Tuesday, 31 December 2013

नए शब्द
नहीं रचे जाते,
नए सिरे से
नई तारीखों में
शब्दों से
रचते हैं हम नए अर्थ  |

Monday, 30 December 2013

अब नहीं
आयेगा कोई कृष्ण
धर्म से पैदा होती है
जो निर्मम और आतंकी  प्रवृति
उसपर तुम्हें ही कसनी होगी नकेल 
गुजर गया
एक बरस और,
वह कभी हारता है नहीं
जो करता है कोशिश एकबार और,
हर बरस की तरह 
नववर्ष २०१४ के लिए 
शुभकामनाएँ देनें की
औपचारिकता एक बार और |

Sunday, 29 December 2013

जिसके घुंघराले बालों की
तारीफ़ करते हुए
हम नहीं अघाते थे
वह विग लगाकर चलता था
वास्तव में वह गंजा था |
कड़ी धूप में हमें छाया देगा
वह जिसे हम
छतरी समझते थे
वास्तव में
वह गिद्ध का निर्मम पंजा था  |

Saturday, 28 December 2013

अपने सपनों के बारे में
तुम्हारे ज़ेहन में जो शंकाएं हैं
अगर उनपर भरोसा करोगे
तो अपने सपनों में
तुम रंग कैसे भरोगे  ?
काँटों भरी है "आप" की राह
"आप"राह से भटकनें न पाएँ
काँटें "आप" को चुभने न पाएँ 
"आप" को मेरी शुभकामनाएँ |
जो ओस की बूँद 
पत्तियों के शिखर पर होती है 
सबसे पहले गिरती है 
धरती पर ख़ाक होनें के लिए
झाड़ू से पहले जगती है
वह
जो झाड़ू उठाती है
झाड़ू खुद नहीं उठती
झाड़ू को वह जगाती है
हाथों के श्रम को
झाड़ू का श्रम बताते हुए
तुम्हें शर्म नहीं आती है |
छतपर ,
इकठ्ठा हो गया है कूड़ा बहुत
उसमें कुछ है सहेजने लायक
कुछ है फेकनें लायक |
कूड़ा कोई भी हो
सहेजने लायक नहीं होता
कितनी भी स्वादिष्ट हो मिठाई
कुछ दिनों बाद सड़ जाती है
कितनी ही ठंडी जगह में रक्खो
सुबह का बना खाना
शाम को
अपना स्वाद खो देता है  | 

Wednesday, 25 December 2013

जिन्हें उसनें किया प्यार
उनपर भरोसा भी किया
उन सभी नें उसको धोखा दिया  |
शायद इसीलिए
उसनें मुझे प्यार तो ढेर किया
लेकिन भरोसा
तनिक भी नहीं किया  |
अक्सर मेरे ज़ेहन में
यह प्रश्न उठता है
क्या उसनें मुझे प्यार किया ?

Monday, 23 December 2013

पत्थर पर उगे पेड़
और उन पेड़ों पर
मुस्कराते हुए फूल
कितनी भी सख्त हो जमीन
पेड़ों के उगने और फूलों के खिलनें की
अनगिनित सम्भावनाएं गर्भ में समेटे हुए |

Sunday, 22 December 2013

स्त्री आमंत्रण दे और पुरुष अस्वीकार कर दे ,ऐसे वीर बालक क्या कहीं हैं ? और ऐसी स्त्री का सानिध्य जो आपको बरसों से अपना मित्र मानती हो ,ऐसी स्त्री का आमंत्रण आप कैसे अस्वीकार कर सकते हैं लेकिन वही स्त्री जब इसे बलात्कार कहती है तो त्रियाचरित्र  का मतलब समझ में आ जाता है और जब आपके अधिकाँश मित्र एवं सहयोगी उस महिला के झूठ में उसके साथ खड़े हुए दिखाई देते हैं तो आत्महत्या करने  के अतिरिक्त कुछ बचता है क्या ?
खुर्शीद भाई तुम्हें सच को स्वीकार कर लेना था,उनका झूठ स्वतः बेपर्दा हो जाता  |    

Saturday, 21 December 2013

तुम आगे
मैं तुम्हारे पीछे
एक ही दिशा में
लगातार चलते रहे
हमारे बीच
फासला बढ़ता रहा
पता ही नहीं चला
एक दूसरे की निगाह से
कब ओझल हो गए  ?

Friday, 20 December 2013


आपका समर्थन करने वालों में ,आपके साथ खड़े होने वालों में हमेशा पुरुषों की संख्या ही ज्यादा देखनें को मिली है | क्या इन पुरुषों के द्वारा आपको दिए समर्थन में कोई दुराग्रह दिखता है ? मर्द जिस भाषा में आपस में बात करते हैं ,उस भाषा में स्त्रियों से बातें नहीं करते | मर्द और स्त्री होनें का बोध ,क्या कभी इस बोध के मिटनें की सम्भावना है ? जब तक यह स्त्री और पुरुष होने का बोध है , दोगलापन इसी बोध का पर्यायवाची है |

अगर स्त्रियाँ ही हैं जिन्होंने पुरुष प्रजाति को इंसान बना रखा है तो यह जानवर किस ग्रह से आते हैं मित्र ?
इंसानों को स्त्री और पुरुष में बांटकर ,स्त्रियों के साथ अन्याय करनें में पुरुषों को सुविधा होती है  |

कुछ पुरुषों की कमजोरी होती है कि वे पुरुष प्रधान बरसों पुरानी व्यवस्था की खिलाफत नहीं कर पाते हैं और कुछ लोग इसकी खिलाफत मात्र इसलिए करते हैं ताकि  रायशुमारी के समय उनका नाम प्रगतिशीलों  में लिखा जा सके  | महिलाएँ इस बारे में क्या सोचती हैं ?पुरूषों को अपनी राय देने का कोई निषेध नहीं है|     

Thursday, 19 December 2013

खुर्शीद भाई की मौत पर ==

हर बार की तरह
अब यादों के साथ
बलात्कार का सिलसिला होगा शुरू |
कुछ लोग मरनें वाले के पक्ष में
और कुछ लोग विरोध में पंक्तिबद्ध होंगे
कुछ जोड़ी आँखें नम होंगी
और कुछ लोग
मरनें वाले को गाली देनें पर
कुटिल मुस्कराहट के साथ कहेंगे
क्या बात कही गुरु |
किसी की मृत्यु पर
उससे जुड़ी यादों के साथ
बलात्कार का सिलसिला
क्यों होता है शुरू ?
किसी की मृत्यु पर
उससे जुड़ी यादों के साथ
बलात्कार का सिलसिला
क्यों होता है शुरू ?

Wednesday, 18 December 2013

बूँद से
प्यास नहीं बुझी तो
वह
सागर की ओर चला
सागर उसे निगल गया |
अब तो 
अपनी परछाईं से भी 
डर लगता है |
खुद पर भरोसा है लेकिन 
परछाईं के किसी गुनाह में 
शामिल होने की खबर नहीं 
आपको है क्या ?

Monday, 16 December 2013

अपनी चीख के सिवा 
कोई नहीं सुनता किसी की चीख |
जैसे चाहे
वैसा उपयोग करनें के लिए
उसे सौंप दी पूरी देह
उसने उस देह में चुना
मात्र कुछ विशेष  |
कुछ दिन बाद
जब नहीं रहा उसके लिए
उस विशेष का महत्व
उसनें शुरू किया
देह को कपड़े पहनाना
और कपड़ों में लगी जेब तलाशना |

Friday, 13 December 2013

गयी भैंस पानी में 
नहीं मालूम था 
"आप" की मौत होगी जवानी में |
मरनें से पहले ही 
"आप" को तो डूब जाना चाहिए 
चुल्लू भर पानी में  |

Tuesday, 10 December 2013

पहली मुलाक़ात में ही उसकी नज़रों ने भरोसा जताया था,
भरोसा बांधता क्यों है ?
क्या इसी भरोसे को प्यार कहते हैं ?
काश,हर रिश्ते की नींव में भरोसा होता
पहली मुलाक़ात में ही
उसने इस भरोसे को परोसा होता,काश |   
बर्फ सी जमी है दिमाग में  |
दिल में लगी आग भी
पिघला नहीं पाती इस बर्फ को |
बुझा नहीं पाती दिल की आग को
दिमाग पर जमी बर्फ भी |

Monday, 9 December 2013

यह कोई मामूली घाव नहीं है
बिलबिलाने लगे हैं कीड़े,
जिसका डर था
वही हुआ आखिर
धर्म कोढ़ हो गया
जिंदगी के रास्ते में
अंधा मोड़ हो गया |

Saturday, 7 December 2013

हम बुद्धिजीवी हैं
खतरे उठाने से डरते हैं
इसीलिए
तलवार की जगह
कलम हाथ में लेकर
शोषितों का
मसीहा बननें की जुगत में लगे हैं |
यह जो सम्बन्ध बरसो-बरस निभ जाते हैं यह उन ढेरों मुखौटों के कारण ही सम्भव हो पाता है जिन्हे हम समय और परिस्थिति के अनुसार अपनें चेहरे पर बदल बदल कर चढ़ाते हैं | पारदर्शिता सम्बन्धों के टिकाऊ होने की गारंटी नहीं देती जबकि मुखौटे चढ़ाइए और सम्बन्धों के उम्रभर निभनें की गारंटी पाईये  |  

Tuesday, 3 December 2013

पहली बार प्यार
प्यार लगता है
पुनरावृति से नहीं होती
तृप्ति
हर बार नया हो कैसे प्यार ?

Sunday, 1 December 2013

फ्लॉप हो चुके शो की चर्चा क्यों करते है भाई | 
रहनुमा समझा था जिन्हें, निकले सब कसाई ||
किसी के व्यक्तित्व की पहचान उसके द्वारा दिए गए प्रश्नोत्तरों के आधार पर कभी मत करना, उत्तर तो रटे भी जा सकते हैं | जिसकी पहचान करनी हो उससे कहिये प्रश्न रखने को , किसी भी व्यक्ति के दिमाग़   में उठने वाले प्रश्न उसकी पहचान करने में आपका सही मार्गदर्शन कर सकते हैं | भोथरा व्यक्ति होगा तो उसके प्रश्न भी भोथरे होंगे | 
आस्तिकों और नास्तिकों
दोनों की दुकाने
जिसकी वजह से चल रही हैं
वह खुद नहीं जानता
आस्तिक और नास्तिक होने का अर्थ
हम यहाँ लड़ रहे हैं व्यर्थ  |
उसके होने को सच मानों
या उसके न होनें को सच मानों
यह दुनियाँ है इंसानों की इस सच को जानों |