दंगो की आड़ में बलात्कार,
ऒफ़ यह सब कितना वीभत्स है
यह सब उसी समाज में हो रहा है
जिस समाज के
हम सब सम्मानित सदस्य कहलाते नहीं अघाते
लानत है ऐसे साहित्य और साहित्यकारों को
जो समाज को चित्रित करने के दम्भ से भरे हैं
और आज भी सिर के बल खड़े हैं |
ऒफ़ यह सब कितना वीभत्स है
यह सब उसी समाज में हो रहा है
जिस समाज के
हम सब सम्मानित सदस्य कहलाते नहीं अघाते
लानत है ऐसे साहित्य और साहित्यकारों को
जो समाज को चित्रित करने के दम्भ से भरे हैं
और आज भी सिर के बल खड़े हैं |
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