Saturday, 31 March 2012

सर्पदंस की पीड़ा

जब तुम्हारा अनजाना अबोध
मासूम जिस्म
मेरे प्यासे शरीर से
जाने या अनजाने मैं नहीं जानता
छू गया था ,
तब मुझे ऐसा लगने लगा कि
मेरे आदिम स्वप्न साकार हो जायेंगे
अधूरी तस्वीरों में
रंग भर जायेंगे ।

उस तपते हुए क्षण में
न जाने मैंने
क्या क्या सोच डाला था
अपनी जहरीली आँखों से
तुम्हारे जिस्म को पी डाला था ।

लेकिन तुम्हारे भोले और मासूम जिस्म
की छाया में
मेरे पशु को नींद आने लगी ,
मैंने खुद को
तुम्हारे स्पर्श से मुक्त कर लिया था
अपनी जहरीली आँखों को
आंसुओं से सी लिया था ।

मैं निर्लिप्त सा उठकर
चल दिया दूर तुमसे
क्योंकि सर्पदंस की पीड़ा
मैंने लेनी नहीं चाही ।

Tuesday, 27 March 2012

एक औरत हम बिस्तर


एक औरत जो बरसों से
मेरे साथ
मेरे घर में रहती है |
हम-बिस्तर मेरे साथ
और बच्चे मेरे
... बुलातें हैं उसे माँ
मैं उसे जानता हूँ उसके नाम से
उसे शायद याद भी नहीं है
मेरा नाम |

... वह औरत जिसे मेरे बच्चे
माँ बुलाते हैं
बस इतना जानती है कि
वो और उसके बच्चो के साथ
उसके घर में
एक अजनबी रहता है |
वो मानती है और
जानती भी है कि
घर के लिए जरूरी है
एक औरत के साथ
एक मर्द का होना |

Wednesday, 21 March 2012


श्री श्री रवि शंकर का कहना है =सरकारी स्कूल के बच्चे बनते हैं नक्सली तथा निजी स्कूलों में पढ़े बच्चे संस्कारवान होते हैं |

अरे अरे यह क्या हो गया श्री श्री को अचानक निजी स्कूलों की दलाली करने लगे |शायद वे भूल गए कि आजाद भारत में जो शिक्षा का प्रसार हुआ है वह सब इन सरकारी स्कूलों के ही देन है |आजादी के बाद कौन सा निजी स्कूल गाँव या कस्बों में खुला {महोदय  कृपया अपने ज्ञान को बढाएं |आप पर जो लोगो कीआस्था है वह बनी रहे  |

Saturday, 17 March 2012

यादों के साथ


यादों के साथ
न जाने कब से
बलात्कार कर रहा हूँ
अफ़सोस कोई भी याद
गर्भवती नहीं होती ।

जाड़े की लम्बी रातों में
एक हड्डियों का ढांचा
लगातार मेरे बिस्तर पर
सोता रहा है
मेरा पौरुष रोता रहा है ।

बचे खुचे गोश्त से
अपने आप को बहलाने की कोशिश
बाँझ औरत को गर्भ ठहर जाये
यह अनहोनी कैसे हो जाये ।

फिर भी मेरी मर्दानगी
पत्थर पर दूब उगाने में
व्यस्त है

Thursday, 8 March 2012

सम्प्रेषण




सम्प्रेषण


सम्प्रेषण  हल न बन सका
मात्र इतना हुआ कि
एक छोटी सी बात का कद
कुछ और घट गया ।                                                             

Wednesday, 7 March 2012

आंधी डरती है

आंधी डरती है

वह निकला
आंधी की वजह खोजने
उसने पेड़ो को चुपचाप खामोश खड़े पाया ।              

रफ़्तार हवा की लगातार
बढती जा रही है
दहलाती है हवा की चीख ।

पेड़ जब भी इस तरह
खामोश हुआ है
हवा आदमखोर आंधी हो गयी है ।

वह तने से चिपक कर
पेड़ को झिझोड़ रहा है
ताकि पत्तियों में
कम्पन पैदा हो सके ।

वह जानता है कि आंधी
पेड़ो के हिलने से डरती है ।




Tuesday, 6 March 2012

घर




घर


चिरौटा मर गया
चिड़िया घर तालाश्ती है,
एक चिरौटे की मौत से
मरती नहीं घर की ख्वाहिश,
चिड़िया को चाहिए घर
(चिरौटा कोई भी हो )

एक प्रेम कविता


एक प्रेम कविता  

चन्द रोज और
फिर हम तुम  दोनों
अपने अपने घेरों में कैद
एक दूसरे की पहुँच  से दूर
अनुपस्थित में भी
एक दूसरे से जुड़ जायेंगे
हम अचानक अपनी उम्रों से
बहुत छोटे हो जायेंगे |

 
मेरा बच्चा मुझे पापा
तुम्हारा बच्चा तुम्हे माँ
कहकर जगायेगा
अपनी तोतली भाषा में
हमें बड़े होने का अहसास कराएगा |
बार बार छोटे और फिर बड़े
होने की इस प्रकिया में
हम न छोटे और न बड़े
ही रह पाएंगे
एक दिन दहलीज पर खड़े -खड़े
हम देखेंगे क़ि
हमारे बच्चे
हमसे भी बड़े हो गए हैं ।

काश .......

काश .......

काश कुछ ऐसा करिश्मा हो जाये
दिल और दिमाग को लकवा मार जाये
मैं न खुश हो सकू
न उदास
बस हो सकू

कुमार अवधेश

चिता की रोशनी में

चिता की रोशनी में

श्मशान की ख़ामोशी में
उन्मुक्त हास्य भी
रुदन मालूम पड़ता है
चिता की रोशनी में
हर आदमी
सन्यासी दिखाई पड़ता है |

बेटू

बेटू
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आज तुम अपने पैरों पर
खड़े होने की कोशिश
कर रहे थे ।

चारपाई को पकड़ कर
खड़े होते
सम्हलते
चारपाई छोड़ देते
और इस तरह तुम बार बार गिरते ।

तुम्हारी इन सारी हरकतों
के दौरान
तुम्हारे कन्धों पर
मैं पहाड़ो का उगना देखता रहा ।

तुम्हे मालूम है बेटू
जब मुझे अपने पैरों पर
चलना आया था
कई पहाड़ों को एक साथ
 अपने कन्धों पर
बैठा हुआ पाया था ।

Sunday, 4 March 2012

क्षितिज के पार


क्षितिज के पार



एक दीवार थी ,जो रोकती थी
एक ऊँगली थी ,जो टोकती थी
दीवार मैंने लांघ ली है और
ऊँगली मैंने तोड़ दी है
और अब रास्तें हैं 
यह रास्ते जहाँ ले जातें हैं
चला जाता हू
किसी मंजिल की दरकार नहीं है
और न ही जानना चाहता हू
क्षितिज के पार की हकीक़त
मैं नापना चाहता हू
रास्ते जो कभी ख़त्म नहीं होते

पैरों के विरूद्ध

पैरों के विरूद्ध
बच्चा खेलता रहा
खिलौनों से
तुम सपनो से |
तुम्हे मालूम न था
टूट जाते हैं और फिर खरीदे नहीं जाते
सपने खिलौने नहीं होते |

तुम्हें भी खिलौनों से खेलना था
टूटते, खरीद लाते
इस तरह तुम टूटने से बच जाते |
घुटनों के बल
चलते हुए
जब जब तुमने
अपने पैरों पर चलने की बात सोची
हर बार तुम्हारी आँखों में
एक सपना ठूंस दिया गया
 सपना एक साजिश है
वयस्क होने की संभावनाओं और
पैरों के विरूद्ध |