Wednesday, 14 August 2013

अपने हाथों
और पैरों की जंजीर खोलकर 
वे सब देश का
निर्माण करने में व्यस्त हो गए
इस व्यस्तता में 
देशवासियों को आज़ाद करना भूल गए
सपनें नहीं हुए पूरे
बूढी हो गयी आज़ादी
हर रोज आँखों में वे
एक नया सपना ठूस देते हैं
चन्द क़दमों पर दिख रही थी जो
उस आज़ादी को हमसे
कोसों दूर कर देते हैं |
 

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