Saturday, 31 March 2012

सर्पदंस की पीड़ा

जब तुम्हारा अनजाना अबोध
मासूम जिस्म
मेरे प्यासे शरीर से
जाने या अनजाने मैं नहीं जानता
छू गया था ,
तब मुझे ऐसा लगने लगा कि
मेरे आदिम स्वप्न साकार हो जायेंगे
अधूरी तस्वीरों में
रंग भर जायेंगे ।

उस तपते हुए क्षण में
न जाने मैंने
क्या क्या सोच डाला था
अपनी जहरीली आँखों से
तुम्हारे जिस्म को पी डाला था ।

लेकिन तुम्हारे भोले और मासूम जिस्म
की छाया में
मेरे पशु को नींद आने लगी ,
मैंने खुद को
तुम्हारे स्पर्श से मुक्त कर लिया था
अपनी जहरीली आँखों को
आंसुओं से सी लिया था ।

मैं निर्लिप्त सा उठकर
चल दिया दूर तुमसे
क्योंकि सर्पदंस की पीड़ा
मैंने लेनी नहीं चाही ।

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