Friday, 14 December 2012

मिट्टी के भाव
बिक गए खेत
मुट्ठी रही बंद
सरक गयी रेत
सपना
===========
जिंदगी
एक सपना है
और सपना
हमारा अपना है |
अपने सपनों में
हम
होते हैं अकेले --एकाकी |

Monday, 10 December 2012

उस औरत को मृत्यदंड दिए बगैर स्त्री की मुक्ति संभव नहीं है ,पुरुष का यह विश्वास कि औरत उसके लिए जीती है जब तक नहीं टूटेगा पुरुष की नींद टूटेगी नहीं |पुरुष के अहंकार को पुष्ट करने का सारा श्रेय औरत को ही जाता है ,पता नहीं औरत कभी जागेगी भी या नहीं या योहीं करवा चौथ एवं छठ पूजा के बहाने पुरुष के अहंकार को पुष्ट करती रहेगी | .

Sunday, 9 December 2012

बेटू
=========
आज तुम
अपने पैरों पर
खड़े होने की कोशिश
कर रहे थे |
चारपाई को पकड़ कर
खड़े होते
सम्हलते
चारपाई छोड़ देते
और इस तरह तुम बार बार गिरते |

तुम्हारी इन
सारी हरकतों के दौरान
तुम्हारे कन्धों पर
मैं पहाड़ों का उगना देखता रहा |

तुम्हें मालूम है बेटू
जब मुझे अपने पैरों पर
चलना आया था
कई पहाड़ों को एक साथ
अपने कन्धों पर
बैठा हुआ पाया था |

Tuesday, 4 December 2012

मैंने facebook par एक पोस्ट " It is very easy to fall in love.
But when love hurts, its very difficult to come out of that लव" पढ़ी तथा कुछ कवितायेँ भी उन सब पर मेरी एक टूटी फूटी प्रतिक्रिया
========================================================.
प्रेम में गिरना ?
समझ में नहीं आया
प्रेम पाने का नाम नहीं
और जो देना जानते हैं
प्रेम उन्हें कभी चोट नहीं पहुंचाता |


अगर हम अनदेखा कर रहे है
किसी के गुनाहों को
तो समझ लेना कि
हमने उसे
प्यार करना छोड़ दिया है |


अगर कोई सपना
नींद से भी लम्बा हो गया
तो समझ लेना कि
उस सपने को
तुम्हारी आँखों में
जबरदस्ती ठूस दिया गया है
तुम नींद से बचो
जगो |

Friday, 30 November 2012

प्यार क्या है ?
===========
प्यार करना
बिस्तर पर
आसान है बहुत
आसान नहीं है
कहना-- प्यार |


यह कैसी विडम्बना है ?
जिससे आप
कह पाते हैं  --प्यार ,
कर नहीं पाते
उसे बिस्तर पर- प्यार |

Thursday, 29 November 2012

भाषा प्रेम की
===========

आदि काल से
प्रेम की एक ही भाषा है
किसी को सशरीर
पाने की लालसा है |

किस नई भाषा की
बात करते हो मेरे दोस्त
प्रेम की भाषा से तुम
कभी अलग नहीं कर पाए गोश्त
ठीक है न मेरे दोस्त |
बच्चे नहीं हैं ये ---
================

इश्क की बातें करो
तो चवन्नी छाप लेंगे
बगावत की बातें करो
तो कन्नी काट लेंगे

कौन कहता है कि बच्चे हैं
आता नहीं है इश्क करना
जरूरत हो तो छन्नी से
 पानी छान लेंगे
बगावत की बातें करो
तो कन्नी काट लेंगे
इश्क में ---
===========

तमाम रात
जागने के बाद
इश्क हो गया काफूर
चले थे जानने
इश्क का पता
लापता खुद हो गये |

वक़्त ने बिसरा दिया
वह, कोई अपना ही था
गुजर कर भी
जो नहीं गुजरता
वह एक घाव है
जो आज भी है रिसता |
ख्वाइश----
==============
 नहीं चाहिए पंख
ऊँची उड़ान
भरने का सामर्थ्य
नहीं चाहिए |

आदिम स्वप्नों से
मुक्त होना चाहता हूँ
प्रेम भरा ह्रदय
नहीं चाहिए |


हाँ ,
समेट लेना चाहता हूँ
सारी सुन्दरता
अपनी बाँहों में एक साथ |

Tuesday, 20 November 2012

.बहुत से सन्देश आ रहे हैं की बालासाहेब ठाकरे की लम्बी उम्र के लिए प्रार्थना करें | इस बाबत मेरा कहना है कि=========

हमारे बस में अगर होता
तो चन्द्र शेखर आज़ाद
भगत सिंह और
सुभाष चन्द्र बोस को
क्योंकर मरने दिया होता |
हमारे पास बूढ़े
और असहाय लोगो की
एक लम्बी कतार होती
और माँ भारती
हमारे साथ उनको भी ढोती |
वे बेचारे
+++++++++++++
वे कहते हैं कि
वे गद्दार नहीं हैं
वे सिर्फ
गद्दी के यार हैं |
बेचारे हैं 
वे करते हैं गद्दारी
इसी यारी के लिए |
तुम हो की
निरर्थक उन्हें गाली देते हो |

Saturday, 17 November 2012

बच्चे घर में
===========

बच्चे
मेहमान बनकर आएँ
तो अच्छे |
मेहमान पसर जाए
घर में
तो रुलाए |

बेटियाँ हमेशा
मेहमान बनकर आती हैं
हम सभी को
सुहाती हैं |

बेटी भी
अगर मेहमान बनकर आए
और आपके घर में
सपरिवार पसर जाए
तो वो
कभी न भाए  |

बच्चे
अगर मेहमान बनकर आएँ
तो अच्छे |

Wednesday, 14 November 2012

बच्चे जब ----
=========================
बच्चे जब
बाप बन जातें हैं
 पथरा जाते हैं उनके पिता |

 इंसान चाहे कितना भी  बड़ा हो जाये
रहता हमेशा अपने माता-पिता का बच्चा ही है|
यह बात कहने में
बहुत आसान है लेकिन
उतनी सरल भी नहीं |

कोई भी व्यक्ति
एक ही समय में
किसी का बच्चा
और किसी का पिता
नहीं हो सकता |

इसीलिए वह
अपने भीतर के बच्चे को
मार देता है और
दे देता है पिता को मृत्यदंड |

उसे दोषी मत ठहराव
वह पिता बन सके
इसके लिए यह जरूरी है |

Saturday, 10 November 2012

मर्यादा पुरषोत्तम
==============
दीपावली
तथाकथित मर्यादा पुरषोत्तम राम
की रावण पर विजय तथा
अग्नि देव द्वारा
सीता की शुचिता की घोषणा
का पर्व है |


इस देश को इसीलिए
मर्यादा पुरषोत्तम राम 
पर गर्व है |

Thursday, 8 November 2012

शुभ दीपावली
==============
सोचता हूँ
दीवाली पर शुभकामनाएं देने की
औपचारिकता निभा ही दूँ |
दीप जलाऊं या न जलाऊं
अँधेरा भाग जाये
आपके जीवन से
इसका ढोंग तो रचाऊं |

उसके आँगन में
मेरे आँगन से
रोशनी ज्यादा हो
किसी ने कभी भी
यह ख्वाइश नहीं की
दमक जाते सबके आँगन |

उसके सामानों की फेहरिस्त
मेरे सामानों की
फेहरिस्त से
लम्बी न होने पाए
दोस्त है वो तो क्या ?
चैन की नींद
वो सोने न पाए |

शुभकामनाएं
देते रहे
एक दूसरे को
और डरते रहे कि
शुभकामनाएं
कहीं फलीभूत न हो जायें |
क्या बताऊँ
शुभकामनाएं देना
एक औपचारिकता है
इसीलिए आदमी
जन्मदिन हो
या हो कोई पर्व
इसे निभाता है |    
शुभ दीपावली
==============
सोचता हूँ
दीवाली पर शुभकामनाएं देने की
औपचारिकता निभा ही दूँ |
दीप जलाऊं या न जलाऊं
अँधेरा भाग जाये
आपके जीवन से
इसका ढोंग तो रचाऊं |

उसके आँगन में
मेरे आँगन से
रोशनी ज्यादा हो
किसी ने कभी भी
यह ख्वाइश नहीं की
दमक जाते सबके आँगन |

Wednesday, 7 November 2012

पेड़ों के साथ
================
पेड़ों के पास बैठना
लिपट जाना
रोना ,सहलाना
नोचना ,खसोटना
सब कितना आसान है पेड़ों के साथ ।

निरापद है
पेड़ों से बातचीत करना ।

कितना आसान है
पेड़ों से यह कहना कि
हम तुमसे नफरत करते हैं
कुछ भी कहना कितना आसान है
पेड़ों के साथ ।

किसी के हिस्से का जहर
कोई यों ही नहीं पीता
कितना आसान है यह मान लेना
कि पेड़ हमसे प्यार करते हैं
कुछ भी मान लेना
कितना आसान है ,पेड़ों के साथ ।

आसान नहीं है
पेड़ों के साथ "घर" बसाना
हम पेड़ों के साथ सो नहीं सकते
और पेड़
कर नहीं सकते प्यार ,बिस्तर पर । 
पेड़ों के साथ
=============
पेड़ों के पास बैठना
लिपट जाना
रोना, सहलाना
नोचना ,खसोटना
सब कितना आसान है पेड़ों के साथ ।

निरापद है
पेड़ों से बातचीत करना ।
कितना आसान है
पेड़ों से यह कहना कि
हम तुमसे नफरत करते हैं
कुछ भी कहना कितना आसान है
पेड़ों के साथ ।

किसी के हिस्से का जहर कोई
यो ही  नहीं पीता
कितना आसान है यह मान लेना
कि पेड़ हमसे प्यार करते हैं
कुछ भी मान लेना
कितना आसान है, पेड़ों के साथ ।

आसान नहीं है
पेड़ों के साथ "घर " बसाना
हम पेड़ों के साथ सो नहीं सकते
और पेड़
कर नहीं सकते प्यार बिस्तर पर । 

Monday, 5 November 2012

स्त्री विमर्श
============
मत खीचो
लक्ष्मण रेखा
जीनो दो उन्हें भी पुरुष की तरह---बेहया
बगैर किसी रेखा में बंधें हुए |
इसमें मात्र एक अड़चन हैं
उनका गर्भाशय
तुम समझ गए न मेरा आशय |



कुमार अवधेश

Sunday, 4 November 2012

हमारी आदत है
==================
हमारी आदत है
हम मिटा देते हैं
अपनी पहचान के सारे स्रोत |
और कोई अगर
करना चाहता है हमारी शिनाख्त
हम मान लेते हैं
उसे अपना दुश्मन |
क्यों ऐसा होता है
बता मेरे मन ?
मुझे भाषा चाहिए
==============
तुमने कहा -मौन
और मैं
कुछ, बहुत कुछ
कहते कहते मौन हो गया
वह सब अनकहा एक सागर
मेरे भीतर रोता है
मौन थक कर
अनाभिव्यक्त सो जाता है |
मौन मुझको तुम तक
संप्रेषित नहीं कर पा रहा है
मुझे भाषा चाहिए | 

Thursday, 1 November 2012

व्याकरण सम्बन्धों का
================
बच्ची सोच रही है
 दुनिया कितनी सुन्दर है
पापा ,मम्मी ,भाई, बहन के साथ
हलाकि वोह गलत सोच रही है |
बड़े हमेशा से यही मानतें हैं कि
बच्चे गलत सोचतें हैं |
लेकिन इस बार
सच में,वोह गलत सोच रही है
उसे मालूम नहीं है कि
सारे सम्बन्धों को वक्त -वक्त पर
तौलना पड़ता है
हर बार
तराजू बदलने के साथ ही
बदल जाता है
सम्बन्धों का वजन 
वक्त के साथ
हर सम्बन्ध का वजूद
खो जाता है |
यहाँ सब कुछ
एक प्रायोजित कार्यक्रम
की तरह घटित होता है
फिर तू क्योंकर रोता है |
गुनाहगार हो तुम
=============
औरत को
दूसरे दर्जे का नागरिक बना कर
सजा दिया कमरे में
अपने ही देश में
देश निकाले की सजा देकर
तुमने किया है गुनाह
जिसकी कोई मुआफी नहीं
और देश के सविंधान में
तुम्हारे इस गुनाह की
कोई सजा भी नहीं
यह कैसा देश है ?
जहाँ शक्ति की देवी
माँ काली ,माँ भगवती
माँ दुर्गा को
मंदिरों में स्थापित कर
औरत के प्रति 
अपनी आस्था की इतिश्री

Tuesday, 25 September 2012

क्या करूँ ?
रुकूँ या चलूँ |
दोस्तों यह सवाल मेरे जेहन में सुगबुगाता हैं
इस उम्र में भी किसी का ख़याल गुदगुदाता है
कुछ तो बताओ मेरे दोस्त
क्या करूँ ?
रुकूँ या चलूँ |

Friday, 7 September 2012

सपनों में घर
तुमने कहा -
"मैं तुमसे प्यार करती हूँ "
यहाँ तक सब ठीक था
गलत हुआ तुम्हारी बात पर
विश्वास कर लेना ।

तुमने मुझे
"घर " का सपना दिखाया
और मैं
दो अदद बच्चों का
बाप बन गया ।

अब प्यार करने की बात
तुम सपने में भी नहीं करती
और "घर "
सपनों में आकर
मुझे डराता है ।  
मेरी गृहस्थी

तुमने कहा था
आओगे देखने मेरी गृहस्थी
मैं
अपनी गृहस्थी
चुन चुन कर सजाता रहा
एक बर्तन टूटता
दूसरा खरीद लाता
टूटे बर्तनों को मैं
तुमसे छिपाना चाहता था
सजाये रखना चाहता था
अपनी गृहस्थी तुम्हारे आने तक
ताकि तुम्हें उदास देख सकूँ ।



कुमार अवधेश

Wednesday, 5 September 2012

जब  याद आते हैं पुराने मित्र
महक जाता है सब कुछ
जैसे पसर गया हो कमरे में इत्र |
वह लड़ना झगड़ना
रूठना मनाना
सब कुछ कितना सरल था ,
आज इतने बरस बाद
कुछ भी सरल नहीं है मित्र |
कोई भी प्रश्न हो
अब लगता है कठिन ,
नहीं होता अब किसी पर भी यकीन |
जब याद आते हैं पुराने मित्र
महक जाता है सब कुछ
जैसे पसर गया हो कमरे में इत्र |

Tuesday, 4 September 2012

सब कुछ उपलब्ध करा देंगे वे
सिर्फ दो वक्त की रोटी
का ही तो तुम्हे इंतज़ाम करना है |
 कितना भला है राजा
 उसे मालूम है
इक्कीसवीं सदी में जरूरी है
मोबाइल ,क्रिकेट का विश्व कप
ओलंपिक मेडल और एटोमिक बम
तुम्हें सिर्फ दो वक़्त की रोटी
 का ही तो इंतजाम करना है |
तुम फिरभी कोसते हो राजा को
यह तो भाई ठीक बात नहीं है |
आओ हम सब मिलकर
ऐसे राजा की बिदाई के बारे में सोचे |

Monday, 3 September 2012

कभी कभी बेहतर होता है
चुप रह जाना
महसूसा हुआ व्यक्त करने से
बेहतर होता है
चुप रह जाना |
क्योकि तुम बुरी तरह से जख्मी होगे
जब तुम्हे मालूम पड़ेगा कि
जो लोग तुम्हारे सबसे करीब हैं
वे तुम्हे सुन तो सकते हैं
 तुम्हें समझ नहीं सकते |

Saturday, 18 August 2012

सन्नाटा चीर दे
कोई शोर
ऐसा
हो
भी तो
सब खामोश हैं |
दीवारों पर लगे पोस्टर
आकर्षित नहीं करते
राहत नहीं देती
पेड़ की छाँव भी |
कोई नोचे मेरे बालों को
खसोटे मुझको
किसी दर्द से जगना चाहता हूँ
मैं अपने होने को
महसूसना चाहता हूँ
सब  नख-हीन हैं | 

Tuesday, 14 August 2012

मेरी समस्त आशाओं  ने
शरीर छोड़ दिया है
और अब
उनकी अतृप्त आत्माएं
किसी और शरीर में
प्रवेश करते भय खाती है |

Wednesday, 8 August 2012

मेरे पैदा होने की तारीख़
माँ नहीं जानती
वोह कहती है
बस इतना याद है कि तू
पितरपक्ष में पैदा हुआ था
तेरे पिता ने
पुरखों को
सिर्फ एक दिन पानी दिया था
फिर उन्हें पानी नहीं दिया गया |
अन्धेरें में
उस पार खड़ा
मेरा पिता भूखा और उदास हैं
मेरी प्यास
 मेरे पुरखों की प्यास है
इस नन्हे पौधे को
इसी प्यास ने रोपा था |
माँ इसे
पौधा नहीं समझती
माँ कहती है ..
तुने पुरखों को ज़ना है
तू अपने पितरों का पिता है 
एकांत में
कुछ कांपता है
क्या कांपता है एकांत में ?
पत्तियां टूटती गयीं .....टूटती गयीं
बनती गयीं भीड़
भीड़ ,जहां कुछ नहीं कांपता
क्यों नहीं कांपता
कुछ भी भीड़ में ?
नदी में चेहरा कांपता है
क्यों कांपता है चेहरा नदी में ?
आओ ,
एकांत और नदी से बचें
भीड़ हो जायें |

Monday, 6 August 2012

अन्ना मत करो नई पार्टी बनाने का गुनाह
राजनीति के कीचड़ से कैसे बच पाओगे
वे जो चाहते थे तुम तैयार भी हो गए कमर कस कर
उसी पागल घोड़े पर बैठने के लिए
यह घोड़ा गिरा देगा ,रौंद देगा तुम्हें
तुम सयाने नहीं हो |
एक परिचय
-------------------
अभी अभी
जो आदमी यहाँ खड़ा था
चला गया केंचुल छोड़कर

Saturday, 4 August 2012

तुम कहती हो
लेकिन
मैं मान नहीं पाता हूँ |
शब्द
कुछ नहीं देते
लेकिन जब कुछ नहीं होता
शब्द राहत देते हैं |
लोग ....लोग तो
सिर्फ आह़त करते हैं |

Tuesday, 5 June 2012

संबंधों की कभी प्राकृतिक मौत नहीं होती
उनका खून किया जाता है
हमारे अहंकार द्वारा या
हमारे आचरण द्वारा
या फिर हमारी अज्ञानता इसका कारण होती है |
संबंधों को शाश्वत बनाने की जुगत करे हम |

Tuesday, 29 May 2012

एक छोटी सी ख्वाहिश में
बीत गया जीवन
मेरे बच्चे दर्द में डूबने न पाएं
मेरे बच्चे मुझसे रूठने न पाएं
एक छोटी सी ख्वाहिश में
बीत गया जीवन
मेरे बच्चे दर्द में डूबने न पाएं
मेरे बच्चे मुझसे रूठने न पाएं
नमन की मुद्रा में
धनुष से तीर चलाने की विद्या
उसने कब सीख ली ?
यह उसे भी नहीं मालूम |
जिंदगी में जो भी प्रयोग किये सब में नाकामयाबी मिली
अब तो जीने में डर लगता है
प्रयोग करने का हौशला ख़त्म
रोशनी की किरण दफ्न
अंधेरों से अब डर नहीं लगता
डरता हूँ रोशनी से अब
समस्या से दूर भागना
और कुछ नहीं करता है
समाधान से आपको कुछ और
दूर कर देता है

Thursday, 5 April 2012

बगावत का स्वर

अकेले एकांत में पड़े पड़े
कभी कभी मैं
टूच्ची सहानुभूति चाहने लगता हू।
मेरे भीतर से एक आदमी निकल कर
मूंछों को ऐंठता हुआ
लिंग को रगड़ता हुआ
हस्त मैथुन में व्यस्त हो जाता है ।

कनखियों से चारों ओर देखता
आश्वस्त मैं उस आदमी को
जल्दी से निगल जाता हूँ ,
मछलियां खाने के बाद
सन्यासी की मुद्रा में खड़ा हो जाता हूँ ।

मैं नंगा होना चाहता हूँ
लेकिन मेरे लिंग की पूजा हो
यह निश्चित हो ,
मैं भूमिगत बागी होना चाहता हूँ
बाहर आधुनिक और घर के भीतर
परंपरा को कैद रखना चाहता हूँ ।

देहरी से बाहर पाँव निकालने पर
परंपरा को टांग तोड़ने की धमकी
यह हमारे आधुनिक होने की सीमा है
इसीलिए बगावत का स्वर धीमा है

Wednesday, 4 April 2012

बिटिया


बिटिया
मुडेर पर बैठी
चिड़िया |
उड़ जाएगी एक दिन
घर आँगन सूना कर
चिड़िया / बिटिया |.

Saturday, 31 March 2012

सर्पदंस की पीड़ा

जब तुम्हारा अनजाना अबोध
मासूम जिस्म
मेरे प्यासे शरीर से
जाने या अनजाने मैं नहीं जानता
छू गया था ,
तब मुझे ऐसा लगने लगा कि
मेरे आदिम स्वप्न साकार हो जायेंगे
अधूरी तस्वीरों में
रंग भर जायेंगे ।

उस तपते हुए क्षण में
न जाने मैंने
क्या क्या सोच डाला था
अपनी जहरीली आँखों से
तुम्हारे जिस्म को पी डाला था ।

लेकिन तुम्हारे भोले और मासूम जिस्म
की छाया में
मेरे पशु को नींद आने लगी ,
मैंने खुद को
तुम्हारे स्पर्श से मुक्त कर लिया था
अपनी जहरीली आँखों को
आंसुओं से सी लिया था ।

मैं निर्लिप्त सा उठकर
चल दिया दूर तुमसे
क्योंकि सर्पदंस की पीड़ा
मैंने लेनी नहीं चाही ।

Tuesday, 27 March 2012

एक औरत हम बिस्तर


एक औरत जो बरसों से
मेरे साथ
मेरे घर में रहती है |
हम-बिस्तर मेरे साथ
और बच्चे मेरे
... बुलातें हैं उसे माँ
मैं उसे जानता हूँ उसके नाम से
उसे शायद याद भी नहीं है
मेरा नाम |

... वह औरत जिसे मेरे बच्चे
माँ बुलाते हैं
बस इतना जानती है कि
वो और उसके बच्चो के साथ
उसके घर में
एक अजनबी रहता है |
वो मानती है और
जानती भी है कि
घर के लिए जरूरी है
एक औरत के साथ
एक मर्द का होना |

Wednesday, 21 March 2012


श्री श्री रवि शंकर का कहना है =सरकारी स्कूल के बच्चे बनते हैं नक्सली तथा निजी स्कूलों में पढ़े बच्चे संस्कारवान होते हैं |

अरे अरे यह क्या हो गया श्री श्री को अचानक निजी स्कूलों की दलाली करने लगे |शायद वे भूल गए कि आजाद भारत में जो शिक्षा का प्रसार हुआ है वह सब इन सरकारी स्कूलों के ही देन है |आजादी के बाद कौन सा निजी स्कूल गाँव या कस्बों में खुला {महोदय  कृपया अपने ज्ञान को बढाएं |आप पर जो लोगो कीआस्था है वह बनी रहे  |

Saturday, 17 March 2012

यादों के साथ


यादों के साथ
न जाने कब से
बलात्कार कर रहा हूँ
अफ़सोस कोई भी याद
गर्भवती नहीं होती ।

जाड़े की लम्बी रातों में
एक हड्डियों का ढांचा
लगातार मेरे बिस्तर पर
सोता रहा है
मेरा पौरुष रोता रहा है ।

बचे खुचे गोश्त से
अपने आप को बहलाने की कोशिश
बाँझ औरत को गर्भ ठहर जाये
यह अनहोनी कैसे हो जाये ।

फिर भी मेरी मर्दानगी
पत्थर पर दूब उगाने में
व्यस्त है

Thursday, 8 March 2012

सम्प्रेषण




सम्प्रेषण


सम्प्रेषण  हल न बन सका
मात्र इतना हुआ कि
एक छोटी सी बात का कद
कुछ और घट गया ।                                                             

Wednesday, 7 March 2012

आंधी डरती है

आंधी डरती है

वह निकला
आंधी की वजह खोजने
उसने पेड़ो को चुपचाप खामोश खड़े पाया ।              

रफ़्तार हवा की लगातार
बढती जा रही है
दहलाती है हवा की चीख ।

पेड़ जब भी इस तरह
खामोश हुआ है
हवा आदमखोर आंधी हो गयी है ।

वह तने से चिपक कर
पेड़ को झिझोड़ रहा है
ताकि पत्तियों में
कम्पन पैदा हो सके ।

वह जानता है कि आंधी
पेड़ो के हिलने से डरती है ।




Tuesday, 6 March 2012

घर




घर


चिरौटा मर गया
चिड़िया घर तालाश्ती है,
एक चिरौटे की मौत से
मरती नहीं घर की ख्वाहिश,
चिड़िया को चाहिए घर
(चिरौटा कोई भी हो )

एक प्रेम कविता


एक प्रेम कविता  

चन्द रोज और
फिर हम तुम  दोनों
अपने अपने घेरों में कैद
एक दूसरे की पहुँच  से दूर
अनुपस्थित में भी
एक दूसरे से जुड़ जायेंगे
हम अचानक अपनी उम्रों से
बहुत छोटे हो जायेंगे |

 
मेरा बच्चा मुझे पापा
तुम्हारा बच्चा तुम्हे माँ
कहकर जगायेगा
अपनी तोतली भाषा में
हमें बड़े होने का अहसास कराएगा |
बार बार छोटे और फिर बड़े
होने की इस प्रकिया में
हम न छोटे और न बड़े
ही रह पाएंगे
एक दिन दहलीज पर खड़े -खड़े
हम देखेंगे क़ि
हमारे बच्चे
हमसे भी बड़े हो गए हैं ।

काश .......

काश .......

काश कुछ ऐसा करिश्मा हो जाये
दिल और दिमाग को लकवा मार जाये
मैं न खुश हो सकू
न उदास
बस हो सकू

कुमार अवधेश

चिता की रोशनी में

चिता की रोशनी में

श्मशान की ख़ामोशी में
उन्मुक्त हास्य भी
रुदन मालूम पड़ता है
चिता की रोशनी में
हर आदमी
सन्यासी दिखाई पड़ता है |

बेटू

बेटू
-----
आज तुम अपने पैरों पर
खड़े होने की कोशिश
कर रहे थे ।

चारपाई को पकड़ कर
खड़े होते
सम्हलते
चारपाई छोड़ देते
और इस तरह तुम बार बार गिरते ।

तुम्हारी इन सारी हरकतों
के दौरान
तुम्हारे कन्धों पर
मैं पहाड़ो का उगना देखता रहा ।

तुम्हे मालूम है बेटू
जब मुझे अपने पैरों पर
चलना आया था
कई पहाड़ों को एक साथ
 अपने कन्धों पर
बैठा हुआ पाया था ।

Sunday, 4 March 2012

क्षितिज के पार


क्षितिज के पार



एक दीवार थी ,जो रोकती थी
एक ऊँगली थी ,जो टोकती थी
दीवार मैंने लांघ ली है और
ऊँगली मैंने तोड़ दी है
और अब रास्तें हैं 
यह रास्ते जहाँ ले जातें हैं
चला जाता हू
किसी मंजिल की दरकार नहीं है
और न ही जानना चाहता हू
क्षितिज के पार की हकीक़त
मैं नापना चाहता हू
रास्ते जो कभी ख़त्म नहीं होते

पैरों के विरूद्ध

पैरों के विरूद्ध
बच्चा खेलता रहा
खिलौनों से
तुम सपनो से |
तुम्हे मालूम न था
टूट जाते हैं और फिर खरीदे नहीं जाते
सपने खिलौने नहीं होते |

तुम्हें भी खिलौनों से खेलना था
टूटते, खरीद लाते
इस तरह तुम टूटने से बच जाते |
घुटनों के बल
चलते हुए
जब जब तुमने
अपने पैरों पर चलने की बात सोची
हर बार तुम्हारी आँखों में
एक सपना ठूंस दिया गया
 सपना एक साजिश है
वयस्क होने की संभावनाओं और
पैरों के विरूद्ध |