Monday, 29 May 2017

बात हिंदी गजलों की ज़मीन पर की जानी चाहिए । यास्‍मीन खान के पास गजलों की ऐसी रवानगी है कि कोई भी उसके शब्‍द चयन, काफिये व रदीफ पर मुग्‍ध हो जाए। यहां पांचों गजलें एक से एक उम्‍दा हैं। पहली गजल तो लाजवाब है। ऐसा काफिया रदीफ अभी तक हिंदी शायरी में तो मैने पाया नहीं। क्‍या खूब कहा है--



दिलदार का ये प्‍यार कभी है कभी नहीं

ये  मौसमे बहार कभी है कभी नहीं



किस्‍तों पर हमको जख्‍म न दीजै हुजूर आप

तलवार पे ये धार कभी है कभी नहीं।



क्‍या बात है।



क्‍या सादगी है ऐसा कहने में। हिंदी शायरी की परंपरा में आज सभी गालिब व मीर नही हैं पर हिंदी गजलों को जिन लोगों ने नए मेयार तक पहुचाया है उनमें दुष्‍यंत, अदम, एहतराम इस्‍लाम, ज्ञानप्रकाश विवेक जैसे गजलगो के बाद नई पीढी में बहुतेरे हस्‍ताक्षर हैं। जैसे मंगल नसीम, विजय किशोर मानव, लक्ष्‍मीशंकर वाजपेयी, दीक्षित दनकौरी,  गौतम राजऋषि, नागेन्‍द्र अनुज, सिचा सचदेव, आलोक श्रीवास्‍तव, सोनरूपा विशाल, इंदुश्रीवास्‍तव.............आदि आदि। यास्‍मीन की ये गजलें देख कर लगा कि गजलों में इन मोहतरमा का हाथ रंवा है। गजलें तो वहीं जिनहें पढ कर दिल को सुकून मिले कुछ नया मिले। कथ्‍य मिले नया शिल्‍प मिले। यास्‍मीन की गजलें एक नए अंदाजेबयां का आग़ाज़ हैं। बड़ी बहर की गजलें लिखनी आसान नहीं। पर यास्‍मीन की और भी गजलें देखी पढी हैं यहां भी दूसरी गजल इस बात की मिसाल है। जैसे छोटी बहर में विज्ञानव्रत को महारत हासिल है वैसे ही बडी व छोटी दोनो बहर में यास्‍मीन  कामयाब गजलें कह रही हैं।


तुमने ठीक कोट किया गुलाब जी को कि उसे अपने मन के गुरूर से न सुना किसी ने तो क्‍या हुआ। वो गजल किसी से तो कम न थी जिसे हम सुना के चले गये। ओम जी आप जिस पर बाएं हाथ से भी लिख दें वह शख्‍स हीरा हो जाए। गंभीर  समाचार को बधाई  कि  उसने  ऐसी गजले छापी। ईश्‍वर तुम्‍हारी कलम को ताकत दे। तमाम युवाओं की दुआएं तुम्‍हारे नाम।








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