Saturday, 30 August 2014

याद आता है पंगत में बैठकर खाना
धीरे-धीरे चलकर पूड़ियों का आना 
रायते का दोने से बिखर जाना 
कद्दू की सब्ज़ी बैगन का भरता 
चटनी के साथ पापड़ का कुरकुराना
कुल्हड़ का बार-बार लुढ़क जाना
आखिर में मीठी बूंदियों का आना
उँगलियों को चाटना और फिर
मीठी उँगलियों को कुल्हड़ में डुबोना
पत्तल के साथ कुल्हड़ उठाना
और कूड़े के ढेर पर फेंक आना
कुत्तों के झुण्ड का जुट जाना
याद आता है पंगत में बैठकर खाना
परमेश्वर 
परमपिता नहीं रहे 
रिश्ते बदल गए हैं 
अब पिता है आदमी 
और आदमी का पुत्र है भगवान |
कृष्ण के साथ ही 
राधा की जोड़ी जमती है 
जब मैं शंकर नहीं हूँ 
तो वह पार्वती कैसे हो सकती है ? 
शंकर का सानिध्य पाती 
तो कोई भी स्त्री पार्वती हो जाती |
कभी कहते हो 
ईश्वर ने हममें प्राण फूंके 
कभी ईश्वर में प्राण फूंकते हो 
यह तुम क्या करते हो ?
लिखिए या मत लिखिए 
खुदको बड़ा कवि घोषित कर लीजिए
जो कुछ भी है स्व-घोषित है 
किताबों का छपना और पुरष्कारों का मिलना 
आज सब कुछ स्व-वित्तपोषित है |
सत्य यह है कि 
सूरज न उगता है न अस्त होता है
यथार्थ यह है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है 
और सूरज उगता और अस्त होता प्रतीत होता है |
जब उन्हें 
गिरगिट कहा जाता है 
वे शर्माते नहीं
केवल अपना रंग बदल लेते हैं 
राष्ट्रीय सम्मान की तालिका में 
उनका नाम सबसे पहले आता है 
जिन्हें रंग बदलने का हुनर आता है |

(केवल वर्तमान सन्दर्भ में ग्रहण करें )
अगर संतान न होने का कारण पुरुष में मौजूद है तो संतानोत्पत्ति के लिए स्त्री को भी बगैर तलाक़ दिए दूसरी शादी करने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए | माननीय शंकराचार्य स्वरूपानंद इस बारे में क्यों रहे मौन ?

2) अक्सर जो हमें स्नेह और सम्मान देता है हम उसके प्रति लापरवाह हो जाते हैं ,उसके जाने के बाद उसके होने का अर्थ जान पाते हैं |
यह कर्मकांड और 
पूजा/ प्रार्थना करने की 
अलग-अलग विधियाँ ही तो आती हैं आड़े 
मंदिर और मस्जिद 
बना दिए गए हैं धर्म के अखाड़े |
देवी देवताओं की मूर्तियों में यह "प्राण प्रतिष्ठा" का क्या नाटक है ? ओह,अपनी मनौतियों को पूरा करने का सामर्थ्य इन मूर्तियों को हम देते हैं और फिर इनके चरणों में लोटकर इनसे वर लेते हैं |
प्रश्न ? सो रहे हैं
प्रश्नों की तलाश में 
उत्तर भटक रहे हैं |
कभी कभी 
दिल और दिमाग को 
लकवा मार जाता है 
दिमाग में प्रश्न नहीं उठते 
और दिल धड़कना भूल जाता है
कभी-कभी ऐसा क्यों हो जाता है ?
जन्नत का लालच भी 
उन्हें गुनाह करने से रोक नहीं पाता है 
हाँ, कुछ क़ाफिरों का क़त्ल 
उनके हाथों से जरूर हो जाता है
ईर्ष्या से बचें
खुश रहें
मुश्किल है,नामुमकिन नहीं
उदासी का शर्तिया इलाज
दूसरों की खुशियों में
शामिल होना सीखें  |

Wednesday, 27 August 2014

स्त्रियां ही नहीं
पुरुष भी बाँझ होते हैं
इन बाँझ पुरुषों के
बाँझ होने का दर्द और
तिरस्कार भी स्त्रियां ही सहती हैं |
याद आता है पंगत में बैठकर खाना
धीरे-धीरे चलकर पूड़ियों का आना
रायते का दोने से बिखर जाना
कद्दू की सब्ज़ी बैगन का भरता
चटनी के साथ पापड़ का कुरकुराना
कुल्हड़ का बार-बार लुढ़क जाना
आखिर में मीठी बूंदियों का आना
उँगलियों को चाटना और फिर
मीठी उँगलियों को कुल्हड़ में डुबोना
पत्तल के साथ कुल्हड़ उठाना
और कूड़े के ढेर पर फेंक आना
कुत्तों के झुण्ड का जुट जाना
याद आता है पंगत में बैठकर खाना  

Saturday, 23 August 2014

हिन्दू लड़का
मुस्लिम लड़की से
शादी कर ले तो सब ठीक
हिन्दू लड़की
मुस्लिम लड़के से
शादी कर ले तो वह है ढीठ  |
प्रकृति ने तो
स्त्री और पुरुष को बनाया
फिर उनके बीच
यह धर्म कहाँ से आया
कैद कर लो
धर्म को देहरी से बाहर
पाँव मत रखने दो  |   

Thursday, 21 August 2014

वो मुसलमान परस्त थे
ये हिन्दू परस्त होने का पीटते हैं ढिंढोरा
ये और वो दोनों एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं
वो मुसलमान से शुरू करते थे
और थोड़ी देर बाद हिन्दू पर आते थे
ये हिन्दू से शुरू करते हैं और मुसलमान तक आते हैं
हिन्दू और मुसलमान बार-बार दोहराते हैं
स्त्री की शुचिता इन्हें भी बहुत प्यारी है
ये एक न एक दिन
महिलाओं को पहना देंगे बुर्का
न हिन्दू को न मुसलमान को  
ये चाहते हैं केवल पुरुष को खुश करना  |      

Wednesday, 20 August 2014

एक व्यक्ति
नया-नया राजनीति में आया
राजनीति के धुरंधर कहे जाते थे जो
उनके चरणों में बैठ गया
पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगा
गुरदेव मुझे भी राजनीति सिखाओ
धुरन्धर जी मुस्कराये और बोले=
भारत में राजनीति करना है
तो एक ही मन्त्र है
मौक़ा देखकर कभी हिन्दू-हिन्दू
और कभी मुसलमान-मुसलमान चिल्लाओ
कभी आरक्षण का करो विरोध
और कभी आरक्षण के पक्ष में
धरने पर बैठ जाओ |

Tuesday, 19 August 2014

कविता
जब आवश्यकता से अधिक
लम्बी हो जाती है
अँधेरे में भी नहीं पढ़ी जाती है
आलोचकों के लिए
आसान होता है उसका महिमा मंडन
क्योकि एक पाठ में
वह कभी नहीं पढ़ी जाती है
महाकाव्य की तरह
किताबों में क़ैद कर दी जाती है
और पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाती है
कभी-कभी कोई छात्र उस लम्बी कविता को
शोध का विषय बनाता है
और शोध के दौरान ही उस कविता से ऊब जाता है |  

Sunday, 17 August 2014

वे त्रस्त हैं
फिर भी शव की आराधना में व्यस्त हैं |
पत्थर को घिस-घिसकर
एक बुत बनाते हैं
फिर सारा जीवन
उसकी पूजा अर्चना में गवांते हैं
वे यों ही मस्त हैं
किसने कहा वे त्रस्त हैं  ? 
वे त्रस्त हैं
फिर भी शव की आराधना में व्यस्त हैं |
पत्थर को घिस-घिसकर
एक बुत बनाया
फिर सारा जीवन
उसकी पूजा अर्चना में गंवाया
वे यों ही मस्त हैं |

Saturday, 16 August 2014

जो हमेशा प्यार करती प्रतीत होती है
प्रेमिका कही जाती है
जो नफरत की हद तक प्यार करती
पत्नी कहलाती है
जो बार-बार
अपने प्यार का इज़हार करता है
वह ढोंगी नहीं प्रेमी है
जो कहता नहीं है
वह पति प्यार नहीं करता है |    
खिसियानी बिल्लियाँ 
एक ही खम्बे को नोचने में व्यस्त हैं 
उस खम्बे की ताक़त बढ़ती है
जिस खम्बे को 
इतनी बिल्लियाँ एक साथ नोचती हैं |
कुछ तथाकथित बुद्दिजीवियों का मानना है कि मोदी जी के पास एक जादू की छड़ी है जिससे वे चाहें तो रातो-रात देश को सभी समस्याओं से निजात दिला सकते हैं और उनकी शिकायत यह है कि मोदी जी जानबूझ कर ऐसा नहीं कर रहे हैं | मोदी जी के सामर्थ्य पर उनके भरोसे को नमन |
आजतक
विकसित नहीं कर पाये
अपना एक तंत्र
फिर भी हैं हम स्वतन्त्र |
उधार का तंत्र
स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएँ देना तो बनता है |

Wednesday, 13 August 2014

मुझे जो कहना था
कह दिया लेकिन
सम्प्रेषण हल न बन सका
मात्र इतना हुआ कि
एक छोटी सी बात का
क़द कुछ और घट गया  |
ठिठुरन से मुक्ति की चाह में
जब मैं अलाव की सेंक लेने बैठा था
तब मुझे यह नहीं मालूम था कि
ठिठुरन से मुक्ति के बदले
मेरा सब कुछ जल जाएगा  |

Tuesday, 12 August 2014

रक्षाबंधन 
अपनी रक्षा के लिए बहन द्वारा भाई से याचना का पर्व 
रक्षा कवच है अगर तो बहन की कलाई पर भाई को बाँधना चाहिए न |
धर्म ने आकर 
आपके कान में कहा
आओ मेरे साथ चलो 
मेरे पास इंसान बनने के सैकड़ों नुस्खे हैं 
आप धर्म से लिपट गए 
धर्म की ऊँगली पकड़कर चलते हुए
आप इंसानियत से दूर हो गए
हिन्दू और मुसलमान बनकर रह गए
अब निर्णय आपको करना है
धर्म की ऊँगली छोड़ना है
या पकड़कर रखना है |
काश ! धर्म निसंतान होता 
न होता कोई हिन्दू 
न होता कोई मुसलमान 
धरती पर दिखता केवल इंसान |
एक व्यक्ति
नया-नया राजनीति में आया
राजनीति के धुरंधर कहे जाते थे जो
उनके चरणों में बैठ गया
पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगा
गुरदेव मुझे भी राजनीति सिखाओ
धुरन्धर जी मुस्कराये और बोले=
भारत में  राजनीति करना है
तो एक ही मन्त्र है
मौक़ा देखकर कभी हिन्दू-हिन्दू
और कभी मुसलमान-मुसलमान चिल्लाओ
कभी आरक्षण का करो विरोध
और कभी आरक्षण के पक्ष में
धरने पर बैठ जाओ   |  

Monday, 11 August 2014

हमारे पुरखों ने
जो दरवाजे बंद कर दिए
उन्हें खोलने का प्रयास
हमनें कभी नहीं किया |

बंद दरवाजों से
निकलने की कोशिश
जब कामयाब होती है
सही मायनों में
जिंदगी तब शुरू होती है | 

Sunday, 10 August 2014

मनुष्य होने की कोशिश में
हम धर्म से लिपट जाते हैं और
मनुष्यता से बहुत दूर चले जाते है
हिन्दू या मुसलमान बनकर मर जाते हैं  |

जोड़ता नहीं
विभाजित करता है धर्म
पेड़ से फूल को तोड़ता है |

मनुष्य होने की कोशिश में
हम धर्म से लिपट जाते हैं और
मनुष्यता से बहुत दूर चले जाते है
हिन्दू या मुसलमान बनकर मर जाते हैं  |

ये बेहूदे भी
खुदा के बन्दे हैं
लेकिन अंधे हैं  |

न ईश्वर के अस्तित्व को नकारता हूँ
न ईश्वर के अस्तित्व को
आकार देने का दम्भ पालता हूँ
तमाम पूजा पाठ,कर्मकांड और धर्म की कालिख
जो ईश्वर के चेहरे पर पोत दी गयी है उसे हटायें
अपने चेहरे पर चढ़ा रक्खी है जो धर्म की नक़ाब
हिम्मत है तो उसे उतारकर
अपना चेहरा ईश्वर को दिखाएँ ज़नाब |

Saturday, 9 August 2014

झूठ बोलने से पहले
कसम खाने का रिवाज़ है
और सच
सच तो एक हसीन ख्वाब है
अब सच में
न कोई आब है,न कोई ताब है |
गीता और क़ुरान की आड़ में
हर रोज़ बोले जाते हैं करोड़ों झूठ
अफ़सोस होता है
जब सर्वज्ञाता, सर्वव्यापी ईश्वर भी
झूठ को पकड़ नहीं पाता है
और थक-हारकर
झूठ की भीड़ में शामिल हो जाता है  | 
अक्सर हम
ज़ुल्म करनेवालों के पक्ष में खड़े होते
और उनके पक्ष में बेहूदे तर्क देते हैं
उनके पक्ष को
और वजन देने के लिए
तमाम धार्मिक किताबों को ढोते हैं
अक्सर हम
ज़ुल्म उनपर ढाते हैं
जो बेहद कमजोर होते हैं    |
2)
अक्सर हम
ज़ुल्म करनेवालों के पक्ष में खड़े होते
और उनके पक्ष में बेहूदे तर्क देते हैं
उनके पक्ष में दिए तर्कों को
और वजन देने के लिए
तमाम धार्मिक किताबों को ढोते हैं
अक्सर हम
ज़ुल्म उनपर ढाते हैं
जो बेहद कमजोर होते हैं    
वे पत्थर मारते रहे 
मैं उन पत्थरों को समेटकर
हर बार उन्हें सौंपता रहा 

लेकिन पत्थर मारने का 
उनका हौसला आज भी कम नहीं हुआ |
एक ऐसा वक्त आता है
जब पेड़ के
दिल और दिमाग को
लकवा मार जाता है
ऐसे लकवाग्रस्त पेड़ पर
कोई पंछी घोसला नहीं बनाता है |

Friday, 8 August 2014

कितने हिन्दुओं के घरों में गीता पढ़ी जाती है ? कितने मुसलमानों द्वारा क़ुरान पढ़ी जाती है ?
उपरोक्त सवालों को लेकर एक सर्वे कराइये हक़ीक़त सामने आ जायेगी | पढ़ना तो दूर हर हिन्दू/ मुसलमान के घर में गीता/ क़ुरान का मिलना भी संदिग्ध है | हाँ,अदालतों में गीता और क़ुरान पर हाथ रखकर झूटी कसम खाने और चन्द लोगों द्वारा धार्मिक भावनाएं भड़काने का प्रचलन आज भी देश में है |     

Thursday, 7 August 2014

माँ ने
कभी कुछ लिखा नहीं
बच्चों के रूप में
कविताओं को रचा है |
हम व्यर्थ ही
कवि होने का दम्भ पालते हैं
हमारे द्वारा लिखी कोई भी कविता
माँ द्वारा रची गयी
कविता के सामने टिकती नहीं है |

Wednesday, 6 August 2014

कलम जिसके हाथ में होती है 
उसका मजहब बखूबी पहचानती है 
कलम अपने मालिक से बगावत नहीं करती 
कलम जिस हाथ में होती है 
उसी की गुलाम होती है |
बच्चे 
साझा करते हैं 
माँ-बाप के गुणों को |
फिर हममें
ईश्वर के गुण क्यों नहीं दिखते ?

2)
जो है वही तो 
सपनों में आता है 
ईश्वर मेरे सपनों में 
कभी नहीं आया |
मैंने कहा
तुमने भर दी हामी
सोचता हूँ मैंने तुमसे
पहले क्यों नहीं कहा ?
व्यर्थ ही
तुमसे दूर रहने का दर्द सहा  | 

Sunday, 3 August 2014

ये दुनियाँ
"मैं" और "तुम" में बटी है
आदमी बड़ा हठी है |
बार-बार लात खाता है
फिर भी
"हम" से घबराता है  | 

Saturday, 2 August 2014

जब वे
प्रेमी-प्रेमिका थे
अच्छे दोस्त थे
तन ही नहीं, मन भी छूते थे
पति-पत्नी बनते ही
केवल तन छूते रहे
मन से हो गए दूर  
दोस्त कहीं गुम हो गया
और एक दूसरे से
झूठ बोलने का सिलसिला शुरू हुआ |