अपने हाथों
और पैरों की जंजीर खोलकर
वे सब देश का
निर्माण करने में व्यस्त हो गए
इस व्यस्तता में
देशवासियों को आज़ाद करना भूल गए
सपनें नहीं हुए पूरे
बूढी हो गयी आज़ादी
हर रोज आँखों में वे
एक नया सपना ठूस देते हैं
चन्द क़दमों पर दिख रही थी जो
उस आज़ादी को हमसे
कोसों दूर कर देते हैं |
और पैरों की जंजीर खोलकर
वे सब देश का
निर्माण करने में व्यस्त हो गए
इस व्यस्तता में
देशवासियों को आज़ाद करना भूल गए
सपनें नहीं हुए पूरे
बूढी हो गयी आज़ादी
हर रोज आँखों में वे
एक नया सपना ठूस देते हैं
चन्द क़दमों पर दिख रही थी जो
उस आज़ादी को हमसे
कोसों दूर कर देते हैं |
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