वह हर रोज
सुबह सुबह आती है
बारात के साथ
रसोईं में घुस जाती है
और जूठे बरतनों में तलाशती है भोजन
जो रात में
खाया नहीं गया उन पुण्यात्माओं द्वारा
गाय को
जूठन खिलाकर पुण्य कमाने की अभिलाषा
और गाय को माता कहकर
दान कर देने का अहंकार
कन्यादान करने के अहंकार से कमतर नहीं है
हर रोज
जो सुबह सुबह आती है रसोईं में
उसके लिए किसी भी रसोईं में भोजन नहीं है
सुबह सुबह आती है
बारात के साथ
रसोईं में घुस जाती है
और जूठे बरतनों में तलाशती है भोजन
जो रात में
खाया नहीं गया उन पुण्यात्माओं द्वारा
गाय को
जूठन खिलाकर पुण्य कमाने की अभिलाषा
और गाय को माता कहकर
दान कर देने का अहंकार
कन्यादान करने के अहंकार से कमतर नहीं है
हर रोज
जो सुबह सुबह आती है रसोईं में
उसके लिए किसी भी रसोईं में भोजन नहीं है
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