Saturday, 16 September 2017

'सारा जहान आज दो खेमों में बंट गया
कोई दिए के साथ है कोई हवा के साथ'

जब रौशनी के लिए आप दिए को चुनते है तो यह मत भूलिए कि दिया उस हवा की वजह से ही जल सका है
दिए को हवा के थपेड़ों से बचाये,हवा के खिलाफ मत हो जाएँ | हवा की अनुपस्थिति में दिए का जलते रहना नामुमकिन है | हवा भी जरूरी है जलता हुआ दिया भी जरूरी है | 

Friday, 15 September 2017

👉 *#अवश्य पढ़े और पूरा लेख पढ़े समय नहीं हो तो बाद में पढ़े!*
दुनिया के भ्रष्टाचार मुक्त देशों में शीर्ष पर गिने जाने वाले न्यूजीलैंण्ड के एक लेखक ब्रायन ने भारत में व्यापक रूप से फैंलें भष्टाचार पर एक लेख लिखा है। ये लेख सोशल मीडि़या पर काफी वायरल हो रहा है। लेख की लोकप्रियता और प्रभाव को देखते हुए विनोद कुमार जी ने इसे हिन्दी भाषीय पाठ़कों के लिए अनुवादित किया है।
मै इस लेख को पढ़कर पोस्ट करने से रोक नही पाया।
अगर पसन्द आये तो आप भी शेयर करें –
*न्यूजीलैंड से एक बेहद तल्ख आर्टिकिल।*
*भारतीय लोग होब्स विचारधारा वाले है (सिर्फ अनियंत्रित असभ्य स्वार्थ की संस्कृति वाले)*
भारत मे भ्रष्टाचार का एक कल्चरल पहलू है। भारतीय भ्रष्टाचार मे बिलकुल असहज नही होते, भ्रष्टाचार यहाँ बेहद व्यापक है। भारतीय भ्रष्ट व्यक्ति का विरोध करने के बजाय उसे सहन करते है। कोई भी नस्ल इतनी जन्मजात भ्रष्ट नही होती
*ये जानने के लिये कि भारतीय इतने भ्रष्ट क्यो होते हैं उनके जीवनपद्धति और परम्पराये देखिये।*
भारत मे धर्म लेनेदेन वाले व्यवसाय जैसा है। भारतीय लोग भगवान को भी पैसा देते हैं इस उम्मीद मे कि वो बदले मे दूसरे के तुलना मे इन्हे वरीयता देकर फल देंगे। ये तर्क इस बात को दिमाग मे बिठाते हैं कि अयोग्य लोग को इच्छित चीज पाने के लिये कुछ देना पडता है। मंदिर चहारदीवारी के बाहर हम इसी लेनदेन को भ्रष्टाचार कहते हैं। धनी भारतीय कैश के बजाय स्वर्ण और अन्य आभूषण आदि देता है। वो अपने गिफ्ट गरीब को नही देता, भगवान को देता है। वो सोचता है कि किसी जरूरतमंद को देने से धन बरबाद होता है।
*जून 2009 मे द हिंदू ने कर्नाटक मंत्री जी जनार्दन रेड्डी द्वारा स्वर्ण और हीरो के 45 करोड मूल्य के आभूषण तिरुपति को चढाने की खबर छापी थी। भारत के मंदिर इतना ज्यादा धन प्राप्त कर लेते हैं कि वो ये भी नही जानते कि इसका करे क्या। अरबो की सम्पत्ति मंदिरो मे व्यर्थ पडी है।*
*जब यूरोपियन इंडिया आये तो उन्होने यहाँ स्कूल बनवाये। जब भारतीय यूरोप और अमेरिका जाते हैं तो वो वहाँ मंदिर बनाते हैं।*
*भारतीयो को लगता है कि अगर भगवान कुछ देने के लिये धन चाहते हैं तो फिर वही काम करने मे कुछ कुछ गलत नही है। इसीलिये भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्ट बन जाते हैं।*
*भारतीय कल्चर इसीलिये इस तरह के व्यवहार को आसानी से आत्मसात कर लेती है, क्योंकि*
1 नैतिक तौर पर इसमे कोई नैतिक दाग नही आता। एक अति भ्रष्ट नेता जयललिता दुबारा सत्ता मे आ जाती है, जो आप पश्चिमी देशो मे सोच भी नही सकते ।
2 भारतीयो की भ्रष्टाचार के प्रति संशयात्मक स्थिति इतिहास मे स्पष्ट है। भारतीय इतिहास बताता है कि कई शहर और राजधानियो को रक्षको को गेट खोलने के लिये और कमांडरो को सरेंडर करने के लिये घूस देकर जीता गया। ये सिर्फ भारत मे है
भारतीयो के भ्रष्ट चरित्र का परिणाम है कि भारतीय उपमहाद्वीप मे बेहद सीमित युद्ध हुये। ये चकित करने वाला है कि भारतीयो ने प्राचीन यूनान और माडर्न यूरोप की तुलना मे कितने कम युद्ध लडे। नादिरशाह का तुर्को से युद्ध तो बेहद तीव्र और अंतिम सांस तक लडा गया था। भारत मे तो युद्ध की जरूरत ही नही थी, घूस देना ही ही सेना को रास्ते से हटाने के लिये काफी था। कोई भी आक्रमणकारी जो पैसे खर्च करना चाहे भारतीय राजा को, चाहे उसके सेना मे लाखो सैनिक हो, हटा सकता था।
प्लासी के युद्ध मे भी भारतीय सैनिको ने मुश्किल से कोई मुकाबला किया। क्लाइव ने मीर जाफर को पैसे दिये और पूरी बंगाल सेना 3000 मे सिमट गई। भारतीय किलो को जीतने मे हमेशा पैसो के लेनदेन का प्रयोग हुआ। गोलकुंडा का किला 1687 मे पीछे का गुप्त द्वार खुलवाकर जीता गया। मुगलो ने मराठो और राजपूतो को मूलतः रिश्वत से जीता श्रीनगर के राजा ने दारा के पुत्र सुलेमान को औरंगजेब को पैसे के बदले सौंप दिया। ऐसे कई केसेज हैं जहाँ भारतीयो ने सिर्फ रिश्वत के लिये बडे पैमाने पर गद्दारी की।
सवाल है कि भारतीयो मे सौदेबाजी का ऐसा कल्चर क्यो है जबकि जहाँ तमाम सभ्य देशो मे ये सौदेबाजी का कल्चर नही है
3- *भारतीय इस सिद्धांत मे विश्वास नही करते कि यदि वो सब नैतिक रूप से व्यवहार करेंगे तो सभी तरक्की करेंगे क्योंकि उनका “विश्वास/धर्म” ये शिक्षा नही देता। उनका कास्ट सिस्टम उन्हे बांटता है। वो ये हरगिज नही मानते कि हर इंसान समान है। इसकी वजह से वो आपस मे बंटे और दूसरे धर्मो मे भी गये। कई हिंदुओ ने अपना अलग धर्म चलाया जैसे सिख, जैन बुद्ध, और कई लोग इसाई और इस्लाम अपनाये। परिणामतः भारतीय एक दूसरे पर विश्वास नही करते। भारत मे कोई भारतीय नही है, वो हिंदू ईसाई मुस्लिम आदि हैं। भारतीय भूल चुके हैं कि 1400 साल पहले वो एक ही धर्म के थे। इस बंटवारे ने एक बीमार कल्चर को जन्म दिया। ये असमानता एक भ्रष्ट समाज मे परिणित हुई, जिसमे हर भारतीय दूसरे भारतीय के विरुद्ध है, सिवाय भगवान के जो उनके विश्वास मे खुद रिश्वतखोर है।*
लेखक-ब्रायन,
गाडजोन न्यूजीलैंड

Sunday, 3 September 2017

सन्दर्भ-भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार
"कविता " एक शब्द की गाली है .
धरती पर पैर न धरते थे
बिना पंख के उड़ते थे
दोस्तों आओ,
पंख की कहानी सुनाओ |

तुम आते या अब न आते
काश यादो के सिलसिले टूट पाते.
चलो इन पहाडों में कहीं गुम हो जाते हैं .

मैं याद करता हूँ ,
उनको हिचकियाँ भी नहीं आती |
मासूमों की मौत पर खामोश खड़े रहे
इतना गिरे कि हम अब पशु भी नहीं रहे.

रूठ जाता है बचपन
फिर लौटकर नहीं आता
बुढ़ापे की शक्ल में लौटता है मगर
थके और उदास क़दमों से चलकर

हम खुद को नहीं बदलते
दुनियां को बदलने निकल पड़ते हैं.
खरीद कर लाते हैं,
अपनी बगिया के फूल तो
हम पूजा में भी नहीं चढ़ाते हैं.

अनजाने ही सही, व्यवस्था की अव्यवस्था को और हष्ट पुष्ट बनाने में कुछ तो है ही हमारा भी योगदान.
खुदा और ईश्वर के चर्चे जिस दिन बन्द हो जाएंगे हम अमन पसन्द हो जाएंगे

रूहें कब्रिस्तान में फ़रमा रही हैं आराम
इंसानी बस्तियां अब दिखती कहाँ हैं जनाब.

भविष्य की लाश पर खड़े होकर वर्तमान सुधार रहे हैं
कमाओ खूब कमाओ अपने बच्चों का भविष्य बनाओ.
सिर्फ नकारात्मकता ही ढूँढना स्वस्थ मानसिकता का परिचायक नहीं होता . ये चटनी बनाने का व्यवसाय बंद कीजिये जनाब .

इंसानियत अभी बची है और इंसानियत का हिन्दू या मुसलमान से कोई लेना देना नहीं है.

उफ़,हम किधर जा रहे हैं,इंसान थे शैतान बनते जा रहे हैं.हे खुदा तू शैतान को अपनी कैद से क्यों करता है रिहा.
रंगहीन सपनों की कोई इबारत नहीं होती
बालू के ढूह पर खड़ी कोई इमारत नहीं होती.

कोई स्पर्श ऐसा नहीं होता जिसे हम भूल न पाएं
फिर हम क्यों प्रेम के नाम पर अपना घर बसाएं .
मंदिर,मस्जिद में बढ़ने लगी है भीड़, शेर दबे पाँव चलकर आ रहा है.
आसाराम के पैर राजनेताओ ने छुये फिर उनका बाजा बजा, राम रहीम के पैर राजनेताओ ने छुये फिर उनका भी बाजा बजा. निर्मल बाबा के पैर छूते हुये किसी राजनेता की तस्वीर वायरल हुई है क्या?

अपने गिरहबान में कोई नहीं है देखता,किसी का घर जलता देखकर हर कोई अपनी रोटी है सेकता.

अपने " हिन्दू या मुसलमान " होने का जश्न घर के अंदर ही मनाएं घर से बाहर आप एक इंसान हैं.
धर्म को घर की देहरी से बाहर पाँव मत रखने दो .
हम घर में सच बोलने का खतरा क्यों नहीं उठाते, वक़्त मिले तो सोचियेगा जरूर.

सैलाब सी है जिंदगी
इसमें हमारी औकात ही क्या.

न आधा हूँ, न पूरा हूँ
ऊँट के मुहँ में जीरा हूँ

सर्वशक्तिमान को आपके भजन,कीर्तन और भोग की कोई आवश्यकता नहीं है.ढोंग आपके इस पाखण्ड में है.
हम घर में सच बोलने का खतरा क्यों नहीं उठाते, वक़्त मिले तो सोचियेगा जरूर.
हिंदी अनंतकाल तक दस्तावेजों में योहीं राजभाषा बनी रहेगी और सितम्बर के महीने में हिंदी की कब्र पर श्रद्धा सुमन चढाने का यह सिलसिला अनंतकाल तक जारी रहेगा |
बुद्धिजीवी और विरोध पक्ष अगर प्रगतिशीलता के बहाने तथा अपने वोट बैंक को बनाये रखने के लिए ऐसे ही अल्पसंख्यंकों के पक्ष में खड़े होने का नाटक करता रहा तो निश्चित जानिये राम के पक्ष में बहुसंख्यक लामबद्ध हो जाएंगे |
प्रेम की नदी में
आप नहाये तो अच्छा,
न नहाये तो और भी अच्छा.
तहजीब बिकती नहीं बाजार में वर्ना खरीदलाते.
सजाकर ड्राइग रूम में माखौल उसका भी उड़ाते.
धर्म से जुड़ी किताबों में जो भी लिखा है उन पर सवाल न उठाने की वजह से यह दुनियाँ जहन्नुम बनती जा रही है.
सब कुछ उपलब्ध करा देंगे वे 
सिर्फ दो वक्त की रोटी 
का ही तो तुम्हे इंतज़ाम करना है |
कितना भला है राजा
उसे मालूम है 
इक्कीसवीं सदी में जरूरी है
मोबाइल ,क्रिकेट का विश्व कप
ओलंपिक मेडल और एटोमिक बम
तुम्हें सिर्फ दो वक़्त की रोटी
का ही तो इंतजाम करना है |
तुम फिरभी कोसते हो राजा को
यह तो भाई ठीक बात नहीं है |
आओ हम सब मिलकर
ऐसे राजा की बिदाई के बारे में सोचे | 04/09/2012
अंतर्वस्त्र मैले हैं 
कमीज तो उजली है 
आकाश में 
छेद करने का हौसला है 
लेकिन द्रष्टि छिछली है 
इसीलिए भविष्य की तस्वीर धुंधली है
हमारी वजह से 
फलता फूलता है उनका पाखण्ड 
हमें मिलना ही चाहिए इसके लिए दण्ड |

Friday, 1 September 2017

तीन साल में 66 वर्ष का युवा 
8000 किमी के हाइवे बनवाकर
50 लाख मकान बनवा कर
करोडो शौचालय बनवा कर
6 नए एम्स बनवाकर
3 नयी पनडुब्बियां बनवा कर
तेजस विमान हिन्दुस्तान में बनवा कर
धनुष तोप दिलाकर
Orop देकर
सर्जिकल स्ट्राइक करके
तीनो सेना को मजबूत बना कर
65 देशों से व्यापारिक रिश्ते बना कर
चीन को पीछे छोड़कर
विकास दर 7.5के ऊपर ले जाकर
महगाई 5 से नीचे लाकर
फसल बीमा देकर
12 रु में 2 लाख का बीमा देकर
नोटबंदी करके नक्सलियों पाकिस्तानियो को दुखी करके
राफेल विमान का सौदा करके
सऊदी अरब में शेख से मंदिर बनवा के
बुरहान वानी को ऊपर पहुचा के
अलगाववादी कश्मीरियों को औकात में लाके।
बस सब की गालियाँ खाता है।
जो काम करता है,
वो कभी ये नहीं कहता कि
*काम बोलता है*
क्योंकि
*काम दिखता है।
ईश्वर की परिकल्पना को सामाजिक स्वीकृति मिलने के साथ ही शुरू हुई हिंसा |ईश्वर की परिकल्पना ने मनुष्य को हिंसक बना दिया |

Saturday, 19 August 2017

खुदा व्यस्त है
जन्नत की हूरों का हिसाब रखने में
कान्हा को फुर्सत कहाँ रासलीला से |
कुछ देर भी भ्रम में .
जीने नहीं दिया उसने मुझको
जिंदगी का फलसफा
कानों में फुसफुसा गया कोई  |

Saturday, 29 July 2017

सफेदी जब बालों से झाँकने लगे
दौड़ते दौड़ते जब आप हाँफने लगें
हसीं सपनें जब आपको डराने लगें
खाने में जब आप लौकी खाने लगें
बूढ़ी पत्नी तब बहुत याद आने लगे | 
पत्थर फेंकों
या फेंकों फूल
तालाब के पानी में
अब कोई हलचल नहीं होती |
फ़ेसबुक,
राहत भी है, आफ़त भी है .
भरपूर सियासत है
जो चाहो सो बोलो
लगती नहीं कोई लागत है.
काश,
थोड़ी सी फीस लग जाती
तो अच्छों अच्छों की बोलती बंद हो जाती

प्रेम नही बाकी सब है.
यह कैसा इंसाफ़ तेरा रब है
प्रेम,
एक भ्रम
हो तो अच्छा
न हो
तो और भी अच्छा .

Thursday, 27 July 2017

शब्द विनती करने लगे
शब्दकोश की तरह भीड़ में जुटने लगे
शब्द  "विरोध" ने आगे बढ़कर कहा--
महोदय अब आप
राजनीति पर कुछ नहीं लिखेंगे
क्योंकि राजनीति हमारी समझ में नहीं आती
इन नेताओं की तरह
अचानक यू टर्न लेना हमें नहीं आता
अक्सर हमारी टांग टूट जाती है  |
शब्द " आक्रोश " ने गुस्से में कहा
महोदय, लोगों द्वारा  बार-बार जंतर मंतर पर
मोमबत्तियां जलाने से आपका यह प्यारा, राजदुलारा आक्रोश नपुंसक हो गया है.
और वह डरा सहमा इंसान न जाने कहाँ जाकर सो गया है.
शब्दों को शिकायत थी
कागज़ पर उकेर देते हो
फिर किताबों में क़ैद कर देते हो |

शब्दों को हवा में घुलने दो
नदी के बहाव में बहने दो
गीत गाने लगेंगे
शब्द मुस्कराने लगेंगे 
कुछ फूल ही तो हैं इस झोली में
माँ के घर से ले आई थी डोली में |

Monday, 24 July 2017

क्यों लगाते हो गुहार
बाँझ होती है सरकार
जनता ही गर्भ धारण करती है हरबार |
पिछली बार लगे बरस दस
अभी तो गर्भ ठहरा ही नहीं है इसबार.

Saturday, 22 July 2017

हम तो बन्दर हैं
+++++++++++
एक ज़माना था
हम भी समझते थे
कि हम सिकंदर हैं |
आईना चीखता नहीं
मुस्कराता है और
हम देखते है कि
हम तो बन्दर हैं |
बाँझ सरकार
जनता ही गर्भ धारण करती है हरबार
पिछली बार लगे बरस दस
अभी तो गर्भ ठहरा ही नहीं है इसबार |
बुद्धिजीवी है 
कलम घिसता है और 
जमीन के नीचे अपनी ही बनाई 
अति सुरक्षित खोह में रहता है 
नपुंसक आक्रोश का जन्मदाता है |
बुद्धिजीवी,
नपुंसक आक्रोश का जन्मदाता 
पिता की भूमिका नहीं निभाता |
खुशनसीब बारिश की बूँद
सर्दी के स्वागत में बारिश की तैयारी है 
अपनी तो भाई 
न किसी से दुश्मनी न किसी से यारी है |
विभाजन की वेदना तो
आज भी झेल रहा है हिन्दुस्तान
हर शहर हर गांव में बसता है एक पाकिस्तान |

दो टुकड़ों में बाँट दिया
एक को हिंदुस्तान
और दूजे को पाकिस्तान कह दिया
दिल तो वही एक है जो दोनों में धड़कता है |
प्रार्थना सभा से भागते हैं लोग.
प्रार्थना को हमने इतना जटिल क्यों बना दिया है ? 
खुदा को काशी और काबा में ढूंढते हो
यही तो है तुम्हारे इंसान होने की सज़ा ||

Thursday, 20 July 2017

धीरे धीरे मरना तो प्रकृति का नियम है
हाँ जब तक आप
पिता की ऊँगली नहीं छोड़ते बड़े नहीं होते
जब तक आप
मंदिर मस्जिद का मोह नहीं छोड़ते बड़े नहीं होते
जब तक आप
अंधविश्वासों से मुक्त नहीं होते बड़े नहीं होते
जब तक आप
चमत्कारों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसते बड़े नहीं होते
न जाने क्यों
मुझे लगता है मरने से पहले बड़ा होना ज्यादा जरूरी है ?

Wednesday, 12 July 2017

दोस्ती इतिहास ही नहीं हमारा भूगोल तक बदल देती है.
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रास्ते खत्म नहीं होते ,
हम ही थक कर रुक जाते हैं.
जो करता हो हम को तुम से जुदा 
वह न मेरा खुदा,न है तेरा खुदा.
1)

हर फटेहाल की मुकद्दर लालू जैसी नहीं होती |
भूखों को उपहार स्वरुप एक रोटी नहीं मिलती ||

2)
वह जीवट का आदमी था,
हर ठोकर पर खिलखिलाकर हँसता था |
3)
हर दर्द की एक मियाद होती है, मियाद के खत्म होने का तू इंतजार कर .
हाथ जोड़ कर.
4)

फ़िज़ा की रंगत 
हवा का रुख अब शायद बदले ,
आखिर कब तलक 
चलते रहेंगे वही पुराने जुमले |
5)
अँधेरे के आगोश में 
रात को चैन से सो लेने दो.
6)

रात को दिन के 
ऊजाले में कभी देखा है ?
7)
भूख उसके चेहरे पर पसरी थी.
ख्वाइश में उसकी एक रोटी थी.
8)
शतरंज में एक घोड़ा होता है जो ढाई घर चलता है. इन बुद्धिजीवियों की चाल का तो कुछ पता ही नहीं चलता है.
9)
उन गमो का जो आपने दिए,भी तो कुछ हिसाब कीजिए.
10)
मुझे मेरी ही नजरों में गिराने की साज़िश के लिये तुम्हारा शुक्रिया
मेरे दोस्त.
11)
एकांत में मेरा अस्तित्व काँपता है 
भीड़ में मेरा व्यक्तित्व काँपता है आओ 
एकांत और भीड़ से बचे 
घर चलें.
हमारी जीभ
तुम्हारी जीभ से लम्बी है
ये सियसत क्यों इतनी गन्दी है ?

Saturday, 8 July 2017

अब जब मिलेगी भाषा
+++++++++++++++
भाषा मुझे मिली
एक बुर्राक सफ़ेद साड़ी में 
एक नजर में मुझे
वह विधवा सी लगी
विधवा को जब कोई देखता है
गलत नज़र से देखता है
उन्होंने वादा किया
गलत नज़र से बचाने का
जिंदगी भर साथ निभाने का
अपनी खोली छोड़कर
वह उसके घर रहने आई
उसने सौंप दिए सारे मोती
कर दी झोली खाली
तबसे वे सफेदपोश
खा रहे हैं उसकी दलाली
उस विधवा की सफ़ेद बुर्राक साड़ी
कर दी मैली काली काली |
अब जब भी भाषा
मुझे मिलेगी तो उसे समझाउँगा
छोड़ दो शालीनता अब
और दो उन्हें भद्दी भद्दी गाली |
अहंकार का क़द
हमेशा आदमी के क़द से बड़ा होता है
खोखली होती है जमीन
जिसपर वह आदमी खड़ा होता है ,
उफनती हुई लहरों को देखो
ऐसा लगता है
समुन्दर कभी बूढ़ा नहीं होता है |

Tuesday, 4 July 2017

बदलता है कल का व्याकरण बदलता है, आज का व्याकरण कभी नहीं बदलता |
मरने से पहले हमारे बीच हुए संवादों को प्रकाशित जरूर करवा देना ताकि दुनियाँ जान सके कि हम कितने बड़े छिछोरे थे |
देश बदलेगा जब हम बदलेंगे और हम बदलना नहीं चाहते हैं | हमारे लिए देश का मतलब केवल मैं होकर रह गया है | 
मेरे परबाबा ने मेरे बाबा को और बाबा ने मुझे बताया था खुदा के घर का पता--
ईश्वर जिस घर में रहता है उससे सटा हुआ जो घर है वहीँ तो खुदा भी रहता है |

Monday, 3 July 2017

आँखों का समुन्दर सूख जाता है 
होंठों का मुस्कराना छूट जाता है 
तब कहीं जाकर वरिष्ठ नागरिक 
होने का सम्मान आपको मिल पाता है |

Thursday, 29 June 2017

प्रकृति के साथ होना ,खुद के पास होना है ,
बरसों बीत जाते हैं खुद से मिलना नहीं होता है |
आज भी 
जंगल में कायम है 
आदमखोर शेर का दबदबा 
न कुछ बदला है, 
न कुछ बदलेगा 
जंगल है बेहद बीहड़
और हम सबके अंदर बैठा है गीदड़ |
मिले नहीं
बाकी रही कशिश
क्या यही प्यार है ?
मिल जाने पर
सब गुड़ गोबर हो जाता है
प्यार कहाँ खो जाता है ?
हमारे सपनों में
+++++++++++
जो हमारे पास होते हैं
वो
हमारे सपनों में नहीं आते |
जिनको पाने
और पास लाने की
उम्मीद अभी बाकी है
वे भी
हमारे सपनों में नहीं आते |
जिनको पाने
और पास लाने की
तिनका भर
उम्मीद नहीं होती
वे हमारे सपनों में
बेख़ौफ़ चले आते हैं |
हमारे पास होते हैं जो
वो हमारे सपनों में
कभी नहीं आते |
चिड़िया नहीं जानती 
============
बच्चे जब 
उड़ना सीख लेते हैं 
घोसला छोड़ देते हैं 
घोसला वीरान,चिड़िया अकेली
तलाशती है चिरौटा
बार बार अपना पेट भरती है
सोचती है -
अब इस बार
बच्चों को उड़ना नहीं सिखाएगी
घोसले के बाहर का आकाश
उन्हें नहीं दिखायेगी |
चिड़िया नहीं जानती कि
बच्चे खुद ब खुद
उड़ना सीख लेते हैं
पेट के लिए
घोसला छोड़ देते हैं |
हम सब
=======
अन्धे
हमें रास्ता दिखाते हैं
हम अपनी आँखें बंद किये 
उनके पीछे पीछे चले जाते हैं |
अन्धे का कहना है
ईश्वर ने मुझे दर्शन दिया
और बदले में मुझसे मेरी आँखे ले लिया
उन्हें आँखें देना गंवारा नहीं
इसलिए अपनी आँखों को
खुद ही अपने हांथों से मूँद लिया |
अन्धें ने पूछा
तुम सबको ईश्वर दिखता है
सब करने लगे हुवां हुवां |
१९८२ में लिखी एक प्रकाशित कविता | यह वह समय था जब कविता में विद्रोह की बातें ही बातें थी |
नपुंसक विद्रोह
==========
तुम जानते हो
व्यवस्था की सामर्थ्य 
इसीलिए व्यवस्था को
नपुंसक कहते हुए
तुम काँप रहे हो |
अभाव से पैदा होनेवाला
विद्रोह नपुंसक है
चंद सिक्कों में बिक जाता है |
जिसे तुम
समुचित विद्रोह कहते हो
वह व्यवस्था के सामने
भिक्षा की मुद्रा में फैला हुआ
एक भिखारी का हाथ है
और तुम्हारा सारा विद्रोह
व्यवस्था का अंग बनने के लिए
एक योजनाबद्ध प्रयास है |
अब बताओ मेरे दोस्त
कविता क्या है ?
उन गहराइयों में
जहाँ भाषा खो जाती है
तुम ढूढते रहे शब्द |
कब कौन 
चला आता है दबे पावँ
हमारे सपनों में
बस जाता है निशब्द |
उन्हें 
अपनी दुकान चलानी थी 
तो कोई न कोई कहानी तो बनानी थी 
उन्होनें कहानी सुनाई 
और हम कहानी सुनते-सुनते सो गए 
तब के सोय
अब जागेगे कब खुदा भी नहीं है जानता ?
हमें इंतज़ार है क़यामत का और
जन्नत की परियाँ
खुश हैं शैतान के साथ |

Wednesday, 14 June 2017

पिता बनने के बाद
पिता की याद बहुत आती है
बच्चों की फिक्र में
उनका रात-रात भर जागना
बैठे-बैठे ही अपना क़द नापना
बच्चों का क़द
जब अपने क़द से बड़ा पाता है
तो पिता ही है जो जश्न मनाता है |
फादर्स डे पर पिता को याद करते हुए|||||||||||||||||||||||||||||
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अवधेश निगम 
पुराने दोस्तों से मिला
सभी ने पंख नोच डाले हैं
कुदरत का करिश्मा देखो
आकाश में उड़ते हुए पंछियों की
तादाद कभी कम नहीं होती |

Tuesday, 13 June 2017

तुम मेरे लिए
अँधेरे बंद कमरे में रोशनदान हो
और तुम
स्वच्छता अभियान के अंतर्गत रक्खा गया पीकदान हो  |
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अवधेश निगम 
कोई शिकवा नहीं
कोई शिकायत नहीं
जो मिलना था,मिल गया
जो नहीं मिल सका उसका गम नहीं.ऐसा कहकर झूठ क्यों बोलूं  |

Monday, 12 June 2017

बचपन में पढ़ा था
एक संतुष्ट सुअर से
बेहतर होता है
एक असंतुष्ट सुकरात

उम्र के इस पड़ाव पर
मैंने पाया कि मैं
न गधा रहा न घोड़ा
मेरे व्यक्तित्व में
दोनों ही शामिल हैं थोड़ा-थोड़ा |
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अवधेश निगम

Sunday, 11 June 2017

मानता हूँ, दुनियाँ में क्रांतियां भूखे लोगों की वजह से ही हुई हैं लेकिन यह भी एक सच है इन भूखे लोगों को नेतृत्व हमेशा भरे पेट वालों ने ही प्रदान किया | इसीलिए हर क्रान्ति के बाद दुनियाँ में भूखे लोगों की संख्या बढ़ी ही है  |  
हाथी सदियों में कभी                  
एक-आध बार बौखलाता है
और महावत को
मारकर ही खुश हो जाता
जंगल में हो या सर्कस में
हाथी को क्या चाहिए
फलों से भरा एक हरा-भरा पेड़ |
देखे हैं बहुत शेर
एक बोतल व्हिस्की में
हो जाते हैं ढेर |

Tuesday, 6 June 2017

घर,
अब घर जैसा नहीं लगता
जैसा घर
बरसों पहले हमने देखा था
घर का घर होना अब मुश्किल है  |
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अवधेश निगम 

Thursday, 1 June 2017

मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है |

मैं एक क़तरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है
हुआ करे जो समन्दर मेरी तलाश में है।

मैं जिसके हाथ में एक फूल दे के आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है |

बेतअल्लुक़ी उसकी कितनी जानलेवा है
आज हाथ में उसके फूल है न पत्थर है |
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– कृष्ण बिहारी ‘नूर’

Wednesday, 31 May 2017

कोई मस्जिद मस्जिद चिल्ला रहा है
कोई मंदिर मंदिर चिल्ला रहा है
ईश्वर और खुदा को अगर तुम "दो" मानते हो
तो जान लो वे दोनों एक दूसरे से लिपटकर आंसू बहा रहे हैं |
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अवधेश निगम 
गधे और घोड़े का रत्ती भर फर्क है मुझमे और तुम में | तुम खुद को घोड़ा मानकर इतराते हो |  हम दोनों में सबसे बड़ी साम्यता यह है कि हम दोनों ही मांसाहारी नहीं हैं |घास तुम भी खाते हो घास हम भी खाते हैं | 

Tuesday, 30 May 2017

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WIPRO CHAIRMAN MR. AZIM PREM JI'S COMMENT ON RESERVATION:

offline

Wipro chairman Mr. Azim prem ji's comment on reservation:

5 years, 1 month ago
I think we should have job reservations in all the fields.
I completely support the PM and all the politicians for promoting this.

Let's start the reservation with our cricket team.

We should have 10 percent reservation for Muslims.
30 percent for OBC, SC /ST like that. Cricket rules should be modified accordingly.
The boundary circle should be reduced for an SC/ST player.
The four hit by an SC/ST/OBC player should be considered
as a six and a six hit by a SC/ST/OBC player should be counted as 8 runs.
An SC/ST/OBC player scoring 60 runs should be declared as a century.
We should influence ICC and make rules so that the pace bowlers
like Shoaib Akhtar should not bowl fast balls to our SC/ST/OBC player.
Bowlers should bowl maximum speed of 80 kilometer per hour to an SC/ST/OBC
player. Any delivery above this speed should be made illegal.
Also we should have reservation in Olympics. In the 100 meters race,
an SC/ST/OBC player should be given a gold medal if he runs 80 meters.
There can be reservation in Government jobs also.
Let's recruit SC/ST and OBC pilots for aircrafts which are
carrying the ministers and politicians (that can really help the country)
Ensure that only SC/ST and OBC doctors do the operations for the ministers
and other politicians. (Another way of saving the country..)
Let's be creative and think of ways and means to guide INDIA forward.
Let's show the world that INDIA is a GREAT country.
Let's be proud of being an INDIAN...
May the good breed of politicians long live..

Monday, 29 May 2017

बात हिंदी गजलों की ज़मीन पर की जानी चाहिए । यास्‍मीन खान के पास गजलों की ऐसी रवानगी है कि कोई भी उसके शब्‍द चयन, काफिये व रदीफ पर मुग्‍ध हो जाए। यहां पांचों गजलें एक से एक उम्‍दा हैं। पहली गजल तो लाजवाब है। ऐसा काफिया रदीफ अभी तक हिंदी शायरी में तो मैने पाया नहीं। क्‍या खूब कहा है--



दिलदार का ये प्‍यार कभी है कभी नहीं

ये  मौसमे बहार कभी है कभी नहीं



किस्‍तों पर हमको जख्‍म न दीजै हुजूर आप

तलवार पे ये धार कभी है कभी नहीं।



क्‍या बात है।



क्‍या सादगी है ऐसा कहने में। हिंदी शायरी की परंपरा में आज सभी गालिब व मीर नही हैं पर हिंदी गजलों को जिन लोगों ने नए मेयार तक पहुचाया है उनमें दुष्‍यंत, अदम, एहतराम इस्‍लाम, ज्ञानप्रकाश विवेक जैसे गजलगो के बाद नई पीढी में बहुतेरे हस्‍ताक्षर हैं। जैसे मंगल नसीम, विजय किशोर मानव, लक्ष्‍मीशंकर वाजपेयी, दीक्षित दनकौरी,  गौतम राजऋषि, नागेन्‍द्र अनुज, सिचा सचदेव, आलोक श्रीवास्‍तव, सोनरूपा विशाल, इंदुश्रीवास्‍तव.............आदि आदि। यास्‍मीन की ये गजलें देख कर लगा कि गजलों में इन मोहतरमा का हाथ रंवा है। गजलें तो वहीं जिनहें पढ कर दिल को सुकून मिले कुछ नया मिले। कथ्‍य मिले नया शिल्‍प मिले। यास्‍मीन की गजलें एक नए अंदाजेबयां का आग़ाज़ हैं। बड़ी बहर की गजलें लिखनी आसान नहीं। पर यास्‍मीन की और भी गजलें देखी पढी हैं यहां भी दूसरी गजल इस बात की मिसाल है। जैसे छोटी बहर में विज्ञानव्रत को महारत हासिल है वैसे ही बडी व छोटी दोनो बहर में यास्‍मीन  कामयाब गजलें कह रही हैं।


तुमने ठीक कोट किया गुलाब जी को कि उसे अपने मन के गुरूर से न सुना किसी ने तो क्‍या हुआ। वो गजल किसी से तो कम न थी जिसे हम सुना के चले गये। ओम जी आप जिस पर बाएं हाथ से भी लिख दें वह शख्‍स हीरा हो जाए। गंभीर  समाचार को बधाई  कि  उसने  ऐसी गजले छापी। ईश्‍वर तुम्‍हारी कलम को ताकत दे। तमाम युवाओं की दुआएं तुम्‍हारे नाम।








जिस राह पर जल रहे हो दिये
उस राह पर ही चलना तुम प्रिये |
राह आसान करने के तरीके
दोस्त कोई उनसे जाकर सीखे |
मार्क्स के हाथ में तिरंगा देखा
वामपंथियों को  नंगा देखा |

Sunday, 28 May 2017

रंगहीन सपनों की कोई इबारत नहीं होती
बालू के ढूह पर खड़ी कोई इमारत नहीं होती  |
धर्म वह तलवार है
जो दिखती नहीं है,
उनको भी है मालूम
धर्म के नाम पर
कत्लेआम की कोई सज़ा नहीं है ||
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अवधेश निगम 

Saturday, 27 May 2017

चाँद तेरा है
और सूरज मेरा है
रंगों से क्यों है दुश्मनी
इंद्रधनुष न मेरा है न तेरा है |

दीवार को तो ढहना है / हमें एक साथ रहना है |
इस सच को कोई बदल नहीं सकता / हमें साथ जीना है और साथ ही मरना है |

स्त्री के शब्दों पर भरोसा मत करना
स्त्री के मौन को समझना फिर उसे बाहों में भरना |
   

Friday, 26 May 2017

ढके हुए चेहरे 
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टुकड़ों टुकड़ों में 
सच को 
कैसे जानोगे 
केवल उसका हाथ देखकर
तुम उसको कैसे पहचानोगे ?
चेहरे को ढककर
घर से बाहर निकलने का चलन
अब नहीं होता यहाँ कोई मिलन
ढके हुए चेहरों में
कौन है दोस्त
कौन है दुश्मन कैसे पहचानोगे ?
अब तो यही है यहाँ की रीति
कूड़े के ढेर पर पड़ी
रो रही है प्रीति |
जिन्होंने तुम्हें पहुँचाई है चोट क्या तुम उनसे बदला लेना चाहते हो ?एक आसान सा तरीका है खुश रहो और जब भी उनसे मिलो मुस्कराते हुए मिलो |


न शिकवा है न शिकायत है
न रूठते हैं,न मनाते हैं
अब रिश्ते यों निभाये जाते हैं |
हम सुधरेंगे तो देश सुधरेगा
हमनें तो न सुधरने की कसम खा रक्खी है,
हम सुधरेंगे नहीं तो देश कैसे सुधरेगा मित्र ?

संविधान में सवाल करने की है आज़ादी
उन्हें सवाल करने में है महारत हासिल
(यह अलग बात है कि
उन सवालों के जवाब वे खुद भी नहीं जानते )
सवालों के चक्रव्यूह में
अभिमन्यु के मरने की खबर सुनने के लिए वे हैं व्याकुल | 

Saturday, 20 May 2017

स्त्री मोह से
मुक्त हो गए
तुम बुद्ध हो गए  |
अब इतना सरलीकरण भी मत करो यार
बुद्ध को समझना इतना ही आसान होता तो गली गली में मिलते बुद्ध |

दलितों और वंचितों का मसीहा
साख बढ़ती ही जाती है,
ईमानदार हो तो लालू यादव जैसा हो |
द्रौपदी का चीरहरण हर युग में होता रहा है
हर खासो-आम का भरोसा बरकरार है कि ...
देर-सबेर कृष्ण आयेंगे जरूर,,,
चीर बढ़ाएंगे जरूर,,,, पीर घटाएंगे जरूर....
कृष्ण का इन्तजार हमारे नपुंसक होने की घोषणा भी तो करता है |
अपनी नपुंसकता को नकारने के लिए वे करते हैं बलात्कार बार-बार  
सुना है-
अंत में जीत सच की ही होती
लेकिन यह कोई नहीं बताता कि
अंत से पहले ही सच अंतिम सांस लेता है |

कृष्ण का इन्तजार हमारे नपुंसक होने की घोषणा भी तो करता है |
अपनी नपुंसकता को नकारने के लिए हम करते हैं बलात्कार बार-बार  
झूठ के पैरों तले
सच को कराहते देखा है
कौन जाने सच को
मैंने देखा है या तुमने देखा है ?

सुना है अंत में जीत सच की ही होती लेकिन यह कोई नहीं बताता कि अंत से पहले ही सच अंतिम सांस लेता है |
मायका कहता है, ये बेटियां तो पराई हैं |
ससुराल कहता है, ये पराये घर से आयी हैं |
मायके भी होते हैं
ससुराल भी होते हैं,मगर
घर नहीं होते लड़कियों के |
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नामालूम
एक वक्त आता है
जब न मायका होता है
और न ससुराल बचता है
तब इन बेटियों का घर बसता है |
यही बेटियां जब सास बनती हैं
तब मायके और ससुराल का खेल फिर शुरू होता है |
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अवधेश निगम

Friday, 19 May 2017

कभी हम यक़ीनन दोस्त थे ,
यह बेरुखी दोस्ती का ईनाम है |
कभी गर अँधेरा देखकर घबरा गया ,
काँधे पर मेरे ऐ दोस्त तुम्हारे हाथ थे  | 

Tuesday, 16 May 2017

चूँकि प्यार
झूठ के ढेर पर खड़ा होता
इसीलिए आपको
उसका क़द बड़ा दिखता है |

जो झूठ बोल सकते हैं 
वे बेहतर प्रेम कविताएं लिख सकते हैं |

Friday, 12 May 2017

माँ, गैर जरूरी बातों की ओर ध्यान नहीं देती लेकिन अफ़सोस अनुसरण हम हमेशा पिता का करते हैं |

हम भी कभी जवान थे और तब तुम्हारी ही तरह जिंदगी की हक़ीक़त से अनजान थे | हममें और तुममें केवल यही तो फर्क है== मैं जवान था तुम जवान हो |


न मरने का रास्ता 
अगर मुझे मालूम होता 
तो सबसे पहले 
मैं अपना मरना स्थगित करता |

ज्यादातर लोग तो जीना शुरू करने से पहले ही मर जाते है | वैसे मौत भी तो आखिर जिंदगी की शुरुआत ही है |

ख्वाब टूटा है 
लेकिन बचपन नहीं छूटा है |

फेसबुक पर किसी की मौत की खबर पर RIP लिखने की बाढ़ सी आ जाती है, यह सब यंत्रवत होता है==== 
 यह सवेंदना नहीं है, यह शोक भी नहीं है, यह भीड़ में अपनी औपचारिक उपस्थिति दर्ज करने की कवायद मात्र है |