अगर ईमानदारी से देखा जाए तो हमारा पूरा जीवन एक दूसरे को अपराधी घोषित करने में ही व्यतीत हो जाता है | अपनी समस्त विफलताओं के लिए हम किसी न किसी को दोषी करार देते हैं | तुम्हारे चुप होने के बाद भी तुम्हारी आहट को सुन पाने का नाटक तब तक करती/ करता रही/रहा जब तक मेरे ह्रदय की धड़कनों में कोई दूसरा आकर नहीं बसा | अनंतकाल से नाटक जारी है, आदमी की फितरत कभी नहीं हारी है |
मेरे अलिखित उपन्यास से
मेरे अलिखित उपन्यास से
No comments:
Post a Comment