ढके हुए चेहरे
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टुकड़ों टुकड़ों में
सच को
कैसे जानोगे
केवल उसका हाथ देखकर
तुम उसको कैसे पहचानोगे ?
चेहरे को ढककर
घर से बाहर निकलने का चलन
अब नहीं होता यहाँ कोई मिलन
ढके हुए चेहरों में
कौन है दोस्त
कौन है दुश्मन कैसे पहचानोगे ?
अब तो यही है यहाँ की रीति
कूड़े के ढेर पर पड़ी
रो रही है प्रीति |
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टुकड़ों टुकड़ों में
सच को
कैसे जानोगे
केवल उसका हाथ देखकर
तुम उसको कैसे पहचानोगे ?
चेहरे को ढककर
घर से बाहर निकलने का चलन
अब नहीं होता यहाँ कोई मिलन
ढके हुए चेहरों में
कौन है दोस्त
कौन है दुश्मन कैसे पहचानोगे ?
अब तो यही है यहाँ की रीति
कूड़े के ढेर पर पड़ी
रो रही है प्रीति |
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