Monday, 15 July 2013

रोज रोज मुखौटे बदलने वाले मुखौटों के व्यापारी

प्रत्येक बुद्धिजीवी, लेखक साहित्यकार की पहली और अंतिम ख्वाईश खुद पे सेक्युलर होने का ठप्पा लगवाना होती है इसके लिए वह कुछ भी कर सकता है ,अपने सारे कपड़े उतारकर नंगा हो सकता है या सामने वाले के सारे कपड़े उतारकर उसे सरे राह नंगा भी कर सकता है | और जो लोग सेक्युलर होने का प्रमाण पत्र बांटते हैं वे निश्चित ही सेक्युलर नहीं हैं ,रोज रोज मुखौटे बदलने वाले मुखौटों के व्यापारी ---- इस देश की असली समस्या यह तथाकथित बुद्धिजीवी ही हैं ,बीन की आवाज सुना नहीं की ठुमक ठुमक कर नाचने लगते हैं | नाचना इनका सबसे पसंदीदा शगल है |
यह जो बीन बजाता है असली गुनहगार है और उसे पहचानने का शऊर हमें कब आयेगा ?

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