Friday, 29 November 2013

पहली बार प्यार
तृप्ति है
पुनरावृति से नहीं होती
इच्छापूर्ति
हर बार नया हो कैसे प्यार ?

Wednesday, 27 November 2013

कभी खेलता था खिलौनों से 
फिर बना खिलौना 
खेलते रहे लोग
तोड़ते रहे 
काश,
हमारे निभाने से निभ जाते रिश्ते
अक्सर
रिश्तों के टूटनें के साथ ही हम टूट जाते हैं
फिर भी रिश्तों को बचा पाना हमारे बस में नहीं होता
उतना आसान भी नहीं है
रिश्तों को निभाना और उन्हें टूटनें से बचाना , है क्या ?
हमारी कोशिश होनी चाहिए कि कविता बची रहे  |

Monday, 25 November 2013

प्रेम,
एक झूठ
जब जिसको होता है
उसको सच जैसा लगता है
सच बदलता है,
हर क्षण बदलता है सच
जो सच तुम्हें अंधा बना दे
वह झूठ के ज्यादा निकट होता है |

Sunday, 24 November 2013

आत्महत्या करने से कोई किसी को रोक नहीं सकता | कामयाब होने पर कोई गुनाह नहीं बनता आत्महत्या के आरोप से बरी कर दिया जाता है,नाकामयाब होनेपर ही सजा का प्रावधान है | 
कुछ नहीं बदला 
न मैं, न तुम 
हाँ का मतलब तो हाँ होता ही है
न का मतलब भी हाँ होता है 
औरत के सन्दर्भ में 
इस सीख को उसनें अंतिम मान लिया 
तो क्या गुनाह किया ?
स्त्री के लिए कुछ बदला हो शायद 
पुरुष के लिए तो कुछ नहीं बदला |

Saturday, 23 November 2013

भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
भीड़ चलती है भेड़ चाल
दंगा हो या हो बलात्कार
भरपूर लुफ्त उठाती है
सस्ते मनोरंजन की खोज में
यहाँ से वहाँ
वहाँ से यहाँ  भटकती है
भीड़ लक्षहीन होती है  |
दुनियाँ की जितनी जनसंख्या है
उतनी ही संख्या है सपनों की
सबके पास उनका अपना एक सपना है
उन सबके सपनों की अपनी एक कहानी है
दुनियाँ का सारा साहित्य
शब्दों से गढ़ी गई इमारत है
जिसमें दफ्न है उनके सपनों की कहानी |
कुछ लोग
आज भी व्यस्त हैं उनके सपनों को जानने में
और कुछ उनके सपनों को चुराने की कोशिश में  |
दंगो की आड़ में बलात्कार,
ऒफ़ यह सब कितना वीभत्स है
यह सब उसी समाज में हो रहा है
जिस समाज के
हम सब सम्मानित सदस्य कहलाते नहीं अघाते
लानत है ऐसे साहित्य और साहित्यकारों को
जो समाज को चित्रित करने के दम्भ से भरे हैं
और आज भी सिर के बल खड़े हैं |  
सच बदलता है,
हर क्षण बदलता है सच
जो सच तुम्हें अंधा बना दे
वह झूट के ज्यादा निकट होता है |
तुम्हारे हर झूट पर भरोसा किया
और मेरा हर सच तुम्हें झूट लगा

Tuesday, 19 November 2013

विचारधारा
देशी या विदेशी नहीं होती
बादलों पर किसी का बस नहीं होता ,
पूरा आकाश उनका है
और पूरी धरती उनकी है  ,
जहाँ चाहें बरसे ,जहाँ चाहें दें छाया ,
परकाया में प्रवेश का हुनर उनके पास है
धरती और आकाश के बीच
पक्षियों की उड़ान पर अंकुश ?
पक्षी नहीं उड़ते आकाश में निर्धारित पथ पर |
जो दलित
अरबपति हो जाता है
आसमान पर चढ़ जाता है
वह अपने आप को
दलित कहाँ मानता है ?
दलितों को वह
सवर्णों की तरह ही दुत्कारता है |

Monday, 18 November 2013

सस्ते में बिकता था
आंसुओं में भी इसका स्वाद
मुफ्त में मिलता था
पितर विसर्जन के लिए
जबसे "गया" गया  
नमक भी बेख़ौफ़ हो गया  |
वह हर रोज
सुबह सुबह आती है
बारात के साथ
रसोईं में घुस जाती है
और जूठे बरतनों में तलाशती है भोजन
जो रात में
खाया नहीं गया उन पुण्यात्माओं द्वारा
गाय को
जूठन खिलाकर पुण्य कमाने की अभिलाषा
और गाय को माता कहकर
दान कर देने का अहंकार
कन्यादान करने के अहंकार से कमतर नहीं है
हर रोज
जो सुबह सुबह आती है रसोईं में
उसके लिए किसी भी रसोईं में भोजन नहीं है    
तुम्हारे
बहुत करीब है
इसीलिए तुम्हें नहीं दिखती
जो ढूँढता है
"कविता" उसे नहीं मिलती 

Sunday, 17 November 2013

घना अँधियारा देखकर
नन्हें दीप की
जलने की इच्छा जागी
अन्धेरा
नन्हे दीप का दुश्मन हो गया
और सूरज
अँधेरे के साथ  हो गया   |

Saturday, 16 November 2013

जब यह सुनिश्चित हो जाता है कि किसी व्यक्ति विशेष की पहचान करने से हमारी पहचान भी बनती है तभी बहुत से लोग उस व्यक्ति विशेष की पहचान करने के लिए आगे आते हैं  | मुक्तिबोध के समकालीनों ने उनकी पहचान करने में कोताही की, आखिर क्यों ? 
मुझे अभी अभी लगा कि
मैं सोता ही रहा
कभी जगा ही नहीं |
उनको पाने के बाद भी
मैं रोता ही रहा
कभी हँसा ही नहीं  |
कौन कह सकता है कि
वह किसी जाल में कभी फंसा ही नहीं ?
जागना-सोना,पाना-खोना
और रोना-हंसना
यही तो जिंदगी है  |
जाल में फंस तो गए हैं
बस अब मुक्त होना है  |
न तो कोई विचार है 
और न मान्यताएं
केवल सन्नाटा है | 
सन्नाटा जब चीखता है 
दहलाता है , 
भीड़ में 
वह डर जाता है
इसीलिए 
न वह किसी के पास जाता है 
और न कोई उसके पास आता है |
वह पथराया सा खड़ा है 
खाली घड़ा है |

Thursday, 14 November 2013

उसने जब कहा था प्यार
उसे नहीं मालूम था कि
वह झूठ बोल रही है  |
उसने जब कहा था प्यार
उसे मालूम था कि
वह झूठ बोल रहा है  |
अनजाने में बोले गए झूठ को
क्या सच माना जा सकता है ?
वह इस झूठ की सजा पाती है
और वह
अपने झूठ पर इतराता है, मुस्कराता है 
उसने जब कहा था प्यार
उसे नहीं मालूम था कि
वह झूठ बोल रही है  |
उसने जब कहा था प्यार
उसे मालूम था कि
वह झूठ बोल रहा है  |
अनजाने में बोले गए झूठ को
क्या, सच माना जा सकता है ?
वह इस झूठ की सजा पाती है
और वह
अपने झूठ पर इतराता है, मुस्कराता है 
1. भारत में ही सर्वप्रथम वर्णव्यवस्था की  शरुआत हुई , जिसने भारत को दो हजार वर्षों तक गुलाम बनाने में मुख्य भूमिका निभायी.
2. भारत में ही सर्वप्रथम सतीप्रथा की  शरुआत हुई, जिसमे विधवा औरतों को जिन्दा जला दिया जाता था. इस प्रथा को ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार ने 1841 में कानून बनाकर बंद किया था.
3. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर छुआछूत की शरुआत हुई, जिसके द्वारा लाखों लोगों को अछूत बनाकर सभ्यता के प्रकाश से दूर रखा गया. 
4. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर गाय, बैलों और घोड़ों की बलि देने की प्रथा का आरम्भ हुआ. 
5. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर नरबलि की प्रथा का आरम्भ किया गया.
6. भारत में ही सर्वप्रथम दासप्रथा का भी आरम्भ हुआ.
7. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर निष्ठुर प्रथा गंगा-प्रवाह का आरम्भ हुआ था, जिसमे मनौती पूरी होने पर लोग अपनी पहली संतान को गंगा-सागर में छोड़ देते थे. इस क्रूर प्रथा को कम्पनी सरकार ने 1835 में कानून बनाकर बंद किया था.
8. भारत में ही सर्वप्रथम धर्म के नाम पर चरक-पूजा का आरम्भ हुआ था, जिसमे मोक्ष के इच्छुक उपासक के मेरुदंड में दो लोहे के हुक धंसाकर उसे रस्सी के द्वारा चरखी के एक छोर से लटका देते थे और दूसरे छोर से उसे तब तक नचाते थे, जब तक उसके प्राण नहीं निकल जाते थे. इस प्रथा को ब्रिटिश सरकार ने 1863 में कानून द्वारा बंद किया था. 
9. भारत में ही सर्वप्रथम कर्मफल आधारित पुनर्जन्म के सिद्धांत का आरम्भ हुआ, जिसने गरीबों के शोषण का क्रूर तन्त्र विकसित किया. 
10. भारत में ही सर्वप्रथम सनातन धर्म के नाम पर एक ऐसे धर्म का आरम्भ हुआ, जिसमे समानता के लिए कोई जगह नहीं है.


उपरोक्त परिप्रेक्ष में क्या हम अपनी विरासत पर गर्व कर सकते हैं  ?

Wednesday, 13 November 2013

कौवों की कांव कांव में
मुश्किल हो जाता है, कोयल को सुनना
रंग-भेद ,जाति-भेद और धर्म-भेद का आधार
रंग और पैदाइश क्यों बना ?
कौवों नें जाल कुछ इस तरह बुना कि
सुरीली और नशीली आवाजें हो गयीं धुवाँ
बहुत मुश्किल है
कौवों की इस भीड़ में कोयल को ढूढ़ना  

Monday, 11 November 2013

आस्तिकता और नास्तिकता पर होने वाली तमाम बहसों को सुनने और पढ़ने पर ऐसा क्यों लगता है कि हम एक घेरे में गोल गोल घूम रहे हैं ,जहाँ से चलते हैं फिर घूम कर वहीँ वापस आ जाते हैं |जब बच्चे के पैदा होते ही उसके धर्म का निर्धारण हो जाता है अब इसमें बच्चे का क्या दोष ? क्या इस व्यवस्था से निजात सम्भव है ? ढेरों मूर्खता पूर्ण विधियों द्वारा इन बच्चों को हम हिन्दू ,मुसलमान औए ईसाई बनाते हैं | काश, इन बच्चों को चुनने की आजादी होती और धर्म के नाम पर इंसानियत के अलावा कोई और  विकल्प नहीं होता |

Sunday, 10 November 2013

सिर से पाँव तक
वे नंगे थे
लेकिन उनका नंगापन हमें दिखा नहीं
क्योकि हम उनके साथ
हम्माम में खड़े थे |
एक ही घर में
अनजानों की तरह रहने से बेहतर है
अलग-अलग मकानों में
परिचितों की तरह रहा जाए
रिश्तों में खुशबू खोना
एक दूसरे से अपरिचित होना
दुर्गन्ध फैलने से पहले
शव को शमशान पहुँचाना
एक सामाजिक जिम्मेदारी है
आईये शव-यात्रा में
खुशी-ख़ुशी शामिल हो जाईये   ।  

Saturday, 9 November 2013

अगर ईमानदारी से देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन एक दूसरे को अपराधी घोषित करने में ही व्यतीत हो जाता है | अपनी समस्त विफलताओं के लिए हम किसी न किसी को दोषी करार देते हैं | तुम्हारे चुप होने के बाद भी तुम्हारी आहट को सुन पाने का नाटक तब तक करती/ करता  रही/रहा  जब तक मेरे ह्रदय की धड़कनों में कोई दूसरा आकर नहीं बसा  | अनंतकाल से नाटक जारी है, आदमी की फितरत कभी नहीं हारी है |
मेरे अलिखित उपन्यास से    

Friday, 8 November 2013

औरत बच्चे को जनती  है
 और बच्चे के साथ ही
जन्म लेती है "माँ"
पिता जन्म नहीं लेता है
पिता बनना होता है
और पुरुष को
पिता बनने में वक्त लगता है |
मौत
अपना पता कहाँ देती है
आती है और आपको
आपके सपनों से
घसीट कर ले जाती है
मौत
आपको मोहलत  कहाँ देती है  ?

Wednesday, 6 November 2013

जिसके आने की
कोई उम्मीद ही न हो
उसका आना
अच्छा लगता है |
जिसे भूल गए थे
यह मानकर कि
वह हमें भूल गया है
हिचकियों के साथ उसकी याद आना
और फिर हिचकियों का बंद हो जाना
अच्छा लगता है | 
मेरे झूट पर यकीन करना
तुम्हारी मजबूरी थी
तुम्हारे झूट पर यकीन करना मेरी |
ख़ुशफहमियाँ जिंदगी को
आसान और सरल बना देती हैं
पहले क्यों नहीं था इसपर यकीन ? 

Monday, 4 November 2013

लड़का
जब प्यार करता है
तो वह केवल पुरुष होता है
लड़की जब प्यार करती है
तो वह होती है केवल स्त्री |
इसी स्त्री से
जन्मती है एक माँ

प्यार 
न पहले था 
न आज है 
हाँ ,
बहुत दिनों से 
तुम लड़ी नहीं   

Sunday, 3 November 2013

देखकर  
डरी सहमीं तितलियाँ
थम गयीं
आँखों की पुतलियाँ  
अल्फाजों से
जख्म बनते हैं
और नज्मों से हम
उन जख्मों पर मरहम लगाते हैं
सच पूछिए तो हम
न कुछ खोते हैं
और ना कुछ पाते हैं |
खोखले और दोगले
लोगों से भरी है
फिर भी
दुनियाँ रसभरी है |

उनका उद्योग
केवल विरोध
समर्थन किसका करते हैं
वे खुद भी नहीं जानते  ?
विकल्प की बात करो
तो बगलें झांकने लगते हैं  |
हालाकि वो अंजाना है 
लेकिन मुझे 
उसे पाना है 
एक अच्छी बात यह है कि
जितना पुराना मैं हूँ 
वह भी उतनी ही पुरानी है 
मेरी और उसकी पहचान 
बरसों बरस  पुरानी है |
विकल्प के नाम पर
राहुल का नाम
लेने से भी वे डरते  हैं  |
विकल्प कहाँ से लाएंगे
क्या विदेश से
आयात करके लायेंगे  
गरम गरम तवे पर
मेरे पैर पड़ गए
क्या गुनाह था हाथों का
क्यों हाथ जल गए ? 
सूरज शर्म से लाल हो गया
एक प्रश्न =
सूरज किस बात पर
शरमा गया
और क्यों लाल हो गया ?
सूरज जब लाल हुआ
अँधेरा कुछ और गहरा
और घना हुआ  | 

Saturday, 2 November 2013

शुभकामनाएँ फलित होती हैं
अगर इस बात का भरोसा होता
तो व्यक्ति
आईने के सामने खड़ा होकर
सारी शुभकामनाएँ खुद को ही दे देता  |