Sunday, 7 October 2018

१)
दीवार तुम उठाते हो
दोषी हमें ठहराते हो.
२)
एक झूठ से
कैसे छिपाओगे
बरसो की लूट.
३)
अहंकार
आपको महसूस ही
नहीं होने देता कि आप ग़लत हैं.
४)
जेएनयू के बाड़े में क़ैद वे खुश हैं
उन्हें खुश रहने दीजिये न जनाब..
५)
हर फसाद की जड़ में बैठा है एक खुदा
वह मेरा खुदा है या तेरा खुदा तू ही बता.
६)
जमीं से आसमां तक ढूंढ आए
फिर भी हम खुद को न ढूंढ पाए 
१)
वह,
चांदनी रातों में
घर से निकलता है
सूरज के ताप से डरता है.
२)
दर्द कम हों जहां
ऐसा नहीं कोई जहां ?
३)
तब न कह सका
अब न कहूँगा,चुप रहूंगा

तुमने ही तो कहा था
बात कहने से छोटी हो जाती है
उस बड़ी बात को
अब छोटी नहीं करूंगा
कुछ नहीं कहूँगा,चुप रहूंगा.

उम्र के इस पड़ाव पर
मेरा मन
जानता है भाषा का बौनापन
इसलिए चुप रहूंगा, कुछ नहीं कहूँगा
1)

दीवारों के भी कान होते हैं यही तो है कहावत
उस हाथी से डरिये जिसपे बैठा न हो महावत.

2)
मेरी वे हरकते जो कभी तुम्हें बेहद पसंद थी
उन्ही बातों से अब तुम्हें दिक्कत है क्या किया जाए.
वो शख्स जिसके लहजे से दिखा करती थी कभी बेबाकी
वही अब तर्क गढ़ता है मार्क्सवादी क्या किया जाए
उसे करवट बदलकर अब नहीं सोने की आदत है
वह अक्सर अब झाड़ता है लफ्फाजी क्या किया जाए
बहुत सीधा सरल था वह हमारे बचपने में
बुढ़ापे में हो गया है बदमाश पाज़ी क्या किया जाए
3)

गजब का यह अहंकार है 
दर्पण के पहले दीवार है.
4)
कम्युनिस्टों का बहुत पुराना फंडा
सलेक्टिव चुप्पी और सेलेक्टिव विरोध 
जब अपनी गलती हो तो दूसरों के सिर पर फोड़ो अंडा. .
1)

गांधी अगर आज होते तो उनकी सरपरस्ती में ही पाकिस्तान द्वारा सारी आतंकी गतिविधियों का संचालन हो रहा होता तथा पुरस्कार वापसी गैंग की अगुवाई गाँधी खुद कर रहे होते.
चुनाव से पहले सभी पार्टियों ने
अपनी अपनी दुकाने सजा ली है.
अब तो चुनाव में
धर्म का ही सिक्का चलता है
कभी राम बिकता है तो कभी शंकर बिकता है.
उनके सपनें में शंकर आते है
और वे शंकर के कहने पर
मानसरोवर की यात्रा भी कर आते हैं.
अब तो विष्णु का मंदिर भी बनेगा
और फिर राम और विष्णु में युद्ध ठनेगा
यह है चुनाव की राम लीला और नेताओं की रासलीला. .

Wednesday, 25 July 2018

वामपंथियों ने कभी वंशवादी और भ्रष्ट कांग्रेस की पूंछ पकड़ी तो कभी अवसरवादी लालू, मुलायम, नीतीश, करूणानिधि जैसों का पिछलग्गू बनकर चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश की। यह राजनीतिक अवसरवाद निश्चित ही इनके लिए आत्मघाती साबित हुआ.वामपंथ आज अप्रासंगिक हो चुका है.वामपंथियों के थिंक टैंक के दोगलेपन ने उन्हें जनता के सामने नंगा कर दिया है. हजारों वर्षों की गुलामी ने हमारे  DNA  को प्रभावित किया है .इस देश के बुद्धिजीवियों ने भ्रष्ट सिस्टम के पक्ष में खड़े होकर उसे ताक़तवर बनाने में मदद की है और बदले में खूब मलाई खाई. 

Sunday, 22 July 2018

जब जो किया
अधूरे मन से किया

सम्पूर्णता में
एक क्षण भी नहीं जिया

न खुलकर हंसा
न जीभर रोया

जाना तो होगा ही
अब बचा ही क्या है

मनचाहा जो भी जिया
सपनों में ही जिया 

Monday, 16 July 2018

क्रांतिदर्शी कबीर
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मोको कहाँ ढूंढें बन्दे,मैं तो तेरे पास में
न मैं देवल न मैं मसजिद,न काबे कैलाश में
न तो कौने क्रियाकर्म में,नहीं योग बैराग में
--------- 

कबीर कहते है कि ईश्वर न तो मंदिर में है न मस्जिद में और ईश्वर कैलाश पर्वत पर भी नहीं मिलेगा ,ईश्वर किसी क्रिया या वैराग्य से भी उपलब्ध नहीं होगा. हर देह में प्राण के रूप में ईश्वर विद्यमान है इसलिए उसकी तलाश देह के भीतर ही करनी होगी . कबीर जब तीर्थों और क्रिया कर्म के पाखण्ड के खिलाफ खड़ा होकर इनकी निरर्थकता की ओर इशारा करते हैं तो सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बन जाते हैं. आज जब तमाम अपने को प्रगतिशील घोषित करने वाले बुद्धिजीवी मंदिर- मस्ज़िद के खिलाफ खड़ा होने का साहस नहीं जुटा पाते हैं तब अपने समय में कबीर ने यह काम कर दिखाया था.

आज देश में धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले बहुत हैं लेकिन उनके पास दो छड़ियाँ हैं एक से वे हिन्दू को हांकते हैं और दूसरी से मुसलमान को हांकते हैं. कबीर के पास केवल एक ही छड़ी थी जिससे वे हिन्दू  मुसलमान दोनों को हांकते थे. कबीर ने मानवमात्र के लिए सामान्यधर्म की प्रतिष्ठा करनी चाही,वह धर्म नहीं जो किताबों और ग्रंथों में बंधा रहता है,जो रूढ़ियों और रिवाजों में फंसा रहता है. कबीर ने मध्यकाल में कहा था--
कांकर पाथर जोरि के,मस्जिद लियो बनाय
ता पर मुल्ला बांग दे, बहरो हुआ खुदाय

आधुनिक काल में जब मनुष्य अधिक बुद्धिजीवी अधिक तार्किक हुआ है तब भी मस्जिदों में ध्वनि विस्तारक यंत्रों के माध्यम से नमाज अदा करता है. मुहल्लों मुहल्लों में हिन्दुओं के द्वारा अखंड रामायण का पाठ चिल्ला -चिल्लाकर यंत्रवत किया जाता है | मंदिर में रक्खे पत्थर को पूजने वाले हिंदुओं पर कटाक्ष करते हुए कबीर कहते हैं-
पाथर पूजे हरी मिले,
तो मै पूजू पहाड़ !
घर की चक्की कोई न पूजे,
जाको पीस खाए संसार !!”

रिश्वतखोरी, शोषण से एकत्रित पैसे को तथाकथित धार्मिक कार्यों में खर्च करके कुछ लोग अपने को कुकृत्य के दुष्परिणामों से मुक्त होने का भ्रम पालते हैं,इसीलिए तो कबीर ने बहुत पहले ही कह दिया था-

तीरथ तो सब बेलड़ी,सब जग मेल्या खाइ |
कबीर मूल निकंदिया ,कौन हलाहल खाइ ||
मन मथुरा दिल द्धारिका,काया कासी जाणि |
दसवां द्धारा देहुरा ,तामें जोति पिछानि   ||

धर्म के नाम पर हिंसा का जो दौर चल रहा है उसमें कबीर की विशुद्ध अहिंसावादी दृष्टि नया आलोक बिखेरती है. धर्म के नाम पर पशुओं की ह्त्या तथा धर्म के नाम पर आदमी की ह्त्या करनेवालों पर कबीर ने बहुत गहरी चोट की है--
दिन भर रोजा रहत हैं रात हनत हैं गाय --

कबीर अपने जीवनकाल में जिन समस्यायों और समाज   में फैली कुरीतियों से जूझ रहे थे वे सब हमारे समाज में रूप बदलकर आज भी मौजूद हैं.इसीलिए कबीर साहित्य की प्रासंगिकता आज भी बानी हुई है |
कबीर ने ६ सौ बरस पहले जो संघर्ष छेड़ा था उस संघर्ष को आगे बढ़ानेवाला निर्भीक एवं जुझारू व्यक्तित्व जो खुलकर ईमानदारी से सच को सच और झूठ को झूठ कह सके समय ऐसे व्यक्ति की तलाश में आज भी है. |
अंत में -
”कबीरा कुंआ एक हैं,
पानी भरैं अनेक ।
बर्तन में ही भेद है,
पानी सबमें एक ॥”
कबीर टीका लगाने वाले सन्त नही बल्कि समतावादी और मानवतावादी विचारधारा के प्रणेता थे।

मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे ,
मैं तो तेरे पास में।
ना मैं तीरथ में, ना मैं मुरत में,
ना एकांत निवास में ।
ना मंदिर में , ना मस्जिद में,
ना काबे , ना कैलाश में।।
ना मैं जप में, ना मैं तप में,
ना बरत ना उपवास में ।।।
ना मैं क्रिया करम में,
ना मैं जोग सन्यास में।।
खोजी हो तो तुरंत मिल जाऊ,
इक पल की तलाश में ।।
कहत कबीर सुनो भई साधू,
मैं तो तेरे पास में बन्दे…
मैं तो तेरे पास में…..
 

सद्गुरु कबीर ने अन्धविश्वास, पाखंड, भेदभाव, जातिप्रथा, पर करारी चोट की थी जैसे-
” जो तूं ब्रह्मण , ब्राह्मणी का जाया !
आन बाट काहे नहीं आया !! ”– कबीर
 अपने आप को ब्राह्मण होने पर गर्व करने वाले ज़रा यह तो बताओ की जो तुम अपने आप को  महान कहते तो फिर तुम किसी अन्य रास्ते से पैदा क्यों नहीं हुआ ? जिस रास्ते से हम सब पैदा हुए हैं, तुम भी उसी रास्ते से ही क्यों पैदा हुए है ?


कोई आज ये बात बोलने की ‘हिम्मंत’ नहीं करता जो  कबीर सदियों पहले कह गए।
“लाडू लावन लापसी ,पूजा चढ़े अपार
पूजी पुजारी ले गया,मूरत के मुह छार !!”
 आप जो भगवान् के नाम पर मंदिरों में दूध, दही, मख्कन, घी, तेल, सोना, चाँदी, हीरे, मोती, कपडे, वेज़- नॉनवेज़ , दारू-शारू, भाँग, मेकअप सामान, चिल्लर, चेक, केश इत्यादि माल जो चढाते हो, क्या वह बरोबर आपके भगवान् तक जा रहा है क्या ?? आपका यह माल कितना % भगवान् तक जाता है ? ओर कितना % बीच में ही गोल हो रहा है ? या फिर आपके भगवान तक आपके चड़ाए गए माल का कुछ भी नही पहुँचता ! अगर कुछ भी नही पहुँच रहा तो फिर घोटाला कहा हो रहा है ? ओर घोटाला कौन कर रहा है ?
सदियों पहले दुनिया के इस सबसे बड़े घोटाले पर कबीर की नज़र पड़ी | कबीर ने बताया आप यह सारा माल ब्राह्मण पुजारी ले जाता है ,और भगवान् को कुछ नहीं मिलता, इसलिए मंदिरों में ब्राह्मणों को दान करना बंद करो |

तत्कालीन देशकाल में समाज में व्याप्त धार्मिक आडम्बर -कुरीतियों पर उन्होंने अपनी रचनाओं में दुस्साहस के साथ प्रहार किये . अपने कार्य-व्यवहार और अभिव्यक्ति से उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम कट्टरपंथियों को बड़ा दुश्मन बना लिया . तत्कालीन जड़वत विचारधारा ,प्रतिमानों  के अंधभक्तों के समक्ष  सत्य का उद्घाटन करते हुए खुलेआम कहना ” हम ना मरहिं,मरहिं संसारा, हमको मिला जियावन हारा” या “ज्यों तिल माहिं तेल है ,ज्यो चकमक मे आगि ,तेरा साईं तुज्झ मे जागि सके तो जागि” जैसे वचन  निश्चित ही क्रांतिकारी उद्घोष है –आज भी इतना साहस करने वाले कवि -संत मुश्किल से ही मिलेंगे . मुस्लिम परिवार में पलने वाले कबीर सिर्फ हिन्दू पाखण्ड और अवैज्ञानिक कुरीतियों ,कर्मकांड पर ही नहीं बोलते ,बल्कि मुस्लिम संप्रदाय के पाखण्ड पर भी उतनी निर्ममता से प्रहार करते है –
कांकर -पांथर जोड़कर महजिद लई बनाय ,ता चढ़ मुल्ला बांग दे , क्या बहरा हुआ खुदाय
हिन्दुओं की कुरीतियों पर चोट करते हुए मूर्तिपूजा का विरोध करते है –
पाथर पूजन हरी मिलें तो में पूजूँ पहाड़ , ताके से चाकी भली पीस खाय संसार

शोषण -अत्याचार करने वालो को कबीर सावधान करते है –

माटी कहे कुम्हार से , तू क्यों रुंधे मोय
एकदिन ऐसा आएगा ,में रुधुन्गी तोय

–निर्बल को ना सताइये ,

जाकि मोटी हाय

मरी खाल सी श्वांस ज्यो

,लोह भसम हो जाय

बकरी पाती खात है ,

हरदिन होत हलाल ,


जो जन बकरी खात है,

उनको कौन हवाल