Sunday, 7 October 2018

1)

दीवारों के भी कान होते हैं यही तो है कहावत
उस हाथी से डरिये जिसपे बैठा न हो महावत.

2)
मेरी वे हरकते जो कभी तुम्हें बेहद पसंद थी
उन्ही बातों से अब तुम्हें दिक्कत है क्या किया जाए.
वो शख्स जिसके लहजे से दिखा करती थी कभी बेबाकी
वही अब तर्क गढ़ता है मार्क्सवादी क्या किया जाए
उसे करवट बदलकर अब नहीं सोने की आदत है
वह अक्सर अब झाड़ता है लफ्फाजी क्या किया जाए
बहुत सीधा सरल था वह हमारे बचपने में
बुढ़ापे में हो गया है बदमाश पाज़ी क्या किया जाए
3)

गजब का यह अहंकार है 
दर्पण के पहले दीवार है.
4)
कम्युनिस्टों का बहुत पुराना फंडा
सलेक्टिव चुप्पी और सेलेक्टिव विरोध 
जब अपनी गलती हो तो दूसरों के सिर पर फोड़ो अंडा. .

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