++++++++++ इस देश में पाखंडियों की पूरी टीम है और हर पाखंडी के पीछे लाखों की भीड़ है भीड़ को बेवकूफ बनाना है आसान तुम्हें बेवकूफ बनाया जा रहा है नामुमकिन है भीड़ को यह समझाना |
पाखंडियों की पूरी टीम है इस देश में और हर पाखंडी के पीछे लाखों की भीड़ है भीड़ को बेवकूफ बनाना है आसान तुम्हें बेवकूफ बनाया जा रहा है नामुमकिन है भीड़ को यह समझाना |
कबीर और नजीर पर चर्चा करने से पहले आज की वास्तविकता से परिचित होना आवश्यक है | नाशाद कानपुरी ( मेरे बहनोई ) उर्दू के शायर उनकी कुछ गजलों का अनुवाद करने का ख़याल मुझे आया तो मैंने अपने परिचित सभी मुस्लिम भाइयों से मुलाकात की लेकिन यह जानकार मुझे आश्चर्य हुआ की उनमे से कोई भी उर्दू पढ़ना नहीं जानता था सभी ने इस काम को करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की | वर्तमान पीढ़ी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने के कारण हि...ंदी के किसी साहित्यकार या कवि का नाम तक नहीं जानती ,हिंदी लिखना वे जानते ही नहीं हैं | सच तो यह है की उर्दू और हिंदी दोनों को अंग्रेजी लील गयी और हमें पता ही नहीं चला | हिंदी की रोटी खाने वाले भी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में ही पढ़ने भेजते हैं ,यह सत्य अब छिपा नहीं है | अब कबीर को उर्दू में पढ़ाया जाए या नजीर को हिंदी में इससे क्या कोई फर्क पड़ने वाला है | आज़ादी के इतने बरसों बाद भी हम कबीर को नजीर नहीं बना सके और नजीर को कबीर का दर्जा नहीं दिला सके | अब आप करते रहिये बहस |
अगर चाहते हो ऐसी नींद
जिसमें न सपने हों न अपने हो न दुश्मन हों न हों दोस्त
तो कोशिश करो कि
किसी पर भी
हाँ किसी पर भी
तिनके भर का भी दबाव
तुम्हारी वजह से न हो
तुम्हारे ख्वाबों से भी
बेहतर होगी तुम्हारी नींद |
+++++++++++++ तुम सोचती होगी तुम्हारे स्पर्श की कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती | तुम्हारा स्पर्श मुझे गेरुए वस्त्र पहना जाता है गेरुए वस्त्रों की मेरे मन पर जो संस्कारगत प्रतिक्रिया होती है मैं उसे नकार नहीं पाता हूँ कुछ क्षणों के लिए सच,मैं सन्यासी हो जाता हूँ |
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गुरु ऐसे रहे कहाँ कि उन्हें याद किया जाए उन्हें मौक़ा लगे तो गुरु दक्षिणा के नामपर केवल अंगूंठा ही नहीं सारी उंगलियाँ भी चट कर जाए | उनसे पहले कहिये कि एकलव्य का अंगूठा लौटाएं तो हम धूम-धाम से गुरुपर्व मनाएं |
================ दर्द की बातें करना दर्द को झेलना और दर्द को देखना |
दर्द की बातें कभी की हैं बहुत दर्द को झेला नहीं दर्द को देखा है बहुत करीब से |
दर्द को झेलता हुआ आदमी अगर अपना रकीब नहीं है कितना त्रासद होता है दर्द को देखना करीब से |
Friday, 19 July 2013
आजादी से पहले-- एक ऊँगली थी जो टोकती थी एक दीवार थी जो रोकती थी
आज़ादी के बाद--- दीवार हमने लाँघ ली है ऊँगली हमने तोड़ दी है
अब न कोई रोकता है और न कोई टोकता है
जीवन भर पुण्य अब करता है कौन ? अब वहां कोई नहीं आता स्वर्ग में पसरा है सन्नाटा नरक के दरवाजे पर डाल दिया गया है बहुत बड़ा ताला पाप के सुख से अब कोई वंचित नहीं रहा |
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अक्सर लोग कुछ पंक्तियाँ लिखते हैं और फिर कहते हैं
(लिखी जा रही एक कविता से )
कविता को ब्यूटी पार्लर भेजकर सजाने सवाँरने का यह सिलसिला नया नया सा है देखते नहीं हो तुम आज का कवि कितना थका थका सा है |
कविता अगर आज और अभी नहीं लिखी गयी तो समझ लो मछली हाथ से फिसल गयी |
हर माँ का जवान चेहरा उसकी पुत्री से मिलता है और हर पुत्री मुकम्मल कविता है | यह बात न माँ जानती है और न उसकी पुत्री उसे कविता लिखने के काम में लगा दिया जाता है और कविता जब खुद कविता लिखती है कितनी बेढंगी लगती है |
+++++++++++++ रोको मत सपनों को आने दो बसने दो आँखों में बेख़ौफ़ | वे लौट कर नहीं आयेंगे गिर गए आँख से जो आंसूं खामोश | जो हैं सत्ता के नशे में मदहोश वे नहीं सुनेंगे तुम्हारी किसी भी बात को उन्हें जगाने के लिए तुम्हें पैदा करना होगा अपने भीतर सच्चा आक्रोश | वह आक्रोश जो बुझ जाता है मोमबत्तियां बुझ जाने के साथ मुक्ति पाना है तुम्हें उस लुच्चे आक्रोश से |
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मौन को भाषा बताकर
तुम
व्यस्त हो गए संवाद में
अपरिचित के साथ
परिचय की भूमिका लिखने में
(मुझे दिए गए सारे मौन
आश्वासनों को भुलाकर )
लो
सारे आश्वासन
( जो तुमने मुझे दिए थे )
थूक कर लौटाता हूँ
थूक को परिचय की चिकनाहट
महसूसने वाले
क्या यह तुम्हारा
महसूसा हुआ सच है ?
या किसी पुरुष के जिस्म का स्वाद |
जिस्म को मनाने और लुभाने में खर्च हो गयी पाई पाई रूह रूठ कर जाती है तो जाने दो | हमें तो आदत है "खिड़कियाँ" बंद कर देने की रूह को मौत आती है तो आने दो |
हमारे पूर्वजों ने सेवा के साथ मेवा को जोड़कर वास्तव में बहुत समझदारी दिखाई ,सेवा के साथ मेवा का मेलजोल सदियों पुराना है यह ख्याल ही अंततोगत्वा हमें सेवा करने के लिए प्रेरित तो करता है,कुछ मिले न मिले परलोक तो सुधरता ही है |
बेटू तुम्हारे कन्धों पर न पहाड़ों का उगना रोक सकता हूँ और न तुम्हें अपने पैरों पर चलने से | इन पहाड़ों को अपने कन्धों पर लिए लिए ही तुम्हे चलना होगा | पहाड़ों का बोझ बर्दाश्त कर सको इसके लिए बेहतर होगा इन पहाड़ों पर ही कहीं तुम अपना "घर" बना लो |
प्रत्येक बुद्धिजीवी, लेखक साहित्यकार की पहली और अंतिम ख्वाईश खुद पे सेक्युलर होने का ठप्पा लगवाना होती है इसके लिए वह कुछ भी कर सकता है ,अपने सारे कपड़े उतारकर नंगा हो सकता है या सामने वाले के सारे कपड़े उतारकर उसे सरे राह नंगा भी कर सकता है | और जो लोग सेक्युलर होने का प्रमाण पत्र बांटते हैं वे निश्चित ही सेक्युलर नहीं हैं ,रोज रोज मुखौटे बदलने वाले मुखौटों के व्यापारी ---- इस देश की असली समस्या यह तथाकथित बुद्धिजीवी ही हैं ,बीन की आवाज सुना नहीं की ठुमक ठुमक कर नाचने लगते हैं | नाचना इनका सबसे पसंदीदा शगल है | यह जो बीन बजाता है असली गुनहगार है और उसे पहचानने का शऊर हमें कब आयेगा ?
Sunday, 14 July 2013
पुरुष जब भी स्त्री को कंधे पर उठाता है गिराने के लिए ही उठाता है | मैं जानता हूँ मेरी इस बात से न स्त्रियाँ सहमत होंगी और न ही पुरुष | सबके अपने अपने स्वार्थ और सब अपने अपने स्वार्थ सिद्ध करने में हैं संलग्न |
लोग हमें प्यार करें ,लोग हमारी ओर आकर्षित हों इसलिए अपने आप को बिकाऊ माल की तरह प्रस्तुत करना मैं कतई इसे स्त्री की अच्छाई के रूप में मानने के लिए तैयार नहीं हूँ | स्त्री हो या हो पुरुष सबकी अपनी अपनी व्यापारिक द्रष्टि होती है और मेरा मानना है स्त्री को अपनी व्यापारिक द्रष्टि को और विकसित करने की जरूरत है |
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मेरे पैदा होने की तारीख
माँ नहीं जानती
माँ कहती है
बस इतना याद है कि
तू पितरपक्ष में
पैदा हुआ था
तेरे पिता ने पुरखों को
सिर्फ एक दिन पानी दिया था
फिर उन्हें
पानी नहीं दिया गया |
अँधेरे में उस पार खड़ा
मेरा पिता
भूखा और उदास है
मेरी प्यास
मेरे पुरखों कि प्यास है |
इस नन्हें पौधे को
इसी प्यास ने रोपा था
माँ इसे पौधा नहीं समझती
कहती है
तूने पुरखों को जना है
तू अपने पितरों का पिता है |
Wednesday, 10 July 2013
किसी भी खिले हुए फूल को देखकर मैं उदास हो जाता हूँ ,हाथ बढ़ाता हूँ और मुरझा जाने से पहले ही उस फूल को तोड़ लेता हूँ अनजाने ही फूल की राह में कुछ कदम कम कर देता हूँ |
+++++++++++++++ भाषा मुझे मिली एक बुर्राक सफ़ेद साड़ी में एक नजर में मुझे वह विधवा सी लगी विधवा को जब कोई देखता है गलत नज़र से देखता है उन्होंने वादा किया गलत नज़र से बचाने का जिंदगी भर साथ निभाने का अपनी खोली छोड़कर वह उसके घर रहने आई उसने सौंप दिए सारे मोती कर दी झोली खाली तबसे वे सफेदपोश खा रहे हैं उसकी दलाली उस विधवा की सफ़ेद बुर्राक साड़ी कर दी मैली काली काली | अब जब भी भाषा मुझे मिलेगी तो उसे समझाउँगा छोड़ दो शालीनता अब और दो उन्हें भद्दी भद्दी गाली |
+++++++++++++ तुमने कहा- "मौन समस्त भाषाओँ की भाषा है " और मैं कुछ, बहुत कुछ कहते कहते मौन हो गया वह सब अनकहा एक सागर मेरे भीतर रोता है मौन थक कर अन-अभिव्यक्त सो जाता है . मौन मुझको तुम तक संप्रेषित नहीं कर पा रहा है मुझे भाषा चाहिए |
+++++++++++++++++ सच न तुम जानते हो न हम जानते हैं दोनों ने ही अपने अपने हाथों में एक झूट पकड़ रखा है और दोनों ही अपने अपने झूट को सच साबित करने में हैं व्यस्त | सबका अपना अपना सच तुम्हारा सच तुम्हारे लिए मेरा सच मेरे लिए फिर क्यों यह गिले शिकवे ?
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एक ही से कई चेहरे
मुझे घेर लेते हैं
डराते हैं ,धमकाते हैं
ये चेहरे
बिना पैरों के
लम्बी यात्राओं पर
निकल जाते हैं
और लौट आते हैं
बिना किसी थकान के
घेर लेते हैं उस आदमी को
जिसका चेहरा
इनके चेहरों से नहीं मिलता |
मैं जब जब
इन चेहरों के साथ
पैरों को जोड़ने की बात सोचता हूँ
चेहरे भागने लगते हैं |
मैं थकान महसूस करता हूँ
( यात्राएं करता हूँ )
जब
एक ही से तमाम चेहरे
बिना पैरों के मुझे घेर लेते हैं |