर होगा
लौटकर न आयें
सपने और अपने
हो सकता है
हम उन्हें लगें हो दुखने |
नदी तुम्हारी आँखों में
अपना घर बसा ले
होंठों पर तुम्हारे
खेलती रहे मुस्कान
जिन्हें हम लगे थे दुखने
वे अब अपने नहीं, हैं अनजान  |

Friday, 2 August 2013

साँप खून पीता है

साँप खून पीता है
+++++++++++
कोई याद करता है
तो अब हिचकियाँ नहीं आती |
सपेरे साँप लेकर
अब घर के दरवाजे पर नहीं आते
साँप को दूध पिलाया था कब
मुझे याद नहीं है अब
साँप बड़े बड़े महलों में रहने लगा है
दूध की जगह
अब वह खून पीने लगा है
सपेरे साँप के महलों में
दरबानी कर रहे हैं
साँप बीन बजाता है
और अब सपेरा साँप से डरता है |    
मुंडेर पर बोलता है कागा
तो अब आते नहीं मेहमान |
पशु,पक्षी और आदमी
सब के सब हो गए बेईमान |

क्यों आते हैं भूकंप ?

क्यों आते हैं भूकंप ?
++++++++++++
गुब्बारे की तरह
फूलना मुश्किल नहीं
मुश्किल है-
गुब्बारे की तरह हल्का हो जाना
हम जब फूलते हैं
कितने भारी हो जाते हैं |
हमारे बोझ से
कांपती है धरती
बिन बुलाए
चले आते हैं भूकंप |

Thursday, 1 August 2013

मित्रों जिंदगी में अनगिनत बार "सर" सुना है और न जाने कितनी बार "सर" कहा है कि अब  इस शब्द से दुर्गन्ध आती है | सेवानिवृति के पश्चात अब यह संबोधन मुझे आहत करता है इसलिए मेरा अनुरोध है कि मुझे दोस्त या मित्र कहकर संबोधित करें या "सर" के अतिरिक्त आप जो चाहें | मैं आशा कर सकता हूँ न कि मेरा अनुरोध मेरे मित्र मानेंगे ?
चढ़ाओ मत उढ़ाओ चादर
++++++++++++++++
मंदिर मस्जिद
और सूफियों की मजार पर
जो चादर
हम चढ़ाते हैं
वे फिर से बिकने के लिए
उसी दुकानपर चले आते हैं |
जितनी बार
वह चादर बिकती है
जिंदगी में
उससे कहीं ज्यादा बार
हम बिकते हैं |
मंदिर ,मस्जिद और मजारों पर
चादर चढ़ाने का यह सिलसिला
नहीं रूकेगा
और आदमी
मंदिर ,मस्जिद और मजारों के बाहर
भूख और ठण्ड से मरता रहेगा