Saturday, 27 July 2013

कबीर और नजीर

कबीर और नजीर पर चर्चा करने से पहले आज की वास्तविकता से परिचित होना आवश्यक है | नाशाद कानपुरी ( मेरे बहनोई ) उर्दू के शायर उनकी कुछ गजलों का अनुवाद करने का ख़याल मुझे आया तो मैंने अपने परिचित सभी मुस्लिम भाइयों से मुलाकात की लेकिन यह जानकार मुझे आश्चर्य हुआ की उनमे से कोई भी उर्दू पढ़ना नहीं जानता था सभी ने इस काम को करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की | वर्तमान पीढ़ी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने के कारण हि...ंदी के किसी साहित्यकार या कवि का नाम तक नहीं जानती ,हिंदी लिखना वे जानते ही नहीं हैं | सच तो यह है की उर्दू और हिंदी दोनों को अंग्रेजी लील गयी और हमें पता ही नहीं चला | हिंदी की रोटी खाने वाले भी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में ही पढ़ने भेजते हैं ,यह सत्य अब छिपा नहीं है | अब कबीर को उर्दू में पढ़ाया जाए या नजीर को हिंदी में इससे क्या कोई फर्क पड़ने वाला है | आज़ादी के इतने बरसों बाद भी हम कबीर को नजीर नहीं बना सके और नजीर को कबीर का दर्जा नहीं दिला सके | अब आप करते रहिये बहस |

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