Tuesday, 30 July 2013

जो जाल बुनते हैं
सबसे पहले जाल में
वे खुद फंसते हैं
और उन्हें यह सुविधा
जब चाहें जाएँ
और जब चाहें आएँ
नहीं मिलती

Sunday, 28 July 2013

नाशाद कानपुरी की एक ग़ज़ल जिसका अनुवाद मेरे मित्र इसरार गुनेश ने किया है

जब तसव्वुर में उनको लाता हूँ
दोनों आलम को भूल जाता हूँ,

उफ़ रे मजबूरियां मुहब्बत की
चोट खाता हूँ, मुस्कुराता हूँ,

जानता हूँ मआले इश्क़ मगर
जानकर भी फरेब खाता हूँ,

सच बता मेरे भूलने वाले
कभी तुझको भी याद आता हूँ,

तेरी जादूबयानियों की क़सम
तेरी बातों में आ ही जाता हूँ,

ख़ार दामन पकड़ ही लेते हैं
लाख 'नाशाद' मैं बचाता हूँ.."

नाशाद कानपुरी
सन १९४८ ई.
 

श्रद्धा के साथ

++++++++++
इस देश में
पाखंडियों की पूरी टीम है
और हर पाखंडी के पीछे
लाखों की भीड़ है
भीड़ को बेवकूफ बनाना है आसान
तुम्हें बेवकूफ बनाया जा रहा है
नामुमकिन है भीड़ को यह समझाना |
पाखंडियों की
पूरी टीम है इस देश में
और हर पाखंडी के पीछे
लाखों की भीड़ है
भीड़ को बेवकूफ बनाना है आसान
तुम्हें बेवकूफ बनाया जा रहा है
नामुमकिन है
भीड़ को यह समझाना |
 

Saturday, 27 July 2013

कबीर और नजीर

कबीर और नजीर पर चर्चा करने से पहले आज की वास्तविकता से परिचित होना आवश्यक है | नाशाद कानपुरी ( मेरे बहनोई ) उर्दू के शायर उनकी कुछ गजलों का अनुवाद करने का ख़याल मुझे आया तो मैंने अपने परिचित सभी मुस्लिम भाइयों से मुलाकात की लेकिन यह जानकार मुझे आश्चर्य हुआ की उनमे से कोई भी उर्दू पढ़ना नहीं जानता था सभी ने इस काम को करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की | वर्तमान पीढ़ी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने के कारण हि...ंदी के किसी साहित्यकार या कवि का नाम तक नहीं जानती ,हिंदी लिखना वे जानते ही नहीं हैं | सच तो यह है की उर्दू और हिंदी दोनों को अंग्रेजी लील गयी और हमें पता ही नहीं चला | हिंदी की रोटी खाने वाले भी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में ही पढ़ने भेजते हैं ,यह सत्य अब छिपा नहीं है | अब कबीर को उर्दू में पढ़ाया जाए या नजीर को हिंदी में इससे क्या कोई फर्क पड़ने वाला है | आज़ादी के इतने बरसों बाद भी हम कबीर को नजीर नहीं बना सके और नजीर को कबीर का दर्जा नहीं दिला सके | अब आप करते रहिये बहस |

गुनाह सपनों के

गनीमत है
सपनों के गुनाह
गुनाह नहीं होते
वरना हम तो
बरसों से जेल में
सड़ रहे होते

Friday, 26 July 2013

नींद

अगर चाहते हो ऐसी नींद
जिसमें न सपने हों
न अपने हो
न दुश्मन हों न हों दोस्त   
तो कोशिश करो कि
किसी पर भी
हाँ किसी पर भी
तिनके भर का भी दबाव
तुम्हारी वजह से न हो
तुम्हारे ख्वाबों से भी
बेहतर होगी तुम्हारी नींद |

Thursday, 25 July 2013

दूधवाला

दूधवाला
दूध में पानी मिलाए
या पानी में दूध
क्या फर्क पड़ता है
आप दूध को पानी
और पानी को दूध समझकर पीजिए |
दूधवाला
दूध में पानी मिलाए
या पानी में दूध
क्या फर्क पड़ता है
आप दूध को पानी
और पानी को दूध समझकर पीजिए |
बेटा विदेश में
माँ-बाप देश में 
सन्यासी के भेष में

Tuesday, 23 July 2013

वयस्क प्रेम से पहले

+++++++++++++
तुम सोचती होगी
तुम्हारे स्पर्श की
कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती |
तुम्हारा स्पर्श
मुझे गेरुए वस्त्र पहना जाता है
गेरुए वस्त्रों की
मेरे मन पर
जो संस्कारगत प्रतिक्रिया होती है
मैं उसे नकार नहीं पाता हूँ
कुछ क्षणों के लिए
सच,मैं सन्यासी हो जाता हूँ |

११/१२/१९७८

Monday, 22 July 2013

हम तो बन्दर हैं

+++++++++++
एक ज़माना था
हम भी समझते थे
कि हम सिकंदर हैं |
आईना चीखता नहीं
मुस्कराता है और
हम देखते है कि
हम तो बन्दर हैं |

Sunday, 21 July 2013

उन्हें आने दो पास

क्यों रोकते हो
उन्हें आने दो पास
आग के पास आयेंगे
घास फूस होंगे तो
खुद ही जल जायेंगे
और अगर लोहा हुए तो
अपना रूप
कुछ तो बदला हुआ पायेंगे |

गुरुपूर्णिमा पर विशेष

==============
गुरु ऐसे रहे कहाँ कि
उन्हें याद किया जाए
उन्हें मौक़ा लगे तो
गुरु दक्षिणा के नामपर 
केवल अंगूंठा ही नहीं
सारी उंगलियाँ भी चट कर जाए |
उनसे पहले कहिये कि
एकलव्य का अंगूठा लौटाएं
तो हम धूम-धाम से गुरुपर्व मनाएं   |

Saturday, 20 July 2013

दर्द को देखना करीब से

================
दर्द की बातें करना
दर्द को झेलना
और दर्द को देखना |


दर्द की बातें
कभी की हैं बहुत
दर्द को झेला नहीं
दर्द को देखा है बहुत करीब से |

दर्द को झेलता हुआ आदमी
अगर अपना रकीब नहीं है 
कितना त्रासद होता है
दर्द को देखना करीब से  |

Friday, 19 July 2013

आजादी से पहले--
एक ऊँगली थी जो टोकती थी
एक दीवार थी जो रोकती थी
आज़ादी के बाद---
दीवार हमने लाँघ ली है
ऊँगली हमने तोड़ दी है
अब न कोई रोकता है
और न कोई टोकता है

Thursday, 18 July 2013

राजेश जोशी की एक कविता पढ़कर

जीवन भर पुण्य
अब करता है कौन ?
अब वहां कोई नहीं आता
स्वर्ग में पसरा है सन्नाटा
नरक के दरवाजे पर
डाल दिया गया है
बहुत बड़ा ताला
पाप के सुख से
अब कोई वंचित नहीं रहा |

लिखी जा रही एक कविता से

+++++++++++
अक्सर लोग
कुछ पंक्तियाँ लिखते हैं
और फिर कहते हैं


(लिखी जा रही एक कविता से )
कविता को
ब्यूटी पार्लर भेजकर
सजाने सवाँरने का यह सिलसिला
नया नया सा है
देखते नहीं हो तुम
आज का कवि
कितना थका थका सा है |
कविता
अगर आज और अभी
नहीं लिखी गयी
तो समझ लो
मछली हाथ से फिसल गयी |  

Wednesday, 17 July 2013

स्त्री है मुकम्मल कविता

हर माँ का
जवान चेहरा
उसकी पुत्री से मिलता है
और हर पुत्री
मुकम्मल कविता है |
यह बात
न माँ जानती है
और न उसकी पुत्री
उसे कविता लिखने के काम में
लगा दिया जाता है
और कविता जब खुद
कविता लिखती है
कितनी बेढंगी लगती है |

सच्चा बनाम लुच्चा

+++++++++++++
रोको मत
सपनों को आने दो
बसने दो आँखों में बेख़ौफ़ |
वे लौट कर नहीं आयेंगे
गिर गए आँख से जो आंसूं
खामोश |
जो हैं सत्ता के नशे में मदहोश
वे नहीं सुनेंगे
तुम्हारी किसी भी बात को
उन्हें जगाने के लिए
तुम्हें पैदा करना होगा
अपने भीतर सच्चा आक्रोश |
वह आक्रोश
जो बुझ जाता है
मोमबत्तियां बुझ जाने के साथ
मुक्ति पाना है तुम्हें
उस लुच्चे आक्रोश से |

नाटक जारी रहे


+++++++++++
एक कायर मजबूरी
मुझे बार बार
तुम तक खींच लाती है
और तुम
एक अनचाही दूरी के साथ
मिलती हो हर बार
स्वागत का यह कैसा नाटक है ?

दूरी
रिश्तों की परम्परा है
आओ निर्वाह करें
ताकि नाटक जारी रहे |


०६/०८/१९७९

परिचय की चिकनाहट

+++++++++++++++
मौन को भाषा बताकर
तुम
व्यस्त हो गए संवाद में
अपरिचित के साथ
परिचय की भूमिका लिखने में
(मुझे दिए गए सारे मौन
आश्वासनों को भुलाकर )
लो
सारे आश्वासन
( जो तुमने मुझे दिए थे )
थूक कर लौटाता हूँ
थूक को परिचय की चिकनाहट
महसूसने वाले
क्या यह तुम्हारा
महसूसा हुआ सच है ?
या किसी पुरुष के जिस्म का स्वाद  |

20/03/1979

रूह को मौत आती है

जिस्म को मनाने
और लुभाने में
खर्च हो गयी पाई पाई
रूह रूठ कर
जाती है
तो जाने दो |
हमें तो आदत है "खिड़कियाँ"
बंद कर देने की
रूह को
मौत आती है
तो आने दो |

Tuesday, 16 July 2013

सेवा के साथ मेवा

हमारे पूर्वजों ने सेवा के साथ मेवा को जोड़कर वास्तव में बहुत समझदारी दिखाई ,सेवा के साथ मेवा का मेलजोल सदियों पुराना है यह ख्याल ही अंततोगत्वा हमें सेवा करने के लिए प्रेरित तो करता है,कुछ मिले न मिले परलोक तो सुधरता ही है |

तुम्हारे कन्धों पर

बेटू
तुम्हारे कन्धों पर
न पहाड़ों का उगना
रोक सकता हूँ
और न तुम्हें
अपने पैरों पर चलने से |
इन पहाड़ों को
अपने कन्धों पर लिए लिए ही
तुम्हे चलना होगा |
पहाड़ों का बोझ
बर्दाश्त कर सको
इसके लिए बेहतर होगा
इन पहाड़ों पर ही कहीं
तुम अपना "घर" बना लो |

Monday, 15 July 2013

रोज रोज मुखौटे बदलने वाले मुखौटों के व्यापारी

प्रत्येक बुद्धिजीवी, लेखक साहित्यकार की पहली और अंतिम ख्वाईश खुद पे सेक्युलर होने का ठप्पा लगवाना होती है इसके लिए वह कुछ भी कर सकता है ,अपने सारे कपड़े उतारकर नंगा हो सकता है या सामने वाले के सारे कपड़े उतारकर उसे सरे राह नंगा भी कर सकता है | और जो लोग सेक्युलर होने का प्रमाण पत्र बांटते हैं वे निश्चित ही सेक्युलर नहीं हैं ,रोज रोज मुखौटे बदलने वाले मुखौटों के व्यापारी ---- इस देश की असली समस्या यह तथाकथित बुद्धिजीवी ही हैं ,बीन की आवाज सुना नहीं की ठुमक ठुमक कर नाचने लगते हैं | नाचना इनका सबसे पसंदीदा शगल है |
यह जो बीन बजाता है असली गुनहगार है और उसे पहचानने का शऊर हमें कब आयेगा ?

Sunday, 14 July 2013

पुरुष जब भी स्त्री को कंधे पर उठाता है गिराने के लिए ही उठाता है | मैं जानता हूँ मेरी इस बात से न स्त्रियाँ सहमत होंगी और न ही पुरुष | सबके अपने अपने स्वार्थ और सब अपने अपने स्वार्थ सिद्ध करने में हैं संलग्न |
लोग हमें प्यार करें ,लोग हमारी ओर आकर्षित हों इसलिए अपने आप को बिकाऊ माल की तरह प्रस्तुत करना मैं कतई इसे स्त्री की अच्छाई के रूप में मानने के लिए तैयार नहीं हूँ | स्त्री हो या हो पुरुष सबकी अपनी अपनी व्यापारिक द्रष्टि होती है और मेरा मानना है स्त्री को अपनी व्यापारिक द्रष्टि को और विकसित करने की जरूरत है |  

Friday, 12 July 2013

माँ कहती है ---


==========
मेरे पैदा होने की तारीख
माँ नहीं जानती
माँ कहती है 
बस इतना याद है कि
तू पितरपक्ष में
पैदा हुआ था
तेरे पिता ने पुरखों को
सिर्फ एक दिन पानी दिया था
फिर उन्हें
पानी नहीं दिया गया |
अँधेरे में उस पार खड़ा
मेरा पिता
भूखा और उदास है
मेरी प्यास
मेरे पुरखों कि प्यास है |
इस नन्हें पौधे को
इसी प्यास ने रोपा था
माँ इसे पौधा नहीं समझती
कहती है
तूने पुरखों को जना है
तू अपने पितरों का पिता है |

Wednesday, 10 July 2013

किसी भी खिले हुए फूल को देखकर मैं उदास हो जाता हूँ ,हाथ बढ़ाता हूँ और मुरझा जाने से पहले ही उस फूल को तोड़ लेता हूँ अनजाने ही फूल की राह में कुछ कदम कम कर देता हूँ |

Sunday, 7 July 2013

रथ को गति

++++++++++
रुका हुआ रथ
अनर्थ
रथ को गति दे दो |
मैं नहीं समझा
आप समझे इसका अर्थ ?

कदमताल करना
चलना नहीं होता |

वे खोजेंगे
कविता का अर्थ
जो सरे राह
कविता को नंगा करते हैं
और फिर उसके
अंगों को टटोल टटोल कर
कविता की व्याख्या करते हैं |

कविता अंधों का हाथी है |

अब जब मिलेगी भाषा

+++++++++++++++
भाषा मुझे मिली
एक बुर्राक सफ़ेद साड़ी में
एक नजर में मुझे
वह विधवा सी लगी
विधवा को जब कोई देखता है
गलत नज़र से देखता है
उन्होंने वादा किया
गलत नज़र से बचाने का
जिंदगी भर साथ निभाने का
अपनी खोली छोड़कर
वह उसके घर रहने आई
उसने सौंप दिए सारे मोती
कर दी झोली खाली
तबसे वे सफेदपोश
खा रहे हैं उसकी दलाली
उस विधवा की सफ़ेद बुर्राक साड़ी
कर दी मैली काली काली |
अब जब भी भाषा
मुझे मिलेगी तो उसे समझाउँगा
छोड़ दो शालीनता अब
और दो उन्हें भद्दी भद्दी गाली |

मुझे भाषा चाहिए


+++++++++++++
तुमने कहा-
"मौन समस्त भाषाओँ की भाषा है "
और मैं कुछ, बहुत कुछ
कहते कहते मौन हो गया
वह सब अनकहा एक सागर
मेरे भीतर रोता है
मौन थक कर अन-अभिव्यक्त 
सो जाता है .
मौन मुझको तुम तक
संप्रेषित नहीं कर पा रहा है
मुझे भाषा चाहिए |

Tuesday, 2 July 2013

सबका अपना अपना सच


+++++++++++++++++
सच
न तुम जानते हो
न हम जानते हैं
दोनों ने ही
अपने अपने हाथों में
एक झूट पकड़ रखा है
और दोनों ही
अपने अपने झूट को
सच साबित करने में हैं व्यस्त |
सबका अपना अपना सच
तुम्हारा सच
तुम्हारे लिए
मेरा सच मेरे लिए
फिर क्यों
यह गिले शिकवे ?

मेरी पत्नी

मेरी पत्नी
मंदिर जाती है
मैं नहीं जाता |
न वो
मुझे आहत करती है
न मैं
उसे आहत करता |
एक दूसरे को
आहत किये बगैर भी
जीवन जिया जा सकता |  

चेहरों के बीच


==========
एक ही से कई चेहरे
मुझे घेर लेते हैं
डराते हैं ,धमकाते हैं
ये चेहरे
बिना पैरों के
लम्बी यात्राओं पर
निकल जाते हैं
और लौट आते हैं
बिना किसी थकान के
घेर लेते हैं उस आदमी को
जिसका चेहरा
इनके चेहरों से नहीं मिलता |
मैं जब जब
इन चेहरों के साथ
पैरों को जोड़ने की बात सोचता हूँ
चेहरे भागने लगते हैं |
मैं थकान महसूस करता हूँ
( यात्राएं करता हूँ )
जब
एक ही से तमाम चेहरे
बिना पैरों के मुझे घेर लेते हैं |