आज तो
सिर्फ औपचारिकताएं ही
औपचारिकताएं शेष हैं |
प्रेम और मित्रता
कहीं शून्य में
खोजती हैं अपना ठिकाना |
जब जब कहा
चलो उस पार चलें
मुहं सिकोड़ कर
उसने कहा -
मुझे उस पार कतई नहीं जाना |
सिर्फ औपचारिकताएं ही
औपचारिकताएं शेष हैं |
प्रेम और मित्रता
कहीं शून्य में
खोजती हैं अपना ठिकाना |
जब जब कहा
चलो उस पार चलें
मुहं सिकोड़ कर
उसने कहा -
मुझे उस पार कतई नहीं जाना |
No comments:
Post a Comment